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Wednesday, 3 August 2011

कान्हा रे कान्हा-ट्रक ड्राईवर १९७०

फिल्म का शीर्षक कुछ भी रखा जा सकता है। इसमें किसी पेशे
विशेष का जिक्र भी संभव है । ५० के दशक में एक फिल्म आई थी
ट्रोली ड्राईवर । उसमें हुस्न्लाल भगतराम का संगीत है। सन ७० के
दशक में अवतरित हुई ट्रक ड्राईवर। ट्रेक्टर ड्राईवर फिल्म की मुझे
तलाश है।

अधिकतर आड़े टेढ़े नाम वाली फ़िल्में “बी” या “सी” श्रेणी में
रखी जाती हैं । इनमें से अगर गलती से कोई हिट हो गयी तो
भी फिल्म की श्रेणी पर फर्क नहीं पढता। एक बड़ी वजह है इनका
निम्न श्रेणियों में गिना जाना –इनमें नामचीन कलाकारों की कमी
होती. नामचीन कलाकार नहीं होते तो संगीत निर्देशक भी कम
जाने पहचाने होते। गायक ज़रूर “ऐ” श्रेणी वाले मिल जाते इन
फिल्मों के गीतों में। गायक बहुत बड़ी वजह बनते इनके गीतों
की लोकप्रियता में।

प्रस्तुत फिल्म में एक लता का गाया भजन है जिसे नियमित रूप
से भक्ति संगीत के कार्यक्रमों में जगह मिलती। काफी बजा हुआ
गीत है ये। जिन श्रोताओं की ज़ल्दी उठ कर आकाशवाणी के भजन
भक्ति के कार्यक्रम सुनने की आदत है उन्होंने इसे अवश्य कई बार
सुन रखा होगा।

फिल्म में देव कुमार और इन्द्राणी मुखर्जी क्रमशः नायक नायिका हैं ।
उसके अलावा फिल्म का आकर्षण हेलन हैं। इन्द्राणी वही कलाकार
हैं जिन्होंने फिल्म आखिरी खत में नायिका की भूमिका निभाई और
देव आनंद अभिनीत देस परदेस में नायक के बड़े भाई की पत्नी की
भूमिका निभाई है। नायक देव कुमार को आपने अक्सर किसी गुंडे या
पहलवान की भूमिका निभाते ही देखा होगा।

गीत इन्दीवर की कलम से निकला है अतः इसके बोल चुस्त हैं।
संगीत तैयार किया है सोनिक ओमी ने। आवाज़ लता मंगेशकर की
है जिन्होंने सोनिक ओमी के लिए गिने चुने गीत ही गाये हैं। कान्हा से
शिकायत वाले स्वर में ये गीत गाया जा रहा है।



गीत के बोल:


कान्हा रे कान्हा
रे तूने लाखों रास रचाए
फिर काहे तोसे
और किसी का प्यार न देखा जाए

कान्हा रे कान्हा

सूनी जिंदगानी मजबूर है जवानी
कैसे तूफ़ान में ला कर छोड़ा रे
सूनी जिंदगानी मजबूर है जवानी
कैसे तूफ़ान में ला कर छोड़ा रे
प्यार मेरा लूटा संसार मेरा लूटा
टूटा दिल क्यों फिर तूने तोडा रे
छिन गयी प्रीत मेरी देख ली रीत तेरी
श्यामा रे तूने जलते दीप बुझाये

कान्हा रे कान्हा

देनी थी जुदाई तो प्रीत क्यूँ बनाई
तूने कैसी ये की मनमानी रे
देनी थी जुदाई तो प्रीत क्यूँ बनाई
तूने कैसी ये की मनमानी रे
राधा कितना रोई है मीरा खोयी खोयी
तूने नारी की पीर न जानी रे
जब यही काम तेरा कौन ले नाम तेरा
तू प्रेमी कैसा प्रेमियों को तड़पाए

कान्हा रे कान्हा
रे तूने लाखों रास रचाए
फिर काहे तोसे
और किसी का प्यार न देखा जाए
..................................
Kanha re Kanha re toone –Truck Driver 1970

Tuesday, 2 August 2011

पुरवा सुहानी आई रे –पूरब और पश्चिम १९७०

पुरुष के समर्पण के चरम के बारे में 'पूरब और पश्चिम' फिल्म के
पिछले गीत में चर्चा हुई थी। इस फिल्म में नारी का इंतज़ार भी है।
गीत में दिखाई देने वाली देसी बाला फिल्म के नायक से मन ही मन
प्यार करती है। फिल्म का नायक विलायती बाला से प्रेम करता है। इस
प्रेम त्रिकोण में चौथा कोण प्रस्तुत गीत में प्रकट होकर मुखर होता है
जो ढोल बजा रहा है-नायक नंबर दो यानि विनोद खन्ना । वो देसी
बाला से प्रेम करता है। गीत का आकर्षण नायिका नंबर एक के चुस्त
कपडे और नायिका नंबर दो का आकर्षक नृत्य है।

इस खालिस देसी धुन को तैयार किया है कल्याणजी आनंदजी ने और गीत
में कहानी कही है इन्दीवर ने।






गीत के बोल:

ढोली ढोल बजाना
ताल से ताल मिलाना
ढोली ढोला ढोली ढोला
ढोली ढोल बजाना
ता ता थैया तक तक थैया
ताल से ताल मिलाना


पुरवा सुहानी आई रे पुरवा
पुरवा सुहानी आई रे पुरवा
ऋतुओं की रानी आई रे पुरवा
मेरे रुके नहीं पांव
प्रीत पे जवानी छाई रे, पुरवा

पुरवा सुहानी आई रे पुरवा

मौसम का मुसाफिर खड़ा रस्ते में
ला ला ला ला ला ला ला ला ला
हो ओ मौसम का मुसाफिर खड़ा रस्ते में
उसके हाथों सब कुछ लुटा सस्ते में
छोटी सी उमरिया है
लंबी सी डगरिया रे
जीवन है परछाई रे, पुरवा

पुरवा सुहानी आई रे पुरवा

हो ढोली ढोल बजाना
हो ताल से ताल मिलाना

कर ले कर भी ले प्यार की पूजा
ना ना ना ना ना ना ना ना
हो, कर ले कर भी ले प्यार की पूजा
प्यार के रंग पे चढ़े न रंग दूजा
क्या ये कोई सपना है
मेरे लिए अपना है
बात मेरी बन आई रे पुरवा

पुरवा सुहानी आई रे पुरवा

हो मीरा सी दीवानी रे नाचे मस्तानी
मीरा सी दीवानी रे नाचे मस्तानी
होंठों पर हैं गम तो आँखों में पानी
घुँघरू दीवाने हुए
रिश्ते पुराने हुए
गीत में कहानी गाई रे पुरवा

पुरवा सुहानी आई रे पुरवा
पुरवा सुहानी आई रे पुरवा
ऋतुओं की रानी आई रे पुरवा
मेरे रुके नहीं पांव
प्रीत पे जवानी छाई रे, पुरवा

पुरवा सुहानी आई रे पुरवा

हो ढोली ढोल बजाना
हो ताल से ताल मिलाना
ढोली ढोल बजाना
ताल से ताल मिलाना
...................................
Purwa suhani aayi re-Purab aur paschim 1970

Friday, 29 July 2011

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे –पूरब और पश्चिम १९७०

पुरुष वर्ग के समर्पण की इन्तेहा, कुछ अतिशयोक्ति सा लगता
ये गीत अपवाद स्वरुप समाज में आपको कहानी रूप में कहीं न
कहीं ज़रूर मिल जायेगा. ऐसा नहीं है कि केवल नारी ही इंतज़ार
करती है, कहीं पुरुष भी प्रतीक्षा कर लिया करता है. फिल्म में
नायिका का चरित्र विलायत में रहने वाली पाश्चात्य सभ्यता में पली
बढ़ी युवती का है. नायक देसी परम्पराओं को निभाने वाला एक
“सादा जीवन उच्च विचार” के साथ देशप्रेम की भावना से ओत
प्रोत युवक है. अब इतने विवरण से आपको नायक को पहचानने
में दिक्कत नहीं होना चाहिए.

जैसा कि हिंदी फिल्मों की कहानी की अनिवार्य मांग है-नायक
को नायिका से प्रेम हो जाता है. अब नायिका को अपने रंग ढंग
में ढालने के लिए और उसे वापस देसी संस्कृति की ओर लाने
के प्रयास में नायक ये गीत गाता है.

गीत इन्दीवर का लिखा हुआ है और निस्संदेह इसे उनके द्वारा
रहित गीतों में से सर्वाधिक लोकप्रिय का दर्ज़ा भी प्राप्त है. गीत
कि गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता. नपा तुला सा
है ये और उतनी ही नपी तुली धुन बनायीं है कल्याणजी आनंदजी
ने जिसे स्वर मुकेश ने दिया है.






गीत के बोल:

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे –पूरब और पश्चिम १९७०
तडपता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए

अभी तुमको मेरी ज़रूरत नहीं
बहुत चाहने वाले मिल जायेंगे
अभी रूप का एक सागर हो तुम
कमल जितने चाहोगी खिल जायेंगे
दर्पण तुम्हें जब डराने लगे
जवानी भी दामन छुड़ाने लगे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा सर झुका है झुका ही रहेगा तुम्हारे लिए

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे

कोई शर्त होती नहीं प्यार में
मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया
नज़र में सितारे जो चमके ज़रा
बुझाने लगीं आरती का दिया
जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो
अंधेरों में अपने ही घिरने लगो
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
ये दीपक जला है जला ही रहेगा तुम्हारे लिए

कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे
तडपता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए
...................................
Koi jab tumhara hriday tod de-Purab aur paschim 1970

Tuesday, 19 July 2011

तारों की छांव में-समाज को बदल डालो १९७०

आपको एक मजरूह का लिखा फिल्म बेनाम का एक लोरी गीत सुनवाया
था. अब सुनिए साहिर का लिखा एक गीत जिसे लोरी कहा जाये या बाल
गीत आप डिसाईड कीजिये. गीत मधुर है और इसे गा रही हैं लता मंगेशकर
नायिका शारदा के लिए फिल्म समाज को बदल डालो में. फिल्म के नाम से
ही अंदाजा लगा लीजिए कि इसके गीतों के लिए सबसे फिट कौन गीतकार
हो सकता है साहिरसा के सिवा. परीक्षित सहनी भी गीत में शामिल हो जाते
हैं थोड़ी देर में. रफ़ी की आवाज़ पर उन्होंने होंठ हिलाए हैं.

चुटकी वाले अंदाज़ में पुरुष स्वर के बोल सुनाई देना शुरू होते हैं. बाद में वो
भी लोरीमय हो जाते हैं .



गीत के बोल:

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है
तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

सो जाओ चैन से, इस काली रैन से
आगे जो देश है सुहाना है

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

गगन तले पवन चले ठंडी सुहानी
धीमी धीमी लय में कहे मन से कहानी
आई रे, आई रे
आई हिंडोले ले के निंदिया की रानी
सो जाओ, सो जाओ
सो जाओ, सो जाओ

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

भवें तेरी पिता जैसी माँ जैसी अँखियाँ
गज़ब करे जिया हरे भोली कनखियाँ
आई हैं आई हैं
आई हैं लेने तुम्हें फूलों की सखियाँ
सो जाओ, सो जाओ
सो जाओ, सो जाओ

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

खिली रहे सजी रहे यूँ ही ये क्यारी
हंसी खुशी जियो माँ तुमपे वारी
खिली रहे सजी रहे यूँ ही ये क्यारी
हंसी खुशी जियो माँ तुमपे वारी
आई रे आई रे
आई रे चंदा के रथ की सवारी
सो जाओ, सो जाओ
सो जाओ, सो जाओ

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है
..................................
Taaron ki chhaon mein-Samaj ko badal daalo 1970

Sunday, 17 July 2011

ये शाम मस्तानी-कटी पतंग १९७०

इस गीत के बारे में कुछ भी लिखना व्यर्थ है. इतनी बार इसे सुन लिया
गया है और इतनी दफे इसका जगह जगह उल्लेख हुआ है कि अब ज्यादा
लिखने कि गुंजाईश नहीं बची है सिवाए इसके गीतकार और संगीतकार के
नाम के. आनंद बक्षी ने लिखा और आर. डी. बर्मन ने इसका संगीत
तैयार किया है. फिल्म का नाम आपको मालूम ही है-गुलशन नंदा के
उपन्यास पर आधारित फिल्म कटी पतंग.



गीत के बोल:

ये शाम मस्तानी,
मदहोश किए जाए,
मुझे डोर कोई खींचे,
तेरी ओर लिए जाए

दूर रहती है तू,
मेरे पास आती नहीं,
होठों पे तेरे
कभी प्यास आती नहीं,
ऐसा लगे जैसे कि तू,
हँस के जहर कोई पिए जाये

ये शाम मस्तानी,
मदहोश किए जाए,
मुझे डोर कोई खींचे,
तेरी ओर लिए जाए

बात जब मैं करूँ,
मुझे रोक देती है क्यों,
तेरी मीठी नजर
मुझे टोक देती है क्यों
तेरी हया, तेरी शरम,
तेरी कसम मेरे होंठ सिये जाए

ये शाम मस्तानी,
मदहोश किए जाए,
मुझे डोर कोई खींचे,
तेरी ओर लिए जाए

एक रूठी हुई
तकदीर जैसे कोई,
खामोश ऐसे है तू
तसवीर जैसे कोई
तेरी नजर बन के जुबां,
लेकिन तेरे पैगाम दिए जाए

ये शाम मस्तानी,
मदहोश किए जाए,
मुझे डोर कोई खींचे,
तेरी ओर लिए जाए
.................................
Ye shaam mastani-Kati Patang 1970

Wednesday, 22 June 2011

लगी ना छूटेगी-परदेसी १९७०

आपको सन १९७० की परदेसी का एक गीत सुनवा चुके हैं।
अगला गीत सुनिए लता मंगेशकर की आवाज़ में। साहिर
के अंदाज़-ए-बयां पर तो संगीतप्रेमी काफी लिखते रहे हैं और
लिखते रहेंगे, थोड़ा मजरूह के अंदाज़-ए-बयां पर भी गौर किया
जाये जिन्होंने ज्यादा सरल और थोड़े कठिन अंदाज़ में काफी
उम्दा किस्म के अफ़साने बुने।

प्रस्तुत गीत में विद्रोही सी सुनाई पढ़ती नायिका का सरे आम
इकरार-ए-मोहब्बत है और अनूठे अंदाज़ में। कुछ चैलेंज वाले
अंदाज़ में ज़माने से वो मुखातिब है-जो बन पड़े कर ले बैरी जहां,
बीच में दीवारें खड़ी करवा दो चाहे मंगल ग्रह भेज दो, हम तो प्यार
करेंगे, बेहिसाब करेंगे और धुआंधार करेंगे।

कुछ कुछ सफ़ेद कपड़ों को उजला बनाने वाले उत्पादों के विज्ञापन
जैसे शुरू होते इस विडियो में लहराते बलखाते कलाकारों के
नाम हैं-विश्वजीत और मुमताज़। कुछ मनमोहक कुछ बोर से
नृत्य में थोड़ी खींचा-तानी थोड़ी ढिशुम-ढिशुम की मिलावट है।




गीत के बोल:

लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ

लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ

तू रोक जो सके रोक ले थाम के
हंस देगी मेरी पायल तेरे नाम पे
बोलियाँ प्यार की
बोलियाँ प्यार की बोलती जाऊंगी
कट दे चाहे मेरी जुबां

लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ

दुनिया ने फिर उसे दुःख दिया भी तो क्या
कोई प्यार को भुला के जिया भी तो क्या
बावरा मन कहे
बावरा मन कहे, मार डालो मोहे
ना रहूंगी मैं पी के बिना

लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ

अब छीन के मुझे ले चले तू कहीं
धड़कन तो मेरे दिल की मिलेगी नहीं
प्यार में खो चुकी
प्यार में खो चुकी मैं तो गुम हो चुकी
अब रहा जिया मेरा कहाँ

लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
................................
Lagi na chhootegi-Pardesi 1970

चूड़ियाँ बाज़ार से मंगवा दे-सुहाना सफ़र १९७०

फ़िल्मी गीतों की कई श्रेणियां हैं-चूड़ी हिट, बिंदी हिट, कंगना हिट,
घाघरा हिट, चोली हिट, परदेसी हिट, विदेशी हिट इत्यादि ।
हमारे एक मित्र को श्रेणियां बनाने का बड़ा शौक है। दो श्रेणी वे
बनाते, दो हम उन्हें मुफ्त में सुझा देते, कभी वे खुश होते तो
कभी वे सुनकर सर खुजाते। इसको यूँ पढ़ें-कभी वे सर पीटते
कभी हम। उसका किस्सा फिर कभी।

आइये आपको एक बहुत दिन से ना सुना एक गीत सुनवाते हैं
जिसमें नायिका नायक से चूड़ियाँ लाने की फरमाइश कर रही है।
उसके बाद बैयाँ पकड़ने का आकर्षक ऑफर भी दिया जा रहा है।

होली का अवसर है और इसमें हुडदंग, डांस, शोरगुल और गीत के
बोल सभी का मिश्रण है। कुल मिला कर ये फ़िल्मी मसालेदार खिचड़ी
सुनने में स्वादिष्ट सी है।



गीत के बोल:

चूड़ियाँ बाज़ार से मंगवा दे रे पहले सैयां
पकड़ फिर बैयाँ
पकड़ फिर बैयाँ, ओ
पकड़ फिर बैयाँ

चूड़ियाँ बाज़ार से मंगवा दे रे पहले सैयां
पकड़ फिर बैयाँ
पकड़ फिर बैयाँ, ओ
पकड़ फिर बैयाँ

रेशमी सलवार तो दिलवा दे रे पहले सैयां
पकड़ फिर बैयाँ
पकड़ फिर बैयाँ, हो

हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

गोरे मुखड़े से गोरी सरका दे
हा आ आ आ
गोरे मुखड़े से गोरी सरका दे
चुनर रंग लेने दे
कच्चा रंग है उतार जायेगा
नज़र रंग लेने दे
जो उतरे ना फिर अंग से
मोहे रंग दे ऐसे रंग से
प्यार ज़रा गुलाल में मिला ले हो पहले सैयां
पकड़ फिर बैयाँ
पकड़ फिर बैयाँ, ओ
पकड़ फिर बैयाँ

चूड़ियाँ बाज़ार से मंगवा दे रे पहले सैयां
पकड़ फिर बैयाँ
पकड़ फिर बैयाँ, हो

माने बात जो तू एक मेरी
हा आ आ आ आ
माने बात जो तू एक मेरी
मैं मानूं सौ बातें
तेरे कदमें में डाल दूं ला के
ज़माने की सौगातें
पहले ले दे मुझको घाघरा
फिर ले चल मुझे आगरा

ताजमहल की सैर तो करवा दे रे पहले सैयां
पकड़ फिर बैयाँ
पकड़ फिर बैयाँ, ओ
पकड़ फिर बैयाँ

चूड़ियाँ बाज़ार से मंगवा दे रे पहले सैयां
पकड़ फिर बैयाँ
पकड़ फिर बैयाँ, हो
............................
Choodiyan bazaar se-Suhana Safar 1970

Friday, 3 June 2011

मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा-पगला कहीं का १९७०

'वेदांत के सिद्धांत' और 'आबरा का डबरा' एक दूसरे के पर्याय हैं। वेदांत एक
मित्र मण्डली का सदस्य है। अकाउंटिंग के पेशे में नहीं होता तो शायद वो
एक सफल राजनीतिक वक्ता या सम्पादकीय लिखने वाला पत्रकार बन
सकता था। किन किन चीज़ों के parallel draw करता था वो, हमारे दिमाग
के कल्पना-कोष से बाहर होते थे। इतनी सफाई और चतुराई के साथ ही
वो विषय परिवर्तन करता कि कब 'मूंग की दाल' से दिल्ली के 'जंतर मंतर'
के बारे में जानकारी शुरू हो जाती, पता ही नहीं चलता। उसकी इसी खूबी
के चलते उसको उसी के समकक्ष एक मित्र ने 'आबरा का डबरा, की पदवी
भी दे डाली। आज आपको अपने मित्र की पसंद का एक गीत सुनाता हूँ।

गीत लिखा है हसरत जयपुरी ने जिन्होंने शंकर जयकिशन के लिए कई
रोमांटिक गीत लिखे। आवाज़ मन्ना डे की है। गीत में आपको कई हास्य
कलाकार दिखाई देंगे नायक शम्मी कपूर और नायिका आशा पारेख के
अलावा।




गीत के बोल:

क्यूँ मारा, क्यूँ मारा
क्यूँ मारा, क्यूँ मारा
क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

वो लड्डू पड़े खाती है, हाँ
वो पेड़ों पे चढ़ जाती है, हाँ
वो लड्डू पड़े खाती है
वो पेड़ों पे चढ़ जाती है
ये मच्छर बीन बजाते हैं
वो अपना राग सुनती है
वो छुम्मक छुम्मक नाचे जब मैं दिल का बजाऊँ
मैं दिल का बजाऊँ एक तारा

मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

अरे घर का ये एक स्टेशन है, हाँ
ये झंडी प्यारी प्यारी है
अरे घर का ये एक स्टेशन है
ये झंडी प्यारी प्यारी है
हम सब तो रेल के डिब्बे हैं
वो अपनी इंजन गाडी है
वो गुस्सा जब भी करती है
तो बन जाती है
तो बन जाती है, अंगारा

मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

बंधू रे बंधू रे
वो जान से बढ़ कर प्यारी है
बंधू रे, बंधू रे
क्या बोलूं मैं,
क्या बोलूं मैं एक कटारी है
बंधू रे, बंधू रे
वो जान से बढ़ कर प्यारी है, हाँ
क्या बोलूं मैं एक कटारी है, हाँ
वो जान से बढ़ कर प्यारी है
क्या बोलूं मैं एक कटारी है
कजरारी उसकी अँखियाँ हैं
इस बात से अपनी यारी है
मैंने तो अपनी कल्लो का है नाम रखा
है नाम रखा, जहान आरा

मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
.................................
Meri bhains ko danda kyun maara-Pagla kahin ka 1970

Saturday, 15 January 2011

चला भी आ आ जा रसिया- मन की ऑंखें १९७०

आइये आपका रिवीज़न कराया जाए। ये गीत पहले आपको
सुनवाने का प्रयत्न किया गया था, शायद आपकी नज़र इस पर
नहीं पड़ी हो, तो आज फिर से एक बार सुन लेते हैं इसको। बाकी
का विवरण इधर है-मन की ऑंखें । यूँ समझिये जैसे मास्साब
स्कूल में रिवीज़न कराते हें वैसे ही हम आपका रिवीज़न करा रहे हैं।




गाने के बोल:

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

मुरझा चले हैं अरमान सारे
धुंधला गए हैं सभी उजले नज़ारे
कैसे जियूंगी ग़मों के सहारे
तरसी निगाहें मेरी तुझको सदायें दें ,
धड़कन पुकारे

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
दिल तो गया मेरा कहीं जान न जाए
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए

चला भी आ...........

मेरी लगन को कहाँ तूने जाना
तेरे लिए तो मेरा दिल है दीवाना
हर साँस मेरी तेरा ही तराना
ये जिंदगानी क्या है
तेरी कहानी है तेरा ही फ़साना

तेरा मेरा वो है रिश्ता
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
.......................................
Chala bhi aa, aa ja rasiya-Man ki ankhen 1970

Monday, 6 December 2010

मोहब्बत से तुम्हें देखा-रातों का राजा १९७०

एक और गीत सुन लेते हैं फिल्म रातों का राजा से।
धीरज कुमार और वैशाली पर फिल्माया गया ये गीत
कुछ कुछ ऐसे शुरू होता है जैसे किसी गीत का अंतरा
सुना जा रहा हो। यही तो खूबी थी पंचम की। अभी तक
किसी पंचम भक्त की नज़र नहीं पड़ी इस ब्लॉग पर वरना
वो इसी गीत की २५-३० खूबियाँ गिनवा देता। एक बात तो
ज़रूर है गीत में नायिका और एक काला कुत्ता दिखाई दे
रहे हैं हीरो के सिवा जो दोनों ही खूबसूरत दिखते हैं। जाने
निर्देशक कुत्ते को प्रतीक रूप में इस्तेमाल कर के ये बताना
चाह रहा हो कि नायक बिलकुल ऐसे कर रहा है जैसे कुत्ता
हड्डी देख के लपकता हो। संभव है वो ये बताना चाह रहा
हो कि असली रातों का राजा ये है जनाब।

देखने पर ऐसा लगता है मानो समुद्र किनारे ये गीत फिल्माया
गया हो, मगर रेत पर गिरने पर चोट नहीं लगा करती, ये ज़रूर
सूखी नदी है कोई । गीत गाया है लता और रफी ने।




गीत के बोल:

मोहब्बत से तुम्हें देखा
मगर तुम ना जाने क्या समझे
जो इतना भी नहीं समझे सनम
तो फिर तुमसे खुदा समझे

मोहब्बत से तुम्हें देखा
मगर तुम ना जाने क्या समझे
जो इतना भी नहीं समझे सनम
तो फिर तुमसे खुदा समझे

लग रहा है हर नज़र में प्यार भी है
थोडा थोडा होश भी है थोड़ी थोड़ी बेखुदी भी
मेरी चाहत को ना समझे हाय नादान हो तुम ऐसे
जाने जाना फिर बता दो तुमको चाहूं और कैसे

मोहब्बत से तुम्हें देखा
मगर तुम ना जाने क्या समझे
जो इतना भी नहीं समझे सनम
तो फिर तुमसे खुदा समझे

बेकरारी पे हमारी किन ख्यालों में ये गुम हो
देखने दो फूल ज्यादा खूबसूरत हैं कि तुम हो
आज छेड़ा जो हवा ने सिमटी जाती हैं ये बाहें
जाने क्या है बेइरादा झुकती जाती हैं निगाहें

मोहब्बत से तुम्हें देखा
मगर तुम ना जाने क्या समझे
जो इतना भी नहीं समझे सनम
तो फिर तुमसे खुदा समझे

मोहब्बत से तुम्हें देखा
मगर तुम ना जाने क्या समझे
जो इतना भी नहीं समझे सनम
तो फिर तुमसे खुदा समझे

आना तो सजनी दिन को आना-रातों का राजा १९७०

अजीब मसला है-फिल्म का नाम है 'रातों का राजा'
और गीत गाया जा रहा है-आना तो सजनी दिन को
आना। १९७० की एक 'ये आई और वो गई' फिल्म से एक
सुनने लायक गीत पेश है। मजरूह के बोल और पंचम
का संगीत है। हीरो हैं २५ फ्लॉप फिल्मों के हीरो
धीरज कुमार। माफ़ कीजियेगा ये नाम मैंने नहीं
रखा उनका, ये तो बहुतों से सुनता आया हूँ। सुना है
उन्होंने एक्टिंग का डिप्लोमा डिग्री वगैरह भी ले रखी
है। अमां यार किस्मत फूटी हो तो डिग्री डिप्लोमा क्या
कर लेंगे। अब आप ही बताइए कि स्विमिंग पूल
में बच्चों का गेंद वाला खेल खेलेंगे तो फिल्म हिट
कहाँ से होगी? स्विमिंग पूल वाले खेल खेलने चाहिए
ना। फिल्म की नायिका कोई वैशाली नाम की मोहतरमा
हैं।




गीत के बोल:

आना तो सजनी दिन को आना
सपनों में आ के सताना ना
हाय,आना तो सजनी दिन को आना
सपनों में आ के सताना ना
अरे, सपनों में आ के सताना ना

दिन को जब गुल खिले
मेरी जान तू मिले
दिन को जब गुल खिले
मेरी जान तू मिले

फिर अदा का खज़ाना
आ के मुझपे लुटाना
पर ये गुज़ारिश सुनती जाना
सपनों में आ के सताना ना

हाय,आना तो सजनी दिन को आना
सपनों में आ के सताना ना
अरे, सपनों में आ के सताना ना

देख ले जालिम
ये तड़पना मेरा
देख ले जालिम
ये तड़पना मेरा

मेरी निंदिया की चोरी
तूने की चकोरी
हाय,मुझे करके दीवाना
सपनों में आ के सताना ना

हाय,आना तो सजनी दिन को आना
सपनों में आ के सताना ना
अरे, सपनों में आ के सताना ना

तेरे जलवे हज़ार
तू है जान-ए-बाहर
तेरे जलवे हज़ार
तू है जान-ए-बाहर
ले के आंचल की छैया
कहियो आ मोरे सैयां
जागूं तो चाहे जो फरमाना
सपनों में आ के सताना ना

हाय,आना तो सजनी दिन को आना
सपनों में आ के सताना ना
अरे, सपनों में आ के सताना ना

Saturday, 20 November 2010

कहीं दूर जब दिन ढल जाए-आनंद १९७०

हम जनता को उनकी पसंद से भी पहचानते हैं। किसी व्यक्ति
के मूड का अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है इसका एक उदाहरण
देता हूँ।

एक सज्जन को मुकेश के गीत पसंद हैं। फिल्म आनंद का ये मशहूर
गीत -"कहीं दूर जब दिन ढल जाए" इन महाशय ने अपनी कालर ट्यून
बना रखा था। जब भी उनको मोबाइल पर रिंग मारो ये गीत सुनाई देता
था। इससे मूड फ्रेश हो जाया करता। ये सिलसिला बहुत दिन तक चला ।
साल भर बाद उनकी कालर ट्यून बदल गई। हिमेश रेशमिया का कोई गीत
उन्होंने कालर ट्यून बना के लगा डाला। उसी के साथ उनके व्यवहार में
बदलाव भी दिखा। उनकी आँखों में अब अक्सर सूअर का बाल दिखाई देता।
इस फेनोमिना की क्या वजह हो सकती है मेरी समझ के बाहर है।

खैर, ये गीत सुनिए आज, जो एक सदाबहार गीत है और फिल्म जगत के
काका अर्थात राजेश खन्ना इसको परदे पर गा रहे हैं। योगेश के लिखे गीत
के लिए धुन बनाई है सलिल चौधरी ने।



गीत के बोल:

कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये

मेरे ख्यालों के आंगन में
कोई सपनों के दीप जलाये
दीप जलाये

कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये

कभी यूँ ही जब हुयीं बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे जब यूँ ही ऑंखें
कभी यूँ ही जब हुयीं बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे जब यूँ ही ऑंखें
कभी मचल के प्यार से चल के
छुए कोई मुझे पर नज़र ना आये
नज़र ना आये

कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये

कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते
कहीं से निकाल आयें जन्मों के नाते
कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते
कहीं से निकाल आयें जन्मों के नाते

है मीठी उलझान बैरी अपना मन
अपना ही हो के सहे दर्द पराये
दर्द पराये

कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे
दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे

ये मेरे सपने यही तो हैं अपने
मुझसे जुदा ना होंगे इनके ये साये
इनके ये साये
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Kahin door jab din dhal jaaye-Anand 1970
 
 
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