Social Icons

Showing posts with label Rajinder Krishan. Show all posts
Showing posts with label Rajinder Krishan. Show all posts

Saturday, 4 February 2012

शरबती तेरी आँखों की-ब्लैकमेल १९७३

आँखों पर मीलों मील लम्बे अफ़साने आपको मिल जायेंगे साहित्य और
फ़िल्मी गीतों में। गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने भी आँखों पर तरह तरह के गीत
लिखे हैं। प्रस्तुत गीत जो कि फिल्म ब्लैकमेल का गीत है में आँखों को शरबती
कि उपमा प्रदान की गई है। 'शरबती' शब्द अक्सर आप दो चीज़ों का जिक्र होने
पर सुना करते होंगे-आँखें और गेंहू। शरबती गेंहू अच्छी क़िस्म का गेंहू माना
जाता है ।


गीत में नायिका की वेश भूषा देख कर शायद आपको देव आनंद की याद आ जाये।
एक बात मुझे हमेशा से चौंकती रही है-फिल्म में नायक नायिका धूल में लोट लगा
लें या मैदान में गुलाटियां खा लें उनके कपडे ज़रा भी गंदे नहीं होते?





गीत के बोल:

मैं डूब डूब जाता हूँ

शरबती तेरी आँखों की, हा
झील सी गहराई में
शरबती तेरी आँखों की
झील सी गहराई में
मैं डूब डूब जाता हूँ

फूलों को तूने रंगत दे दी
सूरज को उजाला, उजाला
सूरज को उजाला
जुल्फों से तूने पानी छटका
तारों की बन गई माला
देखो तारों की बन गई माला
होंठ हैं तेरे दो पैमाने
होंठ तेरे दो पैमाने
पैमानों की मस्ती में
डूब डूब जाता हूँ

शरबती तेरी आँखों की, हा
झील सी गहराई में
शरबती तेरी आँखों की
झील सी गहराई में
मैं डूब डूब जाता हूँ

भूले से जो तू बाग़ में जाये
पत्ता पत्ता डोले
रे डोले पत्ता पत्ता डोले
तिरछी नज़रें जिधर भी फेंके
भड़के सौ सौ शोले, रे शोले
भड़के सौ सौ शोले

गाल हैं तेरे दो अंगारे
गाल हैं तेरे दो अंगारे
अंगारों की गर्मी में
डूब डूब जाता हूँ

शरबती तेरी आँखों की, हा
झील सी गहराई में
शरबती तेरी आँखों की
झील सी गहराई में
मैं डूब डूब
मैं डूब डूब
मैं डूब डूब जाता हूँ
......................................
Sharbati teri ankhon ki-Blackmail 1973

Friday, 26 August 2011

कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर -दुर्गेश नंदिनी १९५६

जैसी कि हम चर्चा करते रहे हैं अब तक, हेमंत कुमार

ने बतौर संगीतकार भी बहुत कामयाबी हासिल की और

उनके संगीत निर्देशन से कई अविस्मरणीय और अमर

रचनाएँ हिंदी फिल्म संगीत जगत को मिलीं. अधिकतर

दूसरे संगीतकारों की भांति उन्होंने भी लता मंगेशकर के

लिए कुछ विशेष और अलौकिक सी धुनें बनायीं.



प्रस्तुत गीत भी ऐसा ही एक गीत है फिल्म ‘दुर्गेश नंदिनी’

से जो कि नाम से ही स्पष्ट है कि एक पौराणिक फिल्म है.

फिल्म में प्रदीप कुमार और बीना राय प्रमुख कलाकार हैं.

यह गीत एक स्वप्न की तरह सा फिल्माया गया है. गीत

लिखा है राजेंद्र कृष्ण ने. गीत का प्रभाव आज इस युग में

भी महसूस किया जा सकता है. इसकी एक झलक भी कोई

एक बार सुने तो पूरा सुने बिना नहीं रह सकता. गीत का

शुरूआती कोरस गान केवल फिल्म वाले वर्जन में ही उपलब्ध

है.









गीत के बोल:



आ आ आ आ आ आ आ आ

आ आ आ आ आ

आ आ आ आ आ आ आ आ

आ आ आ आ आ



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है

ख्यालों की मंजिल ये ख्वाबों की महफ़िल

समझ में न आये ये दुनिया कहाँ है



कहाँ रह गए काफिले बादलों के

कहाँ रह गए काफिले बादलों के

ज़मीन छुप गयी है तले बादलों के

है मुझको यकीन के है जन्नत यहीं

अजब सी फिजां है अजब ये समां है

कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है



नज़र की दुआ का जवाब आ रहा है

नज़र की दुआ का जवाब आ रहा है

मेरी आरजू पे शबाब आ रहा है

ये खामोशियाँ भी हैं एक दास्तान

कोई कहता है मुझसे मोहब्बत जवान है



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है



मोहब्बत भरी इस जहाँ की हैं राहें

मोहब्बत भरी इस जहाँ की हैं राहें

जिन्हें देख कर खो गयी है निगाहें

ये हलकी हवा लायी कैसा नशा

ना रहा होश इतना मेरा दिल कहाँ है



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है

ख्यालों की मंजिल ये ख्वाबों की महफ़िल

समझ में न आये ये दुनिया कहाँ है

........................................

Kahan le chale ho-Durgesh Nandini 1956

Wednesday, 3 August 2011

ओ मोरे सजना-समुन्दर १९५७

फिल्म समुन्दर से एक शानदार गीत आपको सुनवाया था पहले. अब
सुनते हैं फिल्म से एक कम सुना हुआ गीत. गीत ये भी कर्णप्रिय है
मगर ज्यादा सुना गया केवल मदन मोहन भक्तों द्वारा.

गीत फिल्माया गया है बीना रॉय पर. फिल्म में उनके साथ प्रेमनाथ
नायक हैं जिनकी फिल्म में दोहरी भूमिका है. राजेंद्र कृष्ण ने गीत लिखा
है और इसे गा रही हैं लता मंगेशकर.






गीत के बोल:

ओ मोरे सजना
ढूँढूँ कहाँ तेरा निशाँ
तुझको पुकारे मेरे दिल का जहाँ

आ जा कहीं से आ जा दिल का करार ले के
बैठे हुये हैं कब से तेरा इंतज़ार ले के
आ जा कहीं से आ जा दिल का करार ले के
बैठे हुये हैं कब से तेरा इंतज़ार ले के

आ जा कहीं से आ जा

ये हवायें भीगी भीगी ये हसीं हसीं नज़ारे
मेरे साथ कर रहे हैं तेरा इंतज़ार प्यारे
तेरा इंतज़ार प्यारे
बस एक झलक दिखा दे आँखों में प्यार ले के
बैठे हुये हैं कब से तेरा इंतज़ार ले के

आ जा कहीं से आ जा

कहती है आरजू ये आ जा किसी बहाने
कहती है आरजू ये आ जा किसी बहाने
दिल ही में रह न जाएँ कहीं प्यार के फ़साने
कहीं प्यार के फ़साने
सूने चमन में आ जा फिर से बहार ले के
बैठे हुये हैं कब से तेरा इंतज़ार ले के

आ जा कहीं से आ जा
.........................
O more sajna-Samundar 1957

Sunday, 17 July 2011

तेरी शोख नज़र का इशारा-पतंग १९६०

आपको सुनवाते हैं पतंग फिल्म से एक युगल गीत जो मुकेश और लता का गाया हुआ
है. इसके बोल लिखे हैं राजेंद्र कृष्ण ने और संगीत तैयार किया है चित्रगुप्त ने.
सन १९६० की फिल्म पतंग में राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा क्रमशः नायक नायिका
हैं.

एक समय था फिल्म देखने वाले ये कहते-राजेंद्र कुमार की फिल्म है इसमें गाने बढ़िया
होंगे. श्वेत श्याम युग की अधिकतर वे फ़िल्में जिनमें राजेंद्र कुमार ने अभिनय किया
मधुर गीतों से भरपूर होती थीं. सत्तर के दशक में ये धारणा थोड़ी बदलना शुरू हुयी.
राजेंद्र कुमार के जुबली कुमार बनने की प्रक्रिया में उनकी फिल्मों के संगीत का भी बड़ा
योगदान रहा है.

श्रेणी बनाने के शौकीनों के लिए सुझाव - इसे शोख नज़र गीत , नाव गीत कहा
जा सकता है.





गीत के बोल:


तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा

तेरी बाँहों का जब है सहारा
पिया मझधार भी है किनारा
तेरी बाँहों का जब है सहारा

तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा

निकले हैं राही मस्ती में डूबे
मंजिल का क्या है ,मिले न मिले
निकले हैं राही मस्ती में डूबे
मंजिल का क्या है ,मिले न मिले

तुम साथ हो तो किस्मत पे अपनी
शिकवे कहाँ के कहाँ के गीले

ओ जी हो
तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा

तेरी बाँहों का जब है सहारा
पिया मझधार भी है किनारा
तेरी बाँहों का जब है सहारा


एक ख्वाब सा है या है कहानी
कुछ है यकीन कुछ यकीन भी नहीं
एक ख्वाब सा है या है कहानी
कुछ है यकीन कुछ यकीन भी नहीं
हम तो ये जानें सच है या सपना
जो तुम नहीं हो तो हम भी नहीं

हो जी हो
तेरी बाँहों का जब है सहारा
पिया मझधार भी है किनारा
तेरी बाँहों का जब है सहारा

तेरी शोख नज़र का इशारा
मेरी वीरान रातों का तारा
तेरी शोख नज़र का इशारा
.........................
Teri shokh nazar ka ishara-Patang 1960

Saturday, 16 July 2011

हुस्न चला कुछ ऐसी चाल-ब्लफ़ मास्टर १९६३

कभी कभी आप किसी गीत को यकायक गुनगुनाना शुरू कर देते हैं, आज
आपको ऐसा ही गीत सुनवा रहे हैं जो एकदम से दिमाग में आया है अभी.

मनमोहन देसाई ने अपने करियर की शुरुआत से ही शायद बड़े सितारों के
साथ काम करना शुरू कर दिया था. सन १९६३ की फिल्म ब्लफ़ मास्टर के
निर्देशक वही हैं. इसमें शम्मी कपूर और सायरा बानो प्रमुख कलाकार हैं.

हिंदी फिल्म जगत में अक्सर ही निर्देशक से ज्यादा निर्माता की चली है और
कभी कभी इसी वजह से भी फिल्म पिट जाया करती. निर्माता की पसंद कुछ
होती, निर्देशक की कुछ और, इस सूरत में एक राय नहीं बन पाने से निर्देशक
को काम करने में आनंद नहीं आता. जहाँ निर्देशक की पसंद का ख्याल रखा
जाता वो फ़िल्में थोड़ी बेहतर होतीं. ये उन निर्देशकों के बारे में बात की जा रही
है जो निर्देशन की कला में निपुण हैं.

ब्लफ़ मास्टर में शायद स्टार कास्ट बढ़िया है समय के हिसाब से. इसमें उस
समय के नामचीन खलनायक प्राण भी मौजूद हैं.

गीत राजेंद्र कृष्ण का लिखा हुआ है जिसे संगीत में बांधने का काम किया है
कल्याणजी आनंदजी ने. इसे गा रहे हैं लता और रफ़ी.

नायक नायिका पिकनिक पर हैं और उनके साथ के बर्तन भांडे से लगता है
पर्याप्त खाद्य सामग्री है उसमें और जो जनाना सवारियां बड़ी गाडी से उतरी हैं
वे भी खा पी कर तृप्त हो सकती हैं.





गीत के बोल:

अरे हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ न हाल
हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ न हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया

अजी दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया

दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया

हो ओ ओ ओ, कभी पास आएँ कभी दूर जाएँ
के हैं दिल चुराने की लाखों अदाएँ
नहीं तीर निकला अभी तक कमान से
नहीं तीर निकला अभी तक कमान से
कोई उनसे कह दे कि दिल को बचाएँ
कि दिल को बचाएँ

हाय, हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया

दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया

कहाँ तक रहोगे ये दामन बचा के
के मुश्किल है बचना निशाने पे आ के
हमारा है क्या हम तो मिट के रहेंगे
हमारा है क्या हम तो मिट के रहेंगे
जहाँ तुमने देखा ज़रा मुस्करा के
ज़रा मुस्करा के

दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया

अरे हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया

हो ओ ओ ओ,ये दिन हैं तुम्हारे ज़माना तुम्हारा
निगाहें उधर हैं इधर है इशारा
ये पैग़ाम देते हैं ज़ुल्फ़ों के साये
ये पैग़ाम देते हैं ज़ुल्फ़ों के साये
चला आए जो है मोहब्बत का मारा
मोहब्बत का मारा

उफ़,हुस्न चला कुछ ऐसी चाल
दीवाने का पूछ ना हाल
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया

दिल को अब तक है इंकार
आँखें कर बैठीं इकरार
प्यार की क़सम कमाल हो गया, हाय
प्यार की क़सम कमाल हो गया
.................................
Husn chala kuchh aisi chal-Bluff Master 1963

Friday, 15 July 2011

जाऊं मैं कहाँ ये ज़मीन -मिस इंडिया १९५७

आपको श्वेत श्याम युग से एक तेज धुन वाला युगल गीत
सुनवाते हैं. आकर्षक ध्वनि संयोजन से गीत शुरू होता है.
स्टेज पर नशेड़ी सा एक युवक लड़खड़ाते हुए गाना चालू करता
है. इतना नहीं लडखडाता है कि माइक ले के स्टेज के नीचे
टपक जाए. ये है फिल्म का नायक जिसने पार्टी में शायद
ज्यादा पी ली है. पी कितनी भी ली हो गाना सुर ताल में
गायेगा. ये हैं फिल्म के नायक प्रदीप कुमार. एक बात बस
समझ नहीं आई कि मन्ना डे वाले अंतरे एक से क्यूँ हैं इस
गीत में. कहीं ये पुराने ज़माने का 'कॉपी कट पेस्ट' एरर तो
नहीं ?

ये एक गीयर बदलने वाला गीत है. तेज संगीत के और हा हा
के बाद कुछ धीमा धीमा सा गीत सुनाई देता है. तेज वाले भाग
में नायिका शीला वाज़ हैं तो धीमे वाले भाग में नर्गिस.

अभिनेत्री नर्गिस के कैरियर की वे फ़िल्में अधिकांश दर्शकों
को याद हैं जिनमें इन्होने राज कपूर के साथ काम किया है.
सिवाए मदर इंडिया (१९५७) और रात और दिन(१९६४) के
इक्का दुक्का फ़िल्में और हैं जो प्रसिद्ध हुई हैं. सन १९५७ में
एक फिल्म आई थी-मिस इंडिया. इसमें उन्होंने एक आधुनिक
समय की नारी की भूमिका अदा की है. समय से आगे की
भूमिकाएं या फ़िल्में अक्सर नहीं चला करती हैं. इस फिल्म
का संगीत भी थोडा सा ही बजा वो भी सचिन देव बर्मन के
भक्तों के घर. गीत लता मंगेशकर और मन्ना डे का गाया हुआ
है. बोल लिखे हैं राजेंद्र कृष्ण ने.

एक बड़े शामियाने से अगर पहनने के कपडे निकाले जाएँ तो कुछ
कुछ वैसे ही बनेंगे जैसे की इस गीत में बालाएं पहने हुए हैं.



गीत के बोल:

हे हे हे हे हे हे, हे हे हे हे हे हे
हो, हा हा हा
हे हे हे हे हे, हो हो
हा हा, हो हो, हा हा हा हा हा

जाऊं मैं कहाँ,
हाय, जाऊं मैं कहाँ
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे,
चल दिया कारवां छोड़ के
जाऊं मैं कहाँ,
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे,
चल दिया कारवां छोड़ के

जाऊं मैं कहाँ

हो हो हो हो हो हो हो हो
हो हो हा हा हा हा हा

ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
बाँहों में आ के सो जा,
सो जा, सो जा

जाऊं मैं कहाँ,
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे,
चल दिया कारवां छोड़ के

जाऊं मैं कहाँ

रात गुज़रती जाए
आस नज़र न आये
रात गुज़रती जाए
आस नज़र न आये
रो न सकूं अब
रोते रोते आंसू भी शरमाये

हो हो हो, जाऊं मैं कहाँ
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे
चल दिया कारवां छोड़ के

जाऊं मैं कहाँ

हो हो हो हो हा हा हा हा
हो हो हा हा हो हो हो

ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
बाँहों में आ के सो जा,
सो जा, सो जा

..............................
Jaoon main kahan-Miss India 1957

Monday, 11 July 2011

शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा-पड़ोसन १९६८

लता मंगेशकर का गाया गीत सुनिए और देखिये फिल्म पड़ोसन
से। इसे परदे पर गा रही हैं सायरा बानो। सन १९६८ की फिल्म
पड़ोसन के गीत लिखे हैं राजेंद्र कृष्ण ने और इस फिल्म में संगीत
दिया है राहुल देव बर्मन ने। सुनील दत्त और किशोर कुमार इस
फिल्म के प्रमुख नायक हैं।

कोयल की बोली, संतूर की आवाज़ और प्रणय गीतों की सी बजने
वाली शहनाई ये सब लता की आवाज़ के साथ क़यामत सी ढा रही
हैं।




गीत के बोल:

शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा
अब हमें आप के क़दमों ही में रहना होगा
शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा
अब हमें आप के क़दमों ही में रहना होगा

शर्म आती है मगर

आप से रूठ के हम जितना जिये ख़ाक जिये
आप से रूठ के हम जितना जिये ख़ाक जिये
कई इल्ज़ाम लिये और कई इल्ज़ाम दिये
आज के बाद मगर कुछ भी न कहना होगा
अब हमें आप के क़दमों ही में रहना होगा

देर के बाद समझे हैं मोहब्बत क्या है
अब हमें चाँद के झूमर की ज़रुरत क्या है
प्यार से बढ़ के भला कौन सा गहना होगा
अब हमें आप के क़दमों ही में रहना होगा

शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा

आप के प्यार का बीमार हमारा दिल है
आप के प्यार का बीमार हमारा दिल है
आप के ग़म का खरीदार हमारा दिल है
आप को अपना कोई दर्द न सहना होगा

अब हमें आप के क़दमों ही में रहना होगा

शर्म आती है मगर आज ये कहना होगा
शर्म आती है
..................................
Sharm aati hai magar-Padosan 1968

Thursday, 30 June 2011

कौन रोकेगा अब प्यार का रास्ता-एक कली मुस्काई १९६८

लगे हाथ 'एक कली मुस्काई' फिल्म का तीसरा गीत भी सुन ही
लिया जाये। शायद इस गीत का विडियो उपलब्ध नहीं है यू ट्यूब
पर। खुशनुमा सा गीत है और सितार का भरपूर इस्तेमाल हुआ है
इसमें।






गीत के बोल:

कौन रोकेगा अब प्यार का रास्ता
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
आज बैठे-बिठाए ये क्या हो गया
दिल की हर बात आँखों में आने लगी
दिल की हर बात आँखों में आने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

आ गए, आ गए, मुस्कुराने के दिन
आ गए, आ गए, मुस्कुराने के दिन
लड़खड़ाने के दिन, गुनगुनाने के दिन
लड़खड़ाने के दिन, गुनगुनाने के दिन
मैने पायल तो पाँवों में बाँधी नहीं
और आवाज़
और आवाज़ घुँघरू की आने लगी
और आवाज़ घुँघरू की आने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

कोई राहों में कलियाँ बिछाने लगा
कोई राहों में कलियाँ बिछाने लगा
और इशारों से मुझको बुलाने लगा
और इशारों से मुझको बुलाने लगा
मैने दर्पण अभी तक तो देखा नहीं
meri बिंदिया मगर झिलमिलाने लगी
meri बिंदिया मगर झिलमिलाने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

आज कैसी चली भीगी-भीगी पवन
आज कैसी चली भीगी-भीगी पवन
लहलहाने लगा मेरा नाज़ुक बदन
लहलहाने लगा मेरा नाज़ुक बदन
मैने पलकें अभी तक झुकाई नहीं
नींद क्यूँ मेरी आँखों में आने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी

कौन रोकेगा अब प्यार का रास्ता
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
मैं तो पी की नगरिया जाने लगी
....................................
Kaun rokega ab....main to pee ki nagariya-Ek kali muskayi 1968

Wednesday, 29 June 2011

न तुम बेवफ़ा हो-एक कली मुस्काई १९६८

ज़िन्दगी के सफ़र में कुछ ऐसे मुसाफिर मिलते हैं जो
बहुत दूर साथ चलने का वादा/ड्रामा कर के किसी मोड़ पर
बिछड़ जाते हैं या गधे के सर से सींग की तरह गायब हो
जाते हैं।

अगर अलगाव या बिछुड़न के लिए परिस्थितियां जिम्मेदार
होती हैं तो मामला ५०:५० अन्यथा प्रस्तुत गीत की पंक्तियाँ
दोहराते हुए दिल को ढाढ़स बंधाना पढता है। गीत में नायक
के जाते ही नायिका अपने दिल का गुबार बाहर निकाल रही
है।

मदन मोहन के रचे लता के गाये गीतों में से तकरीबन ५०
गीत मुझे बेहद पसंद हैं। ये उनमें से एक है। इसे मुझे सुनते
हुए कई साल हो गये ।

गीत में मीरा नामक अभिनेत्री दिखाई दे रही हैं। राजेंद्र कृष्ण
के बोलों को आवाज़ दी है लता मंगेशकर ने।



गीत के बोल:


न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं
न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं
मगर क्या करें अपनी राहें जुदा हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

जहाँ ठंडी-ठंडी हवा चल रही है
जहाँ ठंडी-ठंडी हवा चल रही है
किसी की मोहब्बत वहाँ जल रही है
ज़मीं-आसमां हमसे दोनों खफ़ा हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

अभी कल तलक़ तो मुहब्बत जवाँ थी
अभी कल तलक़ तो मुहब्बत जवाँ थी
मिलन ही मिलन था जुदाई कहाँ थी
मगर आज दोनों ही बेआसरा हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

ज़माना कहे मेरी राहों में आ जा
ज़माना कहे मेरी राहों में आ जा
मुहब्बत कहे मेरी बाँहों में आ जा
वो समझें ना मजबूरियाँ अपनी क्या हैं

न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं

मगर क्या करें अपनी राहें जुदा हैं
न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं
.............................
Na tum bewafa ho-Ek Kali Muskayi 1968

Tuesday, 28 June 2011

तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में -बहाना १९६०

जादू है या नशा है मालूम नहीं मगर जूने पुराने गीतों की तासीर
और असर आश्चर्यजनक है। मधुर गीत सुनने के लिए किसी भी
बहाने की ज़रुरत नहीं है अतः आज आपको फिल्म बहाना से एक
गीत सुनवा देते हैं। सन १९६० की फिल्म में ये मधुर गीत है जिसे
आशा और तलत महमूद ने गाया है। राजेंद्र कृष्ण के लिखे गीत
की धुन बनाई है मदन मोहन ने।



गीत के बोल:

तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में
रहने को जी चाहता है
दिल में छुपाई हुई बात सजन से
कहने को जी चाहता है

तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में
रहने को जी चाहता है

तेरी निगाहों में

दिल ये हमारा घर है तुम्हारा
आओ जी, आ के बस जाओ जी
दिल ये हमारा घर है तुम्हारा
आओ जी, आ के बस जाओ जी
नैन हमारे देखे ख़्वाब तुम्हारे
ज़रा ख़्वाबों में आ के हँस जाओ जी
जान से प्यारा हमें, घर ये तुम्हारा यहाँ
रहने को जी चाहता है

तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में
रहने को जी चाहता है

तेरी निगाहों में

देखो जी देखो और किसी को
दिल में न अपने बसाना जी
प्यार भरा ये वादा हम तो न भूले पिया
तुम भी इसे न भुलाना जी
प्रीत हमारी रहे दुनिया से न्यारी यही
कहने को जी चाहता है

तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में
रहने को जी चाहता है
दिल में छुपाई हुई बात सजन से
कहने को जी चाहता है

तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में
रहने को जी चाहता है

तेरी निगाहों में
........................
Teri nigahon mein-Bahana 1960

Friday, 24 June 2011

जा रे जा रे ओ माखन चोर-चम्पाकली १९५७

सन १९५७ में भारत भूषण की जो उल्लेखनीय फ़िल्में आयीं
वे थीं-चम्पाकली, गेटवे ऑफ़ इंडिया और रानी रूपमती ।

तीनों फिल्मों में ही कर्णप्रिय संगीत है। इन फिल्मों में से एक
ना एक गीत कालजयी निश्चित ही हुआ।

राजेंद्र कृष्ण ने माखन चोर नन्द किशोर के उल्लेख वाले
कुछ बढ़िया गीत लिखे हैं। फिल्म चम्पाकली के इस गीत को
आपने शायद ही सुना हो। हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन
वाली फिल्म चम्पाकली के गीत सॉफ्ट किस्म के हैं और सुनने
में कानों में हलकी सी गुदगुदी करते हैं।




गीत के बोल:

जा रे जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर

जा जा काहे मचावत शोर
कभी ना छोड़ूँ तोरी ये बैयाँ गोरी-गोरी
सजनिया काहे मचावत शोर

ऐसी ठिठोली करो हमसे ना रसिया
कौन हो तुम हमारे
ऐसी ठिठोली करो हमसे ना रसिया
कौन हो तुम हमारे
होता है गोरी जो चकोरी का चंदा
हम वही हैं तुम्हारे
देखो जी देखो मेरा भोला सा मनवा
समझे नहीं इशारे ओ छलिया

जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर

मैं बन्सी तू तान मेरा तेरा साथ पुराना
ओ मैं बन्सी तू तान मेरा तेरा साथ पुराना
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
रहने दो ये बात चले ना कोई बहाना
मानो ना मानो तुम्हें दिल की क़सम है अपना हमें बनाना

सजनिया काहे मचावत शोर
कभी ना छोड़ूँ तोरी ये बैयाँ गोरी-गोरी
सजनिया काहे मचावत शोर

हटो जी हटो मेरी छोडो डगरिया यूँ हमें ना सताओ
हटो जी हटो मेरी छोडो डगरिया यूँ हमें ना सताओ
जाने से पहले मेरे दिल की नगरिया मुस्करा के बसाओ
जानूँ ना जानूँ कैसा दिल है तुम्हारा
पहले दिल तो दिखाओ रे छलिया

जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर
....................................
Ja re o makhanchor-Champakali 1957

Monday, 20 June 2011

दिल की दुनिया बसा के सांवरिया-अमरदीप १९५८

फिल्म अमरदीप से तीसरा गीत पेश है लता मंगेशकर की
आवाज़ में। बोल लिखे हैं रेजेंद्र कृष्ण ने और संगीतकार
हैं सी रामचंद्र। गीत फिल्माया गया है वैजयंतीमाला पर।
गीत विडियो मिक्सिंग के प्रभाव के कारण मुझे बारम्बार
याद आ जाता है। थोड़ा दुखी करने वाला गीत है लेकिन सुनने
में अच्छा लगता है इसलिए इसे सुन लेते हैं कभी कभी।

अब हर गीत में लोजिक, मैजिक और झिक झिक ज़रूरी नहीं
हैं ना जी ? फिर भी आपको सी रामचंद्र और दूसरे संगीतकारों
में फर्क बताये देते हैं-सी रामचंद्र ने गायकों को ज्यादा मौका
दिया बजाये वाद्य यंत्रों के। साजों की बाजीगरी उन्होंने लगभग
हमेशा ही नियंत्रण में रखी। सन ५८ के दूसरे संगीतकारों के बनाये
और लता के गाये गीत सुन लीजिये। फर्क आप खुद ब खुद
समझ जायेंगे। गीत में लता की आवाज़ के अलावा आप बांसुरी की
आवाज़ को ज्यादा स्पष्ट सुन पाएंगे। इसके अलावा रामचंद्र का
पसंदीदा साज़ मैन्डोलिन की झलक भी कहीं कहीं सुनाई देगी।
वायलिन के अनावश्यक शोर में शायद सी रामचंद्र का ज्यादा
विश्वास नहीं रहा ।



गीत के बोल:

दिल की दुनिया बसा के सांवरिया
दिल की दुनिया बसा के सांवरिया
तुम ना जाने कहाँ खो गये, खो गये
साथ रहना था सारी उमरिया
दूर नज़रों से दूर क्यूँ हो गये, हो गये

जाने वाले, जाने वाले पता तेरा मैंने
आती जाती बहारों से पूछा
जाने वाले पता तेरा मैंने
आती जाती बहारों से पूछा
चुप रहे जब ज़मीन के नज़ारे
आसमान के सितारों से पूछा
चुप रहे जब ज़मीन के नज़ारे
आसमान के सितारों से पूछा

सुन के बादल भी मेरी कहानी
सुन के बादल भी मेरी कहानी
बेबसी पर मेरी रो गये, रो गये

दिल की दुनिया बसा के सांवरिया
तुम ना जाने कहाँ खो गये, खो गये

हंस रहा है
हंस रहा है ये ज़ालिम ज़माना
अपनी खुशियों की महफ़िल सजाये
हंस रहा है ये ज़ालिम ज़माना
अपनी खुशियों की महफ़िल सजाये

मैं अकेली मगर रो रही हूँ
तेरी यादों को दिल से लगाये
मैं अकेली मगर रो रही हूँ
तेरी यादों को दिल से लगाये
बहते बहते ये आंसू भी हारे
बहते बहते ये आंसू भी हारे
आ के पलकों पे हैं सो गये, सो गये

दिल की दुनिया बसा के सांवरिया
तुम ना जाने कहाँ खो गये, खो गये

......................................
Dil ki duniya basa ke sanwariya-Amardeep 1958

Saturday, 11 June 2011

मिले मिले दो बदन-ब्लैकमेल १९७३

गणित के हिसाब से देखा जाये तो जिस गाने को दो लोग
गायें वो-दोगाना, जिसे तीन लोग गायें वो तीनगाना और
जिसे चार गायक गायें वो चारगाना। पिछले गीत से एक
और गीत ध्यान में आया है, लगे हाथ वो भी सुन/देख
लीजिये।

आपको केवल दोगाना ही सुनवा रहे हैं। ये भी ऐसे याद आया
कि जिस गीत में गायक-गायिका गीत की पंक्तियाँ एक साथ
गाते हैं वो पूर्ण दोगाना लगता है। ऐसा एक और गीत है जिसमें
गायक-गायिका ने बहुत सी पंक्तियाँ साथ साथ गई हैं। धक् चिक
धक् चिक वाली ताल के साथ ये गीत आगे बढ़ता है और कब
ख़त्म हो जाता है मालूम नहीं पढता। ये मधुर गीत है फिल्म
ब्लैकमेल से। इसके संगीत के अटपटे होने की वजह आप केवल
इसका विडियो देख कर ही जान पाएंगे। एक बात बताएं-इसको
देखकर हिंदी की कोई कहावत याद आती है आपको ?




गीत के बोल:


मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं
मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं

देर से आई आई तो बहार
अंगारों पे सोकर जागा प्यार
तूफ़ानों में फूल खिलाए
तूफ़ानों में फूल खिलाए कैसा ये मिलन

मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं

होंठ वही हैं है वही मुस्कान
अब तक क्यों कर दबे रहे अरमान
बीते दिनों को भूल ही जाएँ
बीते दिनों को भूल ही जाएँ अब हम-तुम सजन

मिले मिले दो बदन खिले खिले दो चमन
ये ज़िन्दगी कम ही सही कोई ग़म नहीं
..................................
Mile mile do badan-Blackmail 1973

Monday, 6 June 2011

फूल बन जाऊँगा-प्यार किये जा १९६६

राजेंद्र कृष्ण का गीत और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत ? और तो और
शशि कपूर पर महेंद्र कपूर की आवाज़। कुछ अटपटा कोम्बिनाशन है ना।
जो भी हो, ये गीत बढ़िया बन पड़ा है और खासा लोकप्रिय हुआ था। साथ
में आवाज़ है लता मंगेशकर की। शशि के साथ जो खाते पीते घर की
अभिनेत्री हैं उनका नाम है-राजश्री, ये दक्षिण भारत की अभिनेत्री हैं। इस
फिल्म में दो बड़े नामी हास्य कलाकार मौजूद हैं-महमूद और किशोर कुमार।
किशोर कुमार तो फिल्म में नायक हैं और उनकी जोड़ी जमाई गई है कल्पना
के साथ। सभी अभिनेत्रियाँ इस फिल्म की सेहतमंद और तंदुरुस्त हैं।



गीत के बोल:

फूल बन जाऊँगा शर्त ये है मगर
फूल बन जाऊँगा शर्त ये है मगर
अपनी जुल्फों में मुझको सजा लीजिये
अपनी जुल्फों में मुझको सजा लीजिये
ख्वाब बन जाऊंगी शर्त ये है मगर
ख्वाब बन जाऊंगी शर्त ये है मगर
अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये
अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये

कभी कभी सोचूं की तुम मेरे क्या हो
कभी कभी सोचूं की तुम मेरे क्या हो
दर्द हो दिल का, आ आ आ आ आ आ आ
दर्द हो दिल का या तुम दवा हो
दर्द बान जाऊँगा शर्त ये है मगर
दर्द बान जाऊँगा शर्त ये है मगर
दर्द-ए-दिल की मुझी से दवा लीजिये
दर्द-ए-दिल की मुझी से दवा लीजिये
ख्वाब बन जाऊंगी शर्त ये है मगर
अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये
अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये

आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ
तुमने चाह था अफसाना मैं बन गया
तुमने चाह था अफसाना मैं बन गया
बैठे बिथ्लाये दीवाना मैं बन गया
होश में लूंगी, शर्त ये है मगर
होश में लूंगी, शर्त ये है मगर
इक सिवा मेरे सब कुछ भुला दीजिये
इक सिवा मेरे सब कुछ भुला दीजिये
अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये

दुनिया में मेरी जो तुम ही ना आते
दुनिया में मेरी जो तुम ही ना आते
गीत हमारे ऐ ऐ ऐ ऐ ऐ ऐ ऐ
गीत हमारे सितारे ना गाते
गीत बन जाऊँगा शर्त ये है मगर
गीत बन जाऊँगा शर्त ये है मगर
अपने कानों में मुझको जगह दीजिये
अपने कानों में मुझको जगह दीजिये
ख्वाब बन जाऊंगी शर्त ये है मगर
अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये
अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये

फूल बन जाऊँगा शर्त ये है मगर
अपनी जुल्फों में मुझको सजा लीजिये
अपनी जुल्फों में मुझको सजा लीजिये

................................
Phool ban jaoonga-Pyar kiye ja 1966

Tuesday, 31 May 2011

खुली हवा में डोले रे-चम्पाकली १९५७

फिल्म चम्पाकली में संगीतकार हेमंत कुमार ने अच्छा संगीत दिया
राजेंद्र कृष्ण के मधुर गीतों को लता और रफ़ी ने बड़ी तन्मयता के
साथ गाया भी। सॉफ्ट किस्म के गीत हैं फिल्म के। सॉफ्ट गीतों कि
विशेषता ये होती है उन्हें आप जब चाहे बिना ना नुकुर, मूड हो
ना हो सुन कर जी बहला सकते हैं। आपको पहले दो गीत सुनवाये
हैं-छुप गया कोई रे और ओ गवालन क्यूँ मेरा मन। गीत में नायिका
कुछ विशेष व्यायाम कर रही है और वो क्या है मुझे समझ नहींते हैं।
पढता। कृपया बतलाएं धागे में पत्थर बांध के ऐसा क्या किया जाता
है जिससे पक्षी बेचारे नीचे गिरने लगते हैं।





गीत के बोल:

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया
खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

बदरिया जो छाई संदेसा ऐसा लाई
कि सुन-सुन मैं तो शरमाई घबराई
बदरिया जो छाई संदेसा ऐसा लाई
कि सुन-सुन मैं तो शरमाई घबराई
किसी ने चोरी-चोरी मेरे घूँघट के पट खोले रे
लाज की मारी मैं तो हुई रे बावरिया

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

मैं अँखियाँ झुकाऊँ या मुखड़ा छुपाऊँ
समझ नहीं आए हाय कित जाऊँ
मैं अँखियाँ झुकाऊँ या मुखड़ा छुपाऊँ
समझ नहीं आए हाय कित जाऊँ
आज किसी ने मुझे पुकारा प्यार से हौले-हौले रे
झुक झुक जाये हाय मेरी नजरिया

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

......................................
Khuli hawa mein dole re-Champakali 1957

Monday, 30 May 2011

मन में किसी की प्रीत बसा ले-आराम १९५१

आज आराम से कुछ पुराने गाने सुनने का मन हुआ तो
फिल्म 'आराम' के भी कुछ गीत सुन लिए। ये कुछ संयोग
जैसा है कि जिस दिन फुर्सत से गीत सुनने का मन होता है
उस दिन ३० के, ४० के और ५० के दशक के गीत याद आते
हैं जैसे उनसे कोई पुरानी रिश्तेदारी हो। फिल्म का संगीत
लाजवाब है। गौर फरमाएं अनिल बिश्वास ने फिल्म 'लाजवाब'
में भी लाजवाब संगीत दिया है। हाँ ये बात सही है कि आराम
उन फिल्मों में से है जिन्हें श्रोताओं और दर्शकों ने भी जवाब में
लाजवाब कहा। प्रस्तुत गीत में प्यानो का बहुत सुन्दर प्रयोग
हुआ है। फिल्म के तीन गीत आप पूर्व में सुन चुके हैं, लगे हाथ
चौथा भी सुन लीजिये। नायक प्रेमनाथ बहुत ही expressive
किस्म के अदाकार थे। इधर उनको प्यानो बजाते देख मुझे
सुनील दत्त याद आ गये। शायद सुनील दत्त प्रेमनाथ के ख़ास
हाव भावों से प्रभावित थे। संगीत निर्देशक के साथ ही साथ
फिल्म के निर्देशक की भी दाद देना पड़ेगी। मधुबाला को इतने
expression बदलते मैंने बहुत ही कम गीतों में देखा है।

आपने कभी ध्यान दिया है कि युवा लड़कियां बात करते करते
गर्दन को ज्यादा घुमाती हैं, या एक ओर टेढ़ा कर लेती हैं, उम्र
गुजरने के साथ साथ गर्दन घुमाना कम होता और बेलन घुमाना बढ़ने
लगता है। मुझे याद है दूसरी कक्षा में एक बाला दो का पहाडा
सुनाते सुनाते खुद १८० के कोण तक घूमती थी और गर्दन को
२७० के कोण में इधर उधार घुमा डालती थी। उसको देख कर ही
हमें अहसास होता था कि पहाडा याद करना कितना कसरती काम है।

तो सुनिए जनाब १० में से १० नंबर वाला गीत। राजेंद्र कृष्ण की
रचनाएँ अपने मदन मोहन के संगीत निर्देशन में अवश्य सुनी होंगी
और सराही भी होंगी, मैंने भी सराही हैं। मदन मोहन को शिकायत रही
कि उनकी रचनाओं को वो प्रतिसाद नहीं मिला जिसके वे हक़दार
थे। इसका जवाब ये गीत है। गाने में सितार के टुकड़े हो या ना हों
वो आम जनता के कानों को स्वीकार्य होना चाहिए। सितार के ऊंचे
सप्तक वाले सुर कानों को ज़रा झनझना देते हैं और ये बाजीगरी शुद्ध
शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों के लिए ठीक है।

सरलता एक बहुत बड़ा अस्त्र है जिसके बलबूते पर बड़े बड़े किले फतह
किये जाते हैं। ये मूल मंत्र संगीतकार अनिल बिश्वास के शिष्य सी. रामचंद्र
ने भी माना और सी. रामचंद्र से ओर्केस्ट्रा के गुर सीखने वाले संगीतकार
सचिन देव बर्मन ने भी माना। शंकर जयकिशन ने सरलता और शोरगुल
वाली शैली दोनों के बीच एक संतुलन बनाये रखा। यहाँ शोरगुल से मतलब
वाद्य यंत्रों की अधिकता से है, गलत अर्थ ना निकाल बैठें। प्रस्तुत गीत
सौम्यता की एक शानदार मिसाल है। इतने अहिस्ता से गीत गाया जा रहा
है कि कान से लगा के मन तक हलकी सी गुदगुदी का अहसास होता है।




गीत के बोल:

मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
किसी को मन का मीत बना ले
मीत बना ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले

इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
प्रीत बना ले ये जीवन को एक सुहाना सपना
एक सुहाना सपना
जीवन में ये ज्योत जगा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले

प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
जलनेवाला हँसते हँसते फिर भी जलता जाए
फिर भी जलता जाए
प्रीत के हैं अन्दाज़ निराले
ओ मतवाले, ओ मतवाले

मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
..................................
Man mein kisi ki preet-Aaram 1951

Thursday, 19 May 2011

जा री जा री ओ कारी बदरिया-आज़ाद १९५५

कुछ गीत बचपन की यादों से जुड़े होते हैं तो कुछ के साथ
पचपन की उम्र जुडी होती है। आज की पीढ़ी के हिसाब से
ये गीत काफी बुज़ुर्ग गीत है । एक पडोसी चौबे जी जो
बनारस निवासी थे, अक्सर अपने माइके(उनका पैतृक घर
बनारस में था) जाया करते। उनकी बीवी थी जौनपुर की,
मगर वो अपने माइके जाने को उतनी उत्सुक नहीं होती
जितने कि चौबे जी। चौबे जी के जाते ही उनकी श्रीमती
बात बात में उल्लेख करतीं-वो घर गए हैं, वो बनारस गए हैं,
वो यू. पी. गए हैं, इत्यादि।

वे जब जब जाते, हम लोग ऊंचे सुर में ये गाना गाया करते-
जा री जा री ओ कारी बदरिया.................उत्तर प्रदेश गए हैं
सांवरिया.......

खैर ये तो एक प्रसंग हुआ, गीत के बारे में बात की जाये। फिल्म
आज़ाद का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ और ये फिल्म के सबसे
लोकप्रिय गीतों में से एक है। मीना कुमारी पर फिल्माए और
लता द्वारा गए इस गीत के रचयिता हैं-राजेंद्र कृष्ण और
संगीत दिया है सी रामचंद्र ने। गीत के सभी उपलब्ध विडियो पर
टेल पड़े हुए हैं यू ट्यूब पर, अतः संगीतकार सी रामचंद्र की फोटू
देख देख कर ही गीत का आनंद उठा लीजिये।



गीत के बोल:

जा री जा री ओ कारी बदरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया
मत बरसो री मोरी नगरिया
परदेस गए हैं सांवरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया

कहे धीरे धीरे शोर मचाये री
कहे धीरे धीरे शोर मचाये री
मेरा नरम करजवा जलाये री
मेरा नरम करजवा जलाये री
मेरा मनवा जले, कोई बस ना चले
मेरा मनवा जले, कोई बस ना चले
हाय तक तक के सूनी डगरिया

जा री जा री ओ कारी बदरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया
मत बरसो री मोरी नगरिया
परदेस गए हैं सांवरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया

जइयो जइयो री देश पिया के
जइयो जइयो री देश पिया के
कहियो दुखड़े तू मेरे जिया के
कहियो दुखड़े तू मेरे जिया के
कहियो छम छम रोये, अखियाँ न सोये
कहियो छम छम रोये, अखियाँ न सोये
हुई याद में पी की बाँवरिया

जा री जा री ओ कारी बदरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया
मत बरसो री मोरी नगरिया
परदेस गए हैं सांवरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया
जा री जा री ओ कारी बदरिया
.......................................
Ja ri ja ri o kari badariya-Azaad 1955

Saturday, 29 January 2011

बेरहम आसमाँ मेरी मंज़िल बता-बहाना १९६०

मदन मोहन को ग़ज़ल किंग कहा जाता था ऐसा मैंने
जगह जगह पढ़ा है। तलत महमूद ग़ज़ल गायकी
में काफी नाम कमा कर गए हैं। अपनी थरथराती आवाज़
की खूबी के साथ उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत में खूब
झंडे गाड़े। तलत महमूद का नाम ६० के दशक के
आते आते लोग भूलने लगे। ये गीत उनके आखिरी दौर
के गीतों में शामिल है। मदन मोहन के संगीत को पसंद
करने वाले ज़रूर इस गीत को चाव से सुना करते हैं
या फिर जो गायक तलत महमूद के गीत ज्यादा सुना
करते हैं। खैर राजेंद्र कृष्ण के लिखे और मदन
मोहन के संगीत से सजे इस गीत का आनंद उठाइए।



गीत के बोल:

बेरहम आसमाँ मेरी मंज़िल बता है कहाँ
बेरहम आसमाँ

जो न सोचा था वो हो गया
क्यों नसीबा मेरा सो गया
ग़म की ऐसी घटा छा गयी
चैन दिल का कहीं खो गया
ये बता किस लिये
ले रहा है मेरा इम्तिहाँ

बेरहम आसमाँ

बुझ गया है ये दिल इस तरह
चाँद पिछले पहर जिस तरह
इतनी तारीकियों में बता
राह ढूंढे कोई किस तरह
खो गयीं मन्ज़िलें
हो गया गुम कहीं कारवाँ

बेरहम आसमाँ

जा रहें हैं न जाने किधर
देख सकती नहीं कुछ नज़र
छोड़ दी नाव मंझधार में
किस किनारे लगे क्या ख़बर
क्या करें दूर तक
रोशनी का नहीं है निशाँ

बेरहम आसमाँ

मुझसे क़िसमत ने धोखा किया
हर क़दम पे नया ग़म दिया
है ख़ुशी की क़सम कि यहाँ
चैन का साँस तक न लिया
बुझ गया दिल मेरा
रास आया न तेरा जहाँ

बेरहम आसमाँ

तेरी दुनियाँ में यूँ हम जिये
आँसुओं के समुन्दर पिये
दिल में शिक़वे तड़पते रहे
होंठ लेकिन हमेशा सिये
कब तलक़ हम रहें
तेरी दुनिया में यूँ बेज़ुबाँ

बेरहम आसमाँ

अब कोई भी तमन्ना नहीं
अब यहाँ हम को जीना नहीं
ज़िंदगी अब तेरे जाम से
एक क़तरा भी पीना नहीं
मौत को भेज के
ख़त्म कर दे मेरी दास्तां

बेरहम आसमाँ

Saturday, 22 January 2011

दुनिया में आया है तो-मेरे अरमान मेरे सपने १९६३

अप्पको फिल्म मेरे अरमान मेरे सपने का एक मर्मस्पर्शी
गीत सुनवाया था -तेरा आना भी धोखा था। अब सुनिए इसी
फिल्म से एक और मधुर गीत रफ़ी की आवाज़ में। गीत पार्श्व
में बज रहा है और कुछ यादों के साये विडियो में लहरा रहे हैं।
प्रदीप कुमार और जयश्री गढ़कर आपको परदे पर दिखाई देंगे।
गीत प्रेरणादायक है और दुनिया से इंसान को अपने जाने के पहले
क्या करना चाहिए का सन्देश दे रहा है।



गीत के बोल:

दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा

छोटी सी ज़िन्दगी तेरी हँस के गुज़ार दे
अपनी बिगाड़ के किसी की सँवार दे,किसी की सँवार दे
जो हो बेगाना यहाँ अपना बनाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा

दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो

आया था प्यार से तो जाना भी प्यार से
कर ना गिला कोई जाती बहार से
आया था प्यार से तो जाना भी प्यार से
कर ना गिला कोई जाती बहार से, जाती बहार से
दिल पर जो बीत रही है दिल में छुपाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा

दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो

फूलों पे आज होता तेरा भी आशियाँ
आज तेरी आरज़ू बन गई दास्ताँ, बन गई दास्ताँ
बुझ गई शमा तेरी किसी की जलाए जा
आँसू किसी के ले के ख़ुशियाँ लुटाए जा

दुनिया में आया है तो फूल खिलाए जा
दुनिया में आया है तो
..................................................
Duniya mein aaya hai to-Mere armaan mere sapne 1963

Tuesday, 11 January 2011

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे-गेटवे ऑफ़ इंडिया १९५७

आपने कफ़ सिरप ज़रूर एक ना एक बार पिया होगा आइये आज
पियें सौम्यता का सिरप। गीत है फिल्म 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' से।
इसे दो सौम्य कलाकारों पर फिल्माया गया है-भारत भूषण और
मधुबाला। इस गीत को उतने ही आहिस्ता से गाया भी गया है
जितनी आहिस्ता से ये दोनों कलाकार अपने संवाद बोलते हैं या
अदाएं दिखाते हैं । सितार की आवाज़ के साथ गायकों की आवाज़
का मेल 'सोने में सुहागा' जैसा है। अभी इसी उपमा से काम चलाइए,
दूसरी सूझ नहीं रही है।



गीत के बोल:

रफ़ी : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा :हम ज़माने से दूर जा बैठे

आशा : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम ज़माने से दूर जा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

रफ़ी : भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
हाय! क्या चीज़ थी गँवा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

आशा : दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल वही दिल जो दिल में जा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

रफ़ी : एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
गैर का क्यों उसे बना बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

आशा : गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
देख कर कुछ तो चोट खा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम जमाने से दूर जा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
...................................................
Do ghadi wo jo paas aa baithe-Gateway of India 1957
 
 
www.lyrics2nd.blogspot.com