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Wednesday, 19 October 2011

चाँद आहें भरेगा-फूल बने अंगारे-१९६३

चाँद को देख के जनता जनार्दन आहें भरती है। इस गीत में चाँद के आहें
भरने का जिक्र है। चाँद आहें क्यूँ भरेगा ये जानने के लिए सुनें पूरा गीत ।
बहुत खूबसूरत गीत है ये सुनने और देखने में। गीत शुरू होता है माला सिन्हा
के भावपूर्ण चेहरे को दिखाते हुए। आम दर्शक/श्रोता जो शायद राजेंद्र कुमार या
दिलीप कुमार को देखना चाहता है हर रोमांटिक गीत में उसको जोर का झटका
धीरे से लगता है राजकुमार की शक्ल देख के।

कुछ भी हो, गीत एक हिट गीत है और इसमें माला सिन्हा ने जो कमसिन और
अर्ध परिपक्व कन्याओं जैसे भाव चेहरे पर लाये हैं उससे आज की पीढ़ी की
कन्याओं, बालाओं, युवतियों को थोड़ा सबक लेना चाहिए कि शर्माया-वर्माया
कैसे जाये।

गीत में चाँद से आहें भराई हैं आनंद बक्षी साहब से और उन्हें धुन पर तैराया है
संगीतकार बन्धुओं कल्याणजी आनंदजी ने।



गीत के बोल:

चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे

ऐसा चेहरा हैं तेरा
जैसे रोशन सवेरा
जिस जगह तू नहीं है
उस जगह है अँधेरा
ऐसा चेहरा हैं तेरा
जैसे रोशन सवेरा
जिस जगह तू नहीं है
उस जगह है अँधेरा

कैसे फिर चैन तुझ बिन
तेरे बदनाम लेंगे
कैसे फिर चैन तुझ बिन
तेरे बदनाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे

चाँद आहें भरेगा

आँख नाजुक सी कलियाँ
बात मिसरी की डालियाँ
होंठ गंगा के साहिल जुल्फें
जन्नत की गलियाँ
आँख नाजुक सी कलियाँ
बात मिसरी की डालियाँ
होंठ गंगा के साहिल जुल्फें
जन्नत की गलियाँ

तेरी खातिर फरिश्तें
सर पे इल्जाम लेंगे
तेरी खातिर फरिश्तें
सर पे इल्जाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे

चाँद आहें भरेगा

चुप न होगी हवा भी
कुछ कहेगी घटा भी
और मुमकिन है तेरा
जिक्र कर दे खुदा भी
चुप न होगी हवा भी
कुछ कहेगी घटा भी
और मुमकिन है तेरा
जिक्र कर दे खुदा भी

फिर तो पत्थर भी शायद
जफ्त से काम लेंगे
फिर तो पत्थर भी शायद
जफ्त से काम लेंगे

चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे

चाँद आहें भरेगा
...................................
Chand aahen bharega-Phool bane angaare-1963

Tuesday, 18 October 2011

मैं आशिक हूँ बहारों का-आशिक १९६२

बिलकुल राज कपूराना गीत है ये। कुछ गीत ख़ास राज कपूर के लिए रचे
गये थे उनमें से एक है फिल्म आशिक का ये शीर्षक गीत। इस फिल्म से पूर्व
में आप ४ गीत सुन चुके हैं इस ब्लॉग पर। किसी मोहतरमा के ख्याल में
आशिक होना आम बात है। इसमें कुदरत के नज़रों के साथ साथ कई और
पहलुओं के साथ आशिकी का जिक्र है जो गीत को अलग बनाता है।

इस तरह के गीत राज कपूर कि फिल्मों में कई हैं। इन सभी गीतों में वे इधर
उधार घुमते हुए बेफिक्र से गीत गेट दिखाई देते हैं। फिल्म आवारा के शीर्षक
गीत का ही उदाहरण ले लीजिये। ऐसे प्रेरणादायी गीत उनकी फिल्मों की
विशेषता होते थे। ऐसे गीतों को रचने के लिए गीतकार शैलेन्द्र का एक बार
फिर से तह-ए-दिल शुक्रिया।



गीत के बोल:

मैं आशिक हूँ बहारों का, नज़रों का, फिजाओं का, इशारों का
मैं आशिक हूँ बहारों का नज़रों का, फिजाओं का, इशारों का
मैं मस्ताना मुसाफिर हूँ जवां धरती के अनजाने किनारों का
मैं आशिक हूँ बहारों का

सदियों से जग में आता रहा मैं
नए रंग जीवन में गता रहा मैं
नए भेस में नित नए देश मैं

मैं आशिक हूँ बहारों का नज़रों का, फिजाओं का,इशारों का
मैं मस्ताना मुसाफिर हूँ जवां धरती के अनजाने किनारों का
मैं आशिक हूँ बहारों का

कभी मैंने हंस के दीपक जलाए
कभी बन के बादल आंसू बहाए
मेरा रास्ता प्यार का रास्ता

मैं आशिक हूँ बहारों का नज़रों का, फिजाओं का, इशारों का
मैं मस्ताना मुसाफिर हूँ जवां धरती के अनजाने किनारों का
मैं आशिक हूँ बहारों का

चला गर सफ़र को कोई बेसहारा
तो मैं हो लिया संग दिए एक तारा
गाता हुआ दुःख भूलता हुआ

मैं आशिक हूँ बहारों का नज़रों का, फिजाओं का, इशारों का
मैं मस्ताना मुसाफिर हूँ जवां धरती के अनजाने किनारों का
मैं आशिक हूँ बहारों का

..........................................
Main aashiq hoon baharon ka-Aashiq 1962

Saturday, 3 September 2011

क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें-छैला बाबू १९६७

फिल्म छैला बाबू से एक मधुर गीत आपको सुनवाया था पहले। अब सुनवाते हैं
एक मधुर युगल गीत जिसमें नायक नायिका की झुकी हुई पलकों के बारे में
प्रश्न कर रहा है। इन्टरनेट की दुनिया जानकारियों के खजाने से भरी पड़ी है। कई
श्रोता और दर्शक ऐसे भी मिलेंगे आपको जिनके पास दुर्लभ जानकारी होती है। ये
बात और है कि इन दुर्लभ जानकारियों को जगह जगह से इकठ्ठा कर के कुछ चंपुओं
ने सारा श्रेय लेने के लिए कुछ वेबसाइट बना मारी हैं जिन्हें देख के ऐसा लगता है
मानो उन्होंने पैदा होते साथ ही पी एच डी कर मारी हो. इनमें से अधिकतर चंपुओं
की साईट आंग्ल भाषा में है।

गीत और फिल्म के बारे में चर्चा कि जाए। यू ट्यूब पर गीत के नीचे दो कमेन्ट लिखे
हैं जिनसे ये पता चलता है कि इस फिल्म के नायक वही हैं-सलीम जावेद की जोड़ी वाले
सलीम. गौरतलब है पिछले गीत में फिल्म के दुसरे नायक थे-सुबिराज। इस गीत में
सलीम के साथ नायिका हैं जेब रहमान। फिल्म के निर्माता नवसारी निवासी हैं और वहां
के एक सिनेमा के मालिक हैं जैसा कि एक कमेन्ट में उल्लेख है। जहाँगीर टॉकीज़ या
भारत सिनेमा बनवाया था नौशेरवां बारिया ने। सन १९५६ में फिल्म गणेश महिमा से
इसका व्यवसाय शुरू हुआ। जैसा कि विकी के लिंक पर कांतिभाई ने उल्लेख किया है-
गायक मोहम्मद रफ़ी ने इसके स्टेज पर एक लाइव शो भी किया सन १९५७ में जिसमें
उन्होंने प्यासा फिल्म जो कि उस समय रिलीज़ नहीं हुई थी, का एक गीत गा कर वहां
के श्रोताओं को अचंभित किया था। इस सिनेमा को बरसों तक रूसी और नवल नामक
दो भाइयों ने चलाया।

नेट पर उपलब्ध जानकारियों में फिल्म के निर्माता की जगह लिखा मिलेगा-आर. एच.
मुल्लन प्रोडक्शंस । अब ये आप खोजिये कि इस फिल्म का असली निर्माता कौन है ?

एक दिलचस्प बात और बताते चलें आपको. फिल्म के निर्देशक के. परवेज़ हैं जिन्होंने
अपना नाम बाद में कल्पतरु रख लिया और कई परिवारिक फ़िल्में बनाई ८० के दशक
में. उनकी अधिकांश फिल्मों में आपको लक्ष्मी प्यारे का संगीत मिलेगा.




गीत के बोल:

क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें
क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें मेरी जाँ ये बात क्या है
क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें मेरी जाँ ये बात क्या है
मेरे दिल मैं कैसे कह दूँ मुझे प्यार हो गया है
क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें

ये घटा भी आज हम पर मोती लुटा रही है
हमें देख कर कली भी सर को झुका रही है
मेरे दिल की बात सुनने ये हवा भी आ रही है
ये गगन भी देखता है देखे तो हर्ज क्या है

क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें मेरी जाँ ये बात क्या है
मेरे दिल मैं कैसे कह दूँ मुझे प्यार हो गया है
क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें

ये शरम न हमसे कीजे हम भी तो हैं तुम्हारे
किरनों से माँग भर दें कर दो अगर इशारे
दिल गा रहा है नग़मा बस में नहीं हमारे
मौसम भी झूमता है झूमें तो हर्ज क्या है
मेरे दिल मैं कैसे कह दूँ मुझे प्यार हो गया है

क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें मेरी जाँ ये बात क्या है
मेरे दिल मैं कैसे कह दूँ मुझे प्यार हो गया है
क्यों झुकी-झुकी हैं पलकें
........................................
Kyun jhuki jhuki hai palken-Chhaila Babu 1967

Wednesday, 10 August 2011

मेरे ख़्वाबों में ख़यालों में छुपे-हनी मून १९६०

फिल्म हनी मून से एक गीत और सुनते हैं जो युगल गीत कहलाता

है । इसे गाया है लता मंगेशकर और मुकेश ने। गाया तो मुकेश ने है

और लता की आवाज़ में केवल 'हूँ हाँ' का प्रयोग किया है संगीतकार

सलिल चौधरी ने। उनको वैसे भी लता की आवाज़ को ऊंचे सुर में

निकलवाने का शौक रहा है। जो भी हो, इस गीत में जो 'हूँ हाँ' है वो

कर्णप्रिय लगती है। गीत एक नाव में फिल्माया गया है और इसे आप

नाव -गीत की श्रेणी में रख सकते हैं।



सुना जाता है कि ये गीत मनोज कुमार पर फिल्माया गया है। जब

किसी गीत का विडियो उपलब्ध नहीं होता यू ट्यूब पर तो ऐसी ही

पत्रकारी भाषा का प्रयोग करने की इच्छा जागृत हो जाती है। इस

गीत का विडियो सीधे आप देख पाएंगे यू ट्यूब पर ही क्यूंकि इसकी

एम्बेडिंग डिस्एबल की हुई है।















गीत के बोल:





मेरे ख़्वाबों में ख़यालों में छुपे

एक दिन मीत मेरे मेरी गली आप चले आएंगे

कभी तो होगी बहारों की नज़र

आएगी ऐसी लहर आर्ज़ू के फूल मुस्कुराएंगे



मेरे ख़्वाबों में ख़यालों में



मैं उनकी रँग भरी याद लिए खो सा गया

उनका हर ज़िक्र मेरा एक नया गीत बना

मेरे गीतों के मचलते हुए स्वर

उनके आँगन में उतर उन्हें मेरे पास खींच लाएंगे





मेरे ख़्वाबों में ख़यालों में



हिरन की बन रही है चाल ये मद्होश नज़र

वो मेरे पास हैं दुनिया की नहीं मुझको खबर

दूर दुनिया से ज़माने से परे

चाँद तारों के तले हम भी एक आशियाँ बनाएंगे





मेरे ख़्वाबों में ख़यालों में



यकीन है मुझको मेरा प्यार न रूठेगा कभी

साज़-ए-दिल का कोई भी तार न टूटेगा कभी

दिल के इस तार की झनकार के संग

बढ़ते-बढ़ते ये कदम मँज़िलों को खुद ही पहुँच जाएंगे





मेरे ख़्वाबों में ख़यालों में छुपे

एक दिन मीत मेरे मेरी गली आप चले आएंगे

मेरे ख़्वाबों में ख़यालों में

.......................................

Mere khwabon mein khayalon mein-Honeymoon 1960

Tuesday, 2 August 2011

जाने न नज़र पहचाने जिगर-आह १९५३

भीगने के बाद कपडे उतार कर ड्रम में बैठ कर मधुर गीत कैसे गाया जाए
राज कपूर सिखा रहे हैं फिल्म आह के इस गीत में। उनके साथ नर्गिस की
जोड़ी है. लता और मुकेश की आवाज़ में ये सदाबहार युगल गीत सुनिए।
इसे भी हसरत जयपुरी ने लिखा है और धुन बनायीं है शंकर जयकिशन ने।
फिल्म बरसात के साथ १९४९ में शुरू हुयी शैलेन्द्र, हसरत, शंकर जयकिशन
की चौकड़ी की संगीतमय धमा-चौकड़ी ने काफी समय तक हिंदी फिल्म संगीत
जगत में अपना डंका बजाया ।




गीत के बोल:

जाने न नज़र पहचाने जिगर
ये कौन जो दिल पर छाया
मेरा अंग अंग मुस्काया
मेरा अंग अंग मुस्काया

आवाज़ ये किसकी आती है
जो छेड़ के दिल को जाती है
आवाज़ ये किसकी आती है
जो छेड़ के दिल को जाती है
मैं सुन के जिसे शर्मा जाऊँ
है कौन जो दिल में समाया
मेरा अंग अंग मुस्काया
मेरा अंग अंग मुस्काया

जाने न नज़र पहचाने जिगर
ये कौन जो दिल पर छाया
मुझे रोज़ रोज़ तड़पाया
मुझे रोज़ रोज़ तड़पाया

ढूँढेंगे उसे हम तारों में
सावन की ठण्डी बहारों में
ढूँढेंगे उसे हम तारों में
सावन की ठण्डी बहारों में
पर हम भी किसी से कम तो नहीं
क्यों रूप को अपने छुपाया
मुझे रोज़ रोज़ तड़पाया
मुझे रोज़ रोज़ तड़पाया

बिन देखे जिसको प्यार करूँ
गर देखूँ उस को जान भी दूँ
बिन देखे जिसको प्यार करूँ
गर देखूँ उस को जान भी दूँ
एक बार कहो ओ जादूगर
ये कौन सा खेल रचाया
मेरा अंग अंग मुस्काया
मेरा अंग अंग मुस्काया
..................................
Jaane na nazar-Aah 1953

बहारों ने मेरा चमन लूट कर-देवर १९६६

जिंदगी में बहुत कुछ सरप्राइज़ गिफ्ट सरीखा प्राप्त होता है। फिल्म में नायक
जिस युवती से प्रेम करता है उसकी शादी नायक के मित्र से हो जाती है।
कुछ कुछ धोखे वाली कहानी है। धोखा नायक का मित्र देता है । नायक
घटनाक्रम बदलते ही नायिका का देवर बन जाता है। अपनी भावनाओं को
वो गीत के माध्यम से कैसे व्यक्त कर रहा है सुनिए आनंद बक्षी के बोलों,
मुकेश की आवाज़ और रोशन के संगीत में। नायक हैं धर्मेन्द्र, दूल्हा बने हैं
देवेन वर्मा और नायिका हैं शर्मीला टैगोर । आनंद बक्षी के लेखन कौशल के
अगर आप कायल नहीं हैं तो इस गीत को ध्यान से एक बार सुन लीजिए।






गीत के बोल:

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
किसी ने चलो दुश्मनी की मगर
इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

मैं समझा नहीं ऐ मेरे हमनशीं
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये
के साक़ी ने लब से मेरे छीन कर
किसी और को जाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

मुझे क्या पता था कभी इश्क़ में
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं
खता हो गई मुझसे कासिद मेरे
तेरे हाथ पैगाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

खुदाया यहाँ तेरे इन्साफ़ के
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
सज़ा की जगह एक खतावार को
भला तूने ईनाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
....................................
Baharon ne mera chaman loot kar-Devar 1966

Friday, 29 July 2011

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे –पूरब और पश्चिम १९७०

पुरुष वर्ग के समर्पण की इन्तेहा, कुछ अतिशयोक्ति सा लगता
ये गीत अपवाद स्वरुप समाज में आपको कहानी रूप में कहीं न
कहीं ज़रूर मिल जायेगा. ऐसा नहीं है कि केवल नारी ही इंतज़ार
करती है, कहीं पुरुष भी प्रतीक्षा कर लिया करता है. फिल्म में
नायिका का चरित्र विलायत में रहने वाली पाश्चात्य सभ्यता में पली
बढ़ी युवती का है. नायक देसी परम्पराओं को निभाने वाला एक
“सादा जीवन उच्च विचार” के साथ देशप्रेम की भावना से ओत
प्रोत युवक है. अब इतने विवरण से आपको नायक को पहचानने
में दिक्कत नहीं होना चाहिए.

जैसा कि हिंदी फिल्मों की कहानी की अनिवार्य मांग है-नायक
को नायिका से प्रेम हो जाता है. अब नायिका को अपने रंग ढंग
में ढालने के लिए और उसे वापस देसी संस्कृति की ओर लाने
के प्रयास में नायक ये गीत गाता है.

गीत इन्दीवर का लिखा हुआ है और निस्संदेह इसे उनके द्वारा
रहित गीतों में से सर्वाधिक लोकप्रिय का दर्ज़ा भी प्राप्त है. गीत
कि गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता. नपा तुला सा
है ये और उतनी ही नपी तुली धुन बनायीं है कल्याणजी आनंदजी
ने जिसे स्वर मुकेश ने दिया है.






गीत के बोल:

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे –पूरब और पश्चिम १९७०
तडपता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए

अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं
बहुत चाहने वाले मिल जायेंगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम
कमल जितने चाहोगी खिल जायेंगे
दर्पण तुम्हें जब डराने लगे
जवानी भी दामन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा सर झुका है झुका ही रहेगा तुम्हारे लिए

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे

कोई शर्त होती नहीं प्यार में
मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया
नज़र में सितारे जो चमके ज़रा
बुझाने लगीं आरती का दिया
जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो
अंधेरों में अपने ही घिरने लगो
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
ये दीपक जला है जला ही रहेगा तुम्हारे लिए

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे
तडपता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए
...................................
Koi jab tumhara hriday tod de-Purab aur paschim 1970

Thursday, 28 July 2011

इब्तिदा-ए-इश्क में हम -हरियाली और रास्ता १९६२

आज फरियाली का नाश्ता करते हुए एक फिल्म का नाम याद आया
हरियाली और रास्ता. फिल्म सन १९६२ की है जनाब. गीत एक युगल
गीत है लता और मुकेश की आवाजों में. गीत हलके फुल्के मूड वाला
है जिसे अपनी अपनी फ्री इस्टाइल में गाया जा रहा है परदे पर. फैशनेबल
स्वेटर के साथ सरकारी दफ्तर के चपरासी की टोपी का कुछ अजीब सा
कोम्बिनेशन लिए नायक बर्फीले पहाड़ों में कामगार मजदूर सरीखी दिख
रही नायिका के साथ गीत गा रहा है. बर्फीले इलाकों में ऐसी टोपी पहने
शायद ही आप किसी को देखें. अब शायद आप समझ गए होंगे कि फिल्म
जगत में इस जुमले का प्रयोग ज्यादा क्यूँ होता है-"अलग हट के"
नायक नायिका अति गदगद हैं उसकी क्या वज़ह है इसके लिए आपको एक
बार फिल्म अवश्य देखना पड़ेगी.

गीत लिखा है हसरत जयपुरइ ने और इसकी धुन बनायीं है शंकर जयकिशन
ने. फिल्म के सबसे लोकप्रिय गीतों में इसकी गिनती होती है.





गीत के बोल:

इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम सारी रात जागे
अल्ला जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे
दिल में तेरी उलफ़त के बंधने लगे धागे,
अल्ला जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे

क्या कहूँ कुछ कहाँ नहीं जाए
बिन कहे भी रहा नहीं जाए
रात-रात भर करवट मैं बदलूँ
दर्द दिल का सहा नहीं जाए
नींद मेरी आँखों से दूर-दूर भागे,
अल्ला जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे

दिल में जागी प्रीत की ज्वाला
जबसे मैंने होश सम्भाला
मैं हूँ तेरे प्यार की सीमा
तू मेरा राही मतवाला
मेरे मन की बीना में तेरे राग जागे,
अल्ला जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे

तूने जब से आँख मिलाई
दिल से इक आवाज़ ये आई
चल के अब तारों में रहेंगे
प्यार के हम तो हैं सौदाई
मुझको तेरी सूरत भी चाँद रात लागे,
अल्ला जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे
....................................
Ibteda-e-ishq mein ham-Hariyali aur rasta 1962

Tuesday, 19 July 2011

ये दिल ले कर नज़राना-एक बार मुस्कुरा दो १९७२

फिर आ गया सन १९७२. क्या किया जाए, उस वर्ष बहुत से मधुर गीत
जो बने थे. एक और सुन लेते हैं. बहुत दिन से ओ. पी. नैयर के संगीत
वाले गीत नहीं सुने हैं. आज आपके लिए लिया है फिल्म 'एक बार मुस्कुरा
दो' से एक गीत. फिल्म के सभी गीत काफी दफे सुने गए हैं और ये नैयर
के सबसे सफल एल्बम में गिना जाता है. नैयर की खूबी थी कि वे एक
फिल्म के लिए धुनें बनाते तो ऐसी बनाते कि श्रोता सभी गीतों को सुने.
इस चक्कर में कभी कभी एक ही फिल्म के गीत सगे भाई बहनों जैसे
सुनाई देते जैसे कि उनकी एक हिट फिल्म फागुन के गीत हैं. काम चलाऊ
धुनें उनकी फिल्मों में ने के बराबर मिलेगी आपको. उनका गाने/हिट का
अनुपात कई समकालीनों से बेहतर है.

प्रस्तुत गीत कि विशेषता ये है कि ये मुकेश कि आवाज़ में है. मुकेश से
नय्यर ने बहुत कम गीत गवाए. रफ़ी के बाद उनकी पसंद महेंद्र कपूर रहे.
प्रस्तुत गीत में मुकेश के साथ आशा भोंसले की आवाज़ है जो नय्यर खेमे
कि प्रमुख गायिका रहीं.

फिल्म के नायक हैं देव मुखर्जी और नायिका हैं तनुजा. दोनों में से शायद
तनुजा बेहतर अभिनय कर लेती हैं. गीत किस्मत फिल्म के गीत की
याद ज़रूर ही दिलाएगा जिसमें संगीत नैयर का ही है. नायक महिला के
वेश में और नायिका पुरुष भेस में. गीत शमसुल हुदा बिहारी का लिखा
हुआ है.




गीत के बोल:


ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
आ आ आ आ, आ आ, आ आ आ आ

ये दिल ले कर नज़राना आ गया तेरा दीवाना
ये दिल ले कर नज़राना आ गया तेरा दीवाना
दिलबर जानी न देना दिल तोड़ तोड़ तोड़
दिलबर जानी न देना दिल तोड़ तोड़ तोड़

ये प्यार है गहरा सागर है डूब के तुझको जाना
ये प्यार है गहरा सागर है डूब के तुझको जाना
दिलबर जानी जा जा रे पल्ला छोड़ छोड़ छोड़
दिलबर जानी जा जा रे पल्ला छोड़ छोड़ छोड़


ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
नस-नस में है बिजली कहीं जल ना जाना
कहीं जल ना जाना, जल ना जाना
सोच समझकर हमसे ज़रा दिल टकराना
ज़रा दिल टकराना, दिल टकराना
राह प्यार की बड़ी कठिन है कहाँ चला मर जाने, ओ
दिलबर जानी जा जा रे पल्ला छोड़ छोड़ छोड़
दिलबर जानी जा जा रे पल्ला छोड़ छोड़ छोड़

ये दिल ले कर नज़राना आ गया तेरा दीवाना
दिलबर जानी न देना दिल तोड़ तोड़ तोड़
दिलबर जानी न देना दिल तोड़ तोड़ तोड़

ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
टूट पड़े ये बिजली तो क़िस्मत चमके
अरे क़िस्मत चमके, क़िस्मत चमके
आग में तप कर सोना और भी दमके
अरे और भी दमके, और भी दमके
हार-जीत की बात प्यार में चली किसे समझाने
ओ दिलबर जानी न देना दिल तोड़ तोड़ तोड़
दिलबर जानी न देना दिल तोड़ तोड़ तोड़

ये प्यार है गहरा सागर है डूब के तुझको जाना
दिलबर जानी जा जा रे पल्ला छोड़ छोड़ छोड़
दिलबर जानी जा जा रे पल्ला छोड़ छोड़ छोड़
.................................
Ye dil le ke nazrana-Ek baar muskura do 1972

Sunday, 17 July 2011

तेरी शोख नज़र का इशारा-पतंग १९६०

आपको सुनवाते हैं पतंग फिल्म से एक युगल गीत जो मुकेश और लता का गाया हुआ
है. इसके बोल लिखे हैं राजेंद्र कृष्ण ने और संगीत तैयार किया है चित्रगुप्त ने.
सन १९६० की फिल्म पतंग में राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा क्रमशः नायक नायिका
हैं.

एक समय था फिल्म देखने वाले ये कहते-राजेंद्र कुमार की फिल्म है इसमें गाने बढ़िया
होंगे. श्वेत श्याम युग की अधिकतर वे फ़िल्में जिनमें राजेंद्र कुमार ने अभिनय किया
मधुर गीतों से भरपूर होती थीं. सत्तर के दशक में ये धारणा थोड़ी बदलना शुरू हुयी.
राजेंद्र कुमार के जुबली कुमार बनने की प्रक्रिया में उनकी फिल्मों के संगीत का भी बड़ा
योगदान रहा है.

श्रेणी बनाने के शौकीनों के लिए सुझाव - इसे शोख नज़र गीत , नाव गीत कहा
जा सकता है.





गीत के बोल:


तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा

तेरी बाँहों का जब है सहारा
पिया मझधार भी है किनारा
तेरी बाँहों का जब है सहारा

तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा

निकले हैं राही मस्ती में डूबे
मंजिल का क्या है ,मिले न मिले
निकले हैं राही मस्ती में डूबे
मंजिल का क्या है ,मिले न मिले

तुम साथ हो तो किस्मत पे अपनी
शिकवे कहाँ के कहाँ के गीले

ओ जी हो
तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा

तेरी बाँहों का जब है सहारा
पिया मझधार भी है किनारा
तेरी बाँहों का जब है सहारा


एक ख्वाब सा है या है कहानी
कुछ है यकीन कुछ यकीन भी नहीं
एक ख्वाब सा है या है कहानी
कुछ है यकीन कुछ यकीन भी नहीं
हम तो ये जानें सच है या सपना
जो तुम नहीं हो तो हम भी नहीं

हो जी हो
तेरी बाँहों का जब है सहारा
पिया मझधार भी है किनारा
तेरी बाँहों का जब है सहारा

तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा
.........................
Teri shokh nazar ka ishara-Patang 1960

Monday, 11 July 2011

छोटी सी ये ज़िंदगानी रे-आह १९५३

गायक - मुकेश
गीतकार-शैलेन्द्र
संगीतकार -शंकर जयकिशन
फिल्म -आह
वर्ष-१९५३
श्रेणी-तांगा गीत

* परदे पर तांगे में गायक मुकेश स्वयं हैं.



गीत के बोल:

छोटी सी ये ज़िंदगानी रे
चार दिन की जवानी तेरी
हाय रे हाय
ग़म की कहानी तेरी

छोटी सी ये ज़िंदगानी रे
चार दिन की जवानी तेरी
हाय रे हाय
ग़म की कहानी तेरी

शाम हुई ये देश बीराना
तुझ को अपने बलम घर जाना,
सजन घर जाना
शाम हुई ये देश बीराना
तुझ को अपने बलम घर जाना,
सजन घर जाना
राह में मूरख मत लुट जाना,
मत लुट जाना

छोटी सी ये ज़िंदगानी रे
चार दिन की जवानी तेरी
हाय रे हाय
ग़म की कहानी तेरी

छोटी सी ये ज़िंदगानी रे
चार दिन की जवानी तेरी
हाय रे हाय
ग़म की कहानी तेरी

बाबुल का घर छूटा जाये
अखियन घोर अँधेरा छाये,
जी दिल घबराये
आँख से टपके दिल का खज़ाना
दिल का खज़ाना

छोटी सी ये ज़िंदगानी रे
चार दिन की जवानी तेरी
हाय रे हाय
ग़म की कहानी तेरी

छोटी सी ये ज़िंदगानी रे
चार दिन की जवानी तेरी
हाय रे हाय
ग़म की कहानी तेरी
...............................
Chhoti si ye zindagani-Aah 1953

Saturday, 2 July 2011

दर्पण को देखा-उपासना १९७१

थोड़ा साहित्यिक हुआ जाये फिर से ? कुछ संगीत प्रेमियों का
दोमुंहापन कभी कभी खटकता है मुझे। अगर 'आईना' बोलें तो
साहित्यिक नहीं होता मगर जब 'दर्पण' बोल दिया तो साहित्यिक
हो गया। दरअसल हम खिचड़ी भाषा युग में जी रहे हैं जिसकी
हिंगलिश ने भी कस के वाट लगा दी है जो धीरे धीरे कई किलोवाट
तक हो जाएगी।

गीत में, नायिका असमंजस में है-क्यूँ है-थोड़ा प्रकाश डालते हैं-
फिल्म उपासना में मुमताज़ संजय खान से प्रेम करती हैं।
संजय खान को मुमताज़ मजबूरीवश छोडती है जिसके लिए उस
दुष्ट महकमे के लोग ज़िम्मेदार होते हैं जिनके लिए वो अनजाने
में काम करती है। एक गुंडे की चम्पी करने के बाद जब वो भाग
रही होती है तभी फिरोज खान कि कार से टकरा जाती है। फिरोज
खान उसे घर ले आता है और उसकी देखभाल करता है । जब वो
ठीक हो जाती है तब उसे गीत सुनाता है। नायिका के ठीक होने की
प्रक्रिया में नायक उससे प्रेम करने लगता है। शराफत के ज़माने
का गीत है इसलिए नायक घुमा फिर के उससे अपने प्रेम का इज़हार
कर रहा है और अपनी बदनसीबी की गिला रो रहा है।

या तो नायिका किसी नए सम्बन्ध में नहीं उलझना चाहती या फिर
उसकी मानसिक स्तिथि नायक की भावनाओं को समझने लायक
नहीं हुई है। ज्यादा जाने के लिए देखें फिल्म उपासना।

मुकेश के सबसे लोकप्रिय गीतों में इसकी गिनती होती है । इसे लिखा
है इन्दीवर ने और इसकी धुन बनाई है कल्याणजी आनंदजी ने। गीत
में सरल हिंदी बोलों का समावेश है और ये उतना साहित्यिक नहीं जितना
की पब्लिक इसको बतलाती है। इसके अलावा इसमें उर्दू शब्द भी
बहुतेरे हैं।



गीत के बोल:

दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार

दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार

फूलों को देखा
तूने जब जब आई बाहर

एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं,
मुझे नहीं देखा एक बार

दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार

सूरज की पहली किरणों को
देखा तूने अलसाते हुए
सूरज की पहली किरणों को
देखा तूने अलसाते हुए
रातों में तारों को देखा
सपनो में खो जाते हुए

यूं किसी ना किसी बहाने
यूं किसी ना किसी बहाने
तूने देखा सब संसार
तूने देखा सब संसार

दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार

काजल की किस्मत क्या कहिये
नैनों में तुमने बसाया है
काजल की किस्मत क्या कहिये
नैनों में तुमने बसाया है
आँचल की किस्मत क्या कहिये
तुमने अंग लगाया है

हसरत ही रही मेरे दिल में
हसरत ही रही मेरे दिल में
बनूँ तेरे गले का हार
बनूँ तेरे गले का हार

दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार

फूलों को देखा
तूने जब जब आई बाहर

एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं,
मुझे नहीं देखा एक बार

दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
...............................
Darpan ko dekha-Upasana 1969

Saturday, 25 June 2011

तेरे होंठों के दो फूल-पारस १९७१

पारस फिल्म से तीसरा गीत पेश है जो कि एक युगल गीत है
मुकेश और लता की आवाजों में। होंठों को फूलों का दर्ज़ा प्रदान
किया है कुछ कवियों ने और गीत रचईताओं ने। पंखुड़ियों से
तुलना सामान्य विशेषण है लेकिन फूल कहना उसके दर्जे को
बढ़ाना है। वही हाल है जब नायिका आँखों के दो तारों की बात
करती है। गीतकार ने दोनों के लिए एक स्टार से विशेषण का
इस्तेमाल किया हैं। संतुलन ऐसे ही बनाया जाता है ।

प्यार अँधा होता है और बहरा होता है ये साबित करने के कुछ
प्रतीकों की ज़रुरत पढ़ती है कभी कभी। प्यार में हरी घास भी
पालक पनीर नज़र आने लग जाती है। ये वो खुश-खुमारी है
जिसके आगे अच्छे अच्छे पानी भर लेते हैं। प्यार में लॉजिक
इत्यादि नहीं चला करते हैं। इस मामले में अक्सर भैंस का
आकार अकल से बड़ा ही मालूम पढता है।

गीत कि धुन इमानदारी से कहूं तो- आकर्षक है और ये आनंदित
करने वाला गीत है। गीत का फिल्मांकन भी उम्दा किस्म का है।
इसके अलावा इस गीत में सभी elements मौजूद हैं फ़िल्मी
गीत के, नायक नायिका ने स्नान भी कर लिया है गीत में।

कल्याणजी आनंदजी भाई ने देसी ख़ुशबू वाले संगीत के सहारे
अपनी गाडी इतनी दूर तक दौडाई कि अति शास्त्रीयता की खुमारी
से ग्रसित संगीतकार भी दांतों तले ऊँगली दबाते नज़र आये।




गीत के बोल:

तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
मेरे प्यार की बहारों के नज़ारे
अब मुझे चमन से क्या लेना, क्या लेना

तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
मेरी रातों के चमकते सितारे
अब मुझे गगन से क्या लेना, क्या लेना

तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे

तेरी काया कंचन-कंचन किरणों का है जिसमें बसेरा
तेरी साँसें महकी-महकी तेरी ज़ुल्फ़ों में ख़ुशबू का डेरा
तेरा महके अंग-अंग जैसे सोने में सुगंध
मुझे चंदन-वन से क्या लेना, क्या लेना

तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
मेरी रातों के चमकते सितारे

मैने देखा जबसे तुझको मेरे सपने हुए सिंदूरी
तुझे पा के मेरे जीवन-धन हर कमी हुई मेरी पूरी
पिया एक तेरा प्यार मेरे सोलह सिंगार
मुझे अब दर्पण से क्या लेना, क्या लेना

तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
मेरे प्यार की बहारों के नज़ारे

तेरा मुखड़ा दमके-चमके जैसे सागर पे चमके सवेरा
तेरी बाँहें प्यार के झूले तेरी बाँहों में झूले मन मेरा
तेरी मीठी हर बात
तेरी मीठी हर बात
रस की है बरसात
हमें अब सावन से क्या लेना, क्या लेना

तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
अब मुझे चमन से क्या लेना, क्या लेना
अब मुझे गगन से क्या लेना, क्या लेना

हमें क्या लेना, क्या लेना
हमें क्या लेना, क्या लेना
.................................
Tere honthon ke do phool-Paaras 1971

Thursday, 16 June 2011

धीरे रे चलो-जौहर महमूद इन गोवा १९६५

आपको कुछ गंभीर से गीत सुना दिए अब एक मस्त गीत सुनवाते हैं।
मुकेश के लोकप्रिय गीतों में से एक और श्वेत श्याम युग से इसे परदे
पर गा रहे हैं ए एस जौहर और उनकी फैवरेट अभिनेत्री सोनिया साहनी
बांकी हिरनिया का किरदार निभा रही हैं। जौहर अच्छे अभिनेता
थे। इस गीत में वो किसी कुशल रोमांटिक नायक जैसे गीत गाने कि
कुशल कवायद कर रहे हैं।




गीत के बोल:

धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
कमर ना लचके हाय सजनिया


धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया

तेरी बिखरी जुल्फें देख देख ये
मस्त घटा शरमाई, हो देखो
मस्त घटा शरमाई
तेरा रूप जो देखा झूम झूम ली
बिजली ने ली अंगडाई, हो ली
बिजली ने अंगडाई
काले बाल गोरा रूप
जैसे साये में हो धूप
तुझे देख जिया भरमा ही गया

ओ, धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
कमर ना लचके हाय सजनिया

धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया

क्यूँ दिल की राहें छोड़ छोड़ ये
फूल चला कारों पे,
ये फूल चला कारों पे
तेरा पिघले ऐसे रूप के जैसे
मोम हो अंगारों पे जैसे
मोम हो अंगारों पे
तेरा मुखड़ा गुलाबी तेरी चाल शराबी
मुझे राम कसम नशा हो ही गया


ओ, धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
कमर ना लचके हाय सजनिया

धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
धीरे रे चलो मोरी बांकी हिरनिया
................................
Dheere re chalo-Johar Mehmood in Goa 1965

Thursday, 9 June 2011

दिल की नज़र से-अनाड़ी १९५८

ब्लॉग पर नज़र दौडाई तो फिल्म अनाड़ी का एक भी गीत नहीं
दिखा। आज सड़क पर चलते चलते मुझे ये गीत कहीं सुनाई
दिया। सदाबहार युगल गीत जो फिल्माया गया है नूतन और
राज कपूर पर। राज कपूर की फिल्मों में नायिकाओं के रोल
दूसरे निर्देशकों की फिल्मों की तुलना में ज्यादा लम्बे होते। ये
फिल्म हृषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी थी, हो सकता है
की कहानी की मांग और राज कपूर के आग्रह पर नायिका और
चरित्र भूमिका में ललिता पवार की भूमिकाएं बढ़ा दी गई हों।

वैसे इस मामले में श्वेत श्याम का युग रंगीन युग से कहीं बेहतर
था। नारी की छबि और उसके चरित्र परदे पर ज्यादा सशक्त
हुआ करते थे। ये मैं अपनी देखी हुई फिल्मों और अपने अनुभवों
के आधार पर अनुमान लगा रहा हूँ, हो सकता है आपके विचार
मुझसे अलग हों। जो भी हो, नूतन इस फिल्म में भी अपनी
गरिमामयी उपस्थिति से सबको प्रभावित कर गयीं। ये कुछ
अजीब तथ्य है कि आम जनता को राज कपूर की फिल्मों में
नायक नज़र आता और मुझे उन फिल्मों की नायिकाएं।
राज कपूर की फिल्मों की नायिकाओं ने मुझे ज्यादा प्रभावित
किया, अभिनय के मामले में।

गीत शैलेन्द्र का लिखा हुआ है और शंकर जयकिशन की धुन पर
इसे गाया है मुकेश और लता मंगेशकर ने।





गीत के बोल:

दिल की नज़र से, नज़रों की दिल से
ये बात क्या है, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे

धीरे से उठकर, होठों पे आया
ये गीता कैसा, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे

दिल की नज़र से, नज़रों की दिल से
ये बात क्या है, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे
दिल की नज़र से

क्यों बेखबर, यूँ खिंची सी चली जा रही मैं
ये कौनसे बन्धनों में बंधी जा रही मैं
क्यों बेखबर, यूँ खिंची सी चली जा रही मैं
ये कौनसे बन्धनों में बंधी जा रही मैं
कुछ खो रहा है, कुछ मिल रहा है
ये बात क्या है, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे
दिल की नज़र से

हम खो चले, चाँद है या कोई जादूगर है
या, मदभरी, ये तुम्हारी नज़र का असर है
हम खो चले, चाँद है या कोई जादूगर है
या, मदभरी, ये तुम्हारी नज़र का असर है
सब कुछ हमारा, अब है तुम्हारा
ये बात क्या है, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे,
दिल की नज़र से

आकाश में, हो रहें हैं ये कैसे इशारे
क्या, देखकर, आज हैं इतने खुश चाँद-तारे
आकाश में, हो रहें हैं ये कैसे इशारे
क्या, देखकर, आज हैं इतने खुश चाँद-तारे
क्यों तुम पराये, दिल में समाये
ये बात क्या है, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे

दिल की नज़र से, नज़रों की दिल से
ये बात क्या है, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे

धीरे से उठकर, होठों पे आया
ये गीता कैसा, ये राज़ क्या है
कोई हमें बता दे
दिल की नज़र से
.....................................
Dil ki nazar se-Anadi 1958

Wednesday, 8 June 2011

ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई-मर्यादा १९७१

चली आई, कौन ? वही भूली दास्तान ख्यालों में फिर से। फिर वो
भूली सी याद आई है, आई ज़रूर है मगर मुकेश के गीत की शक्ल
में।

आज मुकेश का एक अमर गीत सुना-वक़्त करता जो वफ़ा तो दिल
भारी सा हो आया और इसी गफलत और सिलसिले में एक और दर्द
भरा गीत याद आया ।

आइये सुनें राजेश खन्ना के ऊपर फिल्माया गया मुकेश का गाया
खूबसूरत गीत जो फिल्म मर्यादा(१९७१) से लिया गया है। मुकेश
के इस लोकप्रिय गीत के बोल लिखे हैं आनंद बक्षी ने और धुन
बनाई है कल्याणजी आनंदजी ने।



गीत के बोल:

ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई
ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई
बहार आने से पहले खिजां चली आई
ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई

ख़ुशी की चाह में मैं ने उठाये रंज बड़े
ख़ुशी की चाह में मैं ने उठाये रंज बड़े
मेरा नसीब की मेरे क़दम जहाँ भी पड़े
ये बदनसीबी मेरी भी वहाँ चली आई

ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई

उदास रात है वीरान दिल की महफ़िल है
उदास रात है वीरान दिल की महफ़िल है
न हमसफ़र है कोई और न कोई मंज़िल है
ये ज़िंदगी मुझे लेकर कहाँ चली आई

ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई
बहार आने से पहले खिजान चली आई
ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई
...............................
Zuban pe dard bhari dastaan-Maryada 1971

Saturday, 28 May 2011

हम भी खो गये हैं-मैडम जोरो १९६२

आपको एक और मधुर गीत सुनवाते हैं, ये उन गुमनाम सी फिल्मों
में छुपे हुए नायाब रातों में से एक है। एक आध बार आपके कान में
इसकी ध्वनि ज़रूर पड़ी होगी। मुकेश और कमल बारोट की आवाज़
में ये युगल गीत है फिल्म मैडम जोरो से। सन १९६२ की फिल्म ने
कुछ ख़ास करिश्मा नहीं किया बॉक्स ऑफिस पर। फिल्म के प्रमुख
कलाकार आज़ाद, नादिरा, हेलन और भगवान हैं। बुलो सी रानी फिल्म
के संगीतकार हैं जिन्होंने ४० के दशक से लगाकर ६० के दशक तक
अपनी उपस्थिति बनाये रखी हिंदी फिल्म संगीत के क्षेत्र में और कई
कर्णप्रिय नगमे दिए सौगात स्वरुप श्रोताओं को।




गीत के बोल:

हम भी खो गये हैं
दिल भी खो गया है
कहते हैं प्यार जिसको
शायद वो हो गया है

हम भी खो गये हैं
दिल भी खो गया है
कहते हैं प्यार जिसको
शायद वो हो गया है

दिल हमको ढूंढता है
हम दिल को ढूंढते हैं
मंजिल पे हम खड़े हैं
मंजिल को ढूंढते हैं
आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ
दिल हमको ढूंढता है
हम दिल को ढूंढते हैं
मंजिल पे हम खड़े हैं
मंजिल को ढूंढते हैं
कहते हैं प्यार जिसको
शायद वो हो गया है

हम भी खो गये हैं
दिल भी खो गया है
कहते हैं प्यार जिसको
शायद वो हो गया है

क्या चीज़ है मोहब्बत
समझेगा क्या ज़माना
इतनी सी है कहानी
इतना सा है फ़साना
आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ
क्या चीज़ है मोहब्बत
समझेगा क्या ज़माना
इतनी सी है कहानी
इतना सा है फ़साना
कहते हैं प्यार जिसको
शायद वो हो गया है

हम भी खो गये हैं
दिल भी खो गया है
कहते हैं प्यार जिसको
शायद वो हो गया है

हम भी खो गये हैं
..........................
Ham bhi kho gaye hain-Madam Zorro 1962

ये काफिला है प्यार का-लेख १९४९

फिल्म आशिक के गीत से एक और युगल गीत याद आया आशा भोंसले
और मुकेश का गाया हुआ। आशा है आपने नहीं सुना होगा इसे पहले और
आप इसे एक बार अवश्य ही सुनना चाहेंगे। मोतीलाल और सुरैया अभिनीत
फिल्म लेख से ये गीत लिया गया है। कमर जलालाबादी के लिखे बोलों को
सुरों में पिरोया है संगीतकार कृष्ण दयाल ने। फ़िल्मी गीतों के काफिले
अक्सर प्यार के ही हुआ करते हैं और ये काफिले काफी पुराने हैं। गीतकार
कमर जलालाबादी का लिखा गीत बहुत दिन बाद शामिल किया है ब्लॉग पर।
संगीतकार कृष्ण दयाल के कुछ और गीत हम शामिल करेंगे आगे इस
ब्लॉग पर, टटोलते रहिये हिंदी फिल्म संगीत का खज़ाना ।





गीत के बोल:

ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा
ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा

ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा
जी भर के हँस ले गा ले ये दिन फिर न आएगा
ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा

इस क़ाफ़िले के साथ हँसी भी है अश्क़ भी
इस क़ाफ़िले के साथ हँसी भी है अश्क़ भी
गाएगा कोई और कोई आँसू बहाएगा
इस क़ाफ़िले के साथ हँसी भी है अश्क़ भी
गाएगा कोई और कोई आँसू बहाएगा

ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा

राही गुज़र न जाएं
राही गुज़र न जाएं मुहब्बत के दिन कहीं
आँखें तरस रही हैं कब आँखें मिलाएगा
आँखें तरस रही हैं कब आँखें मिलाएगा
राही गुज़र न जाएं मुहब्बत के दिन कहीं
आँखें तरस रही हैं कब आँखें मिलाएगा

ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा

इस क़ाफ़िले में
इस क़ाफ़िले में वस्ल भी है और जुदाई भी
इस क़ाफ़िले में वस्ल भी है और जुदाई भी
तू जो भी माँग लेगा तेरे पास आएगा
तू जो भी माँग लेगा तेरे पास आएगा
इस क़ाफ़िले में वस्ल भी है और जुदाई भी
तू जो भी माँग लेगा
तू जो भी माँग लेगा तेरे पास आएगा

ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा
............................
Ye kafila hai pyar ka-Lekh 1949

Friday, 27 May 2011

ओ शमा मुझे फूँक दे-आशिक १९६२

फिल्म आशिक(१९६२) के ३ मधुर गीत आपको सुनवा चुके हैं-
लता का गाया एक गीत झनन झनझना के अपनी पायल,
मुकेश के गाये दो गीत - ये तो कहो कौन हो तुम, और
तुम जो हमारे मीत ना होते । हर एक गीत इस फिल्म का
नायाब है। आइये अब चौथा गीत सुना जाये जो कि एक
युगल गीत है मुकेश और लता की आवाज़ में। इसे लिखा
है शैलेन्द्र ने और अलबेले बैले नृत्य जैसे कुछ-कुछ मसाले
पर नाचने वाले कलाकारों के नाम अगर आपको मालूम हो
तो बतलाएं। गौरतलब है फिल्म की नायिका पद्मिनी आपको
नाचती दिखाई दे जाएँगी भीड़ के बीच में। खुशनुमा अंदाज़
से गीत दर्दीला गीत बन जाता है। पुराने ओर्केस्ट्रा कार्यक्रमों
में इस गीत को कई बार सुना है। गाने का ध्वनि संयोजन ही
ऐसा है कि ओर्केस्ट्रा वाले इसको अपने कार्यक्रमों में शामिल
करना पसंद करते।




गीत के बोल:

ओ शमा मुझे फूंक दे
मैं न मैं रहूँ, तू न तू रहे
यही इश्क़ का है दस्तूर
यही इश्क़ का है दस्तूर
परवाने जा है अजब चलन
यहाँ जीते जी अपना मिलन
क़िस्मत को नहीं मंजूर
क़िस्मत को नहीं मंजूर

शाम से लेकर रोज़ सहर तक
तेरे लिए मैं सारी रात जली
मैने तो हाय ये भी न जाना
कब दिन डूबा कब रात ढली
फिर भी हैं मिलने से मजबूर
फिर भी हैं मिलने से मजबूर

ओ शमा मुझे फूंक दे
मैं न मैं रहूँ, तू न तू रहे
यही इश्क़ का है दस्तूर
यही इश्क़ का है दस्तूर

पत्थर दिल हैं ये जगवाले
जाने न कोई मेरे दिल की जलन
पत्थर दिल हैं ये जगवाले
जाने न कोई मेरे दिल की जलन
जब से है जनमी प्यार की दुनिया
तुझको है मेरी मुझे तेरी लगन
तुम बिन ये दुनिया है बेनूर
तुम बिन ये दुनिया है बेनूर

परवाने जा है अजब चलन
यहाँ जीते जी अपना मिलन
क़िस्मत को नहीं मंजूर
क़िस्मत को नहीं मंजूर


हाय री क़िस्मत अंधी क़िस्मत
देख सकी ना तेरी-मेरी ख़ुशी
हाय री उल्फ़त बेबस उल्फ़त
रो के थकी जल-जल के मरी
दिल जो मिले किसका था क़सूर
दिल जो मिले किसका था क़सूर

ओ शमा मुझे फूंक दे
मैं न मैं रहूँ, तू न तू रहे
यही इश्क़ का है दस्तूर
यही इश्क़ का है दस्तूर
परवाने जा है अजब चलन
यहाँ जीते जी अपना मिलन
क़िस्मत को नहीं मंजूर
क़िस्मत को नहीं मंजूर
...................................
O shama mujhe phoonk de-Aashiq 1962

Saturday, 21 May 2011

ख्यालों में किसी के इस तरह-बावरे नैन १९५०

अजीब इत्तेफाक है। बीच रोड पर ट्राफिक के सर्कस के बीच आपको
अगर फिल्म बावरे नैन का ये गीत याद आ जाये तो क्या कीजियेगा ?
अजी बस गुनगुना लग जाइये और क्या। बीच में आड़े टेड़े चलने वालों
के चरित्रों का उल्लेख करके जुबान ख़राब करने के बजाये गीत जोर जोर
से गाने लग जाइये। आज हमने भी यही किया और गाने ने होर्न का काम
किया। बात फिर भी समझ नहीं आई-ऐसा क्यूँ होता है-उलझन में
दिमाग हो और कोई गीत अपने आप दिमाग में कौंध जाये। हम भी
गीत बनाने वालों से यही पूछ लेते हैं-"ख्यालों में किसी के इस तरह
आया नहीं करते" । केदार शर्मा के लिखे गीत की धुन बनाई है रोशन
ने। गीत गा रहे हैं गीता दत्त और मुकेश। राज कपूर के साथ परदे
पर शायद विजय लक्ष्मी नामक अभिनेत्री हैं।



गीत के बोल:

ख़यालों में किसी के, इस तरह आया नहीं करते
किसी को बेवफ़ा आ आ के तड़पाया नहीं करते
ख़यालों में किसी के, इस तरह आया नहीं करते
किसी को बेवफ़ा आ आ के तड़पाया नहीं करते

दिलों को रौंद कर दिल अपना बहलाया नहीं करते
जो ठुकराए गए हों उनको ठुकराया नहीं करते
दिलों को रौंद कर

हँसी फूलों की दो दिन चाँदनी भी चार दिन की है
चाँदनी चार दिन की है
हँसी फूलों की दो दिन चाँदनी भी चार दिन की है
चाँदनी चार दिन की है
मिली हो चाँद सी सूरत तो इतराया नहीं करते
किसी को बेवफ़ा आ आ के तड़पाया नहीं करते

ख़यालों में किसी के

जिन्हें मिटना हो वो मिटने से डर जाया नहीं करते
वो डर जाया नहीं करते
जिन्हें मिटना हो वो मिटने से डर जाया नहीं करते
वो डर जाया नहीं करते
मुहब्बत करने वाले ग़म से घबराया नहीं करते
किसी को बेवफ़ा आ आ के तड़पाया नहीं करते

ख़यालों में किसी के

मुहब्बत का सबक सीखो, ये जाकर जलने वालों से
ये जाकर जलने वालों से
मुहब्बत का सबक सीखो, ये जाकर जलने वालों से
ये जाकर जलने वालों से
के दिल की बात भी लब तक कभी लाया नहीं करते
जो ठुकराए गए हों उनको ठुकराया नहीं करते

ख़यालों में किसी के, इस तरह आया नहीं करते
किसी को बेवफ़ा आ आ के तड़पाया नहीं करते

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Khayalon mein kisi ke-Baawre Nain 1950
 
 
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