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Saturday, 8 October 2011

लुट गई मैं तो आज हो रामा-झूठा सच १९८४

फिल्म अभिनेत्री रेखा हर दशक के साथ नए रूप-संस्करण में दिखाई दीं
इसीलिए उनको अंग्रेजी की 'दिवा' कहा जाता है। गौरतलब है की उन्होंने
अपनी काय को योग के ज़रिये आकर्षक बना लिया और ८० के दशक में
फिल्मकारों ने उनके लिए विशेष दृश्य फिल्मों में तैयार किये उनके सौंदर्य
को आम दर्शक से रु-ब-रु कराने के लिए। रेखा के ऊपर फिल्माया गया और
एक कम सुना गया एक गीत सुनते हैं आज, फिल्म 'झूठा सच' से जिसमें उनके
साथ नायक हैं-धर्मेन्द्र।

गीत लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई है आर. डी. बर्मन
ने। गीत गया है आशा भोंसले ने।



गीत के बोल:

लुट गई मैं तो आज हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खड़ी
लुट गई मैं तो आज हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खडी

लुट गई मैं तो, लुट गई
लुट गई मैं तो आज हो रामा
हो रामा हो रामा है दिया हो रामा
खुली सड़क पर खड़ी खड़ी

............................................
Lut gayi main to-Jhootha Sach 1984

Thursday, 28 July 2011

काहे मनवा नाचे हमरा-आलाप १९७७

फिल्म आलाप से एक गीत और सुना जाए। लीक से
हटकर बनी और बॉक्स ऑफिस की पटरी से ज़ल्द ही
उतरी फिल्म में अमिताभ और रेखा की जोड़ी है।

प्रस्तुत गीत रेखा पर फिल्माया गया है जिसे गाया है
लाता मंगेशकर ने। रेखा की भूमिका सेमी-देहाती किस्म
की है फिल्म में अतः गीत के बोलों में थोड़ी खड़ी बोली
के शब्द समाहित हैं। फिल्म के कथानक अनुसार वो एक
गायक की बीबी हैं अतः उनका गाना भी ज़रूरी है। गीत
कर्णप्रिय है जिसका संगीत तैयार किया है जयदेव ने।

ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित फिल्मों में से यही शायद सबसे
कम चलने वाली फिल्म थी। फिल्म का कथानक अच्छा होते
हुए भी ऐसा लगता है कि कहानी अधूरी सी है या फिर एक
छोटी सी कहानी को किसी सास बहू सीरियल की तरह लम्बा
खींचा गया हो ।



गीत के बोल:


काहे मनवा नाचे हमरा
काहे मनवा नाचे हमरा
सखी री कोई इसे अब समझाए

काहे मनवा नाचे हमरा

नैनं कजरा डालन बैठी
नैनं कजरा डालन बैठी
माथे पे सूरज पालन बैठी
बीच में आये देखो सपने कासे

काहे मनवा नाचे हमरा
काहे मनवा नाचे हमरा
सखी री कोई इसे अब समझाए

काहे मनवा नाचे हमरा

नस नस में ये कौन उतरा है
नस नस में ये कौन उतरा है
दिल में किसका दिल धडका है
नाम अनाम का निस दिन बांचे

काहे मनवा नाचे हमरा
काहे मनवा नाचे हमरा
सखी री कोई इसे अब समझाए

काहे मनवा नाचे हमरा
..........................
Kaahe manwa nache hamra-Alaap 1977

Sunday, 17 July 2011

बोतल से इक बात चली है-घर १९७८

गाने के लिए किसी सिचुएशन का होना ज़रूरी नहीं है किसी फिल्म में.
कभी कभी जबरन भी गीत ठूंसे जाते हैं किसी व्यक्ति विशेष की फ़रमाइश
पर. एक ऐसा ही गीत सुनवाते हैं आपको फिल्म घर से.

गीत फिल्माया गया है विनोद महरा और रेखा पर. गुलज़ार के लिखे बोलों
को सुरों में ढाला है आर डी बर्मन ने. आशा और रफ़ी इस गीत के गायक
हैं. जैसा की गुलज़ार के अधिकांश गीतों में होता है चाँद की विशेष सेवा
इस गीत में भी की गयी है.

कोका कोला की पुरानी बोतल कैसी दिखती थी ये कोका कोला प्रेमी जान
पाएंगे इस गीत से.



गीत के बोल:

बोतल से इक बात चली है
काग उड़ा के रात चली है

बोतल से इक बात चली है
काग उड़ा के रात चली है ,हो
तु रु रु तु, तु रु रु तु ,तु रु तु तु
तु रु रु तु, तु रु रु तु, तु रु तु तु

हो, बोतल से इक बात चली है
तू रु रु तू
काग उड़ा के रात चली है

आज की मय बहुत मीठी है
आज तो आँख मिला के पीना
चांद की मिसरी घुल जायेगी
चाँद से होंठ लगा के पीना

हो
तु रु रु तु तु रु रु तु तु रु तु तु
तु रु रु तु तु रु रु तु तु रु तु तु
हो, बोतल से इक बात चली है
काग उड़ा के रात चली है
हो, बोतल से इक बात चली है
काग उड़ा के रात चली है

वादों वाली रात आयी है
आज की रात इनकार ना करना
अपने दिन और रात ना पूछो
तुमसे जीना तुमपे मरना

तु रु रु तु तु रु रु तु तु रु तु तु
तु रु रु तु तु रु रु तु तु रु तु तु

हो, बोतल से इक बात चली है
तू रु रु तू
काग उड़ा के रात चली है
बोतल से इक बात चली है
काग उड़ा के रात चली है
ल ल ल ल ल ल ल ल

.....................................
Botal se ek baat chali hai-Ghar 1978

Thursday, 30 June 2011

लबों से चूम लो-आस्था १९९७

आज आपको एक नई फिल्म आस्था से गीत सुनवाते हैं। गीत काफी
पसंद किया गया और सराहा गया। अब ये अपने ऑडियो के लिए
सराहा गया या विडियो के लिए ये आप खुद ही पता लगाइए। गीत में
आपको दो कलाकार दिखाई देंगे-ओम पुरी और रेखा।

बासु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित फिल्मों के मामले में बॉक्स ऑफिस पर
ख़ामोशी और सन्नाटा पसरा रहता था। फिल्म तीसरी कसम ऐसा सन्नाटा
पसरा गई कि साहित्य जगत और फिल्म जगत से एक संवेदनशील
गीतकार कम हो गया। फिल्म बाद में चली ज़रूर मगर जिसे असली फायदा
मिलना चाहिए था वो फ़ायदा मिलने तक नश्वर संसार से कूच कर गया।

शायद बासु के भाग्य में लोकप्रियता का तत्त्व कमजोर था या गायब था।
धार्मिक परिवार में पैदा हुए बासु ने शायद ही धार्मिक विषयों को हाथ
लगाया अपने पूरे कैरियर में। उनकी अंतिम फिल्म धार्मिक से नाम
वाली थी थी-आस्था जो कहानी के लिए कम, ओम पुरी और रेखा की
अलग हट के जोड़ी और कुछ अंतरंग दृश्यों की वजह से ज्यादा पहचानी
गई। जिस वर्ष आस्था रिलीज़ हुयी उसी वर्ष बासु ६२ वर्ष की आयु में
दुनिया को अलविदा कह गये ।




गीत के बोल:

लबों से चूम लो
आँखों से थाम लो मुझको

लबों से चूम लो, आँखों से थाम लो मुझको
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले

गुलज़ार:दो सौंधे-सौंधे से जिस्म जिस वक़्त
एक मुट्ठी में सो रहे थे
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी

मैं आरज़ू की तपिश में पिघल रही थी कहीं
तुम्हारे जिस्म से होकर निकाल रही थी कहीं
बड़े हसीं थे जो राह में गुनाह मिले
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले

गुलज़ार: तुम्हारी लौ को पकड़ के जलने की आरज़ू में
जब अपने ही आप से लिपट के सुलग रहा था
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी

तुम्हारी आँखों के साहिल से दूर दूर कहीं
मैं ढूंढती थी मिले खुशबुओं का नूर कहीं
वहीँ रुकी हूँ जहाँ से तुम्हारी राह मिले
तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले
...............................
Labom se choom lo-Aastha 1997

Monday, 6 June 2011

काली घटा छाई-काली घटा १९७९

जब भी कोई अमिताभ की फिल्म का गाना याद आता है तो साथ ही
साथ शशि कपूर की फिल्म का भी कोई गीत याद आ जाता है। अब
आपको सुनवाते हैं शशि कपूर और रेखा अभिनीत सन १९७९ की फिल्म
काली घटा से एक गीत। ये गीत फिल्म में एकल और युगल दोनों संस्करण
में उपलब्ध है। आज आपको सुनवा रहे हैं लता मंगेशकर का एकल गीत
जो रेखा पर फिल्माया गया है। आवाज़ लता की है, बोल आनंद बक्षी के
और संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का।



गीत के बोल:

काली घटा छाई प्रेम रुत आई
आई आई आई आई तेरी याद आई
काली घटा छाई प्रेम रुत आई
आई आई आई आई तेरी याद आई
तुझे ढूंढें मेरे नैन
नहीं नींद नहीं चैन

काली घटा छाई प्रेम रुत आई

यूँ ही नहीं चली आयीं बहारें
फूल यूँ ही नहीं खिले
यूँ ही नहीं चली आयीं बहारें
फूल यूँ ही नहीं खिले

कुछ तो है कारण
इतने युगों से
दो प्रेमी नहीं मिले
छोटा सा जीवन
लम्बी जुदाई

काली घटा छाई प्रेम रुत आई
आई आई आई आई तेरी याद आई
काली घटा छाई प्रेम रुत आई
आई आई आई आई तेरी याद आई
तुझे ढूंढें मेरे नैन
नहीं नींद नहीं चैन

काली घटा छाई प्रेम रुत आई
आई आई आई आई तेरी याद आई

.......................................
Kali ghata chhayi(solo)-Kali ghata 1979

Monday, 16 May 2011

हम हैं प्यार की डगर के- दो मुसाफिर १९७८

कोलगेट स्माइल प्लीज़। निर्देशक ने नायक को शायद यही निर्देश
दिया होगा इस गीत के फिल्मांकन की शुरुआत में। पिछले गीत
में कल्याणजी आनंदजी के जिक्र से ये गीत याद आ गया। सन १९७८
की फिल्म दो मुसाफिर से ये युगल गीत लिया गया है। शशि कपूर
और रेखा पर फिल्माए गाये इस गीत में लता और रफ़ी की आवाजें हैं।
थोड़ा धीमा और कर्णप्रिय गीत है ये। ये उस दौर का गीत है जब अभिनेत्री
रेखा ने योग करना शुरू नहीं किया था। खड़े तो नायक नायिका हैं समुद्र
के किनारे और गीत में जिक्र नदी का है। इतने सुन्दर गीत में इतना तो
नज़र अंदाज़ किया ही जा सकता है, है ना ?

गीत लिखा है एम् जी हशमत ने । फिल्म का शीर्षक गीत है ये और फिल्म
में २-३ बार सुनाई देता है।




गीत के बोल:

हम हैं प्यार की , प्यार की ,
डगर के दो मुसाफिर
डगर के दो मुसाफिर
हम हैं प्यार की डगर के दो मुसाफिर
हो संग संग रहने का वादा हमारा
वादा हमारा लो वादा हमारा

हम हैं प्यार की, प्यार की,
डगर के दो मुसाफिर
डगर के दो मुसाफिर

जैसे नदिया का गहरा पानी
बन के बादल अम्बर चूमे
जैसे अपने प्यार की धुन
धरती सुने सागर सुने
प्यार ही ईश्वर प्यार ही पूजा
प्यार ही ईश्वर प्यार ही पूजा
प्यार से बढ़ के ना कोई

हम हैं प्यार की, प्यार की,
डगर के दो मुसाफिर
डगर के दो मुसाफिर

जैसे तन और मन का संगम
सांसों का संगीत सुनाये
ऐसे अपने प्यार की सरगम'
जनम जनम से ये दोहराए
हर प्रेमी में बसे थे हम तुम
हर प्रेमी में बसे थे हम तुम
और ना दूजा कोई

हम हैं प्यार की, प्यार की,
डगर के दो मुसाफिर
डगर के दो मुसाफिर

हो संग संग रहने का वादा हमारा
वादा हमारा लो वादा हमारा
हम हैं प्यार की डगर के दो मुसाफिर
डगर के दो मुसाफिर
डगर के दो मुसाफिर
.........................................
Hum hain pyar ki dagar ke-Do musafir 1978

Sunday, 3 April 2011

आजकल पांव ज़मीन पर-घर १९७५

बल्ले बल्ले हो गया जी, ये शब्द सुने मैंने कल जब भारत की
टीम ने विश्व कप जीता। तमाम प्रकार के नारे स्लोगन सुनाई दे
गये जिन्हें सुने हुए एक अरसा हो गया था । ये सब नारे सुनने को
मेरे भी कान सन १९८३ के बाद से तरस रहे थे।

मित्रों, क्षमा चाहूँगा होली के अवसर पर आपसे मुखातिब नहीं
हो पाया। रोजी रोटी कभी कभी ज्यादा चक्कर खिला दिया करती है।
इस चक्कर घिन्निये दौर में से कुछ समय निकाल कर आज जंग
लगे दिमाग को कुछ साफ़ करने की कोशिश करता हूँ।

तो साहब मार्च का पूरा महीना वर्ल्ड कप फीवर में गुज़रा। अब
भाफ्रत की टीम ने कप जीत लिया है तो कई दर्शक भी फूले
नहीं समा रहे। ऐसे में एक गीत पेश है जो खिलाडियों और
दर्शकों दोनों की भावनाओं को शायद समझा सके। ये मौका
ज़बरदस्त दिया टीम इंडिया ने देश की सवा अरब आबादी को
जश्न मनाने का।

गुलज़ार का लिखा ये गीत लता मंगेशकर ने गाया है और धुन
बनाई है राहुल देव बर्मन ने।



गीत के बोल:

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे
आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे
बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे

जब भी थामा है तेरा हाथ तो देखा है
जब भी थामा है तेरा हाथ तो देखा है
लोग कहते हैं की बस हाथ की रेखा है
हमने देखा है जो तकदीरों को जुड़ते हुए

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे
बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे

नींद सी रहती है हल्का सा नशा रहता है
रात दिन आँखों में एक तेरा पता रहता है
पर लगी आँखों को देखा है कभी उड़ते हुए

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे
बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे

जाने क्या होता है हर बात पे कुछ होता है
दिन में कुछ होता है और रात में कुछ होता है
थाम लेना जो कभी देखो हमें उड़ते हुए

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे
बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए

आजकल पांव ज़मीन पर नहीं पढ़ते मेरे

Thursday, 20 January 2011

झूम झूम आहा ...कल की फिकर-भोला भाला १९७८

चुम्बकीय प्रभाव के बिना मानव शरीर बेकार है। ये सिद्धांत लगभग
जीवन के हर क्षेत्र में महसूस कर सकते हैं आप। कितनी अभिनेत्रियाँ
आयीं और गयीं लेकिन सफलता और प्रसिद्धि कुछ के खाते में ही लिखी
थी।

भानुरेखा गणेशन उन भाग्यशाली अभिनेत्रियों में से एक हैं जिन्हें दर्शकों
ने पहली फिल्म सावन भादो से ही सर आँखों पर बिठाया। रेखा की ख़ास
बात ये है कि उनके सामान्य से लगने वाले गीत भी आकर्षक लगने लगते
हैं। ये उस चुम्बकीय प्रभाव कि वजह से है जो उन्हें ईश्वरीय देन है। गौर तलब
है हम केवल इस प्रभाव की बात कर रहे हैं। अभिनय के मामले में रेखा में
बहुत आगे चल के सुधर आया जब वे बॉलीवुड के सबसे प्रसिद्ध महानायक
के साथ फिल्मों में दिखाई देना शुरू हुयीं।

आनंद बक्षी के लिखे दार्शनिक से गीत की धुन बनाई है राहुल देव बर्मन ने।




गीत के बोल:

झूम झूम आ हा, झूम झूम आ हा
झूम झूम आ हा, झूम झूम आ हा
झूम झूम आ हा, झूम झूम आ हा
झूम झूम आ हा, झूम झूम आ हा
झूम झूम आ हा आ हा आ हा आ हा
आ हा
कल की फिकर करेगा जो वो दीवाना होगा
कल की फिकर करेगा जो वो दीवाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा
कल की फिकर करेगा जो वो दीवाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा

जीने का शौक है तो ज़िन्दगी को लूट लो
जीने का शौक है तो ज़िन्दगी को लूट लो
पीने का शौक है सागर किसी का छीन लो
इस जवानी की तरह एक कहानी की तरह
इस जवानी की तरह एक कहानी की तरह
झूम झूम आ हा, झूम झूम आ हा

कल ये सागर होगा ना ये पैमाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा

मिल जाता यार तो ये प्यार हम ना लूटते
मिल जाता यार तो ये प्यार हम ना लूटते
हम दिल ना तोड़ते जो दिल ना टूटते
के करें हम क्या करें
क्या जियें हम क्या मारें
के करें हम क्या करें
क्या जियें हम क्या मारें

झूम झूम आ हा, झूम झूम आ हा

ये खिलौने तोड़ के दिल बहलाना होगा
ये खिलौने तोड़ के दिल बहलाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा

कल की फिकर करेगा जो वो दीवाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा
ज़िन्दगी है आज का दिन कल मर जाना होगा
..........................................
Kal ki fikar karega-Bhola bhala 1978

Sunday, 5 December 2010

नीला आसमान सो गया-सिलसिला १९८१

सिलसिला एक प्रेम त्रिकोण पर आधारित कहानी है।
इसमें अमिताभ बच्चन, जाया भादुड़ी और रेखा
ने अभिनय किया है। यश चोपड़ा जो कि त्रिकोण
से खासा लगाव रखते हैं उन्होंने ये एक विश्वसनीय
सी फिल्म बनाई, मगर समय से थोडा आगे होने
की वजह से फिल्म ने अच्छा व्यवसाय नहीं किया।

फिल्म की विशेषता नए रंग रूप में निखरी रेखा
के कोस्तुमे थे। रेखा सन १९८० के बाद जबसे उन्होंने
योग करना शुरू किया एक नई तरोताज़ा काया के
साथ नज़र आयीं। इस फिल्म में लभगग उन्होंने ४००
के करीब परिधान पहने हैं। ये तथ्य एक रेखा के
फैन ने मुझे बताया। मुझ में इतना ध्यान लगा
के कपडे गिनने का धैर्य नहीं है।

जावेद अख्तर ने अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करते
हुए कुछ अच्छे गीत लिखे हैं फिल्म के लिए और
संगीतकार शिव हरि का तो कहना ही क्या जिन्होंने
एक से बढ़ कर एक धुनें तैयार की फिल्म के लिए ।
फिल्म का संगीत खासा लोकप्रिय है और इसके गीत
आज भी सुने जाते हैं। सिलसिला फिल्म से ये गीत
मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। ये लता मंगेशकर वाला
संस्करण है। इसी गीत को अमिताभ ने भी गाया है।



गीत के बोल:

नीला आसमान सो गया
नीला आसमान सो गया हो
नीला आसमान सो गया

आंसुओं में चाँद डूबा रात मुरझाई
ज़िन्दगी में दूर तक फैली है तन्हाई
जो गुज़रे हम पे वो कम है
तुम्हारे गम का मौसम है
नीला आसमान सो गया
नीला आसमान सो गया

हो, याद की वादी में गूंजे बीते अफ़साने
याद की वादी में गूंजे बीते अफ़साने
हमसफ़र जो कल थे अब ठहरे वो बेगाने
मोहब्बत आज प्यासी है
बड़ी गहरी उदासी है
नीला आसमान सो गया हो
नीला आसमान सो गया

नीला आसमान सो गया
नीला आसमान सो गया
नीला आसमान सो गया

Tuesday, 30 November 2010

मन क्यूँ बहका रे-उत्सव १९८४

मंगेशकर बहनों ने साथ में कई गीत गाये हैं। लता ने आशा के
और उषा के साथ कई गीत गाये हैं। आशा ने भी उषा के साथ
कुछ गीत गाये। लता और आशा के गाये युगल गीतों में से जो
सबसे ज्यादा बजा वो आज प्रस्तुत है-फिल्म उत्सव से-मन क्यूँ
बहका रे। संस्कृत नाट्य-मृच्छकटिकम(मिटटी की गाडी) पर
आधारित गिरीश कर्नाड निर्देशित और शशि कपूर रेखा
अभिनीत इस फिल्म का संगीत खूब सुना गया। फिल्म ने
भी ठीक व्यवसाय किया। उस समय का प्रभाव दिखाने के
लिए गीत भी वैसे ही चाहिए थे। सो, देसी वाद्य यंत्रों के जमावड़े
के साथ लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत तैयार किया। चुनौतीपूर्ण
कार्य था जिसमे वे सफल भी रहे। फिल्म का संगीत हिट होने के
बाद लाख्स्मिकांत प्यारेलाल ने दावे के साथ कहा कि फिल्म उत्सव
में केवल वही संगीत दे सकते थे। अनुराधा पटेल और रेखा पर
फिल्माया गया ये गीत लिखा है शारंग देव ने । चार-पांच किलो
सोने के आभूषणों से लदी फंदी रेखा का सौन्दर्य और अभिनय
अपने सर्वोत्तम शिखर पर हैं इस फिल्म में। एक बात और कहूँगा
राजेश खन्ना की भांति रेखा भी वो कलाकार हैं जिन पर फिल्माए
गए गीत जीवंत हो उठते हैं।



गीत के बोल:

मन क्यूँ बहका री बहका
मन क्यूँ बहका री बहका आधी रात को
बेला महका हो
बेला महका री महका आधी रात को
हो मन क्यूँ बहका री बहका आधी रात को
बेला महका री महका आधी रात को
किसने बंसी बजायी आधी रात को
हो किसने बंसी बजायी आधी रात को
जिसने पलकें हो
जिसने पलकें चुराई आधी रात को
हो मन क्यों बहका री बहका आधी रात को
बेला महका री महका आधी रात को

झांझर झमके सुन झमके
हो झांझर झमके सुन झमके
झांझर झमके सुन झमके
आधी रात को ओ ओ ओ
उसको टोको ना रोको, रोको ना टोको,
टोको ना रोको आधी रात को
हो लाज लगे री लागे आधी रात को
लाज लगे री लागे आधी रात को
देना सिन्दूर को सौंप आधी रात को
बेला महका री महका आधी रात को
हो मन क्यों बहका री बहका आधी रात को
बेला महका री महका आधी रात को

बात कहते बने क्या आधी रात को
आँख खोलेगी बात आधी रात को
बात कहते बने क्या आधी रात को
आँख खोलेगी बात आधी रात को
हमने पी चांदनी आधी रात को
हो हो हमने पी चांदनी आधी रात को
चाँद आँखों में आया आधी रात को
बेला महका री महका आधी रात को
हो मन क्यों बहका री बहका आधी रात को
बेला महका री महका आधी रात को

रात गुनती रहेगी आधी बात को
आधी बातों की पीर आधी रात को
रात गुनती रहेगी आधी बात को
आधी बातों की पीर आधी रात को
बात पूरी है कैसे आधी रात को
रात होती हो
रात होती शुरू है आधी रात को
मन क्यों बहका री बहका आधी रात को
बेला महका री महका आधी रात को
हो मन क्यों बहका री बहका
बेला महका री महका
मन क्यूँ बहका
बेला महका
मन क्यूँ बहका
बेला महका

Wednesday, 24 November 2010

कुछ ऐसे बंधन होते हैं-फ़रिश्ता या कातिल १९७७

आपको सन १९५९ की फिल्म सावन से एक युगल गीत सुनवाया था
लता और मुकेश का जिसका संगीत हंसराज बहल ने तैयार किया था।

आइये अब १८ साल बाद यानि कि १९७७ से एक गीत सुनवाते हैं। इस
मधुर गीत को संगीत की लहर पर चढ़ाया है कल्याणजी आनंदजी
ने। एक बात ज़रूर गौर फरमाएं की १८ साल बाद भी गायकों की आवाज़
का जादुई असर बरकरार है। कल्याणजी आनंदजी और हंसराज बहल
अलग अलग दौर के संगीतकार हैं, उनमे तुलना भी बेतुकी सी बात है।
उसके अलावा हंसराज बहल थे पंजाबी मूल के, तो कल्याणजी आनंदजी
की जोड़ी ठेठ गुजराती।

यहाँ केवल दोनों द्वारा तैयार कि गई सॉफ्ट माय लोदीज़ का जिक्र किया
गया है। फिल्म फ़रिश्ता या कातिल कोई बॉक्स ऑफिस पर कमाल
दिखाने वाली फिल्म नहीं थी। इसके बाकी के गीत भी शायद ही आपने
सुने हों।

शशि कपूर और रेखा पर ये मधुए गीत फिल्माया गया है। रेखा
का चेहरा कुछ गोल सा नज़र आता है इस गीत में जो उनके चेहरे की
सामान्य बनावट से थोडा अलग हट के दिख रहा है :प

रेगिस्तान की ख़ामोशी के साथ ये गीत कदम ताल मिलकर चलता सा
प्रतीत हो रहा है। हालाँकि समय के साथ साथ सुर ताल के संगम में
भी बदलाव आते चलते हैं फिर भी इसे अच्छे कर्णप्रिय गीतों की श्रेणी
में रखा जा सकता है। रेगिस्तान में फिल्माया गया सबसे कर्णप्रिय गीत
शायद फिल्म सेहरा का ही है जिसे आप सुन चुके हैं। फर्क सिर्फ इतना है
की सेहरा का फिल्मकार बेहतर था तो फ़रिश्ता या कातिल फिल्म के
कलाकार ज्यादा expressive।

वाकई, ज़िन्दगी में कुछ बंधन बिन बांधे जुड़ जाते हैं और जुड़ने के बाद
जीवन भर तड़पाते हैं। ऐसे बंधनों को अमूमन प्यार का बंधन कहा जाता
है।

कल्याणजी आनंदजी और इन्दीवर का साथ बहुत फिल्मों में रहा है। एक
बारगी सुनने में तो ये गीत इन्दीवर का लिखा सा लगता है, मगर जनाब
ये गीत अनजान ने लिखा है।



गीत के बोल:

कुछ ऐसे
कुछ ऐसे बंधन होते हैं
जो बिन बांधे बांध जाते हैं
कुछ ऐसे बंधन होते हैं
जो बिन बांधे बांध जाते हैं

जो बिन बंधे बांध जाते हैं
जो बिन बंधे बांध जाते हैं
वो जीवन भर तड़पाते हैं

कुछ ऐसे
कुछ ऐसे बंधन होते हैं
जो बिन बांधे बांध जाते हैं

जाने ये कैसा नाता है
हो ओ, जाने ये कैसा नाता है
जो बिन जोड़े जुड़ जाता है
एक दिन मन का पागल पंछी
बिन पंख लगे उड़ जाता है

सूरज छूने की कोशिश में
सूरज छूने की कोशिश में
पंछी के पर जल जाते हैं

कुछ ऐसे
कुछ ऐसे बंधन होते हैं
जो बिन बांधे बांध जाते हैं

जब प्यार की तपती राहों में
हो, ओ जब प्यार की तपती राहों में
दो प्यासे दिल मिल जाते हैं
फिर धुप छाओं बान जाती है
साँसों में फूल खिल जाते हैं

जागी आँखों के ये सपने
जागी आँखों के ये सपने
अक्सर मन को छल जाते हैं

कुछ ऐसे
कुछ ऐसे बंधन होते हैं
जो बिन बांधे बांध जाते हैं

जो बिन बंधे बांध जाते हैं
वो जीवन भर तड़पाते हैं

कुछ ऐसे बंधन होते हैं
जो बिन बांधे बांध जाते हैं
 
 
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