Social Icons

Showing posts with label Sahir Ludhiyanwi. Show all posts
Showing posts with label Sahir Ludhiyanwi. Show all posts

Thursday, 25 October 2012

दीवारों का जंगल-दीवार १९७५

यश चोपड़ा के जाने से हिंदी फिल्म सिनेमा का एक
चैप्टर बंद हो गया है. इस चैप्टर में सफलता के कई
अफ़साने लिखे हुए हैं. प्रगतिशील से परिवर्तनशील सभी
दौरों से गुज़रते हुए उन्होंने दर्शकों के समक्ष कई अनमोल
फ़िल्में पेश कीं.

उनको फिल्म सिनेमा का दर्शक प्रेम कहानियों और प्रेम
त्रिकोणों के लिए ज्यादा जानता है. एक विशिष्ट बात उनके
पूरे फ़िल्मी कैरियर में रही कि उनकी फिल्मों के संगीत का
स्तर बेहतर रहा और संगीत लोकप्रिय रहा. उनके खाते में
फ़िल्मी दुनिया का एक उपकार दर्ज है वो है- महानायक की
दूसरी पारी की सफल शुरुआत करवाना. फिल्म मोहब्बतें
आपको ज़रूर ही अभी तक याद होगी.

चलिए ज़रा लीक से हट कर उनकी निर्देशित एक फिल्म का
गीत सुनते हैं जो ज़रा फिलोसोफिक है. गीत साहिर का लिखा
हुआ है जिसे मन्ना डे ने स्वर दिया है और संगीत तैयार किया
है राहुल देव बर्मन ने.




गीत के बोल:

दीवारों का जंगल जिसका आबादी है नाम
बाहर से चुप चुप लगता है अंदर है कोहराम

दीवारों के इस जंगल में भटक रहे इंसान
अपने अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान
अपनी विपदा छोड़ते आये
अपनी विपदा छोड़ते आये कौन किसी के गाम

बाहर से चुप चुप लगता है अंदर है कोहराम

सीने खाली ऑंखें सूनी चेहरों पर हैरानी
सीने खाली ऑंखें सूनी चेहरों पर हैरानी
जितने घने हंगामें इसमें उतनी घनी वीरानी
रातें कातिल सुबहें मुजरिम
रातें कातिल सुबहें मुजरिम, मुजरिम है हर शाम

बाहर से चुप चुप लगता है अंदर है कोहराम
 
-------------------------------------------------
Deewaron ka jangal-Deewar 1975



Friday, 21 October 2011

सोना, सोना रूपा लायो रे-जोशीला १९७३

जोशीला नाम की एक फिल्म है सन १९७३ की। इसमें देव आनंद और
हेमा मालिनी प्रमुख कलाकार हैं। इस फिल्म को देख कर दर्शकों में जोश
जगा हो या ना हो, गीतों के श्रोताओं में जोश अवश्य ही जगा। फिल्म में
कुछ यादगार गीत हैं। आज आपको सुनवाते हैं आशा भोंसले का गाया थोड़ा
अलग सा गीत। वैसे आर डी बर्मन ने उनके लिए बहुतेरे अलग-हट-के गीत
बनाये हैं। फिल्म की खूबी साहिर लुधियानवी के लिखे गीत हैं। गीत भी कुछ
लीक से हट कर लिखा गया प्रतीत होता है।

वैसे ये पोस्ट भी अलग हट के ही है। इसे मैंने बिलकुल अलग हट के स्थान पर
लिखा था। रेलवे स्टेशन के प्लेटफोर्म पर लगी बेंच पर बैठ के। एक परिवार
के साथ दो छोटे छौने(बच्चे) चले जा रहे थे जिसमें से एक के जूतों से चूं चूं की
आवाज़ आ रही थी , उसे सुन के मुझे इस गीत का शुरूआती संगीत याद आया।
बच्चों के जूतों में चूं चूं की आवाज़ करने वाली आईटम का इस्तेमाल काफी पुराना
हो चुका है मगर सुनने में अच्छा लगता है। अगर किसी डोकरे के जूते में वही फिट
कर दिए जाएँ तो पब्लिक कहेगी-अरे मूंह से तो चूं चूं कम थी जो पैरों से भी करने
लगा बुड़ऊ?

गीत फिल्माया गया है नायिका हेमा मालिनी और अन्य बॉलीवुड में रोजी-रोटी
के लिए रोजाना जद्दो-जहद करने वाले अन्य अनजान से महत्वाकांक्षी सहयोगी
कलाकारों पर।

दर्शक दीर्घा में जो दो अन्य कलाकार हैं उनके नाम इस प्रकार से हैं-सुधीर और बिंदु।
गीत के बीच में दो अन्य महिला कलाकार दिखते हैं वे हैं- सुलोचना और पद्मा खन्ना।
गीत में आगे आपको इफ्तेखार भी पुलिस ऑफिसर की भूमिका में नज़र आयेंगे।

गीत कुछ हाई-फ्रीक्वेंसी ख्यालों से बंधा हुआ है। फिर भी आपको बतलाये देते हैं कि
फिल्म की सिचुएशन के मुताबिक ये नायिका द्वारा नायक की भाव भंगिमाओं और
कृत्यों के ऊपर कटाक्ष सा है। नायिका को ये लगता है कि नायक धन के लोभ में
कुछ आड़ी टेडी हरकतें कर रहा है।




गीत के बोल:


रु रु, रु, रु रु

ओ, सोना, सोना रूपा, सोना रूपा
सोना रूपा लायो रे
सोना रे, सोना
सोना रूपा, सोना रूपा लायो रे
ये सोना, ले जा रे
ये रूपा, ले जा रे
मुझे तो, दिल दे जा
मुझे तो, दिल दे जा

आ, सोना मिले तो लोग आजकल दिल को कभी ना लें
प्रीत के मुंह पर कालिख मल दें, प्यार को ठोकर दें
ओ सखी री, अब है ज़माना दूसरा
आ आ आ आ आ आ आ
सोना, सोना रे
सोना रूपा, सोना रूपा लायो रे
ये सोना, ले जा रे
ये रूपा, ले जा रे
मुझे तो, दिल दे जा
मुझे तो, दिल दे जा

आ, सोना मिले तो लोग आजकल दिल को कभी ना लें
प्रीत के मुंह पर कालिख मल दें प्यार को ठोकर दें
ओ सखी री, अब है ज़माना दूसरा
आ आ आ आ आ आ आ आ
सोना, सोना रे
सोना रूपा, सोना रूपा लायो रे

जादू भरे इशारे सब झूठे हैं
मतलब भरे सहारे सब छूटे हैं
या बा
वादे कभी ना सुनना पछताएगी
सपने कभी ना बुनना लुट जायेगी
ओ ओ ओ सखी री, अब है ज़माना दूसरा
आ आ आ
सोना, सोना रे
सोना रूपा, सोना रूपा लायो रे
ये सोना, ले जा रे
ये रूपा, ले जा रे
मुझे तो दिल दे जा
मुझे तो दिल दे जा
ला ला ला ला ला ला ला ला
सोना, सोना रे

पलकों तले ठिकाना कोई मांगे ना
दिल का भरा खजाना कोई मांगे ना
या बा
अपना इन्हें ना बना संसारी हैं
सदमे पड़ेंगे कहना व्यापारी हैं
ओ सखी री अब है ज़माना दूसरा
आ आ आ
सोना, सोना रे
सोना रूपा, सोना रूपा लायो रे
ये सोना, ले जा रे
ये रूपा, ले जा रे
मुझे तो दिल दे जा
मुझे तो दिल दे जा

आ, सोना मिले तो लोग आजकल दिल को कभी ना लें
प्रीत के मुंह पर कालिख मल दें प्यार को ठोकर दें
ओ ओ ओ सखी री अब है ज़माना दूसरा
आ आ आ आ आ आ आ
सोना, सोना रे
सोना रूपा, सोना रूपा लायो रे
सोना, सोना रे
........................
Sona Rupa Layo Re-Joshila 1973

Thursday, 4 August 2011

आज रोना पड़ा तो समझे-गर्ल फ्रेंड १९६०

गंभीर किस्म के बोल और लाजवाब गायकी के साथ दैवीय संगीत का
मिश्रण है इस गीत में। किशोर कुमार और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म
गर्ल फ्रेंड से ये गीत लिया गया है जिसे स्वयं किशोर कुमार ने गाया है।
साहिर लुधियानवी के बोलों को सुरों में पिरोया है हेमंत कुमार ने।

ये एक सदाबाहर गीत है जिसे आप आसानी से गुनगुना सकते है। इसे
आज भी सुनिए तो ताज़ा सा लगता है। इसके बोल ऐसे हैं जो आपको
दुनिया की हकीकत से साक्षात्कार करते चलते हैं और जैसे सुख-दुःख
की तुलना की जाती है गीतकार ने रोना-हंसना को सहज तरीके से सरल
शब्दों के जाल में बांध दिया है। यहाँ पर आ के शैलेन्द्र और साहिर के
अंदाज़ का संगम हो जाता है।




गीत के बोल:

आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना, खोना पड़ा तो समझे
आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना खोना पड़ा तो समझे

ख़्वाबों की हक़ीक़त क्या थी
अरमानों की क़ीमत क्या थी
अपनों की मुहब्बत क्या थी
ग़ैर होना पड़ा तो समझे

आज रोना पड़ा तो समझे

सुख मिलता है किस मुश्किल से
क्या करती है दुनिया दिल से
इस रंग भरी महफ़िल से
दूर होना पड़ा तो समझे

आज रोना पड़ा तो समझे

निकले थे जिन्हें अपनाने
वो लोग थे सब बेगाने
इस बात को हम दीवाने
चैन खोना पड़ा तो समझे

आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना खोना पड़ा तो समझे
.......................................
Aaj rona pada to samjhe-Girl Friend 1960

Tuesday, 19 July 2011

तारों की छांव में-समाज को बदल डालो १९७०

आपको एक मजरूह का लिखा फिल्म बेनाम का एक लोरी गीत सुनवाया
था. अब सुनिए साहिर का लिखा एक गीत जिसे लोरी कहा जाये या बाल
गीत आप डिसाईड कीजिये. गीत मधुर है और इसे गा रही हैं लता मंगेशकर
नायिका शारदा के लिए फिल्म समाज को बदल डालो में. फिल्म के नाम से
ही अंदाजा लगा लीजिए कि इसके गीतों के लिए सबसे फिट कौन गीतकार
हो सकता है साहिरसा के सिवा. परीक्षित सहनी भी गीत में शामिल हो जाते
हैं थोड़ी देर में. रफ़ी की आवाज़ पर उन्होंने होंठ हिलाए हैं.

चुटकी वाले अंदाज़ में पुरुष स्वर के बोल सुनाई देना शुरू होते हैं. बाद में वो
भी लोरीमय हो जाते हैं .



गीत के बोल:

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है
तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

सो जाओ चैन से, इस काली रैन से
आगे जो देश है सुहाना है

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

गगन तले पवन चले ठंडी सुहानी
धीमी धीमी लय में कहे मन से कहानी
आई रे, आई रे
आई हिंडोले ले के निंदिया की रानी
सो जाओ, सो जाओ
सो जाओ, सो जाओ

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

भवें तेरी पिता जैसी माँ जैसी अँखियाँ
गज़ब करे जिया हरे भोली कनखियाँ
आई हैं आई हैं
आई हैं लेने तुम्हें फूलों की सखियाँ
सो जाओ, सो जाओ
सो जाओ, सो जाओ

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है

खिली रहे सजी रहे यूँ ही ये क्यारी
हंसी खुशी जियो माँ तुमपे वारी
खिली रहे सजी रहे यूँ ही ये क्यारी
हंसी खुशी जियो माँ तुमपे वारी
आई रे आई रे
आई रे चंदा के रथ की सवारी
सो जाओ, सो जाओ
सो जाओ, सो जाओ

तारों की छांव में सपनों के गांव में
परियों के संग तुम्हें जाना है
..................................
Taaron ki chhaon mein-Samaj ko badal daalo 1970

Monday, 18 July 2011

उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी-नया दौर १९५७

फिल्म नया दौर के साथ कुछ रोचक किस्से जुड़े हुए हैं. सुनते हैं कि
पहले नायिका के रोल में मधुबाला को लिया जाना था. उनकी जगह
वैजयंतीमाला आ गयीं. उसी तरह से ओ पी नय्यर भी मूल योजना का
हिस्सा नहीं थे. उन्हें भी बाद में अनुबंधित किया गया.

ओ पी नय्यर ने जो गीत इस फिल्म के लिए बनाये वो आज भी उतने ही
उत्साह से सुने जाते हैं, विशेषकर एक गीत जिसे शादी ब्याह के अवसर पर
खूब बजाया और गाया जाता है. ये युगल गीत जो इधर प्रस्तुत है आज उसे
भी खूब सुना जाता है. गायक हैं आशा और रफ़ी.

साहिर लुधियानवी ने इस फिल्म के गीत लिखे हैं. साहिर ने बी. आर. चोपड़ा की
कई फिल्मों के लिए गीत लिखे, अधिकतर में संगीत एन. दत्ता या रवि का होता.
ऐसा क्यूँ इसकी कहानी फिर कभी, फिलहाल ये गीत सुनिए.




गीत के बोल:

हो, उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी
हो, उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी

हो, उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी
हो, उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी

कुँवारियों का दिल मचले
कुँवारियों का दिल मचले
जिन्द मेरिये

जब ऐसे चिकने चेहरे
जब ऐसे चिकने चेहरे

तो कैसे ना नज़र फिसले
तो कैसे ना नज़र फिसले
जिन्द मेरिये

हो, रुत प्यार करन की आई
रुत प्यार करन की आई

हो, रुत प्यार करन की आई
हो, रुत प्यार करन की आई
के बेरियों के बेर पक गये
के बेरियों के बेर पक गये
जिन्द मेरिये

कभी डाल इधर भी फेरा
कभी डाल इधर भी फेरा

के तक-तक नैन थक गये
के तक-तक नैन थक गये
जिन्द मेरिये

हो, उस गाँव से सँवर कभी साजक़े
हो, उस गाँव से सँवर कभी साजक़े

हो, उस गाँव से सँवर कभी साजक़े
हो, उस गाँव से सँवर कभी साजक़े

के जहाँ मेरा यार बसता
के जहाँ मेरा यार बसता
जिन्द मेरिये

पानी लेने के बहाने आजा
पानी लेने के बहाने आजा

के तेरा मेरा इक रस्ता
के तेरा मेरा इक रस्ता
जिन्द मेरिये

हो, तुझे चाँद के बहाने देखूँ
हो, तुझे चाँद के बहाने देखूँ

तुझे चाँद के बहाने देखूँ
तुझे चाँद के बहाने देखूँ

तू छत पर आजा गोरिये
तू छत पर आजा गोरिये
जिन्द मेरिये

अभी छेड़ेंगे गली के सब लड़के
अभी छेड़ेंगे गली के सब लड़के

के चाँद बैरी छिप जाने दे
के चाँद बैरी छिप जाने दे
जिन्द मेरिये

हो, तेरी चाल है नागन जैसी
हो, तेरी चाल है नागन जैसी

तेरी चाल है नागन जैसी
हो, तेरी चाल है नागन जैसी

रे जोगी तुझे ले जायेंगे
रे जोगी तुझे ले जायेंगे
जिन्द मेरिये

जायेँ कहीं भी मगर हम सजना
हो, जायेँ कहीं भी मगर हम सजना

यह दिल तुझे दे जायेंगे
यह दिल तुझे दे जायेंगे
जिन्द मेरिये
...................................
Ude jab jab zulfen teri-Naya daur 1957

Sunday, 17 July 2011

किसका रस्ता देखे-जोशीला १९७३

जेल की सलाखों के पीछे बंद नौजवान एक दिमाग का दही बनाने
वाला गीत कैसे गा सकता है. सोचने वाली बात है.

पढ़ा लिखा नौकरीपेशा नायक हालातों के चलते सलाखों के पीछे पहुँच
जाता है. वहाँ वो इस उम्मीद में गीत गा रहा है मानो नक्कारखाने
में तूती की आवाज़ सुनने वाला कोई आ जायेगा. और, आ भी जाता
है, सुन्दर नायिका जिसके आने के बाद उसकी जिंदगी में फिर से बहार
लौटने वाली है. अपनी यादों में लुडकते लड़खड़ाते वो आखिर मंजिल की
सीढ़ियों पर फिर से पहुँच जाता है. दो नायिकाएं दिखाई देती हैं गीत
में-राखी और हेमा मालिनी. जेलर की भूमिका में हैं मनमोहन कृष्ण.

बोल साहिर के हैं और धुन राहुल देव बर्मन की. गायक को आप पहचान
ही गए होंगे. गीत की पञ्च लाइन है-कोई नहीं जो यूँ ही जहाँ में, बाँटे
पीर पराई.



गीत के बोल:

किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई

किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई
मीलों है ख़ामोशी, बरसों है तन्हाई
भूली दुनिया कभी की, तुझे भी मुझे भी
फिर क्यों आँख भर आई

हो, किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई

कोई भी साया नहीं राहों में
कोई भी आएगा ना बाहों में
तेरे लिए मेरे लिए, कोई नहीं रोनेवाला ओ
झूठा भी नाता नहीं चाहों में
हाय, तू ही क्यों डूबा रहे आहों में
कोई किसी संग मरे, ऐसा नहीं होने वाला
कोई नहीं जो यूँ ही जहाँ में, बाँटे पीर पराई

हो, किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई

तुझे क्या बीती हुई रातों से
मुझे क्या खोई हुई बातों से
सेज नहीं चिता सही, जो भी मिले सोना होगा
गई जो डोरी छूटी हाथों से
हो, लेना क्या टूटे हुए साथों से
खुशी जहाँ माँगी तूने, वहीं मुझे रोना होगा
ना कोई तेरा ना कोई मेरा, फिर किसकी याद आई

हो, किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई
मीलों है ख़ामोशी, बरसों है तन्हाई
भूली दुनिया कभी की, तुझे भी मुझे भी
फिर क्यों आँख भर आई

किसका रस्ता देखे ऐ दिल ऐ सौदाई
............................................
Kiska rasta dekhe-Joshila 1973

आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद-गुमराह १९६३

गीत को अगर एक पंक्ति या वाक्य में लिखा जाए तो यूँ होगा -
आप जले पर नमक छिडकने चले आये. इसी बात को कई
पहलुओं के साथ आहिस्ता से कहा गया है इस गीत में साहिर द्वारा.
आखिर में सब बातों को याद करने के लिए अफ़सोस भी व्यक्त
किया गया है.

बात आहिस्ता से भले ही कही गयी हो मगर महेंद्र कपूर की बुलंद
आवाज़ में है. महेंद्र कपूर को दो फिल्मों के गीत से बहुत फायदा
हुआ-गुमराह और हमराज़. दोनों ही फिल्मों में रवि का संगीत है.

एक फ़िल्मी गीत को रेकोर्ड करने के लिए साजिंदों की कितनी जमात
हो सकती है इस गीत से अंदाजा लगाइए. ये बात दीगर है कि इन
साजिंदों को गायकों की तुलना में चवन्नी या अठन्नी ही प्राप्त होती है.
और शायद एक बात और गौर करने लायक है-सितार बजाने वाले शास्त्रीय
संगीत के कलाकार आराम से नीचे खुली जगह में बैठ के सितार वादन
करते हैं, यहाँ टीन की छोटी फोल्डिंग कुर्सी पर असुविधाजनक तरीके से
साजिन्दे सितार बजने की चेष्टा कर रहे हैं.




गीत के बोल:

आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए

आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था
शोख नजरों सी मुहब्बत का सलाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वो अहदे वफा याद आया

कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए

रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दिए
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
पर जो मांगे से ना पाया वो सिला याद आया

कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए

आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में ये हल्की सी मुलाकात तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
ग़ैर का हो के भी ये हुस्न मेरे साथ तो है
हाय किस वक्त मुझे कब का गिला याद आया

कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया
आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया
आप आए
.......................................
Aap aaye to khayal-e-dil-e-nashaad-Gumrah 1963

Wednesday, 22 June 2011

लोग कहते हैं कि हम-बहू बेगम १९६७

साहिर का है अंदाज़-ए-बयां और। ख़वातीनों हाज़रात, महबूब
से किनारा करने का खुशनुमा ख्याल और किस के दिमाग में
आ कर कागज़ पर उतर सकता है। किनारा करने की बात पर
रज़ामंदी मांगी जा रही है, समाज की बंदिशें या फिर कोई और
वजह ऐसा करने को प्रेरित कर रही हैं जानने के लिए आपको
बहू बेगम फिल्म एक बार ज़रूर देखना पड़ेगी।

साहिर के गीतों से फिल्म के निर्देशक का काम कभी कभी बहुत
आसान हो जाया करता था। आम दर्शक तो धुन से ही आनंद उठा
लिया करता लेकिन दिमाग खपाने वाले दर्शक गीत की गहराई
में उतर कर नायक की करतब-ए-एक्टिंग को गीत के शब्दों और
भावों से मिलाने की असफल कोशिश में लग जाते। साहिर के गीतों
पर कुछ ही संजीदा कलाकारों ने बढ़िया अभिनय किया है।

कमबख्त दिल तो मानता नहीं है क्या किया जाये, इश्क की
खुमारी दिल पर झाड फानूस की धूल माफिक चिपकी रहती है,
कुछ करने या ना करने की जायज़ वजहें होना ज़रूरी है। अब
जुदा हो ही रहे हैं तो सारे अरमान पूरे करते चलें और ये जुमला
दोहराते चलें-किनारा कर लें।

प्रेम त्रिकोण पर आधारित इस फिल्म में कई यादगार गीत हैं।
ये गीत थोड़ा कम सुना जाता है और गीतों की तुलना में। गीत
मधुर है इसलिए हमने इसे पहले चुना है सुनने के लिए।




गीत के बोल:

लोग कहते हैं कि हम तुमसे किनारा कर लें
तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें
लोग कहते हैं

तुमने जिस हाल-ए-परेशानी से निकला था हमें
आसरा दे के मोहब्बत का संभाला था हमें
सोचते हैं के वही
सोचते हैं के वही हाल दुबारा कर लें
तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें
लोग कहते हैं

यूँ भी अब तुमसे मुलाक़ात अब नहीं होने की
मिल भी जाओ
मिल भी जाओ तो कोई बात नहीं होने की
आखिरी बार बस अब
आखिरी बार बस अब जिक्र तुम्हारा कर लें
तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें
लोग कहते हैं

आखिरी बार ख्यालों में बुला लें तुमको
आखिरी बार कलेजे से लगा लें तुमको
और फिर अपने तड़पने
और फिर अपने तड़पने का नज़ारा कर लें
तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें

लोग कहते हैं कि हम तुमसे किनारा कर लें
तुम जो कह दो तो सितम ये भी गवारा कर लें
लोग कहते हैं
.....................
Log kehte hain ki hum-Bahu Begum 1967

Tuesday, 7 June 2011

तुम अगर साथ देने का वादा करो-हमराज़ १९६७

फिल हमराज़ का एक खूबसूरत गीत हम सुन चुके हैं। आइये दूसरा
ज़बरदस्त हिट गीत सुनें इसी फिल्म से। पता नहीं किस जगह की
(शायद काश्मीर या चंबा) सुन्दर वादियों में गीत फिल्माया गया है।
one film wonder-विम्मी के साथ सुनील दत्त नायक हैं इस गीत में।
विम्मी के हिस्से का मुस्कुराने का काम भी सुनील दत्त कर रहे हैं इस
गीत में। गीत साहिर का लिखा हुआ है और धुन बनाई है संगीतकार
रवि ने। गीत दमदार है और एक्टिंग की इस गीत में ज्यादा ज़रुरत नहीं
समझी निर्देशक ने अतः कैमरा इधर उधर घुमा कर इतिश्री कर ली गई
है।



गीत के बोल:

तुम अगर साथ देने का वादा करो
में यूँ ही मस्त नगमे लुटाता रहूँ
तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो
में तुम्हे देख कर गीत गाता रहूँ

तुम अगर साथ देने का वादा करो
में यूँ ही मस्त नगमे लुटाता रहूँ

आ आ आ आ आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ आ आ आ आ

कितने जलवे फिजाओं में बिखरे मगर
मैंने अब तक किसी को पुकारा नहीं
तुमको देखा तो नज़रें यह कहने लगीं
हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं
तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो
में हर एक शय से नज़रें चुराता रहूँ

तुम अगर साथ देने का वादा करो
में यूँ ही मस्त नगमे लुटाता रहूँ

मैंने ख्वाबों में बरसों तराशा जिसे
तुम वही संगमरमर की तस्वीर हो

हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

तुम न समझो तुम्हारा मुक़दर हूँ में
में समझता हूँ तुम मेरी तकदीर हो
तुम अगर मुझको अपना समझने लगो
में बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ

तुम अगर साथ देने का वादा करो
में यूँ ही मस्त नगमे लुटाता रहूँ

हा आ आ आ आ आ आ आ आ
हा आ आ आ आ आ आ आ आ
................................
Tum agar saath dene ka wada karo-Hamraaz 1967

Friday, 20 May 2011

अब से पहले तो दिल की ये हालत-नवाब साहब १९७८

आपसे भूले-बिसरे और बिछुड़े गीत सुनवाने का वादा है हमारा।
फ़िल्में आती हैं चली जाती हैं मगर कुछ गीत जुबान पर चढ़
जाते हैं उतरने का नाम ही नहीं लेते। ऐसा एक गीत है सन १९७८
की फिल्म नवाब साहब से। इसमें आपको दो चेहरे दिखलाई
देंगे रेहाना सुल्तान और तमन्ना। तमन्ना नमक कलाकार इस
गीत को परदे पर गा रही हैं। पार्श्व गायन किया है उषा मंगेशकर
ने। साहिर लुधियानवी के लिखे बोलों को धुन में ढाला है
संगीतकार सी अर्जुन ने, जी हाँ वही सफलता के कई रेकोर्ड ध्वस्त
करने वाली फिल्म 'जय संतोषी माँ' के संगीतकार। ये गीत हिंदी
फिल्म संगीत में शायद सी अर्जुन के आखिरी उल्लेखनीय धमाकों
में से एक धमाका है। दो अंतरों के बाद आपको परीक्षित साहनी
दिखाई देंगे । गौरतलब है कि जुमला-"आज क्या हो गया" गीत में
३० बार दोहराया गया है। गाने की पञ्च-लाइन भी यही है।



गीत के बोल:


अब से पहले तो ये दिल की हालत न थी
अब से पहले तो ये दिल की हालत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
ज़िंदगी दूसरों की अमानत न थी
ज़िंदगी दूसरों की अमानत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया

अब से पहले तो ये दिल की हालत न थी
अब से पहले तो ये दिल की हालत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया

कोई देखे हमें, कोई चाहे हमें, और सराहे हमें
कोई देखे हमें, कोई चाहे हमें, और सराहे हमें
ये तमन्ना, ये ख़्वाहिश, ये हसरत न थी
ये तमन्ना, ये ख़्वाहिश, ये हसरत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया

अब से पहले, पहले
अब से पहले तो ये दिल की हालत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया

अपने अंदाज़ पर नाज़ करते थे हम, हमको अपनी कसम
अपने अंदाज़ पर नाज़ करते थे हम, हमको अपनी कसम
ग़ैर से बात करने की फ़ुरसत न थी
ग़ैर से बात करने की फ़ुरसत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया

अब से पहले, पहले
अब से पहले तो ये दिल की हालत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया

एक बुत आज क्यूँ कर खुदा बन गया, मुद्द 'आ' बन गया
एक बुत आज क्यूँ कर खुदा बन गया, मुद्द 'आ' बन गया
हमको तो सर झुकाने की आदत ना थी
हमको तो सर झुकाने की आदत ना थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया

अब से पहले, पहले
अब से पहले तो ये दिल की हालत न थी
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
आज क्या हो गया, आज क्या हो गया
....................................................
Ab se pehle...aaj kya ho gaya-Nawab Sahab 1978

Tuesday, 12 April 2011

किसी पत्थर की मूरत से-हमराज़ १९६७

बॉलीवुड ने 'बेबी डॉल' से लगाकर 'उड़द दाल' तक सब कुछ देख लिया है
और शायद दर्शकों ने भी। बस लिफाफे समय के साथ बदलते जाते हैं
ख़त का मजमून वही रहता है जिसका अंदेशा अक्सर होता है।

कुछ अभिनेत्रियों को दर्शक देख कर असमंजस में पढ़ जाते हैं कि उनके
खूबसूरत चेहरे से नज़र हटे तो अभिनय हो रहा है या नहीं इसके बारे में
सोचें। इस पशोपेश में पड़े दर्शक की जब तक कुछ समझ में आये पिक्चर
का "the end" परदे पर प्रकट हो जाता है। जिनके जल्दी समझ आ जाता
है वे मानने लगते हैं कि ऐसी अभिनेत्रियाँ तो साबुन-तेल के विज्ञापनों के
लिए ही सबसे उपयुक्त हैं ।

अब साहब प्रस्तुत गीत एक साहित्यकार-कम-गीतकार की कलम से निकला
है तो हमें भी थोड़ी भाषाई माथापच्ची अवश्य करनी होगी वरन मज़ा नहीं
आएगा।

इस गीत में अभिनय जैसी कोई चीज़ ढूँढने की ज्यादा कोशिश ना ही करें तो
बेहतर होगा। गाने वाला ऐसे हाव भाव दर्शा रहा है जैसे उसे जबरन गाना पढ़
रहा हो , बीच बीच में वो मुस्कुरा के कन्फ्यूज़ कराता है जैसे उसे आनंद आ रहा
हो , और सुनने वाला ऐसे सुन रहा है जैसे बोटनी की क्लास में केमिस्ट्री का
प्रवचन चालू हो गया हो।

अब गीत का विवरण भी हो जाये-गीत गाया है महेंद्र कपूर ने और इसे फिल्माया
गया है अभिनेता सुनील दत्त और नायिका विम्मी पर। गीत साहिर लुधियानवी का
है जिसकी उतनी ही खूबसूरत तर्ज़ के जिम्मेदार हैं संगीतकार रवि।

ये महेंद्र कपूर के सबसे लोकप्रिय गीतों में से एक है। फिल्म हमराज़ के सभी गीत
लोकप्रिय हैं और सुपर-डुपर हिट की श्रेणी में आते हैं। इस सुपर डुपर के बीच
मैं क्यों लपर-लपर कर रहा हूँ भाई



गीत के बोल:

किसी पत्थर की मूरत से मोहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है इबादत का इरादा है

किसी पत्थर की मूरत से मोहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है इबादत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से

जो दिल की धडकनें समझे ना आँखों की जुबां समझे
जो दिल की धडकनें समझे ना आँखों की जुबां समझे
नज़र की गुफ्तगूँ समझे ना ज़ज्बों का बयां समझे
नज़र की गुफ्तगूँ समझे ना ज़ज्बों का बयां समझे
उसी के सामने उसकी शिकायत का इरादा है
उसी के सामने उसकी शिकायत का इरादा है

किसी पत्थर की मूरत से मोहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है इबादत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से

सुना है हर जवान पत्थर के दिल में आग होती है
सुना है हर जवान पत्थर के दिल में आग होती है
मगर जब तक ना छेड़ो शर्मगी परदे में सोती है
ये सोचा है दिल की बात उसके रूबरू कह दें
नतीजा कुछ भी निकले आज अपनी आरज़ू कह दें
हर एक बेजान तकल्लुफ से बगावत का इरादा है
हर एक बेजान तकल्लुफ से बगावत का इरादा है

किसी पत्थर की मूरत से

मोहब्बत बेरुखी से और भड़केगी वो क्या जानें
मोहब्बत बेरुखी से और भड़केगी वो क्या जानें
तबियत इस अदा पे और फडकेगी वो क्या जानें
तबियत इस अदा पे और फडकेगी वो क्या जानें
वो क्या जाने की अपना किस क़यामत का इरादा है
वो क्या जाने की अपना किस क़यामत का इरादा है

किसी पत्थर की मूरत से मोहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है इबादत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से
......................................
Kisi patthar ki moorat se-Hamraaz 1967

Saturday, 29 January 2011

तुम अपना रंज ओ ग़म अपनी परेशानी -शगुन १९६४

आपको फिल्म शगुन का एक गीत सुमन कल्याणपुर का गाया
हुआ हम सुनवा चुके हैं। आइये एक और गीत सुना जाये इसी फिल्म
का जो जगजीत कौर की आवाज़ में है। जगजीत उर्फ़ श्रीमती
ख़य्याम ने कुछ एक गीत गए हैं हिंदी फिल्मों में और शायद
सभी में संगीत ख़य्याम का ही है। साहिर का लिखा हुआ ये गीत
मुझे बेहद पसंद है और कभी कभार इसे सुन लिया करता
हूँ-वजह -इसके बोल। प्यानो की मधुर आवाज़ के साथ गीत का
आगाज़ होता है। गीत शायद निवेदिता नाम की कलाकार पर
फिल्माया गया है।




गीत के बोल:


तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें ग़म की क़सम, इस दिल की वीरानी मुझे दे दो

ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
ये माना मैं किसी क़ाबिल नहीं हूँ इन निगाहों में
बुरा क्या है अगर, ये दुख ये हैरानी मुझे दे दो

तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो

मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
मैं देखूँ तो सही, दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिये, अपनी निगहबानी मुझे दे दो

तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो

वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
वो दिल जो मैने मांगा था मगर गैरों ने पाया था
बड़ी ख्वाहिश है अगर, उसकी पशेमानी मुझे दे दो

तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो

Saturday, 15 January 2011

चला भी आ आ जा रसिया- मन की ऑंखें १९७०

आइये आपका रिवीज़न कराया जाए। ये गीत पहले आपको
सुनवाने का प्रयत्न किया गया था, शायद आपकी नज़र इस पर
नहीं पड़ी हो, तो आज फिर से एक बार सुन लेते हैं इसको। बाकी
का विवरण इधर है-मन की ऑंखें । यूँ समझिये जैसे मास्साब
स्कूल में रिवीज़न कराते हें वैसे ही हम आपका रिवीज़न करा रहे हैं।




गाने के बोल:

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए
ख्वाबों का घरोंदा कहीं टूट न जाए

मुरझा चले हैं अरमान सारे
धुंधला गए हैं सभी उजले नज़ारे
कैसे जियूंगी ग़मों के सहारे
तरसी निगाहें मेरी तुझको सदायें दें ,
धड़कन पुकारे

चला भी आ, हो
आ जा रसिया
दिल तो गया मेरा कहीं जान न जाए
जाने वाले आ जा तेरी याद सताए

चला भी आ...........

मेरी लगन को कहाँ तूने जाना
तेरे लिए तो मेरा दिल है दीवाना
हर साँस मेरी तेरा ही तराना
ये जिंदगानी क्या है
तेरी कहानी है तेरा ही फ़साना

तेरा मेरा वो है रिश्ता
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
के, टूटे जो बालाएं भी तो टूट न पायें
.......................................
Chala bhi aa, aa ja rasiya-Man ki ankhen 1970

Friday, 14 January 2011

क्या मिलिए ऐसे लोगों से-इज्ज़त १९६८

अजनबियों की भीड़ में नायक पहुँचता है। अजनबियों
के लिए वो जाना पहचाना है, बस वही एक बाकियों को
नहीं पहचानता। उन अजनबियों में से एक उसको भाई कह
कर पुकारती है । ऐसे मौके पर उससे गीत गाने की
गुज़ारिश की जाती है और वो अपने दिल की भड़ास गीत
के माध्यम से निकलता है। गीत के साथ शायद कोई
अंग्रेजी खेल हो रहा है जिसको हम फैंसी ड्रेस के नाम
से पुकारते हैं। इसमें आपको पुराने ज़माने की सब
विलायती नृत्य शैलियों का समावेश मिलेगा। आनंद
उठायें एक contrast वाले गीत का। सर में तेल की पूरी बोतल
बोतल चुपड़े हीरो को देखने का सौभाग्य आपको कम ही
ही फिल्मों में मिला होगा। वो ऐसा है की किरदार की मांग होगी
इसलिए निर्देशक ने नायक को काले रंग से भी पोत डाला है।




गीत के बोल:

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे,

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे,

खुद से भी जो खुद को छुपाये,
क्या उनसे पहचान करें,
क्या उनके दामन से लिपटें?,
क्या उनका सम्मान करें?,
जिनकी आधी नीयत उभरे,
आधी नीयत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

दिलदारी का ढोंग रचाकर,
जाल बिछाए बातों का,
जीते जी का रिश्ता कहकर,
सुख ढूंढें कुछ रातों का,
रूह की हसरत लाभ पर आये,
जिस्म की हसरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

जिनके ज़ुल्म से दुखी है जनता,
हर बस्ती हर गावों में,
दया धरम की बात करें वो,
बैठ के सजी सभाओं में,
दान का चर्चा घर घर पहुंचे,
लूट की दौलत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

देखें इन नकली चेहेरों की,
कब तक जय जय कार चले,
उजले कपड़ों की तह में,
कब तक काला संसार चले,
कब तक लोगों की नज़रों से,
छुपी हकीकत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे

क्या मिलिए ऐसे लोगों से,
जिनकी फितरत छुपी रहे,
नकली चेहरा सामने आये,
असली सूरत छुपी रहे
...........................
Kya miliye aise logon se-Izzat 1968

Monday, 3 January 2011

ओ नीले पर्बतों की धारा-आदमी और इंसान १९६९

आज का पहला गीत पेश है फिल्म आदमी और इंसान से।
साहिर के लिखे बोलों पर तर्ज़ बनाई है रवि ने। आशा और
महेंद्र कपूर इसको गा रहे हैं धर्मेन्द्र और सायरा बानो के लिए ।



गीत के बोल:

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला ला ला ला ला

फूल में जैसे फूल की खुशबू
दिल में है यूँ तेरा बसेरा
धरती से अम्बर तक फैला
चाहत की बाहों का घेरा

हो ओ ओ
ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ला ला ला ला ला ला ला
ला ला ला ला ला ला ला

सूरज पीछे घूमे धरती
साँझ के पीछे घूमे सवेरा
जिस नाते ने इन को बाँधे
वो नाता है तेरा मेरा

हो ओ ओ
ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

ओ नीले पर्बतों की धारा
आयी ढूँढने किनारा, बड़ी दूर से
सब को सहारा चाहिये
कोई हमारा चाहिये

Friday, 10 December 2010

चलो एक बार फिर से-गुमराह १९६३

मिलने के पहले भी तो हम अजनबी थे। मिलने के
बाद फिर से अजनबी बन जाएँ। साहिर लुधियानवी
ने प्रेम को नए नए कोण से देख लिया। जितने प्रमाणिक
उनके गीत लगते हैं प्रेम के मामले में उतने दूसरों के
नहीं-ऐसा मैंने एक साहिर प्रेमी को कहते सुना। मैं
भी सोच में पड़ गया की ऐसा क्या क्या है साहिर के
रोमांटिक गीतों में कि जनता तारीफों के पुल बांधती
नहीं अघाती ।

तो जनाब उनके गीतों में कुछ कटु सच्चाई की मिलावट
भी पायी जाती है। केवल कल्पना ही नहीं उन्होंने
अपने अनुभव भी निचोड़ डाले हैं गीतों में। साहिर की
लिखी नज़्म प्रस्तुत है फिल्म गुमराह से। इसमें भी
उन्होंने -वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो
मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा,
यहाँ भूलने की जगह छोड़ना शब्द इस्तेमाल किया गया
है, क्यूंकि भूलना तो संभव ही नहीं है , या रिश्ते जब
बोझ बन जाते हैं तो उन्हें तोडना ही बेहतर है- का सन्देश
देते हैं।

प्रेम त्रिकोण पर आधारित ये फिल्म सन १९६३ में सिनेमा
घरों में प्रकट हुई थी। प्रस्तुत गीत के लिए महेंद्र कपूर
को सर्वश्रेष्ठ गायक के फिल्मफैयर पुरस्कार से नवाजा
जा चूका है। उस साल की बाकी दो प्रविष्टियों में जो गीत
थे वो इस प्रकार से हैं -१) मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत
की कसम फिल्म मेरे महबूब से रफ़ी का गाया हुआ और
२) जो वादा किया वो-ताजमहल से लता का गाया हुआ।
साहिर को फिल्म ताजमहल के गीत लेखन के लिए
फिल्मफैयर पुरस्कार दिया गया। संगीतकार रवि के
लिए भी ये फिल्म फायदेमंद साबित हुई। बी आर चोपड़ा
की आगे आनेवाली अधिकांश फिल्मों में आपको
संगीतकार रवि का संगीत मिलेगा।



गीत के बोल:

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों

ना मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
ना तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
ना मेरे दिल की धड़कन लडखडाये मेरी बातों में
ना ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों

तुम्हें भी कोई उलझान रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं, की यह जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साये हैं

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों

तार्रुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा

चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
चलो एक बार फिर से, अजनबी बन जाये हम दोनों
..............................................................................
Chalo ek baar fir se ajnabi ban jaayen ham dono-Gumrah 1963
 
 
www.lyrics2nd.blogspot.com