अरसे बाद एक मित्र से मुलाक़ात हुई एक हॉस्पिटल में । बहुत दिनों
बाद मिले तो वे कुछ भावुक और कुछ हॉस्पिटेबल से हो उठे। उनका
हॉस्पिटल में हॉस्पिटेबल होना कुछ अनूठा सा लगा। अस्पताल के कैंटीन
में वे चाय और समोसे के लिए आग्रह करने लगे। ज्ञात हो वे अपनी तरफ
से आग्रह वैसे भी कम किया करते थे और हम लोगों से आग्रह की अपेक्षा
रखने वालों में से एक थे। ये उन दिनों की बात है जब हम लोग एक शैक्षणिक
संस्था में कुछ क्षण के लिए ज्ञान के छींटे और अनुभव बटोरने जाया करते थे।
हमने भी कुछ पुराने ज़माने का उधार वसूलने वाले अंदाज़ में ४ समोसे डकार
लिए जो सामान्य व्यक्ति और बीमार दोनों के लिए समान रूप से उपयुक्त लगते
थे स्वाद में। बस, ताज़े बने हुए थे इसलिए हम उसे पूड़ी-सब्जी वाले अंदाज़ में
खा गए। उसके बाद हैं थोड़ी सी शर्म अवश्य आई इस बात को ले कर कि अस्पताल
में हम मरीज़ के हाल-चाल जानने के बजाये पेट भरने का कार्य कर रहे हैं। शायद
ये भाव जो मन में उपजा वह हमारे मित्र कि अंतरात्मा से निकले स्वर की वजह से
हुआ हो:अरे यार ऐसे ठूंस रहे हो जैसे जन्म जन्मांतर से भूखे हो। उनके चेहरे पर
समोसे खाने की प्रक्रिया के बाद हॉस्पिटलिटी वाले भाव नदारद थे और जो भाव थे
उनको देख के हमारे मन में “पिटी” वाले भाव उभारना शुरू हो गए।
हुआ यूँ वे अपने किसी बीमार मित्र को देखने वहां आये हुए थे । बीमार शब्द से याद
आया–बीमा+मार । हर एक को बीमा अवश्य करवा लेना चाहिए। कम से कम वो
बीमारी की मार(इलाज़ का खर्चा)से तो कुछ हद तक बचेगा।
आइये आपको अस्पताल की पृष्ठभूमि पर बना एक गीत सुनवाते हैं। इस गीत में भी
आपको अस्पताल के कुछ हिस्से दिखलाई दे जायेंगे। नायक एक्स रे की फिल्म देखते
देखते अतीत की सुनहरी यादों में खो खो जाता है। फिल्म की कहानी अस्पताल में
घूमती है। अभी तो फिल्म के नायक नायिका खुशनुमा से गीत में खुश दिखायी दे रहे
हैं। आगे आने वाले गीतों में हम चर्चा करेंगे फ़िल्मी अस्पताल के बारे में।
गीत है फिल्म दिल एक मंदिर से जिसमें राजेंद्र कुमार और मीना कुमारी एक रोमांटिक
गीत में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसे लिखा है हसरत जयपुरी ने और इसकी
धुन बनाई है शंकर जयकिशन ने।
गीत के बोल:
यहाँ कोई नहीं तेरा मेरे सिवा
कहती है झूमती गाती हवा
तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
बादल भी बन के पानी एक दिन तो बरसता है
लोहा भी जल के आग में एक दिन तो पिघलता है
जिस दिल में हो मोहब्बत एक दिन तो तडपता है
यहाँ कोई नहीं तेरा मेरे सिवा
कहती है झूमती गाती हवा
तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
तेरे मन की उलझनें सुलझाना चाहता हूँ
तुझे आज से अपनी मैं बनाना चाहता हूँ
मन के सुनहरे मंदिर में बिठाना चाहता हूँ
यहाँ कोई नहीं तेरा मेरे सिवा
कहती है झूमती गाती हवा
तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
तुम सबको छोड़ कर आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ
...........................................
Yahan koi nahin tera mere siwa-Dil ek mandir 1963
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Friday, 16 December 2011
Wednesday, 19 October 2011
चाँद आहें भरेगा-फूल बने अंगारे-१९६३
चाँद को देख के जनता जनार्दन आहें भरती है। इस गीत में चाँद के आहें
भरने का जिक्र है। चाँद आहें क्यूँ भरेगा ये जानने के लिए सुनें पूरा गीत ।
बहुत खूबसूरत गीत है ये सुनने और देखने में। गीत शुरू होता है माला सिन्हा
के भावपूर्ण चेहरे को दिखाते हुए। आम दर्शक/श्रोता जो शायद राजेंद्र कुमार या
दिलीप कुमार को देखना चाहता है हर रोमांटिक गीत में उसको जोर का झटका
धीरे से लगता है राजकुमार की शक्ल देख के।
कुछ भी हो, गीत एक हिट गीत है और इसमें माला सिन्हा ने जो कमसिन और
अर्ध परिपक्व कन्याओं जैसे भाव चेहरे पर लाये हैं उससे आज की पीढ़ी की
कन्याओं, बालाओं, युवतियों को थोड़ा सबक लेना चाहिए कि शर्माया-वर्माया
कैसे जाये।
गीत में चाँद से आहें भराई हैं आनंद बक्षी साहब से और उन्हें धुन पर तैराया है
संगीतकार बन्धुओं कल्याणजी आनंदजी ने।
गीत के बोल:
चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
ऐसा चेहरा हैं तेरा
जैसे रोशन सवेरा
जिस जगह तू नहीं है
उस जगह है अँधेरा
ऐसा चेहरा हैं तेरा
जैसे रोशन सवेरा
जिस जगह तू नहीं है
उस जगह है अँधेरा
कैसे फिर चैन तुझ बिन
तेरे बदनाम लेंगे
कैसे फिर चैन तुझ बिन
तेरे बदनाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
आँख नाजुक सी कलियाँ
बात मिसरी की डालियाँ
होंठ गंगा के साहिल जुल्फें
जन्नत की गलियाँ
आँख नाजुक सी कलियाँ
बात मिसरी की डालियाँ
होंठ गंगा के साहिल जुल्फें
जन्नत की गलियाँ
तेरी खातिर फरिश्तें
सर पे इल्जाम लेंगे
तेरी खातिर फरिश्तें
सर पे इल्जाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
चुप न होगी हवा भी
कुछ कहेगी घटा भी
और मुमकिन है तेरा
जिक्र कर दे खुदा भी
चुप न होगी हवा भी
कुछ कहेगी घटा भी
और मुमकिन है तेरा
जिक्र कर दे खुदा भी
फिर तो पत्थर भी शायद
जफ्त से काम लेंगे
फिर तो पत्थर भी शायद
जफ्त से काम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
...................................
Chand aahen bharega-Phool bane angaare-1963
भरने का जिक्र है। चाँद आहें क्यूँ भरेगा ये जानने के लिए सुनें पूरा गीत ।
बहुत खूबसूरत गीत है ये सुनने और देखने में। गीत शुरू होता है माला सिन्हा
के भावपूर्ण चेहरे को दिखाते हुए। आम दर्शक/श्रोता जो शायद राजेंद्र कुमार या
दिलीप कुमार को देखना चाहता है हर रोमांटिक गीत में उसको जोर का झटका
धीरे से लगता है राजकुमार की शक्ल देख के।
कुछ भी हो, गीत एक हिट गीत है और इसमें माला सिन्हा ने जो कमसिन और
अर्ध परिपक्व कन्याओं जैसे भाव चेहरे पर लाये हैं उससे आज की पीढ़ी की
कन्याओं, बालाओं, युवतियों को थोड़ा सबक लेना चाहिए कि शर्माया-वर्माया
कैसे जाये।
गीत में चाँद से आहें भराई हैं आनंद बक्षी साहब से और उन्हें धुन पर तैराया है
संगीतकार बन्धुओं कल्याणजी आनंदजी ने।
गीत के बोल:
चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
ऐसा चेहरा हैं तेरा
जैसे रोशन सवेरा
जिस जगह तू नहीं है
उस जगह है अँधेरा
ऐसा चेहरा हैं तेरा
जैसे रोशन सवेरा
जिस जगह तू नहीं है
उस जगह है अँधेरा
कैसे फिर चैन तुझ बिन
तेरे बदनाम लेंगे
कैसे फिर चैन तुझ बिन
तेरे बदनाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
आँख नाजुक सी कलियाँ
बात मिसरी की डालियाँ
होंठ गंगा के साहिल जुल्फें
जन्नत की गलियाँ
आँख नाजुक सी कलियाँ
बात मिसरी की डालियाँ
होंठ गंगा के साहिल जुल्फें
जन्नत की गलियाँ
तेरी खातिर फरिश्तें
सर पे इल्जाम लेंगे
तेरी खातिर फरिश्तें
सर पे इल्जाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
चुप न होगी हवा भी
कुछ कहेगी घटा भी
और मुमकिन है तेरा
जिक्र कर दे खुदा भी
चुप न होगी हवा भी
कुछ कहेगी घटा भी
और मुमकिन है तेरा
जिक्र कर दे खुदा भी
फिर तो पत्थर भी शायद
जफ्त से काम लेंगे
फिर तो पत्थर भी शायद
जफ्त से काम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
फूल दिल थाम लेंगे
हुस्न की बात चली तो
सब तेरा नाम लेंगे
चाँद आहें भरेगा
...................................
Chand aahen bharega-Phool bane angaare-1963
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Sunday, 17 July 2011
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद-गुमराह १९६३
गीत को अगर एक पंक्ति या वाक्य में लिखा जाए तो यूँ होगा -
आप जले पर नमक छिडकने चले आये. इसी बात को कई
पहलुओं के साथ आहिस्ता से कहा गया है इस गीत में साहिर द्वारा.
आखिर में सब बातों को याद करने के लिए अफ़सोस भी व्यक्त
किया गया है.
बात आहिस्ता से भले ही कही गयी हो मगर महेंद्र कपूर की बुलंद
आवाज़ में है. महेंद्र कपूर को दो फिल्मों के गीत से बहुत फायदा
हुआ-गुमराह और हमराज़. दोनों ही फिल्मों में रवि का संगीत है.
एक फ़िल्मी गीत को रेकोर्ड करने के लिए साजिंदों की कितनी जमात
हो सकती है इस गीत से अंदाजा लगाइए. ये बात दीगर है कि इन
साजिंदों को गायकों की तुलना में चवन्नी या अठन्नी ही प्राप्त होती है.
और शायद एक बात और गौर करने लायक है-सितार बजाने वाले शास्त्रीय
संगीत के कलाकार आराम से नीचे खुली जगह में बैठ के सितार वादन
करते हैं, यहाँ टीन की छोटी फोल्डिंग कुर्सी पर असुविधाजनक तरीके से
साजिन्दे सितार बजने की चेष्टा कर रहे हैं.
गीत के बोल:
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए
आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था
शोख नजरों सी मुहब्बत का सलाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वो अहदे वफा याद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दिए
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
पर जो मांगे से ना पाया वो सिला याद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में ये हल्की सी मुलाकात तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
हाय किस वक्त मुझे कब का गिला याद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
.......................................
Aap aaye to khayal-e-dil-e-nashaad-Gumrah 1963
आप जले पर नमक छिडकने चले आये. इसी बात को कई
पहलुओं के साथ आहिस्ता से कहा गया है इस गीत में साहिर द्वारा.
आखिर में सब बातों को याद करने के लिए अफ़सोस भी व्यक्त
किया गया है.
बात आहिस्ता से भले ही कही गयी हो मगर महेंद्र कपूर की बुलंद
आवाज़ में है. महेंद्र कपूर को दो फिल्मों के गीत से बहुत फायदा
हुआ-गुमराह और हमराज़. दोनों ही फिल्मों में रवि का संगीत है.
एक फ़िल्मी गीत को रेकोर्ड करने के लिए साजिंदों की कितनी जमात
हो सकती है इस गीत से अंदाजा लगाइए. ये बात दीगर है कि इन
साजिंदों को गायकों की तुलना में चवन्नी या अठन्नी ही प्राप्त होती है.
और शायद एक बात और गौर करने लायक है-सितार बजाने वाले शास्त्रीय
संगीत के कलाकार आराम से नीचे खुली जगह में बैठ के सितार वादन
करते हैं, यहाँ टीन की छोटी फोल्डिंग कुर्सी पर असुविधाजनक तरीके से
साजिन्दे सितार बजने की चेष्टा कर रहे हैं.
गीत के बोल:
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए
आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था
शोख नजरों सी मुहब्बत का सलाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वो अहदे वफा याद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दिए
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
पर जो मांगे से ना पाया वो सिला याद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में ये हल्की सी मुलाकात तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
हाय किस वक्त मुझे कब का गिला याद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
.......................................
Aap aaye to khayal-e-dil-e-nashaad-Gumrah 1963
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Sunil Dutt
Saturday, 16 July 2011
हुस्न चला कुछ ऐसी चाल-ब्लफ़ मास्टर १९६३
कभी कभी आप किसी गीत को यकायक गुनगुनाना शुरू कर देते हैं, आज
आपको ऐसा ही गीत सुनवा रहे हैं जो एकदम से दिमाग में आया है अभी.
मनमोहन देसाई ने अपने करियर की शुरुआत से ही शायद बड़े सितारों के
साथ काम करना शुरू कर दिया था. सन १९६३ की फिल्म ब्लफ़ मास्टर के
निर्देशक वही हैं. इसमें शम्मी कपूर और सायरा बानो प्रमुख कलाकार हैं.
हिंदी फिल्म जगत में अक्सर ही निर्देशक से ज्यादा निर्माता की चली है और
कभी कभी इसी वजह से भी फिल्म पिट जाया करती. निर्माता की पसंद कुछ
होती, निर्देशक की कुछ और, इस सूरत में एक राय नहीं बन पाने से निर्देशक
को काम करने में आनंद नहीं आता. जहाँ निर्देशक की पसंद का ख्याल रखा
जाता वो फ़िल्में थोड़ी बेहतर होतीं. ये उन निर्देशकों के बारे में बात की जा रही
है जो निर्देशन की कला में निपुण हैं.
ब्लफ़ मास्टर में शायद स्टार कास्ट बढ़िया है समय के हिसाब से. इसमें उस
समय के नामचीन खलनायक प्राण भी मौजूद हैं.
गीत राजेंद्र कृष्ण का लिखा हुआ है जिसे संगीत में बांधने का काम किया है
कल्याणजी आनंदजी ने. इसे गा रहे हैं लता और रफ़ी.
नायक नायिका पिकनिक पर हैं और उनके साथ के बर्तन भांडे से लगता है
पर्याप्त खाद्य सामग्री है उसमें और जो जनाना सवारियां बड़ी गाडी से उतरी हैं
वे भी खा पी कर तृप्त हो सकती हैं.
गीत के बोल:
अरे हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ न हाल
हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ न हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
अजी दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया
हो ओ ओ ओ, कभी पास आएँ कभी दूर जाएँ
के हैं दिल चुराने की लाखों अदाएँ
नहीं तीर निकला अभी तक कमान से
नहीं तीर निकला अभी तक कमान से
कोई उनसे कह दे कि दिल को बचाएँ
कि दिल को बचाएँ
हाय, हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
कहाँ तक रहोगे ये दामन बचा के
के मुश्किल है बचना निशाने पे आ के
हमारा है क्या हम तो मिट के रहेंगे
हमारा है क्या हम तो मिट के रहेंगे
जहाँ तुमने देखा ज़रा मुस्करा के
ज़रा मुस्करा के
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
अरे हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
हो ओ ओ ओ,ये दिन हैं तुम्हारे ज़माना तुम्हारा
निगाहें उधर हैं इधर है इशारा
ये पैग़ाम देते हैं ज़ुल्फ़ों के साये
ये पैग़ाम देते हैं ज़ुल्फ़ों के साये
चला आए जो है मोहब्बत का मारा
मोहब्बत का मारा
उफ़,हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
.................................
Husn chala kuchh aisi chal-Bluff Master 1963
आपको ऐसा ही गीत सुनवा रहे हैं जो एकदम से दिमाग में आया है अभी.
मनमोहन देसाई ने अपने करियर की शुरुआत से ही शायद बड़े सितारों के
साथ काम करना शुरू कर दिया था. सन १९६३ की फिल्म ब्लफ़ मास्टर के
निर्देशक वही हैं. इसमें शम्मी कपूर और सायरा बानो प्रमुख कलाकार हैं.
हिंदी फिल्म जगत में अक्सर ही निर्देशक से ज्यादा निर्माता की चली है और
कभी कभी इसी वजह से भी फिल्म पिट जाया करती. निर्माता की पसंद कुछ
होती, निर्देशक की कुछ और, इस सूरत में एक राय नहीं बन पाने से निर्देशक
को काम करने में आनंद नहीं आता. जहाँ निर्देशक की पसंद का ख्याल रखा
जाता वो फ़िल्में थोड़ी बेहतर होतीं. ये उन निर्देशकों के बारे में बात की जा रही
है जो निर्देशन की कला में निपुण हैं.
ब्लफ़ मास्टर में शायद स्टार कास्ट बढ़िया है समय के हिसाब से. इसमें उस
समय के नामचीन खलनायक प्राण भी मौजूद हैं.
गीत राजेंद्र कृष्ण का लिखा हुआ है जिसे संगीत में बांधने का काम किया है
कल्याणजी आनंदजी ने. इसे गा रहे हैं लता और रफ़ी.
नायक नायिका पिकनिक पर हैं और उनके साथ के बर्तन भांडे से लगता है
पर्याप्त खाद्य सामग्री है उसमें और जो जनाना सवारियां बड़ी गाडी से उतरी हैं
वे भी खा पी कर तृप्त हो सकती हैं.
गीत के बोल:
अरे हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ न हाल
हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ न हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
अजी दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया
हो ओ ओ ओ, कभी पास आएँ कभी दूर जाएँ
के हैं दिल चुराने की लाखों अदाएँ
नहीं तीर निकला अभी तक कमान से
नहीं तीर निकला अभी तक कमान से
कोई उनसे कह दे कि दिल को बचाएँ
कि दिल को बचाएँ
हाय, हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
कहाँ तक रहोगे ये दामन बचा के
के मुश्किल है बचना निशाने पे आ के
हमारा है क्या हम तो मिट के रहेंगे
हमारा है क्या हम तो मिट के रहेंगे
जहाँ तुमने देखा ज़रा मुस्करा के
ज़रा मुस्करा के
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
अरे हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
हो ओ ओ ओ,ये दिन हैं तुम्हारे ज़माना तुम्हारा
निगाहें उधर हैं इधर है इशारा
ये पैग़ाम देते हैं ज़ुल्फ़ों के साये
ये पैग़ाम देते हैं ज़ुल्फ़ों के साये
चला आए जो है मोहब्बत का मारा
मोहब्बत का मारा
उफ़,हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
.................................
Husn chala kuchh aisi chal-Bluff Master 1963
Tuesday, 12 July 2011
जब जाग उठें अरमान-बिन बादल बरसात १९६३
हेमंत कुमार की आवाज़ में अब सुनते हैं सन १९६३ की फिल्म
बिन बादल बरसात से एक गीत. बढ़िया रोमांटिक गीत है और
इसमें आशा पारेख और विश्वजीत नैन मटक्का करते दिखेंगे आपको.
सितार और बांसुरी ने कमाल किया है गीत की शुरुआत में. मैंडोलिन
की तरह दोनों(नायक-नायिका)के दिल के तार झनझना जाते हैं.
शकील बदायूनीं के बोल हैं और हेमंत कुमार का संगीत है.
गीत के बोल:
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
हो घर में हसीं मेहमान तो कैसे नींद आये
नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
ये रात ये दिल की धडकन
ये बढती हुई बेताबी
एक जाम की ख़ातिर जैसे
बेचैन हो कोई शराबी
ये रात ये दिल की धडकन
ये बढती हुई बेताबी
एक जाम की ख़ातिर जैसे
बेचैन हो कोई शराबी
शोलों में घिरी हो जान तो कैसे नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
हम तुम की नयी उम्मीदें
यूँ खेल रही हैं दिल से
जिस तरह तड़प कर मौजें
टकराएँ किसी साहिल से
हम तुम की नयी उम्मीदें
यूँ खेल रही हैं दिल से
जिस तरह तड़प कर मौजें
टकराएँ किसी साहिल से
सीने में हो एक तूफ़ान तो कैसे नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
नज़दीक बहुत है मंजिल
फिर भी है गज़ब की दूरी
ऐ दिल ये तू ही बतला दे
वो कौन सी है मजबूरी
नज़दीक बहुत है मंजिल
फिर भी है गज़ब की दूरी
ऐ दिल ये तू ही बतला दे
वो कौन सी है मजबूरी
जब सोच में हो इंसान तो कैसे नींद आये
हो घर में हसीं मेहमान तो कैसे नींद आये
नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
...................................
Jab jaag uthe armaan-Bin badal barsaat 1963
बिन बादल बरसात से एक गीत. बढ़िया रोमांटिक गीत है और
इसमें आशा पारेख और विश्वजीत नैन मटक्का करते दिखेंगे आपको.
सितार और बांसुरी ने कमाल किया है गीत की शुरुआत में. मैंडोलिन
की तरह दोनों(नायक-नायिका)के दिल के तार झनझना जाते हैं.
शकील बदायूनीं के बोल हैं और हेमंत कुमार का संगीत है.
गीत के बोल:
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
हो घर में हसीं मेहमान तो कैसे नींद आये
नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
ये रात ये दिल की धडकन
ये बढती हुई बेताबी
एक जाम की ख़ातिर जैसे
बेचैन हो कोई शराबी
ये रात ये दिल की धडकन
ये बढती हुई बेताबी
एक जाम की ख़ातिर जैसे
बेचैन हो कोई शराबी
शोलों में घिरी हो जान तो कैसे नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
हम तुम की नयी उम्मीदें
यूँ खेल रही हैं दिल से
जिस तरह तड़प कर मौजें
टकराएँ किसी साहिल से
हम तुम की नयी उम्मीदें
यूँ खेल रही हैं दिल से
जिस तरह तड़प कर मौजें
टकराएँ किसी साहिल से
सीने में हो एक तूफ़ान तो कैसे नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
नज़दीक बहुत है मंजिल
फिर भी है गज़ब की दूरी
ऐ दिल ये तू ही बतला दे
वो कौन सी है मजबूरी
नज़दीक बहुत है मंजिल
फिर भी है गज़ब की दूरी
ऐ दिल ये तू ही बतला दे
वो कौन सी है मजबूरी
जब सोच में हो इंसान तो कैसे नींद आये
हो घर में हसीं मेहमान तो कैसे नींद आये
नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
...................................
Jab jaag uthe armaan-Bin badal barsaat 1963
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Friday, 24 June 2011
लोग कहते हैं तो सच ही-ये दिल किसको दूं १९६३
आपको एक माउथ ओर्गनिया और उछलकूदियाना गीत
सुनवाते हैं। जिस गीत की शुरुआत ऐसी उछल कूद से होती
है उसके लिए कोई उपयुक्त श्रेणी मुझे समझ नहीं आती। माउथ
ओरगन अर्थात मुंह से बजाय जाने वाला बाजा। मुंह से वैसे
तो कई चीज़ें बजायी जाती हैं और बजायी जा सकती हैं मगर
सबसे सोबर किस्म का नाम इसी बाजे का है जिसको माउथ
ओरगन कहा जाता है।
गाँव देहात में कभी इस बाजे के लिए एक शब्द भी सुना था
मैंने-विलायती पुंगी। तो आइये इस विलायती पुंगी की आवाज़
का आनंद उठाया जाये। फिल्म का शीषक गीत कह सकते हैं
आप से क्यूंकि फिल्म के नाम के उच्चारण से ही ये गीत
शुरू हो रहा है। गीत तेज़ गति वाला है और याहू-चाहे कोई
मुझे जंगली कहे की याद दिलाता है। उस गीत में शम्मी हैं
तो इस गीत में शशि।
गीत के बोल:
ये दिल किसको दूं
ये दिल किसको दूं
लोग कहते हैं कोई सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
धरती बिछौना मेरा
तारे खिलौना मेरा
राहों में उड़ते जुगनू
चंडी और सोना मेरा
मैं दिलवाला हूँ
मैं मतवाला हूँ
ना मैं दौलतमंद हूँ
ना मैं जन्नतमंद हूँ
दिल का करार मांगूं रे
मैं सच्चा प्यार मांगूं रे
दिल का करार मांगूं रे
मैं सच्चा प्यार मांगूं रे
ये दिल किसको दूं
ये दिल किसको दूं
लोग कहते हैं कोई सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मस्त कलंदर हूँ मैं
दिल का सिकंदर हूँ मैं
कोई ना समझे मुझको
गहरा समुन्दर हूँ मैं
मैं शहजादा हूँ
मैं शहजादा हूँ
यूँ तो सादा हूँ
ना है शैतान से रिश्ता ना मैं हूँ फ़रिश्ता
मैं तो आदम का बेटा हूँ
मैं तो हव्वा का बेटा हूँ
मैं तो आदम का बेटा हूँ
मैं तो हव्वा का बेटा हूँ
ये दिल किसको दूं
ये दिल किसको दूं
लोग कहते हैं कोई सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
.............................
Log kehte hain to sach hi-Ye dil kisko doon 1963
सुनवाते हैं। जिस गीत की शुरुआत ऐसी उछल कूद से होती
है उसके लिए कोई उपयुक्त श्रेणी मुझे समझ नहीं आती। माउथ
ओरगन अर्थात मुंह से बजाय जाने वाला बाजा। मुंह से वैसे
तो कई चीज़ें बजायी जाती हैं और बजायी जा सकती हैं मगर
सबसे सोबर किस्म का नाम इसी बाजे का है जिसको माउथ
ओरगन कहा जाता है।
गाँव देहात में कभी इस बाजे के लिए एक शब्द भी सुना था
मैंने-विलायती पुंगी। तो आइये इस विलायती पुंगी की आवाज़
का आनंद उठाया जाये। फिल्म का शीषक गीत कह सकते हैं
आप से क्यूंकि फिल्म के नाम के उच्चारण से ही ये गीत
शुरू हो रहा है। गीत तेज़ गति वाला है और याहू-चाहे कोई
मुझे जंगली कहे की याद दिलाता है। उस गीत में शम्मी हैं
तो इस गीत में शशि।
गीत के बोल:
ये दिल किसको दूं
ये दिल किसको दूं
लोग कहते हैं कोई सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
धरती बिछौना मेरा
तारे खिलौना मेरा
राहों में उड़ते जुगनू
चंडी और सोना मेरा
मैं दिलवाला हूँ
मैं मतवाला हूँ
ना मैं दौलतमंद हूँ
ना मैं जन्नतमंद हूँ
दिल का करार मांगूं रे
मैं सच्चा प्यार मांगूं रे
दिल का करार मांगूं रे
मैं सच्चा प्यार मांगूं रे
ये दिल किसको दूं
ये दिल किसको दूं
लोग कहते हैं कोई सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मस्त कलंदर हूँ मैं
दिल का सिकंदर हूँ मैं
कोई ना समझे मुझको
गहरा समुन्दर हूँ मैं
मैं शहजादा हूँ
मैं शहजादा हूँ
यूँ तो सादा हूँ
ना है शैतान से रिश्ता ना मैं हूँ फ़रिश्ता
मैं तो आदम का बेटा हूँ
मैं तो हव्वा का बेटा हूँ
मैं तो आदम का बेटा हूँ
मैं तो हव्वा का बेटा हूँ
ये दिल किसको दूं
ये दिल किसको दूं
लोग कहते हैं कोई सच ही कहते होंगे
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
मैं हूँ दीवाना, दिल है मस्ताना
गम से बेगाना
लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे
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Log kehte hain to sach hi-Ye dil kisko doon 1963
Tuesday, 7 June 2011
ज़िन्दगी क्या है-प्यार किया तो डरना क्या १९६३
आपने नई "प्यार किया तो डरना क्या" का गीत सुन लिया, अब सुनिए
शम्मी कपूर वाली फिल्म से एक गीत। गीत श्वेत श्याम है और दर्द
भरा है, पिछले गीत के विपरीत। गीत का फिल्मांकन बढ़िया है और
गीत भी मधुर है। शकील बदायूनीं के लिखे गीत को संगीत से संवारा
है रवि ने। ज़िन्दगी कितनी खाली खाली हो सकती है इस गीत को पूरा
देखने और सुनने के बाद अहसास होता है।
शम्मी कपूर पर फिल्माए गये खुशनुमा गीत आपने कई देखे होंगे मगर
उनके दर्द भरे गीत याद रख पाना आसान नहीं है। उनकी छबि उछल
कूद वाले और रोमांटिक गीत गाने वाले नायक की रही है। अपने शुरूआती
दौर में उन्होंने ज़रूर कुछ रुलाने वाले गीत गाये, कुछ तो ऐसे हैं जिनकी
धुन ही रोती सी सुनाई देती है।
गीत के बोल:
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
झूठी हैं दुनिया की बहारें रंग हैं सारे कच्चे
झूठी हैं दुनिया की बहारें रंग हैं सारे कच्चे
वक़्त पड़े तो थाम लें दामन फूल से काँटे अच्छे
इस गुलशन में क़दम-क़दम पर एक नया धोखा है
नया धोखा है
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
जब इन्सान अकेला था तो दुख भी न थे जीवन में
जब इन्सान अकेला था तो दुख भी न थे जीवन में
पाया जब हमराही उसने डूब गया उलझन में
ये दुनिया है बेगानों की कौन यहाँ अपना है
यहाँ अपना है
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
हाय रे वो इन्सान के जिसको ग़म की नज़र लग जाए
हाय रे वो इन्सान के जिसको ग़म की नज़र लग जाए
चुपके-चुपके आहें भरे और मुँह से न कुछ कह पाए
दिल अपना हँसता है खुद पर और कभी रोता है
और कभी रोता है
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
...................................
Zindagi kya hai-Pyar kiya to darna kya 1963
शम्मी कपूर वाली फिल्म से एक गीत। गीत श्वेत श्याम है और दर्द
भरा है, पिछले गीत के विपरीत। गीत का फिल्मांकन बढ़िया है और
गीत भी मधुर है। शकील बदायूनीं के लिखे गीत को संगीत से संवारा
है रवि ने। ज़िन्दगी कितनी खाली खाली हो सकती है इस गीत को पूरा
देखने और सुनने के बाद अहसास होता है।
शम्मी कपूर पर फिल्माए गये खुशनुमा गीत आपने कई देखे होंगे मगर
उनके दर्द भरे गीत याद रख पाना आसान नहीं है। उनकी छबि उछल
कूद वाले और रोमांटिक गीत गाने वाले नायक की रही है। अपने शुरूआती
दौर में उन्होंने ज़रूर कुछ रुलाने वाले गीत गाये, कुछ तो ऐसे हैं जिनकी
धुन ही रोती सी सुनाई देती है।
गीत के बोल:
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
झूठी हैं दुनिया की बहारें रंग हैं सारे कच्चे
झूठी हैं दुनिया की बहारें रंग हैं सारे कच्चे
वक़्त पड़े तो थाम लें दामन फूल से काँटे अच्छे
इस गुलशन में क़दम-क़दम पर एक नया धोखा है
नया धोखा है
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
जब इन्सान अकेला था तो दुख भी न थे जीवन में
जब इन्सान अकेला था तो दुख भी न थे जीवन में
पाया जब हमराही उसने डूब गया उलझन में
ये दुनिया है बेगानों की कौन यहाँ अपना है
यहाँ अपना है
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
हाय रे वो इन्सान के जिसको ग़म की नज़र लग जाए
हाय रे वो इन्सान के जिसको ग़म की नज़र लग जाए
चुपके-चुपके आहें भरे और मुँह से न कुछ कह पाए
दिल अपना हँसता है खुद पर और कभी रोता है
और कभी रोता है
ज़िन्दगी क्या है ग़म का दरिया है
न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में
अजब दुनिया है
ज़िन्दगी क्या है
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Zindagi kya hai-Pyar kiya to darna kya 1963
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Thursday, 2 June 2011
वो जब याद आए, बहुत याद आए-पारसमणि १९६३
मधुर गीतों की श्रृंखला में अगला युगल गीत पेश है फिल्म
पारसमणि से। १९६३ की फिल्म पारसमणि संगीतकार
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की पदार्पण फिल्म है। इस फिल्म के
संगीत ने ज़बरदस्त खलबली मचाई और इससे ऐलान
हुआ कि आगे आने वाले कई सालों तक ये संगीतकार जोड़ी
हिंदी फिल्म संगीत क्षेत्र में अपने झंडे गाड़ने वाली है।
असद भोपाली के बोलों पर आवाज़ दी है लता और रफ़ी ने।
सन १९६३ में लता और रफ़ी के कई अविस्मरणीय युगल गीत
बने जो आगे प्रस्तुत करेंगे हम इस ब्लॉग पर। फिलहाल इस
गीत का आनंद उठाते हैं। उस दौर में बहुत कम ही रंगीन
फ़िल्में बनी थीं, या बनती तो आधी श्वेत-श्याम, आधी रंगीन
होतीं। प्रस्तुत गीत रंगीन है। परदे पर महिपाल और
गीतांजलि नामक कलाकार हैं जो ज़्यादातर पौराणिक और
धार्मिक फिल्मों में ही देखे गये।
गीत के बोल:
वो जब याद आए, बहुत याद आए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
गम-ए-जिन्दगी के अँधेरे में हमने,
चिराग-ए-मुहब्बत के जलाए बुझाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
आहटे जाग उठीं, रास्ते हँस दिए,
थाम कर दिल उठे, हम किसी के लिए
कई बार ऐसा भी धोखा हुआ है,
चले आ रहे हैं वो नजरें झुकाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
गम-ए-जिन्दगी के अँधेरे में हमने,
चिराग-ए-मुहब्बत के जलाए बुझाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
दिल सुलगने लगा, अश्क बहने लगे
जाने क्या क्या हमें लोग कहने लगे
मगर रोते रोते हँसी आ गई है
ख्यालों में आ के वो जब मुस्कुराये
वो जुदा क्या हुए, जिन्दगी खो गई
शम्मा जलती रही रोशनी खो गई
बहुत कोशिशें कीं मगर दिल ना बहला
कई साज छेड़े, कई गीत गाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
....................................
Wo jab aad aaye-Parasmani 1963
पारसमणि से। १९६३ की फिल्म पारसमणि संगीतकार
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की पदार्पण फिल्म है। इस फिल्म के
संगीत ने ज़बरदस्त खलबली मचाई और इससे ऐलान
हुआ कि आगे आने वाले कई सालों तक ये संगीतकार जोड़ी
हिंदी फिल्म संगीत क्षेत्र में अपने झंडे गाड़ने वाली है।
असद भोपाली के बोलों पर आवाज़ दी है लता और रफ़ी ने।
सन १९६३ में लता और रफ़ी के कई अविस्मरणीय युगल गीत
बने जो आगे प्रस्तुत करेंगे हम इस ब्लॉग पर। फिलहाल इस
गीत का आनंद उठाते हैं। उस दौर में बहुत कम ही रंगीन
फ़िल्में बनी थीं, या बनती तो आधी श्वेत-श्याम, आधी रंगीन
होतीं। प्रस्तुत गीत रंगीन है। परदे पर महिपाल और
गीतांजलि नामक कलाकार हैं जो ज़्यादातर पौराणिक और
धार्मिक फिल्मों में ही देखे गये।
गीत के बोल:
वो जब याद आए, बहुत याद आए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
गम-ए-जिन्दगी के अँधेरे में हमने,
चिराग-ए-मुहब्बत के जलाए बुझाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
आहटे जाग उठीं, रास्ते हँस दिए,
थाम कर दिल उठे, हम किसी के लिए
कई बार ऐसा भी धोखा हुआ है,
चले आ रहे हैं वो नजरें झुकाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
गम-ए-जिन्दगी के अँधेरे में हमने,
चिराग-ए-मुहब्बत के जलाए बुझाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
दिल सुलगने लगा, अश्क बहने लगे
जाने क्या क्या हमें लोग कहने लगे
मगर रोते रोते हँसी आ गई है
ख्यालों में आ के वो जब मुस्कुराये
वो जुदा क्या हुए, जिन्दगी खो गई
शम्मा जलती रही रोशनी खो गई
बहुत कोशिशें कीं मगर दिल ना बहला
कई साज छेड़े, कई गीत गाए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
वो जब याद आए, बहुत याद आए
....................................
Wo jab aad aaye-Parasmani 1963
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Saturday, 22 January 2011
दुनिया में आया है तो-मेरे अरमान मेरे सपने १९६३
अप्पको फिल्म मेरे अरमान मेरे सपने का एक मर्मस्पर्शी
गीत सुनवाया था -तेरा आना भी धोखा था। अब सुनिए इसी
फिल्म से एक और मधुर गीत रफ़ी की आवाज़ में। गीत पार्श्व
में बज रहा है और कुछ यादों के साये विडियो में लहरा रहे हैं।
प्रदीप कुमार और जयश्री गढ़कर आपको परदे पर दिखाई देंगे।
गीत प्रेरणादायक है और दुनिया से इंसान को अपने जाने के पहले
क्या करना चाहिए का सन्देश दे रहा है।
गीत के बोल:
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
छोटी सी ज़िन्दगी तेरी हँस के गुज़ार दे
अपनी बिगाड़ के किसी की सँवार दे,किसी की सँवार दे
जो हो बेगाना यहाँ अपना बनाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो
आया था प्यार से तो जाना भी प्यार से
कर ना गिला कोई जाती बहार से
आया था प्यार से तो जाना भी प्यार से
कर ना गिला कोई जाती बहार से, जाती बहार से
दिल पर जो बीत रही है दिल में छुपाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो
फूलों पे आज होता तेरा भी आशियाँ
आज तेरी आरज़ू बन गई दास्ताँ, बन गई दास्ताँ
बुझ गई शमा तेरी किसी की जलाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो
..................................................
Duniya mein aaya hai to-Mere armaan mere sapne 1963
गीत सुनवाया था -तेरा आना भी धोखा था। अब सुनिए इसी
फिल्म से एक और मधुर गीत रफ़ी की आवाज़ में। गीत पार्श्व
में बज रहा है और कुछ यादों के साये विडियो में लहरा रहे हैं।
प्रदीप कुमार और जयश्री गढ़कर आपको परदे पर दिखाई देंगे।
गीत प्रेरणादायक है और दुनिया से इंसान को अपने जाने के पहले
क्या करना चाहिए का सन्देश दे रहा है।
गीत के बोल:
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
छोटी सी ज़िन्दगी तेरी हँस के गुज़ार दे
अपनी बिगाड़ के किसी की सँवार दे,किसी की सँवार दे
जो हो बेगाना यहाँ अपना बनाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो
आया था प्यार से तो जाना भी प्यार से
कर ना गिला कोई जाती बहार से
आया था प्यार से तो जाना भी प्यार से
कर ना गिला कोई जाती बहार से, जाती बहार से
दिल पर जो बीत रही है दिल में छुपाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो
फूलों पे आज होता तेरा भी आशियाँ
आज तेरी आरज़ू बन गई दास्ताँ, बन गई दास्ताँ
बुझ गई शमा तेरी किसी की जलाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा
दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो
..................................................
Duniya mein aaya hai to-Mere armaan mere sapne 1963
Wednesday, 19 January 2011
ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना-बंदिनी १९६३
फिल्म बंदिनी के इस गीत के लिए भी किसी विवरण की
आवश्यकता नहीं है क्यूंकि ये गीत अपने आप में अपने
अनूठेपन का विवरण देता सुनाई पढता है। फिल्म सिनेमा
इतिहास के सबसे उम्दा विरह गीतों में से एक है ये।
गीत के बोल:
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना
ओ हो ओ ओ ओ
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे
बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे
ढूँढेंगे तुझे गली-गली सब ये ग़म के मारे
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना
हो ओ ओ ओ
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
हो ओ ओ ओ
हो ओ ओ ओ
दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए
दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना
हो ओ ओ ओ
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना
हो ओ ओ ओ
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
.................................
O jaanewale ho sake to-Bandini 1963
आवश्यकता नहीं है क्यूंकि ये गीत अपने आप में अपने
अनूठेपन का विवरण देता सुनाई पढता है। फिल्म सिनेमा
इतिहास के सबसे उम्दा विरह गीतों में से एक है ये।
गीत के बोल:
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना
ओ हो ओ ओ ओ
ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे
बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे
ढूँढेंगे तुझे गली-गली सब ये ग़म के मारे
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना
हो ओ ओ ओ
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
हो ओ ओ ओ
हो ओ ओ ओ
दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए
दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना
हो ओ ओ ओ
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना
हो ओ ओ ओ
जाने वाले हो सके तो लौट के आना
.................................
O jaanewale ho sake to-Bandini 1963
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Monday, 17 January 2011
पीपरा के पतवा-गोदान १९६३
आपको एक फ़िल्मी भोजपुरी गीत से रूबरू करवाते हैं।
शैलेन्द्र के लिखे बोलों की तर्ज़ बनाई है सितार वादक पंडित
रविशंकर ने। फिल्म गोदान के लिए इसे गा रहे हैं रफ़ी।
मस्त गीत है ये और इसको बहुत दिन बाद आज सुना है।
गीत के बोल:
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
अरे पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा कि ओर
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
अरे पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा कि ओर
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
अरे पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
झुकी झुकी बोले कारे कारे ये बदरवा
झुकी झुकी बोले कारे कारे ये बदरवा
कबसे पुकारे तोहे नैनों का कजरवा
उमड़ घुमड़ जब गरजे बदरिया रे
ठुमुक ठुमुक नाचे मोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
सिमिट सिमिट बोले लम्बी ये डगरिया
सिमिट सिमिट बोले लम्बी ये डगरिया
जल्दी जल्दी चल राही अपनी नगरिया
रहिया ताकत फिर हिनिया दुल्हनिया
रे बांध के लगनिया की डोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
.................................
Pipra ke patwa-Godaan 1963
शैलेन्द्र के लिखे बोलों की तर्ज़ बनाई है सितार वादक पंडित
रविशंकर ने। फिल्म गोदान के लिए इसे गा रहे हैं रफ़ी।
मस्त गीत है ये और इसको बहुत दिन बाद आज सुना है।
गीत के बोल:
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
अरे पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा कि ओर
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
अरे पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा कि ओर
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
अरे पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
झुकी झुकी बोले कारे कारे ये बदरवा
झुकी झुकी बोले कारे कारे ये बदरवा
कबसे पुकारे तोहे नैनों का कजरवा
उमड़ घुमड़ जब गरजे बदरिया रे
ठुमुक ठुमुक नाचे मोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
सिमिट सिमिट बोले लम्बी ये डगरिया
सिमिट सिमिट बोले लम्बी ये डगरिया
जल्दी जल्दी चल राही अपनी नगरिया
रहिया ताकत फिर हिनिया दुल्हनिया
रे बांध के लगनिया की डोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा
के हियरा में उठत हिलोर
पुरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा
के चल आज देसवा की ओर
.................................
Pipra ke patwa-Godaan 1963
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1963,
Bhojpuri geet,
Godaan,
Mohd. Rafi,
Pt. Ravishankar,
Shailendra
Saturday, 25 December 2010
मोरा गोरा अंग लईले-बंदिनी १९६३
इस गीत के लिए किसी विवरण की आवश्यकता नहीं है क्यूंकि
विवरण कई बार कई जगह पर आप पढ़ चुके होंगे। तब भी हम
उस विवरण को अपने अंदाज़ में आपके लिए परोस देते हैं।
फिल्म 'सितारों से आगे' के संगीत तैयार होने के वक़्त लता
और संगीतकार सचिन देव बर्मन में अनबन हुई थी जो कुछ
साल तक चली। उसके बाद लता ने जो पहला गीत एस. डी.
के लिए गाया वो यही था-फिल्म बंदिनी का गीत। दोनों के
सम्बन्ध फिर से मधुर बनाने में एस डी के पुत्र आर डी की
भूमिका भी थी। खैर जो हुआ अच्छा हुआ संगीत क्षेत्र के लिए।
लता की अनुपस्थिति में आशा भोंसले को बर्मन खेमे में गाने
का मौका मिला और उन्होंने कई अविस्मरणीय गीत गा लिए
उस दौरान । फिल्म 'लाजवंती' और 'चलती का नाम गाडी' ऐसी
कुछ फ़िल्में हैं जिनमे आपको लता का एक भी गीत नहीं मिलेगा
अन्यथा एस डी के संगीत वाली फिल्म में लता का एक गाना ना
हो, थोडा अचम्भे का विषय है कहा जाता है कि ये गुलज़ार का
प्रथम हिंदी फ़िल्मी गीत है। गीत के बोल हालाँकि शैलेन्द्र के
अंदाज़ वाले हैं और इसमें खट्टी मीठी आँखों का कोई जिक्र नहीं
है इसलिए थोडा संदेह सा होने लगता है कि इसका असली गीतकार
कौन है ? खैर हम उस जानकारी पर विश्वास करके चलते हैं जो
म्यूजिक एल्बम के विवरण द्वारा प्राप्त होती है।
गीत के बोल:
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
एक लाज़ रोके पईयाँ, एक मोह खींचे बईयाँ
एक लाज़ रोके पईयाँ, एक मोह खींचे बईयाँ
जाऊँ किधर ना जानू, हमका कोई बताई दे
हो ओ ओ ओ ओ ओ
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
बदरी हटा के चंदा, चुपके से झाँके चंदा
बदरी हटा के चंदा, चुपके से झाँके चंदा
तोहे राहू लागे बैरी मुसकाए जी जलाई के
हो ओ ओ ओ ओ ओ
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
कुछ खो दिया है पाइ के, कुछ पा लिया गँवाई के
कुछ खो दिया है पाइ के, कुछ पा लिया गँवाई के
कहाँ ले चला है मनवा मोहे बाँवरी बनाइ के
हो ओ ओ ओ ओ ओ
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
विवरण कई बार कई जगह पर आप पढ़ चुके होंगे। तब भी हम
उस विवरण को अपने अंदाज़ में आपके लिए परोस देते हैं।
फिल्म 'सितारों से आगे' के संगीत तैयार होने के वक़्त लता
और संगीतकार सचिन देव बर्मन में अनबन हुई थी जो कुछ
साल तक चली। उसके बाद लता ने जो पहला गीत एस. डी.
के लिए गाया वो यही था-फिल्म बंदिनी का गीत। दोनों के
सम्बन्ध फिर से मधुर बनाने में एस डी के पुत्र आर डी की
भूमिका भी थी। खैर जो हुआ अच्छा हुआ संगीत क्षेत्र के लिए।
लता की अनुपस्थिति में आशा भोंसले को बर्मन खेमे में गाने
का मौका मिला और उन्होंने कई अविस्मरणीय गीत गा लिए
उस दौरान । फिल्म 'लाजवंती' और 'चलती का नाम गाडी' ऐसी
कुछ फ़िल्में हैं जिनमे आपको लता का एक भी गीत नहीं मिलेगा
अन्यथा एस डी के संगीत वाली फिल्म में लता का एक गाना ना
हो, थोडा अचम्भे का विषय है कहा जाता है कि ये गुलज़ार का
प्रथम हिंदी फ़िल्मी गीत है। गीत के बोल हालाँकि शैलेन्द्र के
अंदाज़ वाले हैं और इसमें खट्टी मीठी आँखों का कोई जिक्र नहीं
है इसलिए थोडा संदेह सा होने लगता है कि इसका असली गीतकार
कौन है ? खैर हम उस जानकारी पर विश्वास करके चलते हैं जो
म्यूजिक एल्बम के विवरण द्वारा प्राप्त होती है।
गीत के बोल:
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
एक लाज़ रोके पईयाँ, एक मोह खींचे बईयाँ
एक लाज़ रोके पईयाँ, एक मोह खींचे बईयाँ
जाऊँ किधर ना जानू, हमका कोई बताई दे
हो ओ ओ ओ ओ ओ
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
बदरी हटा के चंदा, चुपके से झाँके चंदा
बदरी हटा के चंदा, चुपके से झाँके चंदा
तोहे राहू लागे बैरी मुसकाए जी जलाई के
हो ओ ओ ओ ओ ओ
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
कुछ खो दिया है पाइ के, कुछ पा लिया गँवाई के
कुछ खो दिया है पाइ के, कुछ पा लिया गँवाई के
कहाँ ले चला है मनवा मोहे बाँवरी बनाइ के
हो ओ ओ ओ ओ ओ
मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे
छुप जाऊँगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे
Friday, 10 December 2010
चलो एक बार फिर से-गुमराह १९६३
मिलने के पहले भी तो हम अजनबी थे। मिलने के
बाद फिर से अजनबी बन जाएँ। साहिर लुधियानवी
ने प्रेम को नए नए कोण से देख लिया। जितने प्रमाणिक
उनके गीत लगते हैं प्रेम के मामले में उतने दूसरों के
नहीं-ऐसा मैंने एक साहिर प्रेमी को कहते सुना। मैं
भी सोच में पड़ गया की ऐसा क्या क्या है साहिर के
रोमांटिक गीतों में कि जनता तारीफों के पुल बांधती
नहीं अघाती ।
तो जनाब उनके गीतों में कुछ कटु सच्चाई की मिलावट
भी पायी जाती है। केवल कल्पना ही नहीं उन्होंने
अपने अनुभव भी निचोड़ डाले हैं गीतों में। साहिर की
लिखी नज़्म प्रस्तुत है फिल्म गुमराह से। इसमें भी
उन्होंने -वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो
मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा,
यहाँ भूलने की जगह छोड़ना शब्द इस्तेमाल किया गया
है, क्यूंकि भूलना तो संभव ही नहीं है , या रिश्ते जब
बोझ बन जाते हैं तो उन्हें तोडना ही बेहतर है- का सन्देश
देते हैं।
प्रेम त्रिकोण पर आधारित ये फिल्म सन १९६३ में सिनेमा
घरों में प्रकट हुई थी। प्रस्तुत गीत के लिए महेंद्र कपूर
को सर्वश्रेष्ठ गायक के फिल्मफैयर पुरस्कार से नवाजा
जा चूका है। उस साल की बाकी दो प्रविष्टियों में जो गीत
थे वो इस प्रकार से हैं -१) मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत
की कसम फिल्म मेरे महबूब से रफ़ी का गाया हुआ और
२) जो वादा किया वो-ताजमहल से लता का गाया हुआ।
साहिर को फिल्म ताजमहल के गीत लेखन के लिए
फिल्मफैयर पुरस्कार दिया गया। संगीतकार रवि के
लिए भी ये फिल्म फायदेमंद साबित हुई। बी आर चोपड़ा
की आगे आनेवाली अधिकांश फिल्मों में आपको
संगीतकार रवि का संगीत मिलेगा।
गीत के बोल:
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
ना मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
ना तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
ना मेरे दिल की धड़कन लडखडाये मेरी बातों में
ना ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
तुम्हें भी कोई उलझान रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं, की यह जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साये हैं
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
तार्रुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
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Chalo ek baar fir se ajnabi ban jaayen ham dono-Gumrah 1963
बाद फिर से अजनबी बन जाएँ। साहिर लुधियानवी
ने प्रेम को नए नए कोण से देख लिया। जितने प्रमाणिक
उनके गीत लगते हैं प्रेम के मामले में उतने दूसरों के
नहीं-ऐसा मैंने एक साहिर प्रेमी को कहते सुना। मैं
भी सोच में पड़ गया की ऐसा क्या क्या है साहिर के
रोमांटिक गीतों में कि जनता तारीफों के पुल बांधती
नहीं अघाती ।
तो जनाब उनके गीतों में कुछ कटु सच्चाई की मिलावट
भी पायी जाती है। केवल कल्पना ही नहीं उन्होंने
अपने अनुभव भी निचोड़ डाले हैं गीतों में। साहिर की
लिखी नज़्म प्रस्तुत है फिल्म गुमराह से। इसमें भी
उन्होंने -वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो
मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा,
यहाँ भूलने की जगह छोड़ना शब्द इस्तेमाल किया गया
है, क्यूंकि भूलना तो संभव ही नहीं है , या रिश्ते जब
बोझ बन जाते हैं तो उन्हें तोडना ही बेहतर है- का सन्देश
देते हैं।
प्रेम त्रिकोण पर आधारित ये फिल्म सन १९६३ में सिनेमा
घरों में प्रकट हुई थी। प्रस्तुत गीत के लिए महेंद्र कपूर
को सर्वश्रेष्ठ गायक के फिल्मफैयर पुरस्कार से नवाजा
जा चूका है। उस साल की बाकी दो प्रविष्टियों में जो गीत
थे वो इस प्रकार से हैं -१) मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत
की कसम फिल्म मेरे महबूब से रफ़ी का गाया हुआ और
२) जो वादा किया वो-ताजमहल से लता का गाया हुआ।
साहिर को फिल्म ताजमहल के गीत लेखन के लिए
फिल्मफैयर पुरस्कार दिया गया। संगीतकार रवि के
लिए भी ये फिल्म फायदेमंद साबित हुई। बी आर चोपड़ा
की आगे आनेवाली अधिकांश फिल्मों में आपको
संगीतकार रवि का संगीत मिलेगा।
गीत के बोल:
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
ना मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
ना तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
ना मेरे दिल की धड़कन लडखडाये मेरी बातों में
ना ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
तुम्हें भी कोई उलझान रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं, की यह जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साये हैं
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
तार्रुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
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Chalo ek baar fir se ajnabi ban jaayen ham dono-Gumrah 1963
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1963,
Gumrah,
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