Social Icons

Showing posts with label Dharmendra. Show all posts
Showing posts with label Dharmendra. Show all posts

Saturday, 8 October 2011

लुट गई मैं तो आज हो रामा-झूठा सच १९८४

फिल्म अभिनेत्री रेखा हर दशक के साथ नए रूप-संस्करण में दिखाई दीं
इसीलिए उनको अंग्रेजी की 'दिवा' कहा जाता है। गौरतलब है की उन्होंने
अपनी काय को योग के ज़रिये आकर्षक बना लिया और ८० के दशक में
फिल्मकारों ने उनके लिए विशेष दृश्य फिल्मों में तैयार किये उनके सौंदर्य
को आम दर्शक से रु-ब-रु कराने के लिए। रेखा के ऊपर फिल्माया गया और
एक कम सुना गया एक गीत सुनते हैं आज, फिल्म 'झूठा सच' से जिसमें उनके
साथ नायक हैं-धर्मेन्द्र।

गीत लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई है आर. डी. बर्मन
ने। गीत गया है आशा भोंसले ने।



गीत के बोल:

लुट गई मैं तो आज हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खड़ी
लुट गई मैं तो आज हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खडी

लुट गई मैं तो, लुट गई
लुट गई मैं तो आज हो रामा
हो रामा हो रामा है दिया हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खड़ी

............................................
Lut gayi main to-Jhootha Sach 1984

Saturday, 13 August 2011

बहारों की बारात आ गई-यकीन १९६९

फिल्म यकीन से एक गाना तो झट जुबान पे आ जाता है वो है फिल्म

का शीर्षक गीत। इतना भी याद आता है कि इस फिल्म में धर्मेन्द्र और

शर्मिला टैगोर हैं। इनकी जोड़ी भी कुछ ही फिल्मों में देखी होगी आपने।

३ फ़िल्में तो मुझे याद आती है-अनुपमा, चुपके चुपके और देवर। देवर

में थोड़ा अलग सा किस्सा था।



हिंदी फिल्म के नायक/हीरो अगर सामान्य पृठभूमि वाले होंगे तो भी उनके

पास गज़ब का सामान होता है। इस फिल्म के हीरो के पास एक शानदार

कार है। अब कार शानदार हो या ना हो, इससे विशेष फर्क नहीं पढता जब

नायिका ज्यादा आकर्षण का केंद्र हो बनिस्बत फिल्म में दिख रहे बाकी के

सामानों के। अब आप ये मत पूछ लीजियेगा कि गाने कि शुरुआत में नायिका

काली साडी पहने हुए है और नायक की कार के शीशे में वो सफ़ेद साडी पहने

दिखाई देती है.



एक बात ज़रूर कार चलने वालों से कहना चाहूँगा-अगर इतना स्टीयरिंग आप

गलती से भी न घुमाएँ किसी पुल पर चलते समय, अन्यथा आपके गाने के

अंतरे नाले या नदी में सुनाई देंगे. या तो फ़िल्मी कार का स्टीयरिंग खराब है,

या फिर उसमें विशेष प्रावधान किया हुआ है, या फिर कार एक जगह पर खड़ी

है और पुल पीछे सरक रहा है.



एक बात में तो सामान्य जीवन और फिल्म कम से कम एक सरीखी

लगते हैं-कार का टायर पंचर होना। गौरतलब है कि टायर पंचर होने

के बाद बदलने वाली कसरत में जिसको पसीना कम निकलता हो वो

भी पसीने से लथ-पथ हो जाता है, उस स्तिथि में नायक का उसी जोश

के साथ गीत गाना और मुस्कुराना अतिश्योक्ति सी लगती है। खैर गीत

सुनिए जो हसरत जयपुरी का लिखा हुआ है और इसकी धुन बनाई है

शंकर जयकिशन ने। मोहम्मद रफी ने इसे गाया है जो कि धर्मेन्द्र के

पसंदीदा गायक रहे हैं।







गीत के बोल:





बहारों की बारात आ गई

ख़ुशी को ले के साथ आ गई

सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान

होठों पे दिल कि बात आ गई



बहारों की बारात आ गई

ख़ुशी को ले के साथ आ गई

सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान

होठों पे दिल की बात आ गई



बहारों की बारात



मुझसे देखो ना शरमाना तुम

मेरी बाहों में खो जाना तुम

मुझसे देखो ना शरमाना तुम

मेरी बाहों में खो जाना तुम

इंतजारी की हद हो चुकी

और ज्यादा ना तरसना तुम

और ज्यादा ना तरसना तुम



बहारों की बारात आ गई

ख़ुशी को ले के साथ आ गई

सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान

होठों पे दिल की बात आ गई



बहारों की बारात



आज छेड़ी हवाओं ने भी

प्यार की मस्त शहनाईयां

आज छेड़ी हवाओं ने भी

प्यार की मस्त शहनाईयां

वादियाँ बन गयीं हैं दुल्हन

जैसे उनकी हों परछाईयाँ

जैसे उनकी हों परछाईयाँ



बहारों की बारात आ गई

ख़ुशी को ले के साथ आ गई

सुनो तो मेरे दिल सुनो तो मेरी जान

होठों पे दिल की बात आ गई



बहारों की बारात

.................................

Baharon ki baraat-Yakeen 1969

Friday, 5 August 2011

रूठे सैयां हमारे सैयां-देवर १९६६

फिल्म देवर से आपको दूसरा गीत सुनवा रहे हैं. नायक अपनी फूटी किस्मत को
कोसते हुए कोठे पर जा पहुँचता है. उसने जम कर मदिरा सेवन भी कर रखा है.
अब उस मदिरा की ऐंठन वाले भाव चेहरे पर कैसे आते हैं वो देखिये इस गीत में.
उस ऐंठन में और बल देने का काम कर रहे हैं नर्तकी का नाच गाना.

संगीतकार रोशन बहुमुखी प्रतिभा वाले संगीतकार थे. इस गीत को ही लीजिए जो
एक मुजरा गीत कहा जा सकता है, इसको बिना विडियो देखे आप अंदाजा नहीं लगा
सकते कि फिल्म कि किस सिचुएशन में इस गीत का प्रयोग हुआ होगा. गीत में
संतूर और बांसुरी का सुन्दर प्रयोग हुआ है. बस हारमोनियम की ध्वनि से ही आप
एक क्लू पा सकते हैं कि ये शायद मुजरा गीत है.

गीत बेला बोस नामक अभिनेत्री पर फिल्माया गया है जिन्होंने लगभग इसी प्रकार की
भूमिकाएं ज्यादा कीं फिल्मों में. इसके अलावा वे डाकुओं कि पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों
में दिखाई दीं .



गीत के बोल:

होए रूठे सैंया
हाय, रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे
ना तो हम बेवफ़ा ना तो हम झूठे

रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे

चैन न आया हमें नींद न आई
देते रहे सारी रैन दुहाई
चैन न आया हमें नींद न आई
देते रहे सारी रैन दुहाई
कोई उनकी भी हाय राम
कोई उनकी भी यूँ ही निंदिया लूटे

रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे
रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे

कैसे न तड़पे दिल ये दीवाना
सच ही तो कहता है सारा ज़माना
कैसे न तड़पे दिल ये दीवाना
सच ही तो कहता है सारा ज़माना
लागी छूटे ना चाहे दुनिया छूटे

रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे
रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे

उनको मनाया हर एक अदा से
हाय मगर तौबा उनकी बला से
उनको मनाया हर एक अदा से
हाय मगर तौबा उनकी बला से
वो ना माने
वो ना माने हाय राम
वो ना माने किसी का चाहे दिल टूटे

रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे
ना तो हम बेवफ़ा ना तो हम झूठे
रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे
रूठे सैंया हमारे सैंया क्यों रूठे
..................................
Roothe saiyan hamare saiyan-Devar 1966

Tuesday, 2 August 2011

बहारों ने मेरा चमन लूट कर-देवर १९६६

जिंदगी में बहुत कुछ सरप्राइज़ गिफ्ट सरीखा प्राप्त होता है। फिल्म में नायक
जिस युवती से प्रेम करता है उसकी शादी नायक के मित्र से हो जाती है।
कुछ कुछ धोखे वाली कहानी है। धोखा नायक का मित्र देता है । नायक
घटनाक्रम बदलते ही नायिका का देवर बन जाता है। अपनी भावनाओं को
वो गीत के माध्यम से कैसे व्यक्त कर रहा है सुनिए आनंद बक्षी के बोलों,
मुकेश की आवाज़ और रोशन के संगीत में। नायक हैं धर्मेन्द्र, दूल्हा बने हैं
देवेन वर्मा और नायिका हैं शर्मीला टैगोर । आनंद बक्षी के लेखन कौशल के
अगर आप कायल नहीं हैं तो इस गीत को ध्यान से एक बार सुन लीजिए।






गीत के बोल:

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
किसी ने चलो दुश्मनी की मगर
इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

मैं समझा नहीं ऐ मेरे हमनशीं
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये
सज़ा ये मिली है मुझे किस लिये
के साक़ी ने लब से मेरे छीन कर
किसी और को जाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

मुझे क्या पता था कभी इश्क़ में
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं
रक़ीबों को कासिद बनाते नहीं
खता हो गई मुझसे कासिद मेरे
तेरे हाथ पैगाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर

खुदाया यहाँ तेरे इन्साफ़ के
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
बहुत मैंने चर्चे सुने हैं मगर
सज़ा की जगह एक खतावार को
भला तूने ईनाम क्यों दे दिया

बहारों ने मेरा चमन लूटकर
खिज़ां को ये इल्ज़ाम क्यों दे दिया
....................................
Baharon ne mera chaman loot kar-Devar 1966

Tuesday, 19 July 2011

या दिल की सुनो दुनियावालों-अनुपमा १९६६

फिल्म अनुपमा से एक गीत पेश है हेमंत कुमार की आवाज़ में.
बोल लिखे हैं कैफी अजमी ने और धुन बनायीं है स्वयं हेमंत कुमार ने.
गीत फिल्माया गया है धर्मेन्द्र पर जिन्हें एक पार्टी में गीत गाने के
लिए बोला गया है. दुखियारी नायिका(शर्मिला टैगोर) को ध्यान में रखते
हुए शायद ऐसा गीत गाया जा रहा है.



गीत के बोल:

या दिल की सुनो दुनियावालों
या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूँ
जो कहते हैं उनको कहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

ये फूल चमन में कैसा खिला
माली की नजर में प्यार नहीं
हँसते हुए क्या-क्या देख लिया
अब बहते हैं आँसू बहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

इक ख्वाब खुशी का देखा नहीं
देखा जो कभी तो भूल गए
मांगा हुआ तुम कुछ दे न सके
जो तुमने दिया वो सहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

क्या दर्द किसी का लेगा कोई
इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आँसू और बहें
अब ऐसी तसल्ली रहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों
............................
Ya dil ki suno-Anupama 1966

Wednesday, 13 July 2011

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये-जुगनू १९७३

एक किलो के करीब गहने पहन कर नाचना आसान नहीं होता.
गीत प्रस्तुत है फिल्म जुगनू से. लता मंगेशकर का गाया और
हेमा मालिनी पर फिल्माया गया ये गीत मुझे तब से पसंद है
जबसे इसे फिल्म रिलीज़ के बाद पहली बार सुना था . हेमा
मालिनी फिल्म के अनुसार एक स्टेज शो में नाच रही हैं. उनका
नृत्य आनंदित करने वाला है और सिनेमा हॉल के अनुभव के
आधार पर मैंने पाया कि हर वर्ग का दर्शक इसको ध्यान से देख
कर खुश हो रहा था.

इस गीत पर गांव की नौटंकी में भी एक डांस देखा था जो कि डांस
मच्छर के भिनभिनाने जैसा था.

इस गीत की 'टुर्र रर्र रा टिपर टिपर' वाली ध्वनि आकर्षित करती
रही सदा. ये गीत इस बात का सबूत है कि सचिन देव बर्मन का
संगीत जैसे जैसे उनकी उम्र बढती गयी, जवान होता गया. सन
१९७३ में लता के गाये और संगीतकारों के गीतों से तुलना इस गीत
से कर के देख लीजिए, खुद आपको अंदाज़ा हो जायेगा कि उनके
संगीत में समय के साथ बदलाव होते चले हैं और उन्होंने दूसरों से
बेहतर धुनें बनाने का प्रयास किया है. एक बात तो ज़रूर है, आप
इस गीत की सन ५० के गीतों से तुलना नहीं कर सकते. सचिन देव
बर्मन के ज्ञानी भक्त फिल्म जुगनू के गीत को ख़ारिज कर देते हैं
क्यूंकि वे इसकी "फैली हुई सपनों की बाहें-घर नंबर ४४" तुलना करने
लग जाते हैं.



गीत के बोल:

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये, हाय
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के, घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के, घुँघरू छनक जाये

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये

तन डोले रे धितंग तितंग
मन बोले रे धितंग तितंग

अम्बुआ की डाली पे जब कोयल बोले
हौले हौले बिरहन का मन पापी डोले
किसे नींद आये किसे चैन आये
पिया याद आये जिया धड़क जाए

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये

घर बैठी शरमाऊँ गली में न आऊँ
लट बिखरे मन भटके कहीं खो ना जाऊँ
घर बैठी शरमाऊँ गली में न आऊँ
लट बिखरे मन भटके कहीं खो ना जाऊँ
डगर में हाय, नज़र मिल जाये
कमर बलखाये, चुनर सरक जाये

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये

पी मेरे, बिन तेरे, जिया नाहिं लागे
सारी रैना मेरे नैना रहें जागे जागे
पी मेरे, बिन तेरे, जिया नाहिं लागे
सारी रैना मेरे नैना रहें जागे जागे
अगन सी बन में, लगे सावन में
मेरे आँगन में, बिजली चमक जाये

मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
चलूँ थम थम के घुँघरू छनक जाये
मेरी पायलिया गीत तेरे गाये
.....................................
Meri payaliya geet tere gaaye-Jugnu 1973

Wednesday, 29 June 2011

मेरा प्यार शालीमार-शालीमार १९७८

इस फिल्म के रिलीज़ होने के पहले तक यही मालूम था कि शालीमार
नाम का एक मशहूर बाग़ काश्मीर में है, जिसे मुग़ल सम्राट शाहजहाँ
ने सन १६४१ में बनवाया था।

देसी विदेशी सितारों से सज्जित फिल्म शालीमार सन १९७८ में आई।
फिल्म का संगीत चर्चित हुआ और खूब बजे इसके गाने। इसका शीर्षक
गीत कहीं खो सा गया। आशा भोंसले की आवाज़ में आइये सुनें इस
फिल्म का शीर्षक गीत जो जीनत अमां पर फिल्माया गया है।






गीत के बोल:

मेरा प्यार शालीमार
तेरा प्यार शालीमार
हम दोनों बेकरार
आँखों में इंतज़ार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार
हम दोनों बेकरार
आँखों में इंतज़ार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार

ये जिसको मिल जाये
उसका दिल खिल जाये
ये जिसको मिल जाये
उसका दिल खिल जाये
हो जाये ज़िंदगी बेकार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार

ये पत्थर ये रूबी
ये दोनों महबूबी
ये पत्थर ये रूबी
ये दोनों महबूबी
हर कोई है इसका ख़रीदार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार
हम दोनों बेकरार
आँखों में इंतज़ार

मेरा प्यार शालीमार
हो तेरा प्यार शालीमार
....................
Mera pyar shalimar-Shalimar 1978

Sunday, 12 June 2011

मैं कौन सा गीत सुनाऊँ-दिल्लगी १९७८

एक फुरसती ज़माना था जब जनता नदी नाले के किनारे बैठा करती,
गप शाप मारती और गीत गाती और सुनती। उस दौर की कल्पना
करना भी शायद आधुनिक युग में affordable नहीं है। साफ़ सुथरी
फ़िल्में बनाने के लिए विख्यात बासु चटर्जी की इस फिल्म ने
ज्यादा बिज़नेस नहीं किया मगर जनता द्वारा सराही अवश्य
गई। ये जी जनाब सराहने वाली जनता है ना, उसके बलबूते पर
बॉलीवुड की रोजी रोटी नहीं चलती। वो चलती है जब सिनेमा हॉल
की आगे की सीट से पीछे की सीट तक जगह ना बची हो। जिसे हम
चवन्नी क्लास कहते हैं, कई नामचीन नायकों की रोजी रोटी वहीँ से
निकल के आई। कभी कभार आंशिक कडकी के चलते हम भी उस
क्लास का आनंद उठा चुके हैं।

बासु की खूबी ये है कि उन्होंने हमारे इर्द गिर्द के और आम जीवन
के सामान्यतया ना छुए जाने वाले पहलुओं को बहुत सहजता से
प्रस्तुत किया परदे पर, दर्शक को यही लगा जैसे वो रोजमर्रा की
कोई आम घटना से रूबरू हो रहा हो। बाकी के निर्देशक अवास्तविकता
को वास्तविकता में तब्दील करने का प्रयत्न करते रहे और बासु चटर्जी
वास्तविकता को सरलता से प्रस्तुत करने में। शत प्रतिशत वास्तविक
हम किसी भी फ़िल्मी कथानक को नहीं कह सकते क्यूंकि नाटकीयता
आवश्यक तत्त्व है मंच और फिल्मों का। फर्क करना होता है हमें तो
बस नाटकीयता, जीवंत नाटकीयता, अति नाटकीयता, फूहड़ता और
मूढ़ता में । कल्पनाशीलता जब इनमे से किसी भी एक तत्त्व से चिपक
जाती है तो उसी तत्त्व विशेष को बढावा देती है। कल्पनाशीलता निर्देशक
के पास होना पहली अनिवार्य शर्त है, उसके बाद नंबर आता है कलाकारों
का। कल्पनाशीलता प्रस्तुतीकरण को बेहतर बनाने का काम करती है।

प्रस्तुत गीत में आपको जो कलाकार दिखाई देंगे उनके नाम इस
प्रकार से हैं-धर्मेन्द्र, असरानी, हेमा मालिनी और मिठू मुखर्जी।
पांचवे शख्स को शायद आप ना पहचान पायें तो आपको एक क्लू
देता हूँ-महाभारत सीरियल में मामा शकुनि की भूमिका निभाने
वाला कलाकार।



गीत के बोल:

मैं कौन सा गीत सुनाऊँ
क्या गाऊं जो पिया बस जाये
तेरे तन मन में
खिल जाएँ सोयी कलियाँ, हाय कलियाँ
और बहारें आयें सूनी बगियाँ में

ये कैसे अचानक बिना कोई आहट
चले आये हो तुम मेरी ज़िन्दगी में
तुम्हें आज पा कर मैं सब कुछ भुला कर
मगन हो के डूबी हुई हूँ ख़ुशी में

इतने ही रंग सलोने, हाय सलोने
भर गये हैं मेरे खाली सावन में

मैं कौन सा गीत सुनाऊँ
क्या गाऊं जो पिया बस जाये
तेरे तन मन में

कभी तुम सहारा बनोगे हमारा
मैं ये बात कल तक नहीं मानती थी
मगर आज कैसे ये लगता है जैसे
मैं हर जनम में तुम्हें जानती थी
लगता है सारी दुनिया, सारी दुनिया
भर गई है जैसे सज के कण कण में

मैं कौन सा गीत सुनाऊँ
क्या गाऊं जो पिया बस जाये
तेरे तन मन में
खिल जाएँ सोयी कलियाँ, हाय कलियाँ
और बहारें आयें सूनी बगियाँ में

.....................................
Main kaun sa geet sunaaon-Dillagi 1978

Saturday, 11 June 2011

मिले मिले दो बदन-ब्लैकमेल १९७३

गणित के हिसाब से देखा जाये तो जिस गाने को दो लोग
गायें वो-दोगाना, जिसे तीन लोग गायें वो तीनगाना और
जिसे चार गायक गायें वो चारगाना। पिछले गीत से एक
और गीत ध्यान में आया है, लगे हाथ वो भी सुन/देख
लीजिये।

आपको केवल दोगाना ही सुनवा रहे हैं। ये भी ऐसे याद आया
कि जिस गीत में गायक-गायिका गीत की पंक्तियाँ एक साथ
गाते हैं वो पूर्ण दोगाना लगता है। ऐसा एक और गीत है जिसमें
गायक-गायिका ने बहुत सी पंक्तियाँ साथ साथ गई हैं। धक् चिक
धक् चिक वाली ताल के साथ ये गीत आगे बढ़ता है और कब
ख़त्म हो जाता है मालूम नहीं पढता। ये मधुर गीत है फिल्म
ब्लैकमेल से। इसके संगीत के अटपटे होने की वजह आप केवल
इसका विडियो देख कर ही जान पाएंगे। एक बात बताएं-इसको
देखकर हिंदी की कोई कहावत याद आती है आपको ?




गीत के बोल:


मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं
मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं

देर से आई आई तो बहार
अंगारों पे सोकर जागा प्यार
तूफ़ानों में फूल खिलाए
तूफ़ानों में फूल खिलाए कैसा ये मिलन

मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं

होंठ वही हैं है वही मुस्कान
अब तक क्यों कर दबे रहे अरमान
बीते दिनों को भूल ही जाएँ
बीते दिनों को भूल ही जाएँ अब हम-तुम सजन

मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं
..................................
Mile mile do badan-Blackmail 1973

Wednesday, 1 June 2011

तुम पुकार लो-ख़ामोशी १९६९

हेमंत कुमार का संगीत सौम्यता से सराबोर हुआ करता था। उन्होंने
कई आकर्षक गीत भी गाये। उनके बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है
-ख़ामोशी का प्रस्तुत गीत। नायिका प्रधान इस फिल्म में मानवीय
संवेदनाओं को झकझोर देने वाले प्रसंग हैं। फिल्म का अंत सबसे ज्यादा
चौंकाने वाला है। कथानक के प्रस्तुतीकरण में अनूठापन भी दिखलाई
देता है कई दृश्यों में। फिल्म के संवाद लेखक और गीतकार गुलज़ार हैं।

असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्में ज़्यादातर आपको
मानवीय संबंधों, उनकी उलझन और जटिलताओं की ओर घूमती हुयी
मिलेंगी। उनकी संवेदनशीलता को पहचानने के लिए आपको बस चार
फ़िल्में ही देख लेना चाहिए अन्नदाता(१९७२), ममता( १९६६) , सफ़र(१९७०),
और ख़ामोशी(१९६९) । ऐसे विषय जिनपर दूसरे निर्देशकों को काम
करने में हिचक होती, उन्हें शायद आनंद आता। पसंद अपनी अपनी।
subject के treatment के मामले में अधिकतर वे दूसरों से २० साबित
हुए। फ़िल्मी समीक्षकों ने उनपर या उनकी फिल्मों पर पांच पन्ने के
निबंध नहीं लिखे। उनकी फिल्मों का संगीत पक्ष बहुत मजबूत हुआ करता
अपने समकालीन बंगाली मूल के बाकी निर्देशकों की भांति। आप शायद ये
ज़रूर जानना चाहेंगे कि अभिनेता असित सेन और निर्देशक असित सेन क्या
अलग अलग इंसान हैं ? थोड़ा अंतरजाल खंगालिए और पता लगाइए।




गीत के बोल:

तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है
तुम पुकार लो
ख़्वाब चुन रही है रात, बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो

होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुख़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो

दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
रात ये क़रार की बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
.................................
Tum pukar lo-Khamoshi १९६९

Friday, 4 February 2011

छलकाएं जाम-मेरे हमदम मेरे दोस्त १९६८

फिल्म मेरे हमदम मेरे दोस्त के ४ गीत आपको सुनवा चुके
हैं। आइये एक और गीत सुनें। गीत मजरूह साहब का लिखा
हुआ है और संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का। इतने ही विवरण से
काम चला लीजिये और गीत का आनंद उठाइए। बस इतना ध्यान
दीजिये की पहले फ्रेम में जो शख्स गिटार बजा रहा है वो फ़िल्मकार
और नायक ओ पी रल्हन का कुम्भ के मेले में buइछ्दा भाई जैसा
दिख रहा है।






गीत के बोल:


छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

फूल जैसे तन के जलवे, ये रँग-ओ-बू के
ये रँग-ओ-बू के
आज जाम-ए-मय उठे, इन होंठों को छू के
इन होंठों को छू के
लचकाइये शाख-ए-बदन, लहराइये ज़ुल्फों की शाम

छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

आपका ही नाम लेकर, पी है सभी ने
पी है सभी ने
आप पर धड़क रहे हैं, प्यालों के सीने
प्यालों के सीने
यहाँ अजनबी कोई नहीं, ये है आपकी महफ़िल तमाम

छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

कौन हर किसी की बाहें, बाहों में डाल ले
बाहों में डाल ले
जो नज़र को शाख लाए, वो ही सम्भाल ले
वो ही सम्भाल ले
दुनिया को हो औरों की धुन, हमको तो है साक़ी से काम

छलकाएं जाम आइये आपकी आँखों के नाम
होंठों के नाम

Monday, 31 January 2011

हुई शाम उन का ख़याल- मेरे हमदम मेरे दोस्त १९६८

आज गुलाम अली की एक मशहूर ग़ज़ल सुन रहा था -
"बिछड़ के भी मुझे तुझसे ये बदगुमानी है " , कि अचानक
यादों के ठीकरे इधर उधर फूटना शुरू हो गए और ठीकरों के
टुकड़ों ने मन को थोडा कुरेद दिया। दिमाग कितना भी भुलाना
चाहे मगर यादें लौट लौट कर आपको दुखाती अवश्य हैं।
कुछ लोग जोर का झटका धीरे से लगा के रवाना हो जाया
करते हैं तो कुछ हल्का सा झटका जोर से लगा कर। दोनों ही
स्तिथियों में मनाव मन को कष्ट अवश्य होता है । ठीकरे से
तुलना इसलिए कि गई क्यूंकि उन ख्यालों का स्वर अक्सर
एक सा ही होता है। ऐसे में एक गीत याद आया और वो आज
पेश-ए-खिदमत है। मजरूह के लाजवाब बोलों को दिल में
सनसनी पैदा करने वाली धुन से सजाया है संगीतकार
लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने और गीत को रूह दी है रफ़ी ने।




गीत के बोल :


हुई शाम उन का ख़याल आ गया
वही ज़िंदगी का सवाल आ गया

अभी तक तो होंठों पे था तबस्सुम का एक सिलसिला
बहुत शादमां थे हम उनको भुलाकर
अचानक ये क्या हो गया
कि चेहरे पे रंग-ए-मलाल आ गया

कि चेहरे पे रंग-ए-मलाल आ गया
हुई शाम उन का ख़याल आ गया

हमें तो यही था गुरूर गम-ए-यार है हम से दूर
वही ग़म जिसे हमने किस-किस जतन से
निकाला था इस दिल से दूर
वो चलकर क़यामात की चाल आ गया
वो चलकर क़यामात की चाल आ गया

हुई शाम उन का ख़याल आ गया
................................................
Hui shaam unka khayal-Mere humdum mere dost 1968

Saturday, 22 January 2011

अल्लाह ये अदा- मेरे हमदम मेरे दोस्त १९६८

फिल्म मेरे हमदम मरे दोस्त के दो मधुर गीत -
ना जा कहीं अब ना जा और चलो सजना आपको
सुनवाए जा चुके हैं भरी भरकम विवरण के साथ
इस गीत को कम विवरण के साथ ही सुन लीजिये।
गीत एक पार्टी में गया जा रहा है। नायिका मुमताज़
इसको परदे पर गा रही हैं, धर्मेन्द्र और शर्मिला
बाकी श्रोताओं के साथ इसको ध्यान से सुन रहे हैं।
गीत में सत्तर प्रतिशत क़व्वाली का आनंद मिलेगा।
इस तरह से ये टू इन वन गीत हुआ।



गीत के बोल:

अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
रूठे पल में ना माने महीनों में
रूठे पल में ना माने महीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में

आहें भर भर के इल्तज़ा कर के
आहें भर भर के इल्तज़ा कर के

हमने देखा है ये हैं पत्थर के
हाँ, हमने देखा है ये हैं पत्थर के

जो मनाओ
जो मनाओ ना माने महीनों में
जो मनाओ ना माने महीनों में

अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह

चाहे भी हम तो इनको
चाहे भी हम तो इनको
ज़ालिम कहाँ ना जाये
शिकवा है उनसे दिल को
शिकवा है उनसे दिल को , के दिल को
के जिनको देखे से प्यार आये, हाय

अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह

चमक आँखों में है सितारों की
चमक आँखों में है सितारों की
छाँव छाओं मुखड़े पे है बहारों की
छाँव मुखड़े पे है बहारों की

बस दिल ही
बस दिल ही
बस दिल ही
बस दिल ही नहीं इनके सीनों में
बस दिल ही नहीं इनके सीनों में

अल्लाह , अल्लाह , यह अदा, ये अदा
कैसी है इन हसीनों में, अल्लाह

हो हो , ओ ओ ओ ओ, हो ओ ओ ओ
चाहत में चीज़ क्या है
चाहत में चीज़ क्या है
यह रंग यह जवानी
उन पर लुटाने वाले
हो, उन पर लुटाने वाले
लुटाये बैठे हैं जिंदगानी, हाय

अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह

चाहे राज़ी वो ना रहे फिर भी
चाहे राज़ी वो ना रहे फिर भी
साड़ी महफ़िल में वो तो है फिर भी
हाँ साड़ी महफ़िल में वो तो है फिर भी

खूबसूरत, हाय
खूबसूरत हज़ारों हसीनों में
खूबसूरत हज़ारों हसीनों में

अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह

अल्लाह यह अदा कैसी है इन हसीनों में, हसीनों में
रूठे पल में ना माने ना माने महीनों में, महीनों में

अल्लाह, यह अदा कैसी है इन हसीनों में
अल्लाह
.................................
Allah ye ada kaisi hai-Mere humdam mere dost 1968

Saturday, 15 January 2011

चला भी आ आ जा रसिया- मन की ऑंखें १९७०

आइये आपका रिवीज़न कराया जाए। ये गीत पहले आपको
सुनवाने का प्रयत्न किया गया था, शायद आपकी नज़र इस पर
नहीं पड़ी हो, तो आज फिर से एक बार सुन लेते हैं इसको। बाकी
का विवरण इधर है-मन की ऑंखें । यूँ समझिये जैसे मास्साब
स्कूल में रिवीज़न कराते हें वैसे ही हम आपका रिवीज़न करा रहे हैं।




गाने के बोल:

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

मुरझा चले हैं अरमान सारे
धुंधला गए हैं सभी उजले नज़ारे
कैसे जियूंगी ग़मों के सहारे
तरसी निगाहें मेरी तुझको सदायें दें ,
धड़कन पुकारे

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
दिल तो गया मेरा कहीं जान न जाए
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए

चला भी आ...........

मेरी लगन को कहाँ तूने जाना
तेरे लिए तो मेरा दिल है दीवाना
हर साँस मेरी तेरा ही तराना
ये जिंदगानी क्या है
तेरी कहानी है तेरा ही फ़साना

तेरा मेरा वो है रिश्ता
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
.......................................
Chala bhi aa, aa ja rasiya-Man ki ankhen 1970

Friday, 14 January 2011

क्या मिलिए ऐसे लोगों से-इज्ज़त १९६८

अजनबियों की भीड़ में नायक पहुँचता है। अजनबियों
के लिए वो जाना पहचाना है, बस वही एक बाकियों को
नहीं पहचानता। उन अजनबियों में से एक उसको भाई कह
कर पुकारती है । ऐसे मौके पर उससे गीत गाने की
गुज़ारिश की जाती है और वो अपने दिल की भड़ास गीत
के माध्यम से निकलता है। गीत के साथ शायद कोई
अंग्रेजी खेल हो रहा है जिसको हम फैंसी ड्रेस के नाम
से पुकारते हैं। इसमें आपको पुराने ज़माने की सब
विलायती नृत्य शैलियों का समावेश मिलेगा। आनंद
उठायें एक contrast वाले गीत का। सर में तेल की पूरी बोतल
बोतल चुपड़े हीरो को देखने का सौभाग्य आपको कम ही
ही फिल्मों में मिला होगा। वो ऐसा है की किरदार की मांग होगी
इसलिए निर्देशक ने नायक को काले रंग से भी पोत डाला है।




गीत के बोल:

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे,

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे,

खुद से भी जो खुद को छुपाये,
क्या उनसे पहचान करें,
क्या उनके दामन से लिपटें?,
क्या उनका सम्मान करें?,
जिनकी आधी नीयत उभरे,
आधी नीयत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

दिलदारी का ढोंग रचाकर,
जाल बिछाए बातों का,
जीते जी का रिश्ता कहकर,
सुख ढूंढें कुछ रातों का,
रूह की हसरत लाभ पर आये,
जिस्म की हसरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

जिनके ज़ुल्म से दुखी है जनता,
हर बस्ती हर गावों में,
दया धरम की बात करें वो,
बैठ के सजी सभाओं में,
दान का चर्चा घर घर पहुंचे,
लूट की दौलत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

देखें इन नकली चेहेरों की,
कब तक जय जय कार चले,
उजले कपड़ों की तह में,
कब तक काला संसार चले,
कब तक लोगों की नज़रों से,
छुपी हकीकत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे
...........................
Kya miliye aise logon se-Izzat 1968

Monday, 3 January 2011

ओ नीले पर्बतों की धारा-आदमी और इंसान १९६९

आज का पहला गीत पेश है फिल्म आदमी और इंसान से।
साहिर के लिखे बोलों पर तर्ज़ बनाई है रवि ने। आशा और
महेंद्र कपूर इसको गा रहे हैं धर्मेन्द्र और सायरा बानो के लिए ।



गीत के बोल:

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला ला ला ला ला

फूल में जैसे फूल की खुशबू
दिल में है यूँ तेरा बसेरा
धरती से अम्बर तक फैला
चाहत की बाहों का घेरा

हो ओ ओ
ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला ला ला ला ला

सूरज पीछे घूमे धरती
साँझ के पीछे घूमे सवेरा
जिस नाते ने इन को बाँधे
वो नाता है तेरा मेरा

हो ओ ओ
ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

Sunday, 19 December 2010

आ जा तेरी याद आई-चरस १९७६

विलायत के नज़ारों वाला फिल्म चरस का गीत पेश है। इस गीत
की शुरुआत में गीतकार की आवाज़ है। जी हाँ ये भारी सी पंजाबी
लहजे वाली आवाज़ आनंद बक्षी की है। इन्होने कुछ फ़िल्मी गीत भी
गाये हैं । बाकी दो आवाजें आप बखूबी पहचानते हैं-लता और रफ़ी की।
परदे पर जो जोड़ी है वो श्रीमान देओल और श्रीमती देओल की है। ये
श्रीमान श्रीमती इस फिल्म के आने के बाद ही बने थे। प्रस्तुत गीत एक
सुपर हिट गीत है और अभी भी रेडियो पर नियमित रूप से बजता सुनाई
देता है।




गीत के बोल:

आनंद बक्षी: दिल इंसान का एक तराजू
जो इन्साफ को तोले
अपनी जगह पर प्यार है कायम
धरती अम्बर डोले
सब से बड़ा सच एक जगत में
भेद अनेक जो खोले
प्रेम बिना जीवन सूना
ये पागल प्रेमी बोले

लता :कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
ओ बालम हरजाई
कि आ जा तेरी याद आयी

रफ़ी:कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
ओ बालम हरजाई
कि आ जा तेरी याद आयी

लता: ज़ालिम कितनी देर लगा दी
तुमने आते आते
अब आये जो अब ना आते
तो हम जान से जाते
दिल दीवाना दीवाने को हम कैसे समझाते
देते राम दुहाई
कि आ जा तेरी याद आयी

रफ़ी: फुर्सत भी है मौसम भी है
मन है रंग रलियों में
छुप गयी है तू खुशबू बन के
शायद इन कलियों में
मैंने तुझको कितना ढूँढा आवारा गलियों में
यह आवाज़ लगाई
कि आ जा तेरी याद आयी

लता: मस्त हवा ने बात कोई
ऐसी कह दी कानों में
जैसे कोई मदिरा भर दे
खाली पैमानों में
तड़पा डाला आज मचलते दिल के अरमानों ने
रुत ने ली अंगडाई
कि आ जा तेरी याद आयी
कि आ जा तेरी याद आयी
.......................................................
Aa jaa teri yaad aayi-Charas 1976

Sunday, 28 November 2010

जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम-शोला और शबनम १९६१

एक और फ्लेश बैक वाला गीत सुन लिया जाए।

धर्मेन्द्र ने कई रोमांटिक फिल्मों में अभिनय किया है।
ये उनके फ़िल्मी जीवन के प्रथम दौर की फिल्म है
साहब क्या लाजवाब गीत मिला उनको परदे पर
जिसे हम सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ कर्णप्रिय युगल गीतों
में गिनते हैं। धर्मेन्द्र के साथ परदे पर 'तरला' नामक
अभिनेत्री हैं जिन्हें मैंने किसी और फिल्म में देखा
हो याद नहीं। गीत लिखा है ..... ने और पिछले गीत की
तरह इसकी धुन भी बनाई है खय्याम ने। बस गीतकार
बदल गए हैं-कैफ़ी आज़मी। खय्याम ने जितना भी संगीत
दिया वो सौम्य किस्म का है। कभी कभार ही उन्होंने
शोरगुल वाले फार्मूले का इस्तेमाल किया है। उनके
संगीतबद्ध ठेठ पंजाबी गीत भी कर्णप्रिय हैं। फ़िल्म 'शोला और
शबनम' के इस गीत में बस दूसरे अंतरे की एक पंक्ति ही
सुनने में खटकती है जहाँ नायक कहता है-तू भी पल भर
रूठे ना । ये पंक्ति पहली पंक्ति के साथ मेल नहीं खाती।


गीत के बोल:

फूल को ढूंढें प्यासा भंवरा
दीपक को परवाना

दुनिया अपने रब को पुकारे
दुनिया अपने रब को पुकारे
तुझको तेरा दीवाना
आ जा, आ जा, आ जा, आ जा

जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम
खेल अधूरा छूटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना
प्यार का बंधन टूटे ना

जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम
खेल अधूरा छूटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

आ आ हा हा हा आ आ

मिलता है जहाँ धरती से गगन
मिलता है जहाँ धरती से गगन
आओ वहीँ हम जाएँ

तू मेरे लिए
मैं तेरे लिए
तू मेरे लिए
मैं तेरे लिए

इस दुनिया को ठुकराएँ
इस दुनिया को ठुकराएँ

दूर बसा लें दिल की जन्नत
जिसको ज़माना लुटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन टूटे ना

हं हं हं ला ला ला ला ला
आ आ आ आ आ आ आ आ आ हं हं हं हं

मिलने की ख़ुशी ना मिलने का गम
ख़त्म ये झगडे हो जाएँ
मिलने की ख़ुशी ना मिलने का गम
ख़त्म ये झगडे हो जाएँ

तू तू ना रहे
मैं मैं ना रहूँ
तू तू ना रहे
मैं मैं ना रहूँ

एक दूजे में खो जाएँ
एक दूजे में खो जाएँ

मैं भी ना छोडूं पल भर दामन
मैं भी ना छोडूं पल भर दामन
तू भी पल भर रूठे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन टूटे ना
 
 
www.lyrics2nd.blogspot.com