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Tuesday, 19 July 2011

या दिल की सुनो दुनियावालों-अनुपमा १९६६

फिल्म अनुपमा से एक गीत पेश है हेमंत कुमार की आवाज़ में.
बोल लिखे हैं कैफी अजमी ने और धुन बनायीं है स्वयं हेमंत कुमार ने.
गीत फिल्माया गया है धर्मेन्द्र पर जिन्हें एक पार्टी में गीत गाने के
लिए बोला गया है. दुखियारी नायिका(शर्मिला टैगोर) को ध्यान में रखते
हुए शायद ऐसा गीत गाया जा रहा है.



गीत के बोल:

या दिल की सुनो दुनियावालों
या मुझको अभी चुप रहने दो
मैं ग़म को खुशी कैसे कह दूँ
जो कहते हैं उनको कहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

ये फूल चमन में कैसा खिला
माली की नजर में प्यार नहीं
हँसते हुए क्या-क्या देख लिया
अब बहते हैं आँसू बहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

इक ख्वाब खुशी का देखा नहीं
देखा जो कभी तो भूल गए
मांगा हुआ तुम कुछ दे न सके
जो तुमने दिया वो सहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों

क्या दर्द किसी का लेगा कोई
इतना तो किसी में दर्द नहीं
बहते हुए आँसू और बहें
अब ऐसी तसल्ली रहने दो

या दिल की सुनो दुनियावालों
............................
Ya dil ki suno-Anupama 1966

Wednesday, 13 July 2011

प्यासी हिरनी बन बन धाए-दो दिल १९६४

हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में अब आपको सुनवाते हैं फिल्म
'दो दिल' का एक गीत जिसे गा रही हैं लता मंगेशकर. वी शांताराम
की पुत्री राजश्री दो दिल फिल्म में नायिका हैं. नायक हैं विश्वजीत.
गीत कैफ़ी आज़मी का लिखा हुआ है.

कुछ भूतिया फिल्मों के गीतों सा शुरू होता है ये गीत. नयिका खुद
दौड लगा रही है और नायक की भी जोगिंग की प्रैक्टिस करवा रही है.
अब इतना मधुर गीत कोई सुन्दर बाला गाती हुई जंगल में दिख
जाए तो अच्छे अच्छे दौड लगा दें उसे देख कर.




गीत के बोल :

कहाँ है तू
तू कहाँ है
आ जा ,ऐ मेरे मेरे सपनों के राजा

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

नयी नयी कली खिली
चुन ले न कोई
नयी नयी कली खिली
चुन ले न कोई

ऐसी वैसी बातें दिल की
सुन ले न कोई
मन हंसा जिया मोरा
जाने क्या गाये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

चलते चलते रुक जाऊं मैं
चल नहीं पाऊँ
चलते चलते रुक जाऊं मैं
चल नहीं पाऊँ
पल पल भड़के तन में अग्नि
कैसे बुझाऊँ
लगी न बुझे कहीं
जी को जलाये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ

एक तो मैं हूँ भोली भाली
दूजे अकेली
एक तो मैं हूँ भोली भाली
दूजे अकेली

कैसे बूझी जाए मोसे
मन की पहेली
चली है हवा नयी
जिया घबराए रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
कोई शिकारी आये रे
चोरी चोरी फंदा डाले
बांह पकड़ ले जाए रे

प्यासी हिरनी बन बन धाए
..................................
Pyasi hirni ban ban dhaaye-Do Dil 1964

Wednesday, 12 January 2011

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं - फरार १९६५

फरार नाम से कई फ़िल्में बन चुकी हैं। १९५५ से लगा के
सन १९७५ तक हर दस साल के अंतर पर एक फिल्म बनी।
१९८५ में कोई नहीं बनी। चौथी फरार आई ९० के दशक
में। प्रस्तुत श्वेत श्याम युग के गीत को आदिरूप हेमंत कुमार
गीत कहा जा सकता है।

बंगला सिनेमा के अनिल चटर्जी पर इसे फिल्माया गया है।
कैफ़ी आज़मी के लिखे बोलों कि धुन भी हेमंत कुमार ने ही
बनाई है। इस तरह से वे गायक-संगीतकार दोनों ही हैं इस
गीत के। लोग पीते हैं तो लड़खड़ाते ही हैं मगर साथ साथ
वे क्या करते हैं ये हमें गीतों और गजलों के माध्यम से
आसानी से पता चल जाता है। हीरो दुखी क्यूँ है- क्या उसे
अंग्रेजी दारु की बोतल में देसी ठर्रा भर के परोस दिया गया है
या फिर कोई और वजह, जाने के लिए आपको देखना पड़ेगी
फिल्म फरार।




गीत के बोल:

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं
दिल से दुनिया का ग़म मिटाते हैं
लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं
दिल से दुनिया का ग़म मिटाते हैं
एक हम हैं के तेरी महफ़िल में
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

खुश हैं सब और ख़ुशी नहीं मिलती
जिंदा हैं ज़िन्दगी नहीं मिलती
जल रहे हैं चराग में धोखे
जल रहे हैं चराग में धोखे
और कहीं रौशनी नहीं मिलती
रौशनी का फरेब खाते हैं
रौशनी का फरेब खाते हैं
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं

महकी महकी हुयी फ़ज़ा को सलाम
बहकी बहकी हुयी हवा को सलाम
इन बहारों से तो भली है खिज़ां
इन बहारों से तो भली है खिजां
इन बहारों की हर अदा को सलाम
जिनमें सौ ज़ख्म मुस्कुराते हैं
जिनमें सौ ज़ख्म मुस्कुराते हैं
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

लोग पीते हैं लड़खड़ाते हैं
दिल से दुनिया का ग़म मिटाते हैं
एक हम हैं के तेरी महफ़िल में
प्यासे आते हैं प्यासे जाते हैं

..........................................
Log peete hain ladkhadate hain-Faraar 1955

Monday, 3 January 2011

और कुछ देर ठहर-आखरी ख़त १९६६

राजेश खन्ना के खाते में शायद सबसे ज्यादा रोमांटिक गीत आये हैं।
वैसे तो सभी नायकों के हिस्से में आये होंगे मगर जिन गीतों को सबसे
ज्यादा सुना जाता है उनकी बात हो रही है। शुरूआती दौर में उनके खाते में
रफ़ी के गाये काफी गीत आये, उनमें से जो उल्लेखनीय गीत है वो हम
पहले सुनेंगे इस ब्लॉग पर। ये गीत कैफ़ी आज़मी का लिखा और ख़य्याम
द्वारा संगीतबद्ध गीत है सन १९६६ की फिल्म आखरी ख़त से।



गीत के बोल:

और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर

रात बाक़ी है अभी रात में रस बाक़ी है
पा के तुझको तुझे पाने की हवस बाक़ी है
और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर

जिस्म का रंग फ़ज़ा में जो बिखर जायेगा
मेहरबान हुस्न तेरा और निखर जायेगा
लाख ज़ालिम है ज़माना मगर इतना भी नहीं
तू जो बाहों में रहे वक़्त ठहर जायेगा
और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर

ज़िंदगी अब इन्हीं क़दमों पे लुटा दूँ तो सही
ज़िंदगी अब इन्हीं क़दमों पे लुटा दूँ तो सही
ऐ हसीन बुत मैं ख़ुदा तुझको बना दूँ तो सही
और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा
और कुछ देर ठहर
....................................
Aur kuchh der thehar-Akhiri khat 1966

Monday, 27 December 2010

कोई ये कैसे बताये-अर्थ १९८२

एक सदाबहार गीत-नाम गुम जायेगा सुनते हुए इस गीत का ख्याल आया।
मस्तिष्क में ऐसे गीतों से धुंधली यादें दृष्टिपटल पर कुछ साफ़ सी होकर
उभरना शुरू हो जाती हैं। ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट सा गया है कुछ
समय के बहाव के साथ लपकना रह गया। ऐसे ही सुबह दोपहर शाम गुज़र
जाती है और मन कुछ अज्ञात की तलाश में इधर उधर भटकना जारी रखता
है। रोजमर्रा की दौड़ तो बस एक बहाना है मन को थोड़ी देर के लिए फुसलाने
का।

विवाहेतर संबंधों पर फ़िल्में बनती रही हैं हिंदी सिनेमा जगत में परन्तु उनको
दर्शकों की खुली स्वीकृति कभी भी प्राप्त नहीं हुई। ऐसी फ़िल्में अक्सर पुरुष ही
ज्यादा देखने जाया करते। कुछ अतिरिक्त मनोबल वाली महिलाएं भी देख लिया
करती मगर अकेले नहीं, अपने खुले विचारों वाले पतियों के साथ।वैसे मनोबल
के मामले में महिलाएं पुरुषों से मीलों आगे हैं। ये तो प्रकट मनोबल की बात
हो रही है बस। जो अप्रकट है वो अतुलनीय है।

कई बार मैं सोचता हूँ की कैफ़ी आज़मी ने शबाना के लिए कुछ ख़ास गीत लिखे
हैं और कभी लगता ये मन का वहम है। कैफ़ी तो लाजवाब शायर हैं, शबाना पर
फिल्माए गए गीत का बेहतर होना संयोग मात्र हो सकता है। ऐसी कई फ़िल्में हैं
जिनमे शबाना ने अभिनय किया है और फिल्म के गीत कैफ़ी आज़मी के लिखे
हुए हैं।



गीत के बोल:

कोई ये कैसे बताये के वो तनहा क्यूँ है
वो जो अपना था, वो और किसी का क्यों है
यही दुनिया हैं तो फिर, एसी ये दुनिया क्यों है
यही होता हैं तो, आखिर यही होता क्यों है?

इक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो, पकड़ ले दामन
उस के सीने में समा जाए, हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फासला इतना क्यों है?

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी हैं फिर से बंधाता क्यों है?

तुम मसर्रत का कहो या इसे गम का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है?

Friday, 3 December 2010

बहारों मेरा जीवन भी संवारो-आखरी ख़त १९६६

राजेश खन्ना की काले पीले ज़माने की फिल्म। इसमें उनके
साथ इन्द्राणी मुखर्जी और एक बच्चे ने काम किया है। पूरी
फिल्म बच्चे के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म के गीत कैफ़ी आज़मी
के लिखे हुए हैं और संगीत तैयार किया ख़य्याम ने। फिल्म से
एक लता का गाया मधुर गीत सुनवाते हैं आपको। चेतन आनंद
निर्देशित ये फिल्म एक बार ज़रूर देखनी चाहिए फिल्म प्रेमियों
को। बच्चे ने फिल्म के नायक नायिका से अच्छी एक्टिंग की है।
मन्नू भंडारी की एक कहानी-आपका बंटी पर आधारित इस फिल्म
ने अलोचाकों के बीच वाहवाही ज़रूर बटोरी भले ही टिकट घर पर
नोट ना बटोरें हों।

गीत के साथ प्रस्तुत कमेंट्स में एक जानकारी यूँ हैं-इस गीत के लिए
सितार वादक उस्ताद रईस खान को विशेष तौर पर पाकिस्तान से
बुलवाया गया था जबकि हमारे देश में सितार वादकों की कोई कमी
नहीं। दूसरे संगीतकार भी सितार वादकों की सेवाएँ नियमित रूप से
लेते रहे हैं। अब ये जानकारी कितनी प्रमाणिक है कहा नहीं जा सकता।
खैर बाकी की जानकारी भी दिए देते हैं आपको-ये गीत राग 'पहाड़ी '
पर आधारित है।



गीत के बोल:

बहारों, मेरा जीवन भी सँवारों
बहारों, मेरा जीवन भी सँवारों

कोई आए कहीं से
कोई आए कहीं से, यूँ पुकारो
बहारों, मेरा जीवन भी सँवारों,
बहारों

तुम्हीं से दिल ने सीखा है तड़पना
तुम्हीं से दिल ने सीखा है तड़पना

तुम्हीं को दोष दूंगी
तुम्हीं को दोष दूंगी, ऐ नज़ारों
बहारों, मेरा जीवन भी सँवारों,
बहारों

रचाओ कोई कजरा लाओ गजरा
रचाओ कोई कजरा लाओ गजरा

लचकती डालियों तुम
लचकती डालियों तुम, फूल बहारों
बहारों, मेरा जीवन भी सँवारों,
बहारों

लगाओ मेरे इन हाथों में मेहंदी
लगाओ मेरे इन हाथों में मेहंदी

सजाओ माँग मेरी
सजाओ माँग मेरी, या सिधारो,
बहारों, मेरा जीवन भी सँवारों,
बहारों

Wednesday, 1 December 2010

शाम रंगीन हुई है -कानून और मुजरिम १९८१

मुख्या धारा के सिनेमा से अधिकतर फ़िल्मी पत्रकारों, लेखकों
और नए नवेले ज्यादा प्याज खाने वाले चिट्ठाकारों का मतलब
होता बड़े बड़े निर्देशकों की फ़िल्में। अब उनकी सूची पहले से ही
बंधी हुई होती ही तो वे महिमामंडन भी गिने चुने लोगों का किया
करते हैं। कुछ का हाल तो ये है कि वे पोंडीचेरी के प्राकृतिक सौंदर्य
पे साधिकार लिखते हैं और वहां गुलमोहर और चीड के वृक्षों की
संख्या पर टिप्पणी करते हैं। अमूमन संगीत प्रेमी भी अधिकांश
अवसरों पर अपने अपने फैवरेट ' पिटारी बाई' और 'भोंगड़े भाई'
के आख्यान में ही व्यस्त दिखाई देते हैं। ऐसे में आम जनता को
ये कैसे पता चलेगा कि इतिहास की तह में क्या क्या छुपा हुआ है ।
एक तो इतिहास वो होता है जो बंद कमरे में कुछ लोगों की सीमित
जानकारी के आधार पर लिखा जाता ही जिसमे शब्द जाल ज्यादा
होता है तथ्य कम, कागज़ ज़रूर। ऐसी ऐतिहासिक किताबों के मोटे
मोटे और चिकने से होते हैं। कीमत ऐसी कि आम आदमी की सोच
के बाहर हो। ऐसी कुछ किताबें पढ़ कर भी सयाने लोग मसाला लिखा
करते हैं । दूसरा इतिहास वो जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता है ।
ऐसा इतिहास भी कम लोगों की पहुँच में होता है। अब मान लीजिये
किसी लेखक ने अपनी आत्मकथा में ये तथ्य छुपाया कि उसकी पीठ में
एग्ज़ीमा था, तो वो आपको उसके निकटस्थ निवासियों से मालूम
पढ़ जायेगा। इतनी फुर्सत किसी को नहीं है जो वास्तविकता जाने
के लिए वर्जिश करे अतः जो सामने प्रस्तुत है उसी को सत्य मानते
हुए इतिश्री कर ली जाती है।

आज एक गीत आपको सुनवाते हैं जो गुमनाम सी अनदेखी फिल्म
कानून और मुजरिम से है- शाम रंगीन हुई है। इस युगल गीत को
गाया है सुरेश वाडकर और उषा मंगेशकर ने। १९८१ में आई फिल्म
कानून और मुजरिम के इस गीत के अलावा फिल्म के बाकी गीत
आपको एल पी रिकॉर्ड के ऊपर ही मिलेंगे।

ये एक ऐसा गीत है जिसकी फरमाइश बहुत आया करती रेडियो पर।
गाँव-गाँव से, मजनू का टीला से और झुमरी तलैया से। बरकाकाना का
नाम भी कभी कभार सुनाई दे जाता । ये बरकाकाना नामक जगह बिहार
से अलग होकर बने राज्य झारखण्ड में मौजूद है ।

सन १९८१ में पुराने दौर के कुछ संगीतकार सक्रिय थे। ख़य्याम ने तो
फिल्म कभी कभी की रेकोर्ड तोड़ सफलता के बाद काफी फिल्मों में संगीत
दिया मगर सी अर्जुन फिल्म 'जय संतोषी माँ' की अपार सफलता के
बावजूद हिंदी फिल्म क्षेत्र में कुछ खास नहीं कर पाए या यूँ कहें उनको
करने नहीं दिया गया ।

सुनिए कैफ़ी आज़मी का लिखा ये गीत जो आज भी सुनने में वही आनंद
देता है जो सन ८१ में दिया करता था।




गीत के बोल:

शाम रंगीन हुई है तेरे आँचल की तरह
सुरमई रंग सजा है तेरे काजल की तरह

पास हो तुम मेरे दिल के मेरे आँचल की तरह
मेरी आँखों में बसे हो मेरे काजल की तरह

शाम रंगीन हुई है तेरे आँचल की तरह

आसमान है मेरे अरमानों का दर्पण जैसे
आसमान है मेरे अरमानों का दर्पण जैसे
दिल यूं धडके मेरा खनके तेरे कंगन जैसे

मस्त हैं आज हवाएं मेरी पायल की तरह
सुरमई रंग सजा है तेरे काजल की तरह

शाम रंगीन हुई है तेरे आँचल की तरह

मेरी हस्ती पे कभी यूं कोई छाया ही ना था
मेरी हस्ती पे कभी यूं कोई छाया ही ना था
तेरे नज़दीक मैं पहले कभी आया ही ना था

मैं हूँ धरती की तरह तुम किसी बादल की तरह
सुरमई रंग सजा है तेरे काजल की तरह

आ आ आ, शाम रंगीन हुयी है तेरे आँचल की तरह

ऐसी रंगीन मुलाक़ात का मतलब क्या है
ऐसी रंगीन मुलाक़ात का मतलब क्या है
इन छलकते हुए जज़्बात का मतलब क्या है

आज हर दर्द भुला दो किसी पागल की तरह
सुरमई रंग सजा है तेरे आँचल की तरह

शाम रंगीन हुई है तेरे आँचल की तरह
पास हो तुम मेरे दिल के मेरे आँचल की तरह
शाम रंगीन हुई है तेरे आँचल की तरह
पास हो तुम मेरे दिल के मेरे आँचल की तरह

Sunday, 28 November 2010

जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम-शोला और शबनम १९६१

एक और फ्लेश बैक वाला गीत सुन लिया जाए।

धर्मेन्द्र ने कई रोमांटिक फिल्मों में अभिनय किया है।
ये उनके फ़िल्मी जीवन के प्रथम दौर की फिल्म है
साहब क्या लाजवाब गीत मिला उनको परदे पर
जिसे हम सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ कर्णप्रिय युगल गीतों
में गिनते हैं। धर्मेन्द्र के साथ परदे पर 'तरला' नामक
अभिनेत्री हैं जिन्हें मैंने किसी और फिल्म में देखा
हो याद नहीं। गीत लिखा है ..... ने और पिछले गीत की
तरह इसकी धुन भी बनाई है खय्याम ने। बस गीतकार
बदल गए हैं-कैफ़ी आज़मी। खय्याम ने जितना भी संगीत
दिया वो सौम्य किस्म का है। कभी कभार ही उन्होंने
शोरगुल वाले फार्मूले का इस्तेमाल किया है। उनके
संगीतबद्ध ठेठ पंजाबी गीत भी कर्णप्रिय हैं। फ़िल्म 'शोला और
शबनम' के इस गीत में बस दूसरे अंतरे की एक पंक्ति ही
सुनने में खटकती है जहाँ नायक कहता है-तू भी पल भर
रूठे ना । ये पंक्ति पहली पंक्ति के साथ मेल नहीं खाती।


गीत के बोल:

फूल को ढूंढें प्यासा भंवरा
दीपक को परवाना

दुनिया अपने रब को पुकारे
दुनिया अपने रब को पुकारे
तुझको तेरा दीवाना
आ जा, आ जा, आ जा, आ जा

जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम
खेल अधूरा छूटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना
प्यार का बंधन टूटे ना

जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम
खेल अधूरा छूटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

आ आ हा हा हा आ आ

मिलता है जहाँ धरती से गगन
मिलता है जहाँ धरती से गगन
आओ वहीँ हम जाएँ

तू मेरे लिए
मैं तेरे लिए
तू मेरे लिए
मैं तेरे लिए

इस दुनिया को ठुकराएँ
इस दुनिया को ठुकराएँ

दूर बसा लें दिल की जन्नत
जिसको ज़माना लुटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन टूटे ना

हं हं हं ला ला ला ला ला
आ आ आ आ आ आ आ आ आ हं हं हं हं

मिलने की ख़ुशी ना मिलने का गम
ख़त्म ये झगडे हो जाएँ
मिलने की ख़ुशी ना मिलने का गम
ख़त्म ये झगडे हो जाएँ

तू तू ना रहे
मैं मैं ना रहूँ
तू तू ना रहे
मैं मैं ना रहूँ

एक दूजे में खो जाएँ
एक दूजे में खो जाएँ

मैं भी ना छोडूं पल भर दामन
मैं भी ना छोडूं पल भर दामन
तू भी पल भर रूठे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन
जनम का बंधन
जनम का बंधन टूटे ना

प्यार का बंधन टूटे ना
 
 
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