नायिका नंबर दो का घर में प्रवेश हो चुका है। ये है फिल्म गृह प्रवेश
से दूसरा गीत। गीत में संजीव कुमार और सारिका अपने अपने भावों
का अनुसार प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ रोमांस कुछ रोमांच वाला ये गीत
कर्णप्रिय है। गुलज़ार के बोल, सुलक्षणा पंडित की आवाज़ और कनु रॉय
का संगीत है। आनंद लीजिए।
उल्लेखनीय है कि कनु रॉय ने एक और लीक से हट के बनी फिल्म
आविष्कार में भी संगीत दिया है।
गीत के बोल:
आप अगर आप न होते तो भला क्या होते
लोग कहते हैं कि पत्थर के मसीहा होते
संगेमरमर के तराशे हुए चेहरे पे अगर
आ आ आ आ आ आ आ
संगेमरमर के तराशे हुए चेहरे पे अगर
आपके हँसने का अंदाज़ यही होता मगर
वो जो शरमा के झुका लेते हैं आप नज़र
ऐसे शरमाने पे हम कैसे न फ़िदा होते
आप अगर आप न होते तो भला क्या होते
लोग कहते हैं कि पत्थर के मसीहा होते
आपके माथे पे बसती है जवां शाम सहर
आपके माथे पे बसती है जवां शाम सहर
अच्छी लगती है हमें आपकी पेशानी मगर
वो जो माथे पे पसीना उभर आती है मगर
ऐसे माथे पे भला क्यों न लोग फ़िदा होते
आप अगर आप न होते तो भला क्या होते
लोग कहते हैं कि पत्थर के मसीहा होते
.......................................
Aap agar aaap na hote-Griha Pravesh 1979
Showing posts with label Sanjeev Kumar. Show all posts
Showing posts with label Sanjeev Kumar. Show all posts
Wednesday, 3 August 2011
ज़िंदगी फूलों की नहीं-गृह प्रवेश 1979
आइये कुछ अलग हट के बनी फिल्मों से गीत सुने जाएँ । सबसे पहले
सुनते हैं कुछ ज्यादा ही हट के बनी फिल्म गृह प्रवेश से एक गीत।
बुद्धिजीवी दो प्रकार के होते हैं-नैसर्गिक और निर्मित। पहले वाले पैदाइशी
होते हैं और दुसरे वालों को जनता दर्ज़ा प्रदान करती है। हमारे देश के कुछ
बुद्धिजीवियों की खूबी है कि वे न समझ आने वाली चीज़ों पर भी वाह वाह
कर उठते हैं। आम जनता जब समझ में कुछ नहीं आता हो तो वो उन
बुद्धिजीवियों की राय और सहमति पर निर्भर हो जाती है ।
फिल्म के कथानक को थकानक कहा जाए तो भी फर्क नहीं पड़ेगा। इसको
समझने के लिए दिमाग खपाने की ज़रूरत पढ़ती है। संजीव कुमार और
शर्मीला टैगोर ने अपने अपने हिस्से का बढ़िया अभिनय किया है। १९७९
में बनी इस फिल्म को समय से आगे की बताते हैं कुछ लोग।
प्रस्तुत गीत फिल्म के टाइटल के साथ सुनाई पढता है इसलिए इसमें गीत का
आनंद लेने के अलावा कोई कन्फ्यूज़न नहीं है। गीत गुलज़ार का लिखा हुआ
है जिसे गा रहे हैं भूपेंद्र। संगीत तैयार किया है कनु रॉय ने।
गीत के बोल:
ज़िंदगी फूलों की नहीं
फूलों की तरह महकी रहे
ज़िंदगी फूलों की नहीं
फूलों की तरह महकी रहे
ज़िंदगी
जब कोई कहीं गुल खिलता है
आवाज़ नहीं आती लेकिन
आवाज़ नहीं आती लेकिन
खुशबू की खबर आ जाती है
खुशबू महकी रहे
ज़िंदगी
जब राह कहीं कोई मुड़ती है
मंजिल का पता तो होता नहीं
मंजिल का पता तो होता नहीं
इक राह पे राह मिल जाती है
राहें मुड़ती रहें
ज़िंदगी
.....................................
Zindagi phoolon ki nahin-Griha Pravesh 1979
सुनते हैं कुछ ज्यादा ही हट के बनी फिल्म गृह प्रवेश से एक गीत।
बुद्धिजीवी दो प्रकार के होते हैं-नैसर्गिक और निर्मित। पहले वाले पैदाइशी
होते हैं और दुसरे वालों को जनता दर्ज़ा प्रदान करती है। हमारे देश के कुछ
बुद्धिजीवियों की खूबी है कि वे न समझ आने वाली चीज़ों पर भी वाह वाह
कर उठते हैं। आम जनता जब समझ में कुछ नहीं आता हो तो वो उन
बुद्धिजीवियों की राय और सहमति पर निर्भर हो जाती है ।
फिल्म के कथानक को थकानक कहा जाए तो भी फर्क नहीं पड़ेगा। इसको
समझने के लिए दिमाग खपाने की ज़रूरत पढ़ती है। संजीव कुमार और
शर्मीला टैगोर ने अपने अपने हिस्से का बढ़िया अभिनय किया है। १९७९
में बनी इस फिल्म को समय से आगे की बताते हैं कुछ लोग।
प्रस्तुत गीत फिल्म के टाइटल के साथ सुनाई पढता है इसलिए इसमें गीत का
आनंद लेने के अलावा कोई कन्फ्यूज़न नहीं है। गीत गुलज़ार का लिखा हुआ
है जिसे गा रहे हैं भूपेंद्र। संगीत तैयार किया है कनु रॉय ने।
गीत के बोल:
ज़िंदगी फूलों की नहीं
फूलों की तरह महकी रहे
ज़िंदगी फूलों की नहीं
फूलों की तरह महकी रहे
ज़िंदगी
जब कोई कहीं गुल खिलता है
आवाज़ नहीं आती लेकिन
आवाज़ नहीं आती लेकिन
खुशबू की खबर आ जाती है
खुशबू महकी रहे
ज़िंदगी
जब राह कहीं कोई मुड़ती है
मंजिल का पता तो होता नहीं
मंजिल का पता तो होता नहीं
इक राह पे राह मिल जाती है
राहें मुड़ती रहें
ज़िंदगी
.....................................
Zindagi phoolon ki nahin-Griha Pravesh 1979
Labels:
1979,
Bhupinder,
Griha Pravesh,
Gulzar,
Kanu Roy,
Sanjeev Kumar,
Sarika,
Sharmila Tagore
Saturday, 25 June 2011
तेरे होंठों के दो फूल-पारस १९७१
पारस फिल्म से तीसरा गीत पेश है जो कि एक युगल गीत है
मुकेश और लता की आवाजों में। होंठों को फूलों का दर्ज़ा प्रदान
किया है कुछ कवियों ने और गीत रचईताओं ने। पंखुड़ियों से
तुलना सामान्य विशेषण है लेकिन फूल कहना उसके दर्जे को
बढ़ाना है। वही हाल है जब नायिका आँखों के दो तारों की बात
करती है। गीतकार ने दोनों के लिए एक स्टार से विशेषण का
इस्तेमाल किया हैं। संतुलन ऐसे ही बनाया जाता है ।
प्यार अँधा होता है और बहरा होता है ये साबित करने के कुछ
प्रतीकों की ज़रुरत पढ़ती है कभी कभी। प्यार में हरी घास भी
पालक पनीर नज़र आने लग जाती है। ये वो खुश-खुमारी है
जिसके आगे अच्छे अच्छे पानी भर लेते हैं। प्यार में लॉजिक
इत्यादि नहीं चला करते हैं। इस मामले में अक्सर भैंस का
आकार अकल से बड़ा ही मालूम पढता है।
गीत कि धुन इमानदारी से कहूं तो- आकर्षक है और ये आनंदित
करने वाला गीत है। गीत का फिल्मांकन भी उम्दा किस्म का है।
इसके अलावा इस गीत में सभी elements मौजूद हैं फ़िल्मी
गीत के, नायक नायिका ने स्नान भी कर लिया है गीत में।
कल्याणजी आनंदजी भाई ने देसी ख़ुशबू वाले संगीत के सहारे
अपनी गाडी इतनी दूर तक दौडाई कि अति शास्त्रीयता की खुमारी
से ग्रसित संगीतकार भी दांतों तले ऊँगली दबाते नज़र आये।
गीत के बोल:
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
मेरे प्यार की बहारों के नज़ारे
अब मुझे चमन से क्या लेना, क्या लेना
तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
मेरी रातों के चमकते सितारे
अब मुझे गगन से क्या लेना, क्या लेना
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरी काया कंचन-कंचन किरणों का है जिसमें बसेरा
तेरी साँसें महकी-महकी तेरी ज़ुल्फ़ों में ख़ुशबू का डेरा
तेरा महके अंग-अंग जैसे सोने में सुगंध
मुझे चंदन-वन से क्या लेना, क्या लेना
तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
मेरी रातों के चमकते सितारे
मैने देखा जबसे तुझको मेरे सपने हुए सिंदूरी
तुझे पा के मेरे जीवन-धन हर कमी हुई मेरी पूरी
पिया एक तेरा प्यार मेरे सोलह सिंगार
मुझे अब दर्पण से क्या लेना, क्या लेना
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
मेरे प्यार की बहारों के नज़ारे
तेरा मुखड़ा दमके-चमके जैसे सागर पे चमके सवेरा
तेरी बाँहें प्यार के झूले तेरी बाँहों में झूले मन मेरा
तेरी मीठी हर बात
तेरी मीठी हर बात
रस की है बरसात
हमें अब सावन से क्या लेना, क्या लेना
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
अब मुझे चमन से क्या लेना, क्या लेना
अब मुझे गगन से क्या लेना, क्या लेना
हमें क्या लेना, क्या लेना
हमें क्या लेना, क्या लेना
.................................
Tere honthon ke do phool-Paaras 1971
मुकेश और लता की आवाजों में। होंठों को फूलों का दर्ज़ा प्रदान
किया है कुछ कवियों ने और गीत रचईताओं ने। पंखुड़ियों से
तुलना सामान्य विशेषण है लेकिन फूल कहना उसके दर्जे को
बढ़ाना है। वही हाल है जब नायिका आँखों के दो तारों की बात
करती है। गीतकार ने दोनों के लिए एक स्टार से विशेषण का
इस्तेमाल किया हैं। संतुलन ऐसे ही बनाया जाता है ।
प्यार अँधा होता है और बहरा होता है ये साबित करने के कुछ
प्रतीकों की ज़रुरत पढ़ती है कभी कभी। प्यार में हरी घास भी
पालक पनीर नज़र आने लग जाती है। ये वो खुश-खुमारी है
जिसके आगे अच्छे अच्छे पानी भर लेते हैं। प्यार में लॉजिक
इत्यादि नहीं चला करते हैं। इस मामले में अक्सर भैंस का
आकार अकल से बड़ा ही मालूम पढता है।
गीत कि धुन इमानदारी से कहूं तो- आकर्षक है और ये आनंदित
करने वाला गीत है। गीत का फिल्मांकन भी उम्दा किस्म का है।
इसके अलावा इस गीत में सभी elements मौजूद हैं फ़िल्मी
गीत के, नायक नायिका ने स्नान भी कर लिया है गीत में।
कल्याणजी आनंदजी भाई ने देसी ख़ुशबू वाले संगीत के सहारे
अपनी गाडी इतनी दूर तक दौडाई कि अति शास्त्रीयता की खुमारी
से ग्रसित संगीतकार भी दांतों तले ऊँगली दबाते नज़र आये।
गीत के बोल:
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
मेरे प्यार की बहारों के नज़ारे
अब मुझे चमन से क्या लेना, क्या लेना
तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
मेरी रातों के चमकते सितारे
अब मुझे गगन से क्या लेना, क्या लेना
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरी काया कंचन-कंचन किरणों का है जिसमें बसेरा
तेरी साँसें महकी-महकी तेरी ज़ुल्फ़ों में ख़ुशबू का डेरा
तेरा महके अंग-अंग जैसे सोने में सुगंध
मुझे चंदन-वन से क्या लेना, क्या लेना
तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
मेरी रातों के चमकते सितारे
मैने देखा जबसे तुझको मेरे सपने हुए सिंदूरी
तुझे पा के मेरे जीवन-धन हर कमी हुई मेरी पूरी
पिया एक तेरा प्यार मेरे सोलह सिंगार
मुझे अब दर्पण से क्या लेना, क्या लेना
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
मेरे प्यार की बहारों के नज़ारे
तेरा मुखड़ा दमके-चमके जैसे सागर पे चमके सवेरा
तेरी बाँहें प्यार के झूले तेरी बाँहों में झूले मन मेरा
तेरी मीठी हर बात
तेरी मीठी हर बात
रस की है बरसात
हमें अब सावन से क्या लेना, क्या लेना
तेरे होंठों के दो फूल प्यारे-प्यारे
तेरी आँखों के दो तारे प्यारे-प्यारे
अब मुझे चमन से क्या लेना, क्या लेना
अब मुझे गगन से क्या लेना, क्या लेना
हमें क्या लेना, क्या लेना
हमें क्या लेना, क्या लेना
.................................
Tere honthon ke do phool-Paaras 1971
Labels:
1971,
Indeewar,
Kalyanji Anandji,
Lata Mangeshkar,
Mukesh,
Paaras,
Rakhi,
Sanjeev Kumar
सजना के सामने मैं तो रहूंगी-पारस १९७१
यकायक, अचानक, तुरंत फुरंत जब कोई गीत याद आता है
है तो उसे सुनवाने कि इच्छा हो ही जाती है। अभिनेत्री राखी
को आपने अधिकांश चलचित्रों में भारतीय नारी की पोषाक
और वेश भूषा में ही देखा होगा। आज आपको एक ऐसा गीत
सुनवाते हैं जिसमें वे विलायती बाला जैसी नज़र आती हैं।
इन्दीवर के लिखे गीत को गा रही हैं आशा भोंसले और गीत
की तर्ज़ बनाई है कल्याणजी आनंदजी ने।
गीत के बोल :
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
आ हा, सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
अंखियों में छ गया नशा भीगा भीगा
अंखियों में छ गया नशा भीगा भीगा
जान गई सखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
जान गई !
ओ रातों को, रातों को ?
आ हा रातों को
रातों को उड़ उड़ के कहती है निंदिया
ऐ री लागेगी कब मेरे माथे पे बिंदिया
मन की अभी तक मन में छुपी है
फ़ैल गई, फ़ैल गई बतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
सजना के
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
हो ओ ऐसी लगी
कैसी लगी ?
हा हा ऐसी लगी
ऐसी लगी आग मेरे सीने में प्रीत की
हाय याद आये घडी घडी अनदेखे मीत की
दिन तो गुज़रूंगी कर कर के बतियाँ
गुजरी ना
गुजरी ना रतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
क्या होगा ?
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
हा चोरी चोरी
चोरी चोरी ?
आ हा चोरी चोरी
चोरी चोरी सपने में आता है कोई
फिर उसके ख्यालों में रहूँ खोयी खोयी
बान के दीवानी लिख दी जो मैंने
पकड़ी गई
पकड़ी गई पतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
सजना के
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
आ हा सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
...............................
Sajna ke samne main to rahoongi-Paaras 1971
है तो उसे सुनवाने कि इच्छा हो ही जाती है। अभिनेत्री राखी
को आपने अधिकांश चलचित्रों में भारतीय नारी की पोषाक
और वेश भूषा में ही देखा होगा। आज आपको एक ऐसा गीत
सुनवाते हैं जिसमें वे विलायती बाला जैसी नज़र आती हैं।
इन्दीवर के लिखे गीत को गा रही हैं आशा भोंसले और गीत
की तर्ज़ बनाई है कल्याणजी आनंदजी ने।
गीत के बोल :
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
आ हा, सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
अंखियों में छ गया नशा भीगा भीगा
अंखियों में छ गया नशा भीगा भीगा
जान गई सखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
जान गई !
ओ रातों को, रातों को ?
आ हा रातों को
रातों को उड़ उड़ के कहती है निंदिया
ऐ री लागेगी कब मेरे माथे पे बिंदिया
मन की अभी तक मन में छुपी है
फ़ैल गई, फ़ैल गई बतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
सजना के
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
हो ओ ऐसी लगी
कैसी लगी ?
हा हा ऐसी लगी
ऐसी लगी आग मेरे सीने में प्रीत की
हाय याद आये घडी घडी अनदेखे मीत की
दिन तो गुज़रूंगी कर कर के बतियाँ
गुजरी ना
गुजरी ना रतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
क्या होगा ?
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
हा चोरी चोरी
चोरी चोरी ?
आ हा चोरी चोरी
चोरी चोरी सपने में आता है कोई
फिर उसके ख्यालों में रहूँ खोयी खोयी
बान के दीवानी लिख दी जो मैंने
पकड़ी गई
पकड़ी गई पतियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
सजना के
सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप, चुप
आ हा सजना के सामने मैं तो रहूंगी चुप
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
बोल उठी अँखियाँ तो क्या होगा
हाय हाय क्या होगा
...............................
Sajna ke samne main to rahoongi-Paaras 1971
Labels:
1971,
Asha Bhosle,
Indeewar,
Kalyanji Anandji,
Paaras,
Rakhi,
Sanjeev Kumar
Saturday, 22 January 2011
रंग बसंती छा गया-राजा और रंक १९६८
लता और रफ़ी के गाये लगभग ४३० युगल गीतों में से अभी
आपको कुछ ही सुनवाए हैं। आइये अब सुनते हैं एक लोकप्रिय
युगल गीत फिल्म राजा और रंक से। टी वी पर एक पेंट कंपनी
के विज्ञापन को देख कर आज दिमाग में ये गीत कौंधा।
गुलज़ाराना अंदाज़ में पोस्ट की कोंपलें दिमाग से फूटने लगीं और
शब्द पत्तों की मानिंद टपकना शुरू हो गए, पतझड़ का मौसम जो है।
बिखरे हुए अधखाये, साबुत बेरों को बटोर कर आपके लिए छाप दिए हैं ।
तुरही की आवाज़ कुछ अलग सुनाई पढ़ती है और उससे अंदाज़ा लगाया
जा सकता है कि गीत किसी पीरियड या ऐतिहासिक फिल्म से है। साथ
में बांसुरी का भी बढ़िया प्रयोग है इस गीत में।
आनंद बक्षी के लिखे हुए गीत की तर्ज़ बनाई है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।
गीत के बोल:
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
धरती का है आँचल पीला झूमे अम्बर नीला-नीला
सब रंगों से है रंगीला, रंग बसंती
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
लहराए ये तेरा आँचल सावन के झूलों जैसा
दिल मेरा ले गया है ये तेरा रूप गोरी
सरसों के फूलों जैसा
ओ लहराए ये तेरा आँचल सावन के झूलों जैसा
दिल मेरा ले गया है ये तेरा रूप गोरी
सरसों के फूलों जैसा
जब देखूं जी चाहे मेरा
नाम बसंती रख दूं तेरा
छोडो-छेड़ो न
हो हो हो ओ ओ ओ
तेरी बातें राम दुहाई मनवा लूटा नींद चुराई
सैयां तेरी प्रीत से आई, तंग बसंती
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
o मस्ताना मौसम आ गया
हो हो हो ओ सुन लो देशवासियों
सुन लो देशवासियों
आज से इस देश में
छोटा-बड़ा कोई न होगा सारे एक सामान होंगे
सुन लो देशवासियों
कोई न होगा भूखा-प्यासा पूरी होगी सबकी आशा
हम हैं राजा
तुम हो कौन नगर के राजे छोटा मुंह बड़ी बात न साजे
झूमो नाचो गाओ बाजे, चंग बसंती
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
आपको कुछ ही सुनवाए हैं। आइये अब सुनते हैं एक लोकप्रिय
युगल गीत फिल्म राजा और रंक से। टी वी पर एक पेंट कंपनी
के विज्ञापन को देख कर आज दिमाग में ये गीत कौंधा।
गुलज़ाराना अंदाज़ में पोस्ट की कोंपलें दिमाग से फूटने लगीं और
शब्द पत्तों की मानिंद टपकना शुरू हो गए, पतझड़ का मौसम जो है।
बिखरे हुए अधखाये, साबुत बेरों को बटोर कर आपके लिए छाप दिए हैं ।
तुरही की आवाज़ कुछ अलग सुनाई पढ़ती है और उससे अंदाज़ा लगाया
जा सकता है कि गीत किसी पीरियड या ऐतिहासिक फिल्म से है। साथ
में बांसुरी का भी बढ़िया प्रयोग है इस गीत में।
आनंद बक्षी के लिखे हुए गीत की तर्ज़ बनाई है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।
गीत के बोल:
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
धरती का है आँचल पीला झूमे अम्बर नीला-नीला
सब रंगों से है रंगीला, रंग बसंती
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
लहराए ये तेरा आँचल सावन के झूलों जैसा
दिल मेरा ले गया है ये तेरा रूप गोरी
सरसों के फूलों जैसा
ओ लहराए ये तेरा आँचल सावन के झूलों जैसा
दिल मेरा ले गया है ये तेरा रूप गोरी
सरसों के फूलों जैसा
जब देखूं जी चाहे मेरा
नाम बसंती रख दूं तेरा
छोडो-छेड़ो न
हो हो हो ओ ओ ओ
तेरी बातें राम दुहाई मनवा लूटा नींद चुराई
सैयां तेरी प्रीत से आई, तंग बसंती
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
o मस्ताना मौसम आ गया
हो हो हो ओ सुन लो देशवासियों
सुन लो देशवासियों
आज से इस देश में
छोटा-बड़ा कोई न होगा सारे एक सामान होंगे
सुन लो देशवासियों
कोई न होगा भूखा-प्यासा पूरी होगी सबकी आशा
हम हैं राजा
तुम हो कौन नगर के राजे छोटा मुंह बड़ी बात न साजे
झूमो नाचो गाओ बाजे, चंग बसंती
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
संग बसंती, अंग बसंती, रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया
Labels:
1968,
Anand Bakshi,
Lata Mangeshkar,
Mohd. Rafi,
Nazima,
Raja aur rank,
Sanjeev Kumar
Tuesday, 21 December 2010
चाँद चुरा के लाया हूँ -देवता १९७८
आज फिल्म देवता से गीत सुनिए। ना ना, ये वो पुरानी देवता फिल्म
नहीं है जिसमें सी रामचंद्र का संगीत है। ये तो सन १९७८ में आई
संजीव कुमार और शबाना आज़मी की जोड़ी वाली फिल्म है जिसमें
उनके साथ एक और प्रतिभाशाली कलाकार डैनी ने काम किया। इस
फिल्म का संगीत काफी सुना गया और सराहा गया।
बदलाव के लिए आपको आज फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत पहले
सुनवाते हैं। इसे गाया है लता और किशोर ने। बोल हैं एक नामचीन
गीतकार के और संगीत है आर दी बर्मन का। इस फिल्म का प्रोमो रेडियो
पर खूब बजा करता और उसमें संजीव कुमार का एक डॉयलॉग सुनवाया
जाता जिसे हम अगली पोस्ट में पढेंगे। बोल किसके हैं पहचानिए और
ना पहचान पायें तभी गीत के टैग देखें।
गीत के बोल:
चाँद चुरा के लाया हूँ
चाँद चुरा के लाया हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
हो, ना कोई देखे ना पहचाने
बैठें पेड़ के नीचे
अरे चल बैठें चर्च के पीछे
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
अरे जो होना था कल हुआ था
आज तो आज की सोचो
जाग गए तो
जागने दो
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
हो ढूँढ ना पाएँ बस्ती वाले साहिल से कह जाएँ
बोल दिया तो
बोलने दो ना
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
नहीं है जिसमें सी रामचंद्र का संगीत है। ये तो सन १९७८ में आई
संजीव कुमार और शबाना आज़मी की जोड़ी वाली फिल्म है जिसमें
उनके साथ एक और प्रतिभाशाली कलाकार डैनी ने काम किया। इस
फिल्म का संगीत काफी सुना गया और सराहा गया।
बदलाव के लिए आपको आज फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत पहले
सुनवाते हैं। इसे गाया है लता और किशोर ने। बोल हैं एक नामचीन
गीतकार के और संगीत है आर दी बर्मन का। इस फिल्म का प्रोमो रेडियो
पर खूब बजा करता और उसमें संजीव कुमार का एक डॉयलॉग सुनवाया
जाता जिसे हम अगली पोस्ट में पढेंगे। बोल किसके हैं पहचानिए और
ना पहचान पायें तभी गीत के टैग देखें।
गीत के बोल:
चाँद चुरा के लाया हूँ
चाँद चुरा के लाया हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
हो, ना कोई देखे ना पहचाने
बैठें पेड़ के नीचे
अरे चल बैठें चर्च के पीछे
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
अरे जो होना था कल हुआ था
आज तो आज की सोचो
जाग गए तो
जागने दो
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
हो ढूँढ ना पाएँ बस्ती वाले साहिल से कह जाएँ
बोल दिया तो
बोलने दो ना
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
Labels:
1978,
Devta,
Gulzar,
Kishore Kumar,
Lata Mangeshkar,
RD Burman,
Sanjeev Kumar,
Shabana Azmi
Tuesday, 23 November 2010
मन मेरा तुझको माँगे -पारस १९७१
बिना विवरण के गीत सुन लीजिये एक फिल्म पारस(१९७१) से।
यह गायिका सुमन कल्याणपुर का एक लोकप्रिय गीत है।
गायिका : सुमन कल्याणपुर
गीतकार: इन्दीवर
संगीतकार: कल्याणजी आनंदजी।
गीत के बोल:
मन मेरा तुझको माँगे, दूर दूर तू भागे
मन मेरा तुझको माँगे और दूर दूर तू भागे
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
ओ हो, ओ हो हो
कहो ये प्रीत कैसी, नयी ये रीत कैसी
के भँवरा कली से लजाये
जवानी जले ऐसे, हज़ारों दिये जैसे
पतंगा न क्यूँ पास आये
जलती रही दिल में, मैं पाई तेरी छैयाँ
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
मन मेरा तुझको माँगे दूर दूर तू भागे
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
ओ हो, ओ हो हो
बदल के उजाले हैं तेरे हवाले
सम्भाले बिना कौन तेरे
तू बाँहों में उठा ले
तू सीने में छुपा ले
बहुत ग़म खड़े मुझको घेरे
सहारा लिया तेरा, छुड़ाये तू ही बैयाँ
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
मन मेरा तुझको माँगे, दूर दूर तू भागे
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
यह गायिका सुमन कल्याणपुर का एक लोकप्रिय गीत है।
गायिका : सुमन कल्याणपुर
गीतकार: इन्दीवर
संगीतकार: कल्याणजी आनंदजी।
गीत के बोल:
मन मेरा तुझको माँगे, दूर दूर तू भागे
मन मेरा तुझको माँगे और दूर दूर तू भागे
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
ओ हो, ओ हो हो
कहो ये प्रीत कैसी, नयी ये रीत कैसी
के भँवरा कली से लजाये
जवानी जले ऐसे, हज़ारों दिये जैसे
पतंगा न क्यूँ पास आये
जलती रही दिल में, मैं पाई तेरी छैयाँ
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
मन मेरा तुझको माँगे दूर दूर तू भागे
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
ओ हो, ओ हो हो
बदल के उजाले हैं तेरे हवाले
सम्भाले बिना कौन तेरे
तू बाँहों में उठा ले
तू सीने में छुपा ले
बहुत ग़म खड़े मुझको घेरे
सहारा लिया तेरा, छुड़ाये तू ही बैयाँ
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
मन मेरा तुझको माँगे, दूर दूर तू भागे
मैं ऐसी उलझी सैयाँ
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
तेरा प्यार बना है देखो भूल भुलैया
Labels:
1971,
Indeewar,
Kalyanji Anandji,
Paaras,
Rakhi,
Sanjeev Kumar,
Suman Kalyanpur
Subscribe to:
Posts (Atom)


