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Friday, 26 August 2011

कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर -दुर्गेश नंदिनी १९५६

जैसी कि हम चर्चा करते रहे हैं अब तक, हेमंत कुमार

ने बतौर संगीतकार भी बहुत कामयाबी हासिल की और

उनके संगीत निर्देशन से कई अविस्मरणीय और अमर

रचनाएँ हिंदी फिल्म संगीत जगत को मिलीं. अधिकतर

दूसरे संगीतकारों की भांति उन्होंने भी लता मंगेशकर के

लिए कुछ विशेष और अलौकिक सी धुनें बनायीं.



प्रस्तुत गीत भी ऐसा ही एक गीत है फिल्म ‘दुर्गेश नंदिनी’

से जो कि नाम से ही स्पष्ट है कि एक पौराणिक फिल्म है.

फिल्म में प्रदीप कुमार और बीना राय प्रमुख कलाकार हैं.

यह गीत एक स्वप्न की तरह सा फिल्माया गया है. गीत

लिखा है राजेंद्र कृष्ण ने. गीत का प्रभाव आज इस युग में

भी महसूस किया जा सकता है. इसकी एक झलक भी कोई

एक बार सुने तो पूरा सुने बिना नहीं रह सकता. गीत का

शुरूआती कोरस गान केवल फिल्म वाले वर्जन में ही उपलब्ध

है.









गीत के बोल:



आ आ आ आ आ आ आ आ

आ आ आ आ आ

आ आ आ आ आ आ आ आ

आ आ आ आ आ



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है

ख्यालों की मंजिल ये ख्वाबों की महफ़िल

समझ में न आये ये दुनिया कहाँ है



कहाँ रह गए काफिले बादलों के

कहाँ रह गए काफिले बादलों के

ज़मीन छुप गयी है तले बादलों के

है मुझको यकीन के है जन्नत यहीं

अजब सी फिजां है अजब ये समां है

कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है



नज़र की दुआ का जवाब आ रहा है

नज़र की दुआ का जवाब आ रहा है

मेरी आरजू पे शबाब आ रहा है

ये खामोशियाँ भी हैं एक दास्तान

कोई कहता है मुझसे मोहब्बत जवान है



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है



मोहब्बत भरी इस जहाँ की हैं राहें

मोहब्बत भरी इस जहाँ की हैं राहें

जिन्हें देख कर खो गयी है निगाहें

ये हलकी हवा लायी कैसा नशा

ना रहा होश इतना मेरा दिल कहाँ है



कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफिर

सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है

ख्यालों की मंजिल ये ख्वाबों की महफ़िल

समझ में न आये ये दुनिया कहाँ है

........................................

Kahan le chale ho-Durgesh Nandini 1956

Thursday, 4 August 2011

आज रोना पड़ा तो समझे-गर्ल फ्रेंड १९६०

गंभीर किस्म के बोल और लाजवाब गायकी के साथ दैवीय संगीत का
मिश्रण है इस गीत में। किशोर कुमार और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म
गर्ल फ्रेंड से ये गीत लिया गया है जिसे स्वयं किशोर कुमार ने गाया है।
साहिर लुधियानवी के बोलों को सुरों में पिरोया है हेमंत कुमार ने।

ये एक सदाबाहर गीत है जिसे आप आसानी से गुनगुना सकते है। इसे
आज भी सुनिए तो ताज़ा सा लगता है। इसके बोल ऐसे हैं जो आपको
दुनिया की हकीकत से साक्षात्कार करते चलते हैं और जैसे सुख-दुःख
की तुलना की जाती है गीतकार ने रोना-हंसना को सहज तरीके से सरल
शब्दों के जाल में बांध दिया है। यहाँ पर आ के शैलेन्द्र और साहिर के
अंदाज़ का संगम हो जाता है।




गीत के बोल:

आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना, खोना पड़ा तो समझे
आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना खोना पड़ा तो समझे

ख़्वाबों की हक़ीक़त क्या थी
अरमानों की क़ीमत क्या थी
अपनों की मुहब्बत क्या थी
ग़ैर होना पड़ा तो समझे

आज रोना पड़ा तो समझे

सुख मिलता है किस मुश्किल से
क्या करती है दुनिया दिल से
इस रंग भरी महफ़िल से
दूर होना पड़ा तो समझे

आज रोना पड़ा तो समझे

निकले थे जिन्हें अपनाने
वो लोग थे सब बेगाने
इस बात को हम दीवाने
चैन खोना पड़ा तो समझे

आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना खोना पड़ा तो समझे
.......................................
Aaj rona pada to samjhe-Girl Friend 1960

Tuesday, 19 July 2011

या दिल की सुनो दुनियावालों-अनुपमा १९६६

फिल्म अनुपमा से एक गीत पेश है हेमंत कुमार की आवाज़ में.
बोल लिखे हैं कैफी अजमी ने और धुन बनायीं है स्वयं हेमंत कुमार ने.
गीत फिल्माया गया है धर्मेन्द्र पर जिन्हें एक पार्टी में गीत गाने के
लिए बोला गया है. दुखियारी नायिका(शर्मिला टैगोर) को ध्यान में रखते
हुए शायद ऐसा गीत गाया जा रहा है.



गीत के बोल:

या दिल की सुनो दुनियावालों
या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूँ
जो कहते हैं उनको कहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

ये फूल चमन में कैसा खिला
माली की नजर में प्यार नहीं
हँसते हुए क्या-क्या देख लिया
अब बहते हैं आँसू बहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

इक ख्वाब खुशी का देखा नहीं
देखा जो कभी तो भूल गए
मांगा हुआ तुम कुछ दे न सके
जो तुमने दिया वो सहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

क्या दर्द किसी का लेगा कोई
इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आँसू और बहें
अब ऐसी तसल्ली रहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों
............................
Ya dil ki suno-Anupama 1966

Saturday, 16 July 2011

शिव जी बिहाने चले-मुनीमजी १९५५

सावन के महीने में आपको फिल्म सावन का एक गीत सुनवा दिया. इसके
बोलों में अगर कुछ त्रुटियाँ हों तो ध्यानाकर्षण अपेक्षित है पाठकों से.

आज आपको एक सावन स्पेशल फ़िल्मी धार्मिक गीत सुनवाते हैं। फिल्म
मुनीमजी में इसे एक नाट्य कार्यक्रम के रूप में दिखाया गया है। एक अरसा
हो गया इसको सुने हुए। वैसे भी भक्ति की ज़रुरत संकट या अपनी इच्छा
पूर्ती के लिए पढ़ती है। ऐसा ज्यादा अनुभव में आता है। जिनमें भक्ति स्वतः
उत्पन्न हो, ऐसे प्राणी उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। गीत प्रस्तुत करने
कि इच्छा शिवरात्रि के अवसर पर थी मगर संभव न हो पाया.

खैर गीत पर चर्चा की जाए। नाट्य जगत का संगीत से रिश्ता बहुत पुराना है।
अक्सर आपने देखा होगा नाट्य या प्रह्सनों के दौरान एक सूत्रधार या तो
कहानी बयान करता मिलता या फिर कोई गीत सुना कर कहानी को आगे
बढ़ने का काम करता या फिर जो नाटक सर के उपर से गुजरते प्रतीत होते
उनको दर्शकों के भेजे में डालने का प्रयत्न करता। कुल मिलकर बिना सूत्रधार
के मजा नहीं आता। लम्बे ३-४ घंटे के किसी नाटक में तो मैंने १०-१२ गीत
सुन डाले। जब भी झपकी लग जाती गाने वालों की ज़ोर की आवाजें उठ बैठने
को बाध्य कर देती। कई बार तो यूँ होता कि पर्दा गिरने के बाद ही पता चलता
कि नाटक ख़त्म हो गया है।

गीत में शिव जी की बारात निकाल रही है। उनके गण आसपास नृत्य करते हुए
ख़ुशी से झूम रहे हैं। गीत लिखा है शैलेन्द्र ने और धुन बनाई है एस डी बर्मन ने।
गायक कलाकार हैं हेमंत कुमार।

चलते चलते एक इच्छा मैं भी एक अपनी छोड़ते चलता हूँ और स्तुति करता हूँ ।
हे-प्रभु उन ब्लॉग एग्रीगेटर्स के मालिकों को क्षमा कर देना जिन्होंने एक पोस्ट
वाले ब्लॉग तो सूची में डाल दिए और हमें तरसा रहे हैं। एक ले दे के चिट्ठाजगत
ही बचा था ट्रैफिक मिलने को वो भी बंद पड़ा हुआ है। चंपूगिरी और चमचागिरी
हमसे होती नहीं तो क्या करें बताएं , ज्ञान दें, और , थोड़े फुरसतिये समर्पित
किस्म के टिप्पणीकार भेज दे जो खाली पन्ने की पोस्ट देख के भी वाह वाह का
चटका लगायें।




गीत के बोल:

बम बम भोला
बम बम भोला
बम बम भोला
बम बम भोला

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के ना

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
को: भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ जब शिव बाबा करे तैयारी
कैसे सकल समान हो
दाहिने अंग त्रिशूल विराजे
नाचे भूत शैतान हो
ब्रह्मा चलें विष्णु चलें
लै के वेद पुराण हो
शंख चक्र और गदा धनुष लै
चलें श्री भगवान हो
और बन-ठन के चलें बोम भोला
लिए भांग धतूरा का गोला
बोले ये हरदम
चले लड़का पराये के

भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

हो ई आयी हो ई आया
हो ई आयी हो ई आया

आ आ आ आ आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ आ आ आ आ

हे: ओ माता मतदिन पर चंचल ली
तिलक जली लीलार हो
काला नाग गर्दन के नीचे
वोहू दिलन फुसकार हो
लोटा फेंक के भाग चलैली
ताविज निकल लिलार हो
इन के संग बिबाह न करबो
गौरी रही कुँवारी हो
कहे पार्वती समझायी
बतिया मानो हमरो माई
जै हा राइहा ला हम करमवा लिखाए के

भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओम नमः शिवाय
......स्वाहा ....
ओम नमः शिवाय

ओ जब शिव बाबा मड़वा गईले
होला मंगलाचार हो
बाबा पंडित वेद विचारे
होला गुस्सा चार हो
बजरबटी की लगी झालरी
नागिन की अधिकार हो
विज मड़वा मे नावन अईली
करे झंगन वड़ीयार हो
ए गो नागिन गह्लन विदाई
नावन गिऊले चले परायी
सब हँसे लगैला
देवता ठठाय के

भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ कोमल रूप धरे शिव-शंकर
खुशी भये नर-नारी हो
राजही नाचन गान कराइले
इज्जत रहें हमार हो
रहे वर साथी शिव-शंकर से
केहू के न पावल पार हो
इन के जटा से गंगा बहिली
महिमा अगम अपार हो
जय शिव-शंकर ध्यान लगाये
इन के तीनों लोक दिखाये
कहे दुःख हरण यही
छडो बनवाए के

भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना

ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना
....................................
Shivji Bihane Chale-Munimji 1955

Wednesday, 13 July 2011

प्यासी हिरनी बन बन धाए-दो दिल १९६४

हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में अब आपको सुनवाते हैं फिल्म
'दो दिल' का एक गीत जिसे गा रही हैं लता मंगेशकर. वी शांताराम
की पुत्री राजश्री दो दिल फिल्म में नायिका हैं. नायक हैं विश्वजीत.
गीत कैफ़ी आज़मी का लिखा हुआ है.

कुछ भूतिया फिल्मों के गीतों सा शुरू होता है ये गीत. नयिका खुद
दौड लगा रही है और नायक की भी जोगिंग की प्रैक्टिस करवा रही है.
अब इतना मधुर गीत कोई सुन्दर बाला गाती हुई जंगल में दिख
जाए तो अच्छे अच्छे दौड लगा दें उसे देख कर.




गीत के बोल :

कहाँ है तू
तू कहाँ है
आ जा ,ऐ मेरे मेरे सपनों के राजा

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

नयी नयी कली खिली
चुन ले न कोई
नयी नयी कली खिली
चुन ले न कोई

ऐसी वैसी बातें दिल की
सुन ले न कोई
मन हंसा जिया मोरा
जाने क्या गाये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

चलते चलते रुक जाऊं मैं
चल नहीं पाऊँ
चलते चलते रुक जाऊं मैं
चल नहीं पाऊँ
पल पल भड़के तन में अग्नि
कैसे बुझाऊँ
लगी न बुझे कहीं
जी को जलाये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

एक तो मैं हूँ भोली भाली
दूजे अकेली
एक तो मैं हूँ भोली भाली
दूजे अकेली

कैसे बूझी जाए मोसे
मन की पहेली
चली है हवा नयी
जिया घबराए रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
..................................
Pyasi hirni ban ban dhaaye-Do Dil 1964

Tuesday, 12 July 2011

जब जाग उठें अरमान-बिन बादल बरसात १९६३

हेमंत कुमार की आवाज़ में अब सुनते हैं सन १९६३ की फिल्म
बिन बादल बरसात से एक गीत. बढ़िया रोमांटिक गीत है और
इसमें आशा पारेख और विश्वजीत नैन मटक्का करते दिखेंगे आपको.
सितार और बांसुरी ने कमाल किया है गीत की शुरुआत में. मैंडोलिन
की तरह दोनों(नायक-नायिका)के दिल के तार झनझना जाते हैं.

शकील बदायूनीं के बोल हैं और हेमंत कुमार का संगीत है.




गीत के बोल:

जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये

हो घर में हसीं मेहमान तो कैसे नींद आये
नींद आये

जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये

ये रात ये दिल की धडकन
ये बढती हुई बेताबी
एक जाम की ख़ातिर जैसे
बेचैन हो कोई शराबी
ये रात ये दिल की धडकन
ये बढती हुई बेताबी
एक जाम की ख़ातिर जैसे
बेचैन हो कोई शराबी

शोलों में घिरी हो जान तो कैसे नींद आये

जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये

हम तुम की नयी उम्मीदें
यूँ खेल रही हैं दिल से
जिस तरह तड़प कर मौजें
टकराएँ किसी साहिल से

हम तुम की नयी उम्मीदें
यूँ खेल रही हैं दिल से
जिस तरह तड़प कर मौजें
टकराएँ किसी साहिल से

सीने में हो एक तूफ़ान तो कैसे नींद आये

जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये


नज़दीक बहुत है मंजिल
फिर भी है गज़ब की दूरी
ऐ दिल ये तू ही बतला दे
वो कौन सी है मजबूरी
नज़दीक बहुत है मंजिल
फिर भी है गज़ब की दूरी
ऐ दिल ये तू ही बतला दे
वो कौन सी है मजबूरी

जब सोच में हो इंसान तो कैसे नींद आये
हो घर में हसीं मेहमान तो कैसे नींद आये
नींद आये

जब जाग उठें अरमान तो कैसे नींद आये
...................................
Jab jaag uthe armaan-Bin badal barsaat 1963

Monday, 11 July 2011

वो शाम कुछ अजीब थी-ख़ामोशी १९६९

फिर आज डूब जाने को मन करता है तुम्हारी गहरी आवाज़ के समुन्दर में.
किसी किशोर कुमार के भक्त ने ये उदगार प्रकट किये थे इस गीत के लिए
बरसों पहले. मैं भी कुछ सहमत हूँ उस भक्त की भावना से. इस गीत में
अतिरिक्त आयाम है जो इसे सामान्य गीतों की श्रेणी से अलग करके विशिष्ट
की श्रेणी में रखता है. हेमंत कुमार ने जितने मन लगा के खुद के गाये और
लता मंगेशकर वाले गीत बनाये हैं उसी तबियत से इस गीत को भी बनाया
है. किशोर कुमार के सर्वश्रेठ गीतों में से एक आज सुनते हैं फिल्म ख़ामोशी
से. सन १९६९ की फिल्म ख़ामोशी का हर एक गीत नायब रत्न है. बोल लिखे
हैं गुलज़ार ने . गीत का फिल्मांकन एक नाव में हुआ है. इसका फिल्मांकन
बढ़िया है और गीत एक संक्षिप्त कथा के माफिक लगता है.

नायक राजेश खन्ना इस फिल्म में एक मनोरोगी की हैं और वहीदा रहमान एक
मनोचिकित्सक की भूमिका में हैं . पिछले रोगी (धर्मेन्द्र) का इलाज करते करते
वह उससे प्रेम करने लगती है. नायिका का मानसिक द्वन्द इस गीत में बखूबी
दर्शाया गया है. मन को बांटना वाकई मुश्किल काम है.

विरोधाभास का भाव भी है इस गीत में. नायक खुशनुमा ख्याल में है और
नायिका उसके काँधे पर सर रख कर रो रही है. इस गीत की एडिटिंग ज़बरदस्त
है और उस एडिटिंग वाले कलाकार को नमन.

अंत में गीत मरहम का सा काम करता है नायिका के लिए और वो मरीज को
अपना प्रेमी समझ कर उससे लिपट जाती है.




गीत के बोल:

वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है

वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब है

झुकी हुई निगाह में, कहीं मेरा ख़याल था
दबी दबी हँसीं में इक, हसीन सा सवाल था
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं सोचता था, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
न जाने क्यूँ लगा मुझे, के मुस्कुरा रही है वो

वो शाम कुछ अजीब थी

मेरा ख़याल हैं अभी, झुकी हुई निगाह में
खिली हुई हँसी भी है, दबी हुई सी चाह में
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
मैं जानता हूँ, मेरा नाम गुनगुना रही है वो
यही ख़याल है मुझे, के साथ आ रही है वो

वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है
वो कल भी पास पास थी, वो आज भी करीब है
......................................
Wo shaam kuchh ajeeb thi-Khamoshi 1969

Tuesday, 28 June 2011

भँवरा बड़ा नादान हाय-साहब बीबी और गुलाम १९६२

आओ री ओ बावरी , आओ री, इतना मत इतराओ री। थोड़ा सा लड़ियाओ री।
आइये आज आपको सुनवाते हैं एक चर्चित फिल्म साहब बीबी और गुलाम
से से एक मस्त गीत। आशा भोंसले इसको गा रही हैं परदे पर वहीदा रहमान
के लिए। शकील बदयूनीं साहब ने इस गीत को लिखा है जिसकी तर्ज़ बनाई है
हेमंत कुमार ने। सन १९६२ से यह गीत श्रोताओं को लुभाता रहा है। मनमोहक
अंदाज़ में 'हाय' बोली जा रही है और मुंह बनाने का क्रैश कोर्स है ये गीत लड़कियों
और युवतियों के लिए।



गीत के बोल:

भँवरा बड़ा नादान हाय
भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय

भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय

भँवरा बड़ा नादान

कभी उड़ जाये कभी मंडराये
भेद जिया के खोले न
कभी उड़ जाये कभी मंडराये
भेद जिया के खोले न
सामने आये नैन मिलाये
मुख देखे कुछ बोले न,
वो मुख देखे कुछ बोले न

भँवरा बड़ा नादान हाय

अखियों में रच के चले बच बच के
जैसे हो कोई बेगाना
अखियों में रच के चले बच बच के
जैसे हो कोई बेगाना
रहे सँग दिल के मिले नहीं मिल के
बन के रहे वो अन्जाना,
हो बन के रहे वो अन्जाना

भँवरा बड़ा नादान हाय

कोई जब रोके कोई जब टोके
गुन गुन करता भागे रे
न कुछ पूछे न कुछ बूझे
कैसा अनाड़ी लागे रे,
वो कैसा अनाड़ी लागे रे

भँवरा बड़ा नादान हाय
बगियन का मेहमान हाय
फिर भी जाने न जाने न जाने न
कलियन की मुस्कान हाय

भँवरा बड़ा नादान हाय
.......................
Bhanwra bada nadaan-Sahib Biwi aur Ghulam 1962

Friday, 24 June 2011

जा रे जा रे ओ माखन चोर-चम्पाकली १९५७

सन १९५७ में भारत भूषण की जो उल्लेखनीय फ़िल्में आयीं
वे थीं-चम्पाकली, गेटवे ऑफ़ इंडिया और रानी रूपमती ।

तीनों फिल्मों में ही कर्णप्रिय संगीत है। इन फिल्मों में से एक
ना एक गीत कालजयी निश्चित ही हुआ।

राजेंद्र कृष्ण ने माखन चोर नन्द किशोर के उल्लेख वाले
कुछ बढ़िया गीत लिखे हैं। फिल्म चम्पाकली के इस गीत को
आपने शायद ही सुना हो। हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन
वाली फिल्म चम्पाकली के गीत सॉफ्ट किस्म के हैं और सुनने
में कानों में हलकी सी गुदगुदी करते हैं।




गीत के बोल:

जा रे जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर

जा जा काहे मचावत शोर
कभी ना छोड़ूँ तोरी ये बैयाँ गोरी-गोरी
सजनिया काहे मचावत शोर

ऐसी ठिठोली करो हमसे ना रसिया
कौन हो तुम हमारे
ऐसी ठिठोली करो हमसे ना रसिया
कौन हो तुम हमारे
होता है गोरी जो चकोरी का चंदा
हम वही हैं तुम्हारे
देखो जी देखो मेरा भोला सा मनवा
समझे नहीं इशारे ओ छलिया

जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर

मैं बन्सी तू तान मेरा तेरा साथ पुराना
ओ मैं बन्सी तू तान मेरा तेरा साथ पुराना
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
रहने दो ये बात चले ना कोई बहाना
मानो ना मानो तुम्हें दिल की क़सम है अपना हमें बनाना

सजनिया काहे मचावत शोर
कभी ना छोड़ूँ तोरी ये बैयाँ गोरी-गोरी
सजनिया काहे मचावत शोर

हटो जी हटो मेरी छोडो डगरिया यूँ हमें ना सताओ
हटो जी हटो मेरी छोडो डगरिया यूँ हमें ना सताओ
जाने से पहले मेरे दिल की नगरिया मुस्करा के बसाओ
जानूँ ना जानूँ कैसा दिल है तुम्हारा
पहले दिल तो दिखाओ रे छलिया

जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर
....................................
Ja re o makhanchor-Champakali 1957

Wednesday, 1 June 2011

तुम पुकार लो-ख़ामोशी १९६९

हेमंत कुमार का संगीत सौम्यता से सराबोर हुआ करता था। उन्होंने
कई आकर्षक गीत भी गाये। उनके बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है
-ख़ामोशी का प्रस्तुत गीत। नायिका प्रधान इस फिल्म में मानवीय
संवेदनाओं को झकझोर देने वाले प्रसंग हैं। फिल्म का अंत सबसे ज्यादा
चौंकाने वाला है। कथानक के प्रस्तुतीकरण में अनूठापन भी दिखलाई
देता है कई दृश्यों में। फिल्म के संवाद लेखक और गीतकार गुलज़ार हैं।

असित सेन द्वारा निर्देशित फ़िल्में ज़्यादातर आपको
मानवीय संबंधों, उनकी उलझन और जटिलताओं की ओर घूमती हुयी
मिलेंगी। उनकी संवेदनशीलता को पहचानने के लिए आपको बस चार
फ़िल्में ही देख लेना चाहिए अन्नदाता(१९७२), ममता( १९६६) , सफ़र(१९७०),
और ख़ामोशी(१९६९) । ऐसे विषय जिनपर दूसरे निर्देशकों को काम
करने में हिचक होती, उन्हें शायद आनंद आता। पसंद अपनी अपनी।
subject के treatment के मामले में अधिकतर वे दूसरों से २० साबित
हुए। फ़िल्मी समीक्षकों ने उनपर या उनकी फिल्मों पर पांच पन्ने के
निबंध नहीं लिखे। उनकी फिल्मों का संगीत पक्ष बहुत मजबूत हुआ करता
अपने समकालीन बंगाली मूल के बाकी निर्देशकों की भांति। आप शायद ये
ज़रूर जानना चाहेंगे कि अभिनेता असित सेन और निर्देशक असित सेन क्या
अलग अलग इंसान हैं ? थोड़ा अंतरजाल खंगालिए और पता लगाइए।




गीत के बोल:

तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है
तुम पुकार लो
ख़्वाब चुन रही है रात, बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो

होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
होंठ पे लिये हुए दिल की बात हम
जागते रहेंगे और कितनी रात हम
मुख़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो

दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
दिल बहल तो जायेगा इस ख़याल से
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से
रात ये क़रार की बेक़रार है
तुम्हारा इन्तज़ार है, तुम पुकार लो
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Tum pukar lo-Khamoshi १९६९

Tuesday, 31 May 2011

खुली हवा में डोले रे-चम्पाकली १९५७

फिल्म चम्पाकली में संगीतकार हेमंत कुमार ने अच्छा संगीत दिया
राजेंद्र कृष्ण के मधुर गीतों को लता और रफ़ी ने बड़ी तन्मयता के
साथ गाया भी। सॉफ्ट किस्म के गीत हैं फिल्म के। सॉफ्ट गीतों कि
विशेषता ये होती है उन्हें आप जब चाहे बिना ना नुकुर, मूड हो
ना हो सुन कर जी बहला सकते हैं। आपको पहले दो गीत सुनवाये
हैं-छुप गया कोई रे और गवालन क्यूँ मेरा मन। गीत में नायिका
कुछ विशेष व्यायाम कर रही है और वो क्या है मुझे समझ नहींते हैं।
पढता। कृपया बतलाएं धागे में पत्थर बांध के ऐसा क्या किया जाता
है जिससे पक्षी बेचारे नीचे गिरने लगते हैं।





गीत के बोल:

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया
खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

बदरिया जो छाई संदेसा ऐसा लाई
कि सुन-सुन मैं तो शरमाई घबराई
बदरिया जो छाई संदेसा ऐसा लाई
कि सुन-सुन मैं तो शरमाई घबराई
किसी ने चोरी-चोरी मेरे घूँघट के पट खोले रे
लाज की मारी मैं तो हुई रे बावरिया

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

मैं अँखियाँ झुकाऊँ या मुखड़ा छुपाऊँ
समझ नहीं आए हाय कित जाऊँ
मैं अँखियाँ झुकाऊँ या मुखड़ा छुपाऊँ
समझ नहीं आए हाय कित जाऊँ
आज किसी ने मुझे पुकारा प्यार से हौले-हौले रे
झुक झुक जाये हाय मेरी नजरिया

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

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Khuli hawa mein dole re-Champakali 1957

Saturday, 29 January 2011

मेरी तकदीर के मालिक-शर्त १९५४

फिल्म शर्त के नाम से एक गाना तुरंत याद आ जाता है
वो है-ना ये चाँद होगा ना तारे रहेंगे जो गीता दत्त और
हेमंत कुमार ने गाया है। इस फिल्म में बहुत से मधुर
गीत हैं। आज आपको लता का गाया हुआ गीत सुनवाते
हैं । थोड़ा दर्द भरा गीत है ये। एस एच बिहारी के लिखे गीत
की तर्ज़ बनाई है हेमंत कुमार ने। इस गीत को हम हेमंत
कुमार द्वारा तैयार किये गए सर्वश्रेष्ठ गीतों में शामिल कर
सकते हैं। इस गीत की अतिरिक्त मधुरता जादू सा असर
करती है और आप इसे पूरा सुने बिना नहीं रह पाते।



गीत के बोल:


कहाँ से ले के आई हैं कहाँ मजबूरियाँ मेरी
ज़बान खामोश आँखें ख़ामोश आँखें कह रही हैं दास्तां मेरी

मेरी तक़दीर के मालिक मेरा कुछ फ़ैसला कर दे
बुरा चाहे बुरा कर दे भला चाहे भला कर दे

मेरी तक़दीर के मालिक

मुझे इतना बता दे मैं कहाँ जाऊँ किधर जाऊँ
कहीं जाने से अच्छा है तेरे क़दमों में मर जाऊँ
सहारा दे नहीं सकता तो फिर बेआसरा कर दे

मेरी तक़दीर के मालिक

नहीं दुनिया में मेरा दूसरा कोई ठिकाना है
मुझे तो बस यहीं अपना मुक़द्दर आजमाना है
लिया है दिल तो मेरी जान भी तन से जुदा कर दे

मेरी तक़दीर के मालिक

मुझे बरबाद करने में जो होता हो भला तेरा
बुझा दे अपने हाथों से चिराग़-ए-ज़िन्दगी मेरा
नहीं कोई गिला तुझसे अगर चाहे फ़ना कर दे

मेरी तक़दीर के मालिक मेरा कुछ फ़ैसला कर दे
बुरा चाहे बुरा कर दे भला चाहे भला कर दे

मेरी तक़दीर के मालिक

Wednesday, 19 January 2011

झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे-परिवार १९५६

एक और परिवार फिल्म से एक गीत सुनवाते हैं आपको ।
ये भी एक युगल गीत है । इस गीत में हेमंत कुमार साथ दे रहे
हैं लता मंगेशकर का । सौम्य किस्म का गीत है ये और ऐसे
गीतों की वजह से ही उस दौर के संगीत का हम आज भी याद
रखे हुए हैं। सुनते रहिये मधुर गीत.................




गीत के बोल:

झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
ओ कारे कारे,
झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
ओ कारे कारे,
सोये अरमान जागे कई तूफ़ान जागे,
सोये अरमान जागे कई तूफ़ान जागे
माने ना मन मोरा सजना बिना

झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
ओ कारे कारे,
झिर झिर झिर झिर

हो ओ ओ ओ, हो ओ ओ ओ ओ ओ
हो ओ ओ ओ, हो ओ ओ ओ ओ ओ
आ जा के तोहे मेरी प्रीत पुकारे
तुझको ही आज तेरा गीत पुकारे
आ जा के तोहे मेरी प्रीत पुकारे
तुझको ही आज तेरा गीत पुकारे
याद आयीं बीती बातें
तुमसे मिलन कि रातें
याद आयीं बीती बातें
तुमसे मिलन कि रातें
काहे को भूले मोहे, अपना बना

झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
ओ कारे कारे,
झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
ओ कारे कारे,
सोये अरमान जागे, कई टूउफान जागे,
सोये अरमान जागे, कई तूफ़ान जागे,
बरखा ना भाये गोरी तेरे बिना

झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
ओ कारे कारे,
झिर झिर झिर झिर

हो ओ ओ ओ, हो ओ ओ ओ ओ ओ
हो ओ ओ ओ, हो ओ ओ ओ ओ ओ
तेरे घुंघराले काले बालों से काली
रात ने आज मेरी नींद चुरा ली
तेरे घुंघराले काले बालों से काली
रात ने आज मेरी नींद चुरा ली
तोसे ही प्यार करूं
तेरा इंतज़ार करूं
तोसे ही प्यार करूं
तेरा इंतज़ार करूं
तेरे बिन झूठा मेरा हर सपना

झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
ओ कारे कारे,
झिर झिर झिर झिर बदरवा बरसे
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Jhir jhir jhir jhir badarwa barse-Parivar 1956

Wednesday, 12 January 2011

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं - फरार १९६५

फरार नाम से कई फ़िल्में बन चुकी हैं। १९५५ से लगा के
सन १९७५ तक हर दस साल के अंतर पर एक फिल्म बनी।
१९८५ में कोई नहीं बनी। चौथी फरार आई ९० के दशक
में। प्रस्तुत श्वेत श्याम युग के गीत को आदिरूप हेमंत कुमार
गीत कहा जा सकता है।

बंगला सिनेमा के अनिल चटर्जी पर इसे फिल्माया गया है।
कैफ़ी आज़मी के लिखे बोलों कि धुन भी हेमंत कुमार ने ही
बनाई है। इस तरह से वे गायक-संगीतकार दोनों ही हैं इस
गीत के। लोग पीते हैं तो लड़खड़ाते ही हैं मगर साथ साथ
वे क्या करते हैं ये हमें गीतों और गजलों के माध्यम से
आसानी से पता चल जाता है। हीरो दुखी क्यूँ है- क्या उसे
अंग्रेजी दारु की बोतल में देसी ठर्रा भर के परोस दिया गया है
या फिर कोई और वजह, जाने के लिए आपको देखना पड़ेगी
फिल्म फरार।




गीत के बोल:

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं
दिल से दुनिया का ग़म मिटाते हैं
लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं
दिल से दुनिया का ग़म मिटाते हैं
एक हम हैं के तेरी महफ़िल में
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

खुश हैं सब और ख़ुशी नहीं मिलती
जिंदा हैं ज़िन्दगी नहीं मिलती
जल रहे हैं चराग में धोखे
जल रहे हैं चराग में धोखे
और कहीं रौशनी नहीं मिलती
रौशनी का फरेब खाते हैं
रौशनी का फरेब खाते हैं
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं

महकी महकी हुयी फ़ज़ा को सलाम
बहकी बहकी हुयी हवा को सलाम
इन बहारों से तो भली है खिज़ां
इन बहारों से तो भली है खिजां
इन बहारों की हर अदा को सलाम
जिनमें सौ ज़ख्म मुस्कुराते हैं
जिनमें सौ ज़ख्म मुस्कुराते हैं
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं
दिल से दुनिया का ग़म मिटाते हैं
एक हम हैं के तेरी महफ़िल में
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

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Log peete hain ladkhadate hain-Faraar 1955

Thursday, 2 December 2010

मैं गरीबों का दिल->आब-ए-हयात १९५५

सरदार मालिक के २-३ गीत हमने कुछ अरसे पहले सुने।
बाद में अधिकतर उनके पुत्र अन्नू मालिक के गीत सुनते
रहे।

सरदार मालिक ने अधिकतर ५० के दशक में काम किया।
१९५५ की एक फिल्म आब-ए-हयात में उनका संगीत है।
फिल्म कुछ यादगार गीतों से भरी पड़ी है। इनमे सबसे
ज्यादा बजने वाला और सुना जानेवाला गीत है हेमंत कुमार
गाया "मैं गरीबों का दिल" । गाने की विशेषता है
भारी आवाज़ वाले हेमंत कुमार के साथ फीमेल कोरस।
महिला कोरस की आवाज़ गाने की खूसूरती को और भी
निखारती है। वैसे तो हिंदी फिल्म संगीत के खजाने में
ऐसे बहुत से गीत हैं जिसमे पुरुष आवाज़ के साथ
जनाना कोरस का प्रयोग किया गया हो। गीत फिल्माया
गया है प्रेमनाथ पर जो खुद भी बुलंद आवाज़ के स्वामी
थे। गीत हसरत जयपुरी का लिखा हुआ है।




गीत के बोल:

आ हा हा हा हा, हा हा हा हा
आ हा हा हा हा, हा हा हा हा

आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ

मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान
मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान

बेकसों के लिए प्यार का आसमान
बेकसों के लिए प्यार का आसमान

मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान
हा हा हा हा आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ

मैं जो गाता चलूँ साथ महफ़िल चले
साथ महफ़िल चले
साथ महफ़िल चले
मैं जो बढ़ता चलूँ साथ मंजिल चले
साथ मंजिल चले
साथ मंजिल चले
मुझे राहें दिखाती चले बिजलियाँ
मुझे राहें दिखाती चले बिजलियाँ

मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान
मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान

हुस्न भी देख कर मुझ को हैरान है
देखो हैरान है
देखो हैरान है
इश्क को मुझ से मिलने का अरमान है
देखो अरमान है
देखो अरमान है
अपनी दुनिया का हूँ मैं हसीं नौजवान
अपनी दुनिया का हूँ मैं हसीं नौजवान

मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान
मैं गरीबों का दिल हूँवतन की ज़बान

कारवां जिन्दगानी कारुकता नहीं
हाँ जी रुकता नहीं
हाँ जी रुकता नहीं
बादशाहों के आगे मैं झुकता नहीं
हाँ जी झुकता नहीं
मैं तो झुकता नहीं
चाँद तारों से आगे मेरा आशियाँ
चाँद तारों से आगे मेरा आशियाँ

मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान
मैं गरीबों का दिल हूँ वतन की ज़बान

तू गरीबों का दिल है वतन की ज़बान
तू गरीबों का दिल है वतन की ज़बान

बेकसों के लिए प्यार का आसमान
बेकसों के लिए प्यार का आसमान

तू गरीबों का दिल है वतन की ज़बान
तू गरीबों का दिल है वतन की ज़बान

हा हा हा हा आ आ आ आ आ
आ आ आ आ आ
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Main gareebon ka dil-Aab-e-Hayat 1955

Wednesday, 1 December 2010

चलो चलें माँ- जागृति १९५४

फिल्म जागृति से तीन गीत आपको सुनवाए जा चुके हैं, देशभक्ति
और उज्जवल देश की कामनाओं से भरपूर गीत। अब सुनिए माँ से
गुज़ारिश करता एक बच्चा क्या कह रहा है। आशा भोंसले की
आवाज़ में ये गीत कुछ कुछ कहानी की तरह लगता है। बोल
कविवर प्रदीप के हैं और संगीत हेमंत कुमार का। कुछ महान
संगीतप्रेमियों के पास संगीतकार रवि की आवाज़ में गाया गया
यही गीत उपलब्ध है। उल्लेखनीय है कि रवि ने हेमंत कुमार के
साथ सहायक के रूप में कुछ समय काम किया था। भारतीय संस्कृति
की जड़ से जुडी हुई है फिल्म जागृति शायद इसी वजह से इसे स्कूल
के बच्चों को दिखाया जाता है। फिल्म और फिल्म के गीत काफी
प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक हैं।



गीत के बोल:

चलो चलें माँ
चलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छाओं में
चलो चले माँ

हो राहें इशारे रेशमी घटाओं में
चलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छाओं में
चलो चलें माँ

आओ चलें हम एक साथ वहाँ
दुःख ना जहाँ कोई ग़म ना जहाँ
आओ चलें हम एक साथ वहाँ
दुःख ना जहाँ कोई ग़म ना जहाँ
आज है निमंत्रण सन सन हवाओं में
चलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छाओं में
चलो चलें माँ

रहना मेरे संग माँ हरदम
ऐसा ना हो के बिछड़ जाएँ हम
रहना मेरे संग माँ हरदम
ऐसा ना हो के बिछड़ जाएँ हम
घूमना है हमको दूर की दिशाओं में
चलो चलें माँ
सपनों के गाँव में
काँटों से दूर कहीं
फूलों की छांव में
चलो चलें माँ

Tuesday, 23 November 2010

अरे छोड़ दे सजनिया पतंग मेरी-नागिन १९५४

नागिन सन १९५४ की फिल्म है और ज़बरदस्त हिट फिल्म है।
इसके गीत इतने बजे कि लोगों को याद हो गए। पिछले गीत
को सुनने के बाद ये ही सबसे पहले दिमाग में आता है। वजह
क्या है आप ढूंढिए। फिल्म में एक नौटंकी में नायक प्रदीप कुमार
और नायिका वैजयंतीमाला ये गीत गा रहे हैं। हेमंत कुमार और
लता मंगेशकर के गाये इस गीत को लिखा है राजेंद्र कृष्ण ने और
धुन बनाई है हेमंत कुमार ने।



गीत के बोल:

अरी छोड़ दे सजनिया
छोड़ दे पतंग मेरी छोड़ दे
ऐसे छोड़ूँ न बलमवा
नैनवा के डोर पहले जोड़ दे

अरी छोड़ दे सजनिया
छोड़ दे पतंग मेरी छोड़ दे
ऐसे छोड़ूँ न बलमवा
नैनवा के डोर पहले जोड़ दे

आशाओं का मांजा लागा
रंगी प्यार से डोरी
आशाओं का मांजा लागा
रंगी प्यार से डोरी
तेरे मुहल्ले उड़ते उड़ते
आई चोरी चोरी

बैरी दुनिया कहीं न तोड़ दे
पतंग मेरी छोड़ दे
ऐसे छोड़ूँ न बलमवा
नैनवा के डोर पहले जोड़ दे

अरमानों की डोर लूटने
खड़े है दुनियवाले
बाँके चरख़ीवाले
अरमानों की डोर लूटने
खड़े है दुनियवाले
बाँके चरख़ीवाले

ऊँचे नीलगगन में
छोड़ दे पतंग मेरी छोड़ दे
ऐसे छोड़ूँ न बलमवा
नैनवा के डोर पहले जोड़ दे

देख चली ये संग हवा के
बलखाती इठलाती
सैयाँ बलखाती इठलाती
चीर के बैरी जग का सीना
गीत प्यार के गाती
देखो गीत प्यार के गाती

हैं किस में इतना ज़ोर
जो काटे डोर सामने आये न
फिर मेरी अटरिया पे
छोड़ दे पतंग सैयाँ छोड़ दे

ऐसे छोड़ूँ न सजनिया
नैनवा के डोर पहले जोड़ दे
सैयाँ छोड़ दे पतंग मेरी छोड़ दे
गोरी नैनवा के डोर पहले जोड़ दे

सैयाँ छोड़ दे पतंग मेरी छोड़ दे
गोरी नैनवा के डोर पहले जोड़ दे
सैयाँ छोड़ दे पतंग मेरी छोड़ दे
गोरी नैनवा के डोर पहले जोड़ दे
सैयाँ छोड़ दे पतंग मेरी छोड़ दे
 
 
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