गंभीर किस्म के बोल और लाजवाब गायकी के साथ दैवीय संगीत का
मिश्रण है इस गीत में। किशोर कुमार और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म
गर्ल फ्रेंड से ये गीत लिया गया है जिसे स्वयं किशोर कुमार ने गाया है।
साहिर लुधियानवी के बोलों को सुरों में पिरोया है हेमंत कुमार ने।
ये एक सदाबाहर गीत है जिसे आप आसानी से गुनगुना सकते है। इसे
आज भी सुनिए तो ताज़ा सा लगता है। इसके बोल ऐसे हैं जो आपको
दुनिया की हकीकत से साक्षात्कार करते चलते हैं और जैसे सुख-दुःख
की तुलना की जाती है गीतकार ने रोना-हंसना को सहज तरीके से सरल
शब्दों के जाल में बांध दिया है। यहाँ पर आ के शैलेन्द्र और साहिर के
अंदाज़ का संगम हो जाता है।
गीत के बोल:
आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना, खोना पड़ा तो समझे
आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना खोना पड़ा तो समझे
ख़्वाबों की हक़ीक़त क्या थी
अरमानों की क़ीमत क्या थी
अपनों की मुहब्बत क्या थी
ग़ैर होना पड़ा तो समझे
आज रोना पड़ा तो समझे
सुख मिलता है किस मुश्किल से
क्या करती है दुनिया दिल से
इस रंग भरी महफ़िल से
दूर होना पड़ा तो समझे
आज रोना पड़ा तो समझे
निकले थे जिन्हें अपनाने
वो लोग थे सब बेगाने
इस बात को हम दीवाने
चैन खोना पड़ा तो समझे
आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना खोना पड़ा तो समझे
.......................................
Aaj rona pada to samjhe-Girl Friend 1960
Showing posts with label Waheeda Rehman. Show all posts
Showing posts with label Waheeda Rehman. Show all posts
Thursday, 4 August 2011
Saturday, 16 July 2011
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए-गाईड १९६५
कुछ गीत कठिन होना भी ज़रूरी हैं. अगर हर गीत आम आदमी
गुनगुनाते-गुनगुनाते गाने लग जाए तो पार्श्व गायन के लिए लंबी
कतार लग जायेगी. सुनने में सरल सा लगता ये गीत तो ऐसा है
कि मंजे हुए गायक भी इसे गाते समय डगमगा जाते हैं और इस
गीत की खूबी ये है कि संगीत के बिना इसको गुनगुनाने पर कुछ
रिक्तता का आभास होता है. इस तरीके से बना है ये कि बिना
संगीत के टुकड़ों के ये न तो गुनगुनाने में अच्छा लगता है और
शायद सुनने में भी न लगे. इसको ही कहते हैं बोल और धुन का
एक दूसरे से कस कर बंधा होना.
प्रस्तुत गीत है फिल्म गाईड से जो हिंदी फिल्म सिनेमा इतिहास का
एक मील का पत्थर है. शैलेन्द्र के लिखे गीत को स्वरबद्ध किया है
संगीतकार सचिन देव बर्मन ने. इस गीत को कातिल बनाने में
सैक्सोफोन ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है जो कि मनोहारी सिंह ने
बजायी है. उम्मीद है इसमें बजी बांसुरी ज़रूर प्रसिद्द बांसुरी वादक
हरिप्रसाद चौरसिया की ही होगी.
गीत के बोल:
आ, आ आ आ आ आ
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
प्यार में जिनके सब जग छोड़ा,
और हुए बदनाम,
उनके ही हाथों हाल हुआ ये,
बैठे हैं दिल को थाम,
अपने कभी थे, अब हैं पराए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
ऐसी ही रिमझिम, ऐसी फुहारें,
ऐसी ही थी बरसात,
खुद से जुदा और जग से पराए,
हम दोनों थे साथ,
फिर से वो सावन अब क्यों ना आए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
दिल के मेरे पास हो इतने,
फिर भी हो कितने दूर,
तुम मुझसे, मैं दिल से परेशान,
दोनों हैं मजबूर,
ऐसे में किसको कौन मनाए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
..........................
Din dhal jaaye-Guide 1964
गुनगुनाते-गुनगुनाते गाने लग जाए तो पार्श्व गायन के लिए लंबी
कतार लग जायेगी. सुनने में सरल सा लगता ये गीत तो ऐसा है
कि मंजे हुए गायक भी इसे गाते समय डगमगा जाते हैं और इस
गीत की खूबी ये है कि संगीत के बिना इसको गुनगुनाने पर कुछ
रिक्तता का आभास होता है. इस तरीके से बना है ये कि बिना
संगीत के टुकड़ों के ये न तो गुनगुनाने में अच्छा लगता है और
शायद सुनने में भी न लगे. इसको ही कहते हैं बोल और धुन का
एक दूसरे से कस कर बंधा होना.
प्रस्तुत गीत है फिल्म गाईड से जो हिंदी फिल्म सिनेमा इतिहास का
एक मील का पत्थर है. शैलेन्द्र के लिखे गीत को स्वरबद्ध किया है
संगीतकार सचिन देव बर्मन ने. इस गीत को कातिल बनाने में
सैक्सोफोन ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है जो कि मनोहारी सिंह ने
बजायी है. उम्मीद है इसमें बजी बांसुरी ज़रूर प्रसिद्द बांसुरी वादक
हरिप्रसाद चौरसिया की ही होगी.
गीत के बोल:
आ, आ आ आ आ आ
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
प्यार में जिनके सब जग छोड़ा,
और हुए बदनाम,
उनके ही हाथों हाल हुआ ये,
बैठे हैं दिल को थाम,
अपने कभी थे, अब हैं पराए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
ऐसी ही रिमझिम, ऐसी फुहारें,
ऐसी ही थी बरसात,
खुद से जुदा और जग से पराए,
हम दोनों थे साथ,
फिर से वो सावन अब क्यों ना आए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
दिल के मेरे पास हो इतने,
फिर भी हो कितने दूर,
तुम मुझसे, मैं दिल से परेशान,
दोनों हैं मजबूर,
ऐसे में किसको कौन मनाए
दिन ढल जाए हाय रात ना जाए,
तू तो ना आए तेरी याद सताए
दिन ढल जाए
..........................
Din dhal jaaye-Guide 1964
Labels:
1965,
Dev Anand,
Guide,
Mohd. Rafi,
SD Burman,
Shailendra,
Waheeda Rehman
Monday, 11 July 2011
वो शाम कुछ अजीब थी-ख़ामोशी १९६९
फिर आज डूब जाने को मन करता है तुम्हारी गहरी आवाज़ के समुन्दर में.
किसी किशोर कुमार के भक्त ने ये उदगार प्रकट किये थे इस गीत के लिए
बरसों पहले. मैं भी कुछ सहमत हूँ उस भक्त की भावना से. इस गीत में
अतिरिक्त आयाम है जो इसे सामान्य गीतों की श्रेणी से अलग करके विशिष्ट
की श्रेणी में रखता है. हेमंत कुमार ने जितने मन लगा के खुद के गाये और
लता मंगेशकर वाले गीत बनाये हैं उसी तबियत से इस गीत को भी बनाया
है. किशोर कुमार के सर्वश्रेठ गीतों में से एक आज सुनते हैं फिल्म ख़ामोशी
से. सन १९६९ की फिल्म ख़ामोशी का हर एक गीत नायब रत्न है. बोल लिखे
हैं गुलज़ार ने . गीत का फिल्मांकन एक नाव में हुआ है. इसका फिल्मांकन
बढ़िया है और गीत एक संक्षिप्त कथा के माफिक लगता है.
नायक राजेश खन्ना इस फिल्म में एक मनोरोगी की हैं और वहीदा रहमान एक
मनोचिकित्सक की भूमिका में हैं . पिछले रोगी (धर्मेन्द्र) का इलाज करते करते
वह उससे प्रेम करने लगती है. नायिका का मानसिक द्वन्द इस गीत में बखूबी
दर्शाया गया है. मन को बांटना वाकई मुश्किल काम है.
विरोधाभास का भाव भी है इस गीत में. नायक खुशनुमा ख्याल में है और
नायिका उसके काँधे पर सर रख कर रो रही है. इस गीत की एडिटिंग ज़बरदस्त
है और उस एडिटिंग वाले कलाकार को नमन.
अंत में गीत मरहम का सा काम करता है नायिका के लिए और वो मरीज को
अपना प्रेमी समझ कर उससे लिपट जाती है.
गीत के बोल:
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है
झुकी हुई निगाह में, कहीं मेरा ख़याल था
दबी दबी हँसीं में इक, हसीन सा सवाल था
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
न जाने क्यूँ लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी
मेरा ख़याल हैं अभी, झुकी हुई निगाह में
खिली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है
......................................
Wo shaam kuchh ajeeb thi-Khamoshi 1969
किसी किशोर कुमार के भक्त ने ये उदगार प्रकट किये थे इस गीत के लिए
बरसों पहले. मैं भी कुछ सहमत हूँ उस भक्त की भावना से. इस गीत में
अतिरिक्त आयाम है जो इसे सामान्य गीतों की श्रेणी से अलग करके विशिष्ट
की श्रेणी में रखता है. हेमंत कुमार ने जितने मन लगा के खुद के गाये और
लता मंगेशकर वाले गीत बनाये हैं उसी तबियत से इस गीत को भी बनाया
है. किशोर कुमार के सर्वश्रेठ गीतों में से एक आज सुनते हैं फिल्म ख़ामोशी
से. सन १९६९ की फिल्म ख़ामोशी का हर एक गीत नायब रत्न है. बोल लिखे
हैं गुलज़ार ने . गीत का फिल्मांकन एक नाव में हुआ है. इसका फिल्मांकन
बढ़िया है और गीत एक संक्षिप्त कथा के माफिक लगता है.
नायक राजेश खन्ना इस फिल्म में एक मनोरोगी की हैं और वहीदा रहमान एक
मनोचिकित्सक की भूमिका में हैं . पिछले रोगी (धर्मेन्द्र) का इलाज करते करते
वह उससे प्रेम करने लगती है. नायिका का मानसिक द्वन्द इस गीत में बखूबी
दर्शाया गया है. मन को बांटना वाकई मुश्किल काम है.
विरोधाभास का भाव भी है इस गीत में. नायक खुशनुमा ख्याल में है और
नायिका उसके काँधे पर सर रख कर रो रही है. इस गीत की एडिटिंग ज़बरदस्त
है और उस एडिटिंग वाले कलाकार को नमन.
अंत में गीत मरहम का सा काम करता है नायिका के लिए और वो मरीज को
अपना प्रेमी समझ कर उससे लिपट जाती है.
गीत के बोल:
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है
झुकी हुई निगाह में, कहीं मेरा ख़याल था
दबी दबी हँसीं में इक, हसीन सा सवाल था
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
न जाने क्यूँ लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी
मेरा ख़याल हैं अभी, झुकी हुई निगाह में
खिली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है
......................................
Wo shaam kuchh ajeeb thi-Khamoshi 1969
Labels:
1969,
Gulzar,
Hemant Kumar,
Khamoshi,
Kishore Kumar,
Rajesh Khanna,
Waheeda Rehman
Thursday, 30 June 2011
मैं टूटी हुई एक नैया हूँ-आदमी १९६८
फिल्म आदमी के तीन गीत आप सुन ही चुके हैं। अब
सुनते हैं चौथा गीत। ये दर्द भरा या यूँ कहिये नैराश्य के
भावों को उभारता गीत है। गायक ने जिस गंभीर तरीके
से उस मूड को उभारा है वो बहुत तारीफ़-ए-काबिल है।
शकील बदायूनी के बोलों को धुन प्रदान की है नौशाद
ने। इस गीत के लिए दिलीप कुमार से उपयुक्त नायक
कौन हो सकता है भला ? एक दुविधा सी है और नायक
अपन आप को नायिका के हवाले करना चाहता है मगर
गीत के अंत में वो अकेला छोड़ देने की ख्वाहिश ज़ाहिर
कर ही देता है।
गीत के बोल:
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
जी चाहे डुबो दो मौजों में या साहिल पे ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
एक तुम ही सहारा हो मेरा जीवन की अँधेरी रातों में
दुनिया की ख़ुशी तक़दीर का ग़म सब कुछ है तुम्हारे हाथों में
अब चाहे इधर ले जाओ मुझे या चाहे उधर ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
मायूस नज़र मजबूर क़दम उजड़ा हुआ आलम है दिल का
जीना भी ये कोई जीना है मुँह देख सकूँ ना मंज़िल का
बीते हुए दिन मिल जाएँ जहाँ मुझे ऐसी डगर ले जाओ -२
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
आँसू न बहाओ मेरे लिए ग़म मुझको अकेले सहने दो
टूटे न तुम्हारा नाज़ुक दिल ये दर्द मुझी तक रहने दो
अब छोड़ दो मुझको राहों में या दूर नगर ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
......................................
Main tooti hui ek naiya hoon-Aadmi 1968
सुनते हैं चौथा गीत। ये दर्द भरा या यूँ कहिये नैराश्य के
भावों को उभारता गीत है। गायक ने जिस गंभीर तरीके
से उस मूड को उभारा है वो बहुत तारीफ़-ए-काबिल है।
शकील बदायूनी के बोलों को धुन प्रदान की है नौशाद
ने। इस गीत के लिए दिलीप कुमार से उपयुक्त नायक
कौन हो सकता है भला ? एक दुविधा सी है और नायक
अपन आप को नायिका के हवाले करना चाहता है मगर
गीत के अंत में वो अकेला छोड़ देने की ख्वाहिश ज़ाहिर
कर ही देता है।
गीत के बोल:
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
जी चाहे डुबो दो मौजों में या साहिल पे ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
एक तुम ही सहारा हो मेरा जीवन की अँधेरी रातों में
दुनिया की ख़ुशी तक़दीर का ग़म सब कुछ है तुम्हारे हाथों में
अब चाहे इधर ले जाओ मुझे या चाहे उधर ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
मायूस नज़र मजबूर क़दम उजड़ा हुआ आलम है दिल का
जीना भी ये कोई जीना है मुँह देख सकूँ ना मंज़िल का
बीते हुए दिन मिल जाएँ जहाँ मुझे ऐसी डगर ले जाओ -२
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
आँसू न बहाओ मेरे लिए ग़म मुझको अकेले सहने दो
टूटे न तुम्हारा नाज़ुक दिल ये दर्द मुझी तक रहने दो
अब छोड़ दो मुझको राहों में या दूर नगर ले जाओ
मैं टूटी हुई इक नैया हूँ मुझे चाहे जिधर ले जाओ
......................................
Main tooti hui ek naiya hoon-Aadmi 1968
Labels:
1968,
Aadmi,
Dilip Kumar,
Mohd. Rafi,
Naushad,
Shakeel Badayuni,
Waheeda Rehman
Tuesday, 28 June 2011
भँवरा बड़ा नादान हाय-साहब बीबी और गुलाम १९६२
आओ री ओ बावरी , आओ री, इतना मत इतराओ री। थोड़ा सा लड़ियाओ री।
आइये आज आपको सुनवाते हैं एक चर्चित फिल्म साहब बीबी और गुलाम
से से एक मस्त गीत। आशा भोंसले इसको गा रही हैं परदे पर वहीदा रहमान
के लिए। शकील बदयूनीं साहब ने इस गीत को लिखा है जिसकी तर्ज़ बनाई है
हेमंत कुमार ने। सन १९६२ से यह गीत श्रोताओं को लुभाता रहा है। मनमोहक
अंदाज़ में 'हाय' बोली जा रही है और मुंह बनाने का क्रैश कोर्स है ये गीत लड़कियों
और युवतियों के लिए।
गीत के बोल:
भँवरा बड़ा नादान हाय
भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय
भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय
भँवरा बड़ा नादान
कभी उड़ जाये कभी मंडराये
भेद जिया के खोले न
कभी उड़ जाये कभी मंडराये
भेद जिया के खोले न
सामने आये नैन मिलाये
मुख देखे कुछ बोले न,
वो मुख देखे कुछ बोले न
भँवरा बड़ा नादान हाय
अखियों में रच के चले बच बच के
जैसे हो कोई बेगाना
अखियों में रच के चले बच बच के
जैसे हो कोई बेगाना
रहे सँग दिल के मिले नहीं मिल के
बन के रहे वो अन्जाना,
हो बन के रहे वो अन्जाना
भँवरा बड़ा नादान हाय
कोई जब रोके कोई जब टोके
गुन गुन करता भागे रे
न कुछ पूछे न कुछ बूझे
कैसा अनाड़ी लागे रे,
वो कैसा अनाड़ी लागे रे
भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय
भँवरा बड़ा नादान हाय
.......................
Bhanwra bada nadaan-Sahib Biwi aur Ghulam 1962
आइये आज आपको सुनवाते हैं एक चर्चित फिल्म साहब बीबी और गुलाम
से से एक मस्त गीत। आशा भोंसले इसको गा रही हैं परदे पर वहीदा रहमान
के लिए। शकील बदयूनीं साहब ने इस गीत को लिखा है जिसकी तर्ज़ बनाई है
हेमंत कुमार ने। सन १९६२ से यह गीत श्रोताओं को लुभाता रहा है। मनमोहक
अंदाज़ में 'हाय' बोली जा रही है और मुंह बनाने का क्रैश कोर्स है ये गीत लड़कियों
और युवतियों के लिए।
गीत के बोल:
भँवरा बड़ा नादान हाय
भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय
भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय
भँवरा बड़ा नादान
कभी उड़ जाये कभी मंडराये
भेद जिया के खोले न
कभी उड़ जाये कभी मंडराये
भेद जिया के खोले न
सामने आये नैन मिलाये
मुख देखे कुछ बोले न,
वो मुख देखे कुछ बोले न
भँवरा बड़ा नादान हाय
अखियों में रच के चले बच बच के
जैसे हो कोई बेगाना
अखियों में रच के चले बच बच के
जैसे हो कोई बेगाना
रहे सँग दिल के मिले नहीं मिल के
बन के रहे वो अन्जाना,
हो बन के रहे वो अन्जाना
भँवरा बड़ा नादान हाय
कोई जब रोके कोई जब टोके
गुन गुन करता भागे रे
न कुछ पूछे न कुछ बूझे
कैसा अनाड़ी लागे रे,
वो कैसा अनाड़ी लागे रे
भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय
भँवरा बड़ा नादान हाय
.......................
Bhanwra bada nadaan-Sahib Biwi aur Ghulam 1962
Wednesday, 1 June 2011
तुम पुकार लो-ख़ामोशी १९६९
हेमंत कुमार का संगीत सौम्यता से सराबोर हुआ करता था। उन्होंने
कई आकर्षक गीत भी गाये। उनके बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है
-ख़ामोशी का प्रस्तुत गीत। नायिका प्रधान इस फिल्म में मानवीय
संवेदनाओं को झकझोर देने वाले प्रसंग हैं। फिल्म का अंत सबसे ज्यादा
चौंकाने वाला है। कथानक के प्रस्तुतीकरण में अनूठापन भी दिखलाई
देता है कई दृश्यों में। फिल्म के संवाद लेखक और गीतकार गुलज़ार हैं।
असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्में ज़्यादातर आपको
मानवीय संबंधों, उनकी उलझन और जटिलताओं की ओर घूमती हुयी
मिलेंगी। उनकी संवेदनशीलता को पहचानने के लिए आपको बस चार
फ़िल्में ही देख लेना चाहिए अन्नदाता(१९७२), ममता( १९६६) , सफ़र(१९७०),
और ख़ामोशी(१९६९) । ऐसे विषय जिनपर दूसरे निर्देशकों को काम
करने में हिचक होती, उन्हें शायद आनंद आता। पसंद अपनी अपनी।
subject के treatment के मामले में अधिकतर वे दूसरों से २० साबित
हुए। फ़िल्मी समीक्षकों ने उनपर या उनकी फिल्मों पर पांच पन्ने के
निबंध नहीं लिखे। उनकी फिल्मों का संगीत पक्ष बहुत मजबूत हुआ करता
अपने समकालीन बंगाली मूल के बाकी निर्देशकों की भांति। आप शायद ये
ज़रूर जानना चाहेंगे कि अभिनेता असित सेन और निर्देशक असित सेन क्या
अलग अलग इंसान हैं ? थोड़ा अंतरजाल खंगालिए और पता लगाइए।
गीत के बोल:
तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है
तुम पुकार लो
ख़्वाब चुन रही है रात, बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुख़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
रात ये क़रार की बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
.................................
Tum pukar lo-Khamoshi १९६९
कई आकर्षक गीत भी गाये। उनके बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है
-ख़ामोशी का प्रस्तुत गीत। नायिका प्रधान इस फिल्म में मानवीय
संवेदनाओं को झकझोर देने वाले प्रसंग हैं। फिल्म का अंत सबसे ज्यादा
चौंकाने वाला है। कथानक के प्रस्तुतीकरण में अनूठापन भी दिखलाई
देता है कई दृश्यों में। फिल्म के संवाद लेखक और गीतकार गुलज़ार हैं।
असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्में ज़्यादातर आपको
मानवीय संबंधों, उनकी उलझन और जटिलताओं की ओर घूमती हुयी
मिलेंगी। उनकी संवेदनशीलता को पहचानने के लिए आपको बस चार
फ़िल्में ही देख लेना चाहिए अन्नदाता(१९७२), ममता( १९६६) , सफ़र(१९७०),
और ख़ामोशी(१९६९) । ऐसे विषय जिनपर दूसरे निर्देशकों को काम
करने में हिचक होती, उन्हें शायद आनंद आता। पसंद अपनी अपनी।
subject के treatment के मामले में अधिकतर वे दूसरों से २० साबित
हुए। फ़िल्मी समीक्षकों ने उनपर या उनकी फिल्मों पर पांच पन्ने के
निबंध नहीं लिखे। उनकी फिल्मों का संगीत पक्ष बहुत मजबूत हुआ करता
अपने समकालीन बंगाली मूल के बाकी निर्देशकों की भांति। आप शायद ये
ज़रूर जानना चाहेंगे कि अभिनेता असित सेन और निर्देशक असित सेन क्या
अलग अलग इंसान हैं ? थोड़ा अंतरजाल खंगालिए और पता लगाइए।
गीत के बोल:
तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है
तुम पुकार लो
ख़्वाब चुन रही है रात, बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुख़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
रात ये क़रार की बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
.................................
Tum pukar lo-Khamoshi १९६९
Labels:
1969,
Dharmendra,
Gulzar,
Hemant Kumar,
Khamoshi,
Waheeda Rehman
Saturday, 29 January 2011
तुम अपना रंज ओ ग़म अपनी परेशानी -शगुन १९६४
आपको फिल्म शगुन का एक गीत सुमन कल्याणपुर का गाया
हुआ हम सुनवा चुके हैं। आइये एक और गीत सुना जाये इसी फिल्म
का जो जगजीत कौर की आवाज़ में है। जगजीत उर्फ़ श्रीमती
ख़य्याम ने कुछ एक गीत गए हैं हिंदी फिल्मों में और शायद
सभी में संगीत ख़य्याम का ही है। साहिर का लिखा हुआ ये गीत
मुझे बेहद पसंद है और कभी कभार इसे सुन लिया करता
हूँ-वजह -इसके बोल। प्यानो की मधुर आवाज़ के साथ गीत का
आगाज़ होता है। गीत शायद निवेदिता नाम की कलाकार पर
फिल्माया गया है।
गीत के बोल:
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें ग़म की क़सम, इस दिल की वीरानी मुझे दे दो
ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
बुरा क्या है अगर, ये दुख ये हैरानी मुझे दे दो
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिये, अपनी निगहबानी मुझे दे दो
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
बड़ी ख्वाहिश है अगर, उसकी पशेमानी मुझे दे दो
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
हुआ हम सुनवा चुके हैं। आइये एक और गीत सुना जाये इसी फिल्म
का जो जगजीत कौर की आवाज़ में है। जगजीत उर्फ़ श्रीमती
ख़य्याम ने कुछ एक गीत गए हैं हिंदी फिल्मों में और शायद
सभी में संगीत ख़य्याम का ही है। साहिर का लिखा हुआ ये गीत
मुझे बेहद पसंद है और कभी कभार इसे सुन लिया करता
हूँ-वजह -इसके बोल। प्यानो की मधुर आवाज़ के साथ गीत का
आगाज़ होता है। गीत शायद निवेदिता नाम की कलाकार पर
फिल्माया गया है।
गीत के बोल:
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें ग़म की क़सम, इस दिल की वीरानी मुझे दे दो
ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
बुरा क्या है अगर, ये दुख ये हैरानी मुझे दे दो
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिये, अपनी निगहबानी मुझे दे दो
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
बड़ी ख्वाहिश है अगर, उसकी पशेमानी मुझे दे दो
तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
Labels:
1964,
Jagjit Kaur,
Khayyam,
Sahir Ludhiyanwi,
Shagun,
Waheeda Rehman
Saturday, 15 January 2011
चला भी आ आ जा रसिया- मन की ऑंखें १९७०
आइये आपका रिवीज़न कराया जाए। ये गीत पहले आपको
सुनवाने का प्रयत्न किया गया था, शायद आपकी नज़र इस पर
नहीं पड़ी हो, तो आज फिर से एक बार सुन लेते हैं इसको। बाकी
का विवरण इधर है-मन की ऑंखें । यूँ समझिये जैसे मास्साब
स्कूल में रिवीज़न कराते हें वैसे ही हम आपका रिवीज़न करा रहे हैं।
गाने के बोल:
चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए
चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए
मुरझा चले हैं अरमान सारे
धुंधला गए हैं सभी उजले नज़ारे
कैसे जियूंगी ग़मों के सहारे
तरसी निगाहें मेरी तुझको सदायें दें ,
धड़कन पुकारे
चला भी आ, हो
आ जा रसिया
दिल तो गया मेरा कहीं जान न जाए
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
चला भी आ...........
मेरी लगन को कहाँ तूने जाना
तेरे लिए तो मेरा दिल है दीवाना
हर साँस मेरी तेरा ही तराना
ये जिंदगानी क्या है
तेरी कहानी है तेरा ही फ़साना
तेरा मेरा वो है रिश्ता
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
.......................................
Chala bhi aa, aa ja rasiya-Man ki ankhen 1970
सुनवाने का प्रयत्न किया गया था, शायद आपकी नज़र इस पर
नहीं पड़ी हो, तो आज फिर से एक बार सुन लेते हैं इसको। बाकी
का विवरण इधर है-मन की ऑंखें । यूँ समझिये जैसे मास्साब
स्कूल में रिवीज़न कराते हें वैसे ही हम आपका रिवीज़न करा रहे हैं।
गाने के बोल:
चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए
चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए
मुरझा चले हैं अरमान सारे
धुंधला गए हैं सभी उजले नज़ारे
कैसे जियूंगी ग़मों के सहारे
तरसी निगाहें मेरी तुझको सदायें दें ,
धड़कन पुकारे
चला भी आ, हो
आ जा रसिया
दिल तो गया मेरा कहीं जान न जाए
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
चला भी आ...........
मेरी लगन को कहाँ तूने जाना
तेरे लिए तो मेरा दिल है दीवाना
हर साँस मेरी तेरा ही तराना
ये जिंदगानी क्या है
तेरी कहानी है तेरा ही फ़साना
तेरा मेरा वो है रिश्ता
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
.......................................
Chala bhi aa, aa ja rasiya-Man ki ankhen 1970
Subscribe to:
Posts (Atom)


