आज एक गीत स्वतः दिमाग में आया सोचा आपको सुनवा दिया जाये और तो,
संयोगवश ये आपको स्मार्ट इंडियन सुनवा चुके हैं अपने ब्लॉग पर कुछ ही दिन
पहले । इस फिल्म का नाम सुन कर आपको शायद १९६९ की आराधना के किशोर
के गाये गीत की याद अवश्य ही आएगी।
इस गीत में भाव लगभग वही हैं पत्थर के सनम वाले गीत के-'पत्थर के सनम
तुझे हमने मोहब्बत का खुदा जाना'। फर्क इतना है कि वो गीत मजरूह का लिखा
हुआ है और परदे पर मनोज कुमार पर फिल्माया गया है और इस गीत के गीतकार
आनंद बक्षी हैं और इसे परदे पर जीतेंद्र गा रहे हैं। दोनों गीतों में आपको मुमताज़
नामक अभिनेत्री दिखाई देती हैं। ये उस दौर की फिल्म है जिसमें अभिनेत्री मुमताज़
प्रथम श्रेणी कि सफल अभिनेत्रियों कि कतार में शामिल हो चुकी थीं।
गायक दोन ही गीतों के हैं-रफ़ी और संगीत भी दोनों गीतों का संगीतकार जोड़ी
लक्ष्मीकान्य प्यारेलाल ने तैयार किया है। गौर तलब है कि १९६७(पत्थर के सनम )
और १९७२ (रूप तेरा मस्ताना) तक लक्ष्मी प्यारे उसी शैली को बरकरार रख पाने
में सफल रहे। ये फिल्म अलबत्ता ज्यादा नहीं चली मगर फिल्म का ये गीत बेहद
लोकप्रिय हुआ।
गीत को आप निस्संदेह जीतेंद्र पर फिल्माए रफ़ी के सर्वश्रष्ठ गीतों में गिन सकते
हैं। गीत में आपको प्राण और अरुणा ईरानी नाम के कलाकार भी दिखाई देंगे।
प्राण तो स्वाभाविक तौर पर फिल्म के खलनायक ही हैं।
गीत के बोल:
हो ओ ओ ओ ओ ओ
बड़े बेवफा है ये हुस्न वाले
बड़े बेवफा है ये हुस्न वाले
पर तेरी बात कुछ और है
बड़े बेखबर है ये इश्क वाले
पर मेरी बात कुछ और है
बड़े बेवफा है ये हुस्न वाले
मिट गया जिस पे ये हो गए मेहरबान
आ आ आ आ आ आ आ आ आ
मिट गया जिस पे ये हो गए मेहरबान
हुस्न वालो की है बस यही दास्ता
कैसे कैसे न जाने दीवाने दिल
इन्ही बेवफाओ ने तोड़ डाले
बड़े बेवफा है ये हुस्न वाले
तू कही जानेमन रूठ जाना नही
आ आ आ आ आ आ आ आ आ
तू कही जानेमन रूठ जाना नही
ज़िक्र तेरा ये तेरा फ़साना नही
भोली भाली है इनकी सूरत मगर
बड़े संगदिल है यह भोले भाले
बड़े बेवफा है ये हुस्न वाले
पर तेरी बात कुछ और है
बड़े बेवफा है ये हुस्न वाले
........................................
Bade bewafa hain ye husn waale-Roop tera mastana १९७२
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Tuesday, 18 October 2011
Friday, 15 July 2011
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे-ब्रह्मचारी १९६८
आपको एक सूचना प्रधान गीत सुनवाते हैं. इसके मुखड़े के बोल ही
ऐसे हैं की लगता है सूचना दी जा रही हो. अपने ज़माने में आम श्रोता
और बाद के ज़माने में ओर्केस्ट्रा के कलाकारों और श्रोताओं का पसंदीदा
ये गीत है फिल्म ब्रह्मचारी से. गीत लिखा है शैलेन्द्र ने और इसे गाया
है रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने. संगीत तो आप पहचान ही गए होंगे
नहीं? तो, आपको पोस्ट के अंत में बतायेंगे.
आपको इसका विवरण ऐसे सुनाते हैं जैसे किसी किरकिट के मैच की
कमेंट्री सुनाई जाती है. - साड़े पांच इंच की मुस्कान के साथ एक
गिटार भांजता युवक गीत में सर्वप्रथम दिखाई देता है. इसके बाद प्रश्न
सूचक अंदाज़ में नायक नायिका की ओर कदम बढ़ा कर उससे कुछ
करने की इच्छा जाहिर करता है इशारों में जिसे नायिका शायद अभी
समझ नहीं पायी है. और जैसे ही नायक उसका हाथ पकड़ कर एक
चक्कर उसको खिलाता है नायिका खुशी से दायें बाएं होती हुई हाथ
झटकते हुए नाचना शुरू कर देती है मानो किसी खिलौने को चाबी दे
दी गयी हो. उसके बाद नायक बड़ी टांगने की पेटी(हारमोनियम)जैसे
दिखने वाले किसी वाद्य को बजाना शुरू कर देता है. मजे की बात ये
है कि वो एक कोर्ड(chord)के सेट पर उँगलियाँ जमाए है और बाकी
का काम बाजा खुद कर रहा है. अब एक विलन से दिखने वाले नौजवान
को देखिये सफ़ेद शेरवानी पहने, इनका नाम प्राण है. नायक नायिका का
गर्दन हिलाने का कार्यक्रम भी जारी है. हमारे स्टेटीशीयन थोड़ी देर में
बतलायेंगे कितनी बार गर्दन हिल गयी और कितनी बार शरीर के बाकी
भाग.
और लीजिए इसी के साथ नायक ने गाना शुरू कर दिया है. और मैंने भी
गीत के बोल लिखना शुरू कर दिया है. नायिका "अच्छा, तो क्या" जुमले
बोलने के बाद जो नायक गा रहा है वही दोहराना शुरू कर देती है जैसे कोई
ट्यूशन लेता हुआ बच्चा मास्टरजी के पहाडा को याद करते वक्त करता है-
दो एकं दो, दो दूनी चार . इसके बाद नायक एक अंग्रेजी बाजा जिसको हम
सेक्सोफोन कहते हैं, बजाना शुरू कर देता है एक आल राउंडर की तरह.
ऐसे होनहार युवकों की खेल जगत में बहुत ज़रूरत है जो कि समय आने
पर किरकिट का बल्ला छोड़ होकी, फुटबाल वगैरह खेल सकें, ज़रूरत पढ़ने
पर नाव का चप्पू भी चला सकें.
नायक नायिका का परिचय करवा दिया जाए इसी बीच जब तक सेक्सोफोन की
आवाज़ सुनाई देती है. नायक है शम्मी कपूर और नायिका हैं मुमताज़. अगले
ब्रेक में आपको गायक गायिकाओं के बारे में बतलायेंगे. और लीजिए वही नृत्य
फिर से चालू है अंग्रेजी के ट्विस्ट नृत्य से प्रेरित और इसमें हाथ झटकने की
देसी मिलावट है. इसको करने के पहले बस इतना करना होता है ,हाथ पानी
से धो ले और उसे पोंछें नहीं. बस ट्विस्ट नृत्य करते करते हाथ झटकिये,
हाथ अपने आप सूख जायेंगे. शम्मी कपूर के सर हिलाने की ट्रेडमार्क अदा को
नायिका भी इस गीत में दोहरा रही हैं. इस अदा का फायदा ये है कि अगर
आपके सर पर आटे का खुला डब्बा गिर पड़े तो इस प्रक्रिया को ३ मिनट तक
करने से आपके बालों पर चिपका,गिरा आटा एकदम झड कर अलग हो जायेगा.
सेक्सोफोन की आवाज़ बंद होते ही कैमरे ने भी झूम के अपना सर घुमा लिया है
और वो पार्टी में मौजूद लोगों की शक्लें पहचानने का एक मौका दे रहा है.
नायिका उसी अंदाज़ में पंक्तियाँ दोहराती है जिस अंदाज़ में नायक ने गाना शुरू
किया था. नायक "तो क्या" बोलता हुआ बीच में कूद पढता है जैसे किसी खिडकी
से कूद कर अंदर आया हो.
बाकी की कमेंट्री चटके(कमेन्ट)लगने के पश्चात उपलब्ध कराई जायेगी. ......
गीत के बोल:
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
हमने तो प्यार में ऐसा काम कर लिया
प्यार की राह में अपना नाम कर लिया
हमने तो प्यार में ऐसा काम कर लिया
प्यार की राह में अपना नाम कर लिया
प्यार की राह में अपना नाम कर लिया
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
दो बदन एक दिन एक जान हो गए
मंज़िलें एक हुईं हमसफ़र बन गए
दो बदन एक दिन एक जान हो गए
मंज़िलें एक हुईं हमसफ़र बन गए
मंज़िलें एक हुईं हमसफ़र बन गए
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
क्यों भला हम डरें दिल के मालिक हैं हम
हर जनम में तुझे अपना माना सनम
क्यों भला हम डरें दिल के मालिक हैं हम
हर जनम में तुझे अपना माना सनम
हर जनम में तुझे अपना माना सनम
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
..................................
Ajkal tere mere pyar ke charche-Brahmachari 1968
ऐसे हैं की लगता है सूचना दी जा रही हो. अपने ज़माने में आम श्रोता
और बाद के ज़माने में ओर्केस्ट्रा के कलाकारों और श्रोताओं का पसंदीदा
ये गीत है फिल्म ब्रह्मचारी से. गीत लिखा है शैलेन्द्र ने और इसे गाया
है रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने. संगीत तो आप पहचान ही गए होंगे
नहीं? तो, आपको पोस्ट के अंत में बतायेंगे.
आपको इसका विवरण ऐसे सुनाते हैं जैसे किसी किरकिट के मैच की
कमेंट्री सुनाई जाती है. - साड़े पांच इंच की मुस्कान के साथ एक
गिटार भांजता युवक गीत में सर्वप्रथम दिखाई देता है. इसके बाद प्रश्न
सूचक अंदाज़ में नायक नायिका की ओर कदम बढ़ा कर उससे कुछ
करने की इच्छा जाहिर करता है इशारों में जिसे नायिका शायद अभी
समझ नहीं पायी है. और जैसे ही नायक उसका हाथ पकड़ कर एक
चक्कर उसको खिलाता है नायिका खुशी से दायें बाएं होती हुई हाथ
झटकते हुए नाचना शुरू कर देती है मानो किसी खिलौने को चाबी दे
दी गयी हो. उसके बाद नायक बड़ी टांगने की पेटी(हारमोनियम)जैसे
दिखने वाले किसी वाद्य को बजाना शुरू कर देता है. मजे की बात ये
है कि वो एक कोर्ड(chord)के सेट पर उँगलियाँ जमाए है और बाकी
का काम बाजा खुद कर रहा है. अब एक विलन से दिखने वाले नौजवान
को देखिये सफ़ेद शेरवानी पहने, इनका नाम प्राण है. नायक नायिका का
गर्दन हिलाने का कार्यक्रम भी जारी है. हमारे स्टेटीशीयन थोड़ी देर में
बतलायेंगे कितनी बार गर्दन हिल गयी और कितनी बार शरीर के बाकी
भाग.
और लीजिए इसी के साथ नायक ने गाना शुरू कर दिया है. और मैंने भी
गीत के बोल लिखना शुरू कर दिया है. नायिका "अच्छा, तो क्या" जुमले
बोलने के बाद जो नायक गा रहा है वही दोहराना शुरू कर देती है जैसे कोई
ट्यूशन लेता हुआ बच्चा मास्टरजी के पहाडा को याद करते वक्त करता है-
दो एकं दो, दो दूनी चार . इसके बाद नायक एक अंग्रेजी बाजा जिसको हम
सेक्सोफोन कहते हैं, बजाना शुरू कर देता है एक आल राउंडर की तरह.
ऐसे होनहार युवकों की खेल जगत में बहुत ज़रूरत है जो कि समय आने
पर किरकिट का बल्ला छोड़ होकी, फुटबाल वगैरह खेल सकें, ज़रूरत पढ़ने
पर नाव का चप्पू भी चला सकें.
नायक नायिका का परिचय करवा दिया जाए इसी बीच जब तक सेक्सोफोन की
आवाज़ सुनाई देती है. नायक है शम्मी कपूर और नायिका हैं मुमताज़. अगले
ब्रेक में आपको गायक गायिकाओं के बारे में बतलायेंगे. और लीजिए वही नृत्य
फिर से चालू है अंग्रेजी के ट्विस्ट नृत्य से प्रेरित और इसमें हाथ झटकने की
देसी मिलावट है. इसको करने के पहले बस इतना करना होता है ,हाथ पानी
से धो ले और उसे पोंछें नहीं. बस ट्विस्ट नृत्य करते करते हाथ झटकिये,
हाथ अपने आप सूख जायेंगे. शम्मी कपूर के सर हिलाने की ट्रेडमार्क अदा को
नायिका भी इस गीत में दोहरा रही हैं. इस अदा का फायदा ये है कि अगर
आपके सर पर आटे का खुला डब्बा गिर पड़े तो इस प्रक्रिया को ३ मिनट तक
करने से आपके बालों पर चिपका,गिरा आटा एकदम झड कर अलग हो जायेगा.
सेक्सोफोन की आवाज़ बंद होते ही कैमरे ने भी झूम के अपना सर घुमा लिया है
और वो पार्टी में मौजूद लोगों की शक्लें पहचानने का एक मौका दे रहा है.
नायिका उसी अंदाज़ में पंक्तियाँ दोहराती है जिस अंदाज़ में नायक ने गाना शुरू
किया था. नायक "तो क्या" बोलता हुआ बीच में कूद पढता है जैसे किसी खिडकी
से कूद कर अंदर आया हो.
बाकी की कमेंट्री चटके(कमेन्ट)लगने के पश्चात उपलब्ध कराई जायेगी. ......
गीत के बोल:
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
हमने तो प्यार में ऐसा काम कर लिया
प्यार की राह में अपना नाम कर लिया
हमने तो प्यार में ऐसा काम कर लिया
प्यार की राह में अपना नाम कर लिया
प्यार की राह में अपना नाम कर लिया
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
दो बदन एक दिन एक जान हो गए
मंज़िलें एक हुईं हमसफ़र बन गए
दो बदन एक दिन एक जान हो गए
मंज़िलें एक हुईं हमसफ़र बन गए
मंज़िलें एक हुईं हमसफ़र बन गए
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
क्यों भला हम डरें दिल के मालिक हैं हम
हर जनम में तुझे अपना माना सनम
क्यों भला हम डरें दिल के मालिक हैं हम
हर जनम में तुझे अपना माना सनम
हर जनम में तुझे अपना माना सनम
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
अच्छा !
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
तो क्या
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर
सबको मालूम है और सबको खबर हो गयी
..................................
Ajkal tere mere pyar ke charche-Brahmachari 1968
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Saturday, 2 July 2011
दर्पण को देखा-उपासना १९७१
थोड़ा साहित्यिक हुआ जाये फिर से ? कुछ संगीत प्रेमियों का
दोमुंहापन कभी कभी खटकता है मुझे। अगर 'आईना' बोलें तो
साहित्यिक नहीं होता मगर जब 'दर्पण' बोल दिया तो साहित्यिक
हो गया। दरअसल हम खिचड़ी भाषा युग में जी रहे हैं जिसकी
हिंगलिश ने भी कस के वाट लगा दी है जो धीरे धीरे कई किलोवाट
तक हो जाएगी।
गीत में, नायिका असमंजस में है-क्यूँ है-थोड़ा प्रकाश डालते हैं-
फिल्म उपासना में मुमताज़ संजय खान से प्रेम करती हैं।
संजय खान को मुमताज़ मजबूरीवश छोडती है जिसके लिए उस
दुष्ट महकमे के लोग ज़िम्मेदार होते हैं जिनके लिए वो अनजाने
में काम करती है। एक गुंडे की चम्पी करने के बाद जब वो भाग
रही होती है तभी फिरोज खान कि कार से टकरा जाती है। फिरोज
खान उसे घर ले आता है और उसकी देखभाल करता है । जब वो
ठीक हो जाती है तब उसे गीत सुनाता है। नायिका के ठीक होने की
प्रक्रिया में नायक उससे प्रेम करने लगता है। शराफत के ज़माने
का गीत है इसलिए नायक घुमा फिर के उससे अपने प्रेम का इज़हार
कर रहा है और अपनी बदनसीबी की गिला रो रहा है।
या तो नायिका किसी नए सम्बन्ध में नहीं उलझना चाहती या फिर
उसकी मानसिक स्तिथि नायक की भावनाओं को समझने लायक
नहीं हुई है। ज्यादा जाने के लिए देखें फिल्म उपासना।
मुकेश के सबसे लोकप्रिय गीतों में इसकी गिनती होती है । इसे लिखा
है इन्दीवर ने और इसकी धुन बनाई है कल्याणजी आनंदजी ने। गीत
में सरल हिंदी बोलों का समावेश है और ये उतना साहित्यिक नहीं जितना
की पब्लिक इसको बतलाती है। इसके अलावा इसमें उर्दू शब्द भी
बहुतेरे हैं।
गीत के बोल:
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
फूलों को देखा
तूने जब जब आई बाहर
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं,
मुझे नहीं देखा एक बार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
सूरज की पहली किरणों को
देखा तूने अलसाते हुए
सूरज की पहली किरणों को
देखा तूने अलसाते हुए
रातों में तारों को देखा
सपनो में खो जाते हुए
यूं किसी ना किसी बहाने
यूं किसी ना किसी बहाने
तूने देखा सब संसार
तूने देखा सब संसार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
काजल की किस्मत क्या कहिये
नैनों में तुमने बसाया है
काजल की किस्मत क्या कहिये
नैनों में तुमने बसाया है
आँचल की किस्मत क्या कहिये
तुमने अंग लगाया है
हसरत ही रही मेरे दिल में
हसरत ही रही मेरे दिल में
बनूँ तेरे गले का हार
बनूँ तेरे गले का हार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
फूलों को देखा
तूने जब जब आई बाहर
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं,
मुझे नहीं देखा एक बार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
...............................
Darpan ko dekha-Upasana 1969
दोमुंहापन कभी कभी खटकता है मुझे। अगर 'आईना' बोलें तो
साहित्यिक नहीं होता मगर जब 'दर्पण' बोल दिया तो साहित्यिक
हो गया। दरअसल हम खिचड़ी भाषा युग में जी रहे हैं जिसकी
हिंगलिश ने भी कस के वाट लगा दी है जो धीरे धीरे कई किलोवाट
तक हो जाएगी।
गीत में, नायिका असमंजस में है-क्यूँ है-थोड़ा प्रकाश डालते हैं-
फिल्म उपासना में मुमताज़ संजय खान से प्रेम करती हैं।
संजय खान को मुमताज़ मजबूरीवश छोडती है जिसके लिए उस
दुष्ट महकमे के लोग ज़िम्मेदार होते हैं जिनके लिए वो अनजाने
में काम करती है। एक गुंडे की चम्पी करने के बाद जब वो भाग
रही होती है तभी फिरोज खान कि कार से टकरा जाती है। फिरोज
खान उसे घर ले आता है और उसकी देखभाल करता है । जब वो
ठीक हो जाती है तब उसे गीत सुनाता है। नायिका के ठीक होने की
प्रक्रिया में नायक उससे प्रेम करने लगता है। शराफत के ज़माने
का गीत है इसलिए नायक घुमा फिर के उससे अपने प्रेम का इज़हार
कर रहा है और अपनी बदनसीबी की गिला रो रहा है।
या तो नायिका किसी नए सम्बन्ध में नहीं उलझना चाहती या फिर
उसकी मानसिक स्तिथि नायक की भावनाओं को समझने लायक
नहीं हुई है। ज्यादा जाने के लिए देखें फिल्म उपासना।
मुकेश के सबसे लोकप्रिय गीतों में इसकी गिनती होती है । इसे लिखा
है इन्दीवर ने और इसकी धुन बनाई है कल्याणजी आनंदजी ने। गीत
में सरल हिंदी बोलों का समावेश है और ये उतना साहित्यिक नहीं जितना
की पब्लिक इसको बतलाती है। इसके अलावा इसमें उर्दू शब्द भी
बहुतेरे हैं।
गीत के बोल:
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
फूलों को देखा
तूने जब जब आई बाहर
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं,
मुझे नहीं देखा एक बार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
सूरज की पहली किरणों को
देखा तूने अलसाते हुए
सूरज की पहली किरणों को
देखा तूने अलसाते हुए
रातों में तारों को देखा
सपनो में खो जाते हुए
यूं किसी ना किसी बहाने
यूं किसी ना किसी बहाने
तूने देखा सब संसार
तूने देखा सब संसार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
काजल की किस्मत क्या कहिये
नैनों में तुमने बसाया है
काजल की किस्मत क्या कहिये
नैनों में तुमने बसाया है
आँचल की किस्मत क्या कहिये
तुमने अंग लगाया है
हसरत ही रही मेरे दिल में
हसरत ही रही मेरे दिल में
बनूँ तेरे गले का हार
बनूँ तेरे गले का हार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
फूलों को देखा
तूने जब जब आई बाहर
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं
एक बदनसीब हूँ मैं,
मुझे नहीं देखा एक बार
दर्पण को देखा
तूने जब जब किया श्रृंगार
...............................
Darpan ko dekha-Upasana 1969
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Friday, 1 July 2011
दो घूँट मुझे भी पिला दे-झील के उस पार १९७३
कहते हैं जो दिखता है वो बिकता है। दुकानदारी में ये
सिद्धांत बहुत काम का है। ब्लॉग जगत में भी यही बात
लागू होती है। मेरे ब्लॉग पर भी लागू होती है। मुझे अभी
तक विलायती या अप्रवासी हिंदी प्रेमी भारतीयों में से केवल
२-३ बंधु ही ऐसे मिले जो ब्लॉग पर नियमित रूप से नज़र
डाला करते हैं। इस ब्लॉग को बेहतर बनाने के सुझाव और
टिप्पणियों की ज़रुरत महसूस होती है कभी कभी। स्वतः
प्रेरणा से एक सीमा तक ही कुछ किया जा सकता है।
आइये आपको आज एक फरमाइशी गीत सुनवाते हैं। ये गीत है
फिल्म झील के उस पार से। गीत फिल्माया गया है मुमताज़ पर।
मुमताज़ के साथ जो कलाकार हैं परदे पर, उनका नाम अनवर
हुसैन है जो अभिनेत्री नर्गिस के भाई हैं।
इस गीत को आप शराबी गीतों की श्रेणी में रख लीजिये।
दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
बालमा रे, ज़ालिमा,
अरे अरे अरे अरे,
आग पानी मैं लगा दे ज़रा सी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
गाऊंगी रे, नाचूंगी रे
तेरे लिए आज से मैं
आये शरम, लेकिन बलम ,
मर जाऊंगी लाज से मैं
गाऊंगी रे, नाचूंगी रे
तेरे लिए आज से मैं
आये शरम, लेकिन बलम,
मर जाऊंगी लाज से मैं
बालमा रे, ज़ालिमा,
अरे अरे अरे अरे,
लाज का ये घूंघट उठा दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
किस काम का ये जाम है
इसमें मज़ा वोह नहीं है
भर के भी यह ख़ाली सा है
इसमें नशा वो नहीं है
किस काम का ये जाम है
इसमें मज़ा वो नहीं है
भर के भी यह ख़ाली सा है
इसमें नशा वो नहीं है
साक़िया रे, साक़िया,
अरे अरे अरे अरे,
प्यार थोड़ा इस में मिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
इस पे लिखा, इस में लिखा
आये मज़ा आज ऐसे,
तडपे जिया ऐसे मेरा
बुलबुल कोई कैद जैसे
इस पे लिखा, इस में लिखा
आये मज़ा आज ऐसे,
तड़पे जिया ऐसे मेरा
बुलबुल कोई कैद जैसे
थोड़ी या पे रंज़िया,
अरे अरे अरे अरे, एक बार,
एक बार, पहरा हटा दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
..............................
Do ghoot mujhe bhi pila de-Jheel ke us paar 1973
सिद्धांत बहुत काम का है। ब्लॉग जगत में भी यही बात
लागू होती है। मेरे ब्लॉग पर भी लागू होती है। मुझे अभी
तक विलायती या अप्रवासी हिंदी प्रेमी भारतीयों में से केवल
२-३ बंधु ही ऐसे मिले जो ब्लॉग पर नियमित रूप से नज़र
डाला करते हैं। इस ब्लॉग को बेहतर बनाने के सुझाव और
टिप्पणियों की ज़रुरत महसूस होती है कभी कभी। स्वतः
प्रेरणा से एक सीमा तक ही कुछ किया जा सकता है।
आइये आपको आज एक फरमाइशी गीत सुनवाते हैं। ये गीत है
फिल्म झील के उस पार से। गीत फिल्माया गया है मुमताज़ पर।
मुमताज़ के साथ जो कलाकार हैं परदे पर, उनका नाम अनवर
हुसैन है जो अभिनेत्री नर्गिस के भाई हैं।
इस गीत को आप शराबी गीतों की श्रेणी में रख लीजिये।
दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
बालमा रे, ज़ालिमा,
अरे अरे अरे अरे,
आग पानी मैं लगा दे ज़रा सी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
गाऊंगी रे, नाचूंगी रे
तेरे लिए आज से मैं
आये शरम, लेकिन बलम ,
मर जाऊंगी लाज से मैं
गाऊंगी रे, नाचूंगी रे
तेरे लिए आज से मैं
आये शरम, लेकिन बलम,
मर जाऊंगी लाज से मैं
बालमा रे, ज़ालिमा,
अरे अरे अरे अरे,
लाज का ये घूंघट उठा दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
किस काम का ये जाम है
इसमें मज़ा वोह नहीं है
भर के भी यह ख़ाली सा है
इसमें नशा वो नहीं है
किस काम का ये जाम है
इसमें मज़ा वो नहीं है
भर के भी यह ख़ाली सा है
इसमें नशा वो नहीं है
साक़िया रे, साक़िया,
अरे अरे अरे अरे,
प्यार थोड़ा इस में मिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
हो, दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
इस पे लिखा, इस में लिखा
आये मज़ा आज ऐसे,
तडपे जिया ऐसे मेरा
बुलबुल कोई कैद जैसे
इस पे लिखा, इस में लिखा
आये मज़ा आज ऐसे,
तड़पे जिया ऐसे मेरा
बुलबुल कोई कैद जैसे
थोड़ी या पे रंज़िया,
अरे अरे अरे अरे, एक बार,
एक बार, पहरा हटा दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
दो घूँट मुझे भी पिला दे शराबी,
देख फिर होता है क्या
..............................
Do ghoot mujhe bhi pila de-Jheel ke us paar 1973
Wednesday, 22 June 2011
लगी ना छूटेगी-परदेसी १९७०
आपको सन १९७० की परदेसी का एक गीत सुनवा चुके हैं।
अगला गीत सुनिए लता मंगेशकर की आवाज़ में। साहिर
के अंदाज़-ए-बयां पर तो संगीतप्रेमी काफी लिखते रहे हैं और
लिखते रहेंगे, थोड़ा मजरूह के अंदाज़-ए-बयां पर भी गौर किया
जाये जिन्होंने ज्यादा सरल और थोड़े कठिन अंदाज़ में काफी
उम्दा किस्म के अफ़साने बुने।
प्रस्तुत गीत में विद्रोही सी सुनाई पढ़ती नायिका का सरे आम
इकरार-ए-मोहब्बत है और अनूठे अंदाज़ में। कुछ चैलेंज वाले
अंदाज़ में ज़माने से वो मुखातिब है-जो बन पड़े कर ले बैरी जहां,
बीच में दीवारें खड़ी करवा दो चाहे मंगल ग्रह भेज दो, हम तो प्यार
करेंगे, बेहिसाब करेंगे और धुआंधार करेंगे।
कुछ कुछ सफ़ेद कपड़ों को उजला बनाने वाले उत्पादों के विज्ञापन
जैसे शुरू होते इस विडियो में लहराते बलखाते कलाकारों के
नाम हैं-विश्वजीत और मुमताज़। कुछ मनमोहक कुछ बोर से
नृत्य में थोड़ी खींचा-तानी थोड़ी ढिशुम-ढिशुम की मिलावट है।
गीत के बोल:
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
तू रोक जो सके रोक ले थाम के
हंस देगी मेरी पायल तेरे नाम पे
बोलियाँ प्यार की
बोलियाँ प्यार की बोलती जाऊंगी
कट दे चाहे मेरी जुबां
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
दुनिया ने फिर उसे दुःख दिया भी तो क्या
कोई प्यार को भुला के जिया भी तो क्या
बावरा मन कहे
बावरा मन कहे, मार डालो मोहे
ना रहूंगी मैं पी के बिना
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
अब छीन के मुझे ले चले तू कहीं
धड़कन तो मेरे दिल की मिलेगी नहीं
प्यार में खो चुकी
प्यार में खो चुकी मैं तो गुम हो चुकी
अब रहा जिया मेरा कहाँ
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
................................
Lagi na chhootegi-Pardesi 1970
अगला गीत सुनिए लता मंगेशकर की आवाज़ में। साहिर
के अंदाज़-ए-बयां पर तो संगीतप्रेमी काफी लिखते रहे हैं और
लिखते रहेंगे, थोड़ा मजरूह के अंदाज़-ए-बयां पर भी गौर किया
जाये जिन्होंने ज्यादा सरल और थोड़े कठिन अंदाज़ में काफी
उम्दा किस्म के अफ़साने बुने।
प्रस्तुत गीत में विद्रोही सी सुनाई पढ़ती नायिका का सरे आम
इकरार-ए-मोहब्बत है और अनूठे अंदाज़ में। कुछ चैलेंज वाले
अंदाज़ में ज़माने से वो मुखातिब है-जो बन पड़े कर ले बैरी जहां,
बीच में दीवारें खड़ी करवा दो चाहे मंगल ग्रह भेज दो, हम तो प्यार
करेंगे, बेहिसाब करेंगे और धुआंधार करेंगे।
कुछ कुछ सफ़ेद कपड़ों को उजला बनाने वाले उत्पादों के विज्ञापन
जैसे शुरू होते इस विडियो में लहराते बलखाते कलाकारों के
नाम हैं-विश्वजीत और मुमताज़। कुछ मनमोहक कुछ बोर से
नृत्य में थोड़ी खींचा-तानी थोड़ी ढिशुम-ढिशुम की मिलावट है।
गीत के बोल:
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
तू रोक जो सके रोक ले थाम के
हंस देगी मेरी पायल तेरे नाम पे
बोलियाँ प्यार की
बोलियाँ प्यार की बोलती जाऊंगी
कट दे चाहे मेरी जुबां
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
दुनिया ने फिर उसे दुःख दिया भी तो क्या
कोई प्यार को भुला के जिया भी तो क्या
बावरा मन कहे
बावरा मन कहे, मार डालो मोहे
ना रहूंगी मैं पी के बिना
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
अब छीन के मुझे ले चले तू कहीं
धड़कन तो मेरे दिल की मिलेगी नहीं
प्यार में खो चुकी
प्यार में खो चुकी मैं तो गुम हो चुकी
अब रहा जिया मेरा कहाँ
लगी ना छूटेगी प्यार में ज़ालिमा
जो बन पड़े कर ले बैरी जहाँ
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Lagi na chhootegi-Pardesi 1970
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Saturday, 22 January 2011
अल्लाह ये अदा- मेरे हमदम मेरे दोस्त १९६८
फिल्म मेरे हमदम मरे दोस्त के दो मधुर गीत -
ना जा कहीं अब ना जा और चलो सजना आपको
सुनवाए जा चुके हैं भरी भरकम विवरण के साथ
इस गीत को कम विवरण के साथ ही सुन लीजिये।
गीत एक पार्टी में गया जा रहा है। नायिका मुमताज़
इसको परदे पर गा रही हैं, धर्मेन्द्र और शर्मिला
बाकी श्रोताओं के साथ इसको ध्यान से सुन रहे हैं।
गीत में सत्तर प्रतिशत क़व्वाली का आनंद मिलेगा।
इस तरह से ये टू इन वन गीत हुआ।
गीत के बोल:
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
रूठे पल में ना माने महीनों में
रूठे पल में ना माने महीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
आहें भर भर के इल्तज़ा कर के
आहें भर भर के इल्तज़ा कर के
हमने देखा है ये हैं पत्थर के
हाँ, हमने देखा है ये हैं पत्थर के
जो मनाओ
जो मनाओ ना माने महीनों में
जो मनाओ ना माने महीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
चाहे भी हम तो इनको
चाहे भी हम तो इनको
ज़ालिम कहाँ ना जाये
शिकवा है उनसे दिल को
शिकवा है उनसे दिल को , के दिल को
के जिनको देखे से प्यार आये, हाय
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
चमक आँखों में है सितारों की
चमक आँखों में है सितारों की
छाँव छाओं मुखड़े पे है बहारों की
छाँव मुखड़े पे है बहारों की
बस दिल ही
बस दिल ही
बस दिल ही
बस दिल ही नहीं इनके सीनों में
बस दिल ही नहीं इनके सीनों में
अल्लाह , अल्लाह , यह अदा, ये अदा
कैसी है इन हसीनों में, अल्लाह
हो हो , ओ ओ ओ ओ, हो ओ ओ ओ
चाहत में चीज़ क्या है
चाहत में चीज़ क्या है
यह रंग यह जवानी
उन पर लुटाने वाले
हो, उन पर लुटाने वाले
लुटाये बैठे हैं जिंदगानी, हाय
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
चाहे राज़ी वो ना रहे फिर भी
चाहे राज़ी वो ना रहे फिर भी
साड़ी महफ़िल में वो तो है फिर भी
हाँ साड़ी महफ़िल में वो तो है फिर भी
खूबसूरत, हाय
खूबसूरत हज़ारों हसीनों में
खूबसूरत हज़ारों हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में, हसीनों में
रूठे पल में ना माने ना माने महीनों में, महीनों में
अल्लाह, यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
.................................
Allah ye ada kaisi hai-Mere humdam mere dost 1968
ना जा कहीं अब ना जा और चलो सजना आपको
सुनवाए जा चुके हैं भरी भरकम विवरण के साथ
इस गीत को कम विवरण के साथ ही सुन लीजिये।
गीत एक पार्टी में गया जा रहा है। नायिका मुमताज़
इसको परदे पर गा रही हैं, धर्मेन्द्र और शर्मिला
बाकी श्रोताओं के साथ इसको ध्यान से सुन रहे हैं।
गीत में सत्तर प्रतिशत क़व्वाली का आनंद मिलेगा।
इस तरह से ये टू इन वन गीत हुआ।
गीत के बोल:
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
रूठे पल में ना माने महीनों में
रूठे पल में ना माने महीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
आहें भर भर के इल्तज़ा कर के
आहें भर भर के इल्तज़ा कर के
हमने देखा है ये हैं पत्थर के
हाँ, हमने देखा है ये हैं पत्थर के
जो मनाओ
जो मनाओ ना माने महीनों में
जो मनाओ ना माने महीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
चाहे भी हम तो इनको
चाहे भी हम तो इनको
ज़ालिम कहाँ ना जाये
शिकवा है उनसे दिल को
शिकवा है उनसे दिल को , के दिल को
के जिनको देखे से प्यार आये, हाय
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
चमक आँखों में है सितारों की
चमक आँखों में है सितारों की
छाँव छाओं मुखड़े पे है बहारों की
छाँव मुखड़े पे है बहारों की
बस दिल ही
बस दिल ही
बस दिल ही
बस दिल ही नहीं इनके सीनों में
बस दिल ही नहीं इनके सीनों में
अल्लाह , अल्लाह , यह अदा, ये अदा
कैसी है इन हसीनों में, अल्लाह
हो हो , ओ ओ ओ ओ, हो ओ ओ ओ
चाहत में चीज़ क्या है
चाहत में चीज़ क्या है
यह रंग यह जवानी
उन पर लुटाने वाले
हो, उन पर लुटाने वाले
लुटाये बैठे हैं जिंदगानी, हाय
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
चाहे राज़ी वो ना रहे फिर भी
चाहे राज़ी वो ना रहे फिर भी
साड़ी महफ़िल में वो तो है फिर भी
हाँ साड़ी महफ़िल में वो तो है फिर भी
खूबसूरत, हाय
खूबसूरत हज़ारों हसीनों में
खूबसूरत हज़ारों हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में, हसीनों में
रूठे पल में ना माने ना माने महीनों में, महीनों में
अल्लाह, यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
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Allah ye ada kaisi hai-Mere humdam mere dost 1968
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