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Friday, 24 June 2011

जा रे जा रे ओ माखन चोर-चम्पाकली १९५७

सन १९५७ में भारत भूषण की जो उल्लेखनीय फ़िल्में आयीं
वे थीं-चम्पाकली, गेटवे ऑफ़ इंडिया और रानी रूपमती ।

तीनों फिल्मों में ही कर्णप्रिय संगीत है। इन फिल्मों में से एक
ना एक गीत कालजयी निश्चित ही हुआ।

राजेंद्र कृष्ण ने माखन चोर नन्द किशोर के उल्लेख वाले
कुछ बढ़िया गीत लिखे हैं। फिल्म चम्पाकली के इस गीत को
आपने शायद ही सुना हो। हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन
वाली फिल्म चम्पाकली के गीत सॉफ्ट किस्म के हैं और सुनने
में कानों में हलकी सी गुदगुदी करते हैं।




गीत के बोल:

जा रे जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर

जा जा काहे मचावत शोर
कभी ना छोड़ूँ तोरी ये बैयाँ गोरी-गोरी
सजनिया काहे मचावत शोर

ऐसी ठिठोली करो हमसे ना रसिया
कौन हो तुम हमारे
ऐसी ठिठोली करो हमसे ना रसिया
कौन हो तुम हमारे
होता है गोरी जो चकोरी का चंदा
हम वही हैं तुम्हारे
देखो जी देखो मेरा भोला सा मनवा
समझे नहीं इशारे ओ छलिया

जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर

मैं बन्सी तू तान मेरा तेरा साथ पुराना
ओ मैं बन्सी तू तान मेरा तेरा साथ पुराना
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
रहने दो ये बात चले ना कोई बहाना
मानो ना मानो तुम्हें दिल की क़सम है अपना हमें बनाना

सजनिया काहे मचावत शोर
कभी ना छोड़ूँ तोरी ये बैयाँ गोरी-गोरी
सजनिया काहे मचावत शोर

हटो जी हटो मेरी छोडो डगरिया यूँ हमें ना सताओ
हटो जी हटो मेरी छोडो डगरिया यूँ हमें ना सताओ
जाने से पहले मेरे दिल की नगरिया मुस्करा के बसाओ
जानूँ ना जानूँ कैसा दिल है तुम्हारा
पहले दिल तो दिखाओ रे छलिया

जा रे ओ माखन चोर
चलेगी ना ये चोरी तेरी जोरा-जोरी
ओ छलिया, जा रे ओ माखन चोर
....................................
Ja re o makhanchor-Champakali 1957

Monday, 20 June 2011

तुम रूठ के मत जाना- फागुन १९५८

मधुबाला के नाम से ये गीत मुझे बार बार याद आ जाता है-
मैं सोया अँखियाँ मीचे। इस गीत को सुनते सुनते मुझे भी
नींद आ जाती है। गीत के विडियो ऑडियो दोनों में नशा
सा है। गीत इतनी सौम्यता से गाया और फिल्माया गया है
कि इसकी सादगी से भी नशा सा होने लगता है। एक बार इसे
अवश्य सुनें और देखें।

आज आपको एक और गीत सुनवाते हैं फिल्म फागुन से।
ये भी युगल गीत है आशा और रफ़ी की आवाजों में। कमर
जलालाबादी के सरल बोलों पर धुन तैयार की है संगीतकार
ओ पी नय्यर ने। फागुन फिल्म सन १९५८ की एक बड़ी हिट
फिल्म थी। सफलता में फिल्म के संगीत का भी बहुत बड़ा
योगदान था।

एक कविता पाठ की तरह सा ये गीत विरह गीत के रूप में प्रस्तुत
किया गया है फिल्म में। जैसे फिल्म फागुन के गीत एक दूसरे के
निकट के सम्बन्धी से सुनाई देते हैं वैसे ही इस गीत में रोती हुई
नायिका सुचित्रा सेन की दूर की रिश्तेदार सी दिखाई देती है।





गीत के बोल:


तुम रूठ के मत जाना
तुम रूठ के मत जाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना

क्यों हो गया बेगाना
क्यों हो गया बेगाना
तेरा-मेरा क्या रिश्ता ये तूने नहीं जाना
तेरा-मेरा क्या रिश्ता ये तूने नहीं जाना

मैं लाख हूँ बेगाना
मैं लाख हूँ बेगाना
फिर ये तड़प कैसी इतना तो बता जाना
फिर ये तड़प कैसी इतना तो बता जाना

फ़ुरसत हो तो आ जाना
फ़ुरसत हो तो आ जाना
अपने ही हाथों से मेरी दुनिया मिटा जाना
अपने ही हाथों से मेरी दुनिया मिटा जाना

तुम रूठ के मत जाना
तुम रूठ के मत जाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना

.................................
Tum rooth ke mat jaana-Phagun 1958

Tuesday, 31 May 2011

खुली हवा में डोले रे-चम्पाकली १९५७

फिल्म चम्पाकली में संगीतकार हेमंत कुमार ने अच्छा संगीत दिया
राजेंद्र कृष्ण के मधुर गीतों को लता और रफ़ी ने बड़ी तन्मयता के
साथ गाया भी। सॉफ्ट किस्म के गीत हैं फिल्म के। सॉफ्ट गीतों कि
विशेषता ये होती है उन्हें आप जब चाहे बिना ना नुकुर, मूड हो
ना हो सुन कर जी बहला सकते हैं। आपको पहले दो गीत सुनवाये
हैं-छुप गया कोई रे और गवालन क्यूँ मेरा मन। गीत में नायिका
कुछ विशेष व्यायाम कर रही है और वो क्या है मुझे समझ नहींते हैं।
पढता। कृपया बतलाएं धागे में पत्थर बांध के ऐसा क्या किया जाता
है जिससे पक्षी बेचारे नीचे गिरने लगते हैं।





गीत के बोल:

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया
खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

बदरिया जो छाई संदेसा ऐसा लाई
कि सुन-सुन मैं तो शरमाई घबराई
बदरिया जो छाई संदेसा ऐसा लाई
कि सुन-सुन मैं तो शरमाई घबराई
किसी ने चोरी-चोरी मेरे घूँघट के पट खोले रे
लाज की मारी मैं तो हुई रे बावरिया

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

मैं अँखियाँ झुकाऊँ या मुखड़ा छुपाऊँ
समझ नहीं आए हाय कित जाऊँ
मैं अँखियाँ झुकाऊँ या मुखड़ा छुपाऊँ
समझ नहीं आए हाय कित जाऊँ
आज किसी ने मुझे पुकारा प्यार से हौले-हौले रे
झुक झुक जाये हाय मेरी नजरिया

खुली हवा में डोले रे आज मेरा मन बोले रे
दिल की बहार ले के आएगा साँवरिया

......................................
Khuli hawa mein dole re-Champakali 1957

Tuesday, 11 January 2011

आ लौट के आ जा मेरे मीत-रानी रूपमती १९५९

मुकेश की आवाज़ में एक गीत सुनिए जिसे ना जाने कितनी
बार सुना होगा मैंने। इस दर्द भरे गीत का आकाशवाणी से
विशेष नाता रहा है और इसे लगभग सभी गीतों के कार्यक्रम
में नियमित रूप से बजाय जाता रहा। पिछले गीत से मुझे ये
गीत याद आया। भारत भूषण इस गीत में भी आपको दिखाई देंगे
बस फर्क गायक की आवाज़ का हो गया है। पिछला गीत रफ़ी की
आवाज़ में था। ऐतिहासिक और पौराणिक फिल्मों के लिए अभिनेता
भारत भूषण भी एक पसंद हुआ करते थे फिल्म निर्माताओं की। गीत
लिखा है कविवर भारत व्यास ने और धुन है एस एन त्रिपाठी की।



गीत के बोल:

लौट के आ, लौट के आ
लौट के आ , लौ के आ

आ लौट के आ जा मेरे मीत
आ लौट के आ जा मेरे मीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

आ लौट के आ जा मेरे मीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

मेरा सूना पड़ा रे संगीत
मेरा सूना पड़ा रे संगीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

आ लौट के आ जा मेरे मीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

आ लौट के आ जा मेरे मीत

बरसे गगन मेरे बरसे नयन
देखो तरसे है मन अब तो आ जा
बरसे गगन मेरे बरसे नयन
देखो तरसे है मन अब तो आ जा
शीतल पवन लगाये अगन
ओ सजन अब तो मुखड़ा दिखा जा
शीतल पवन लगाये अगन
ओ सजन अब तो मुखड़ा दिखा जा

तूने भाली रे निभाई प्रीत
तूने भाली रे निभाई प्रीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

आ लौट के आ जा मेरे मीत

एक पल है हँसना एक पल है रोना
कैसा है जीवन का खेला
एक पल है हँसना एक पल है रोना
कैसा है जीवन का खेला
एक पल है मिलना एक पल बिछड़ना
दुनिया है दो दिन का मेला

ये घडी ना जाए बीत
ये घडी ना जाए बीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

आ लौट के आ जा मेरे मीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

मेरा सूना पड़ा रे संगीत
मेरा सूना पड़ा रे संगीत
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं

आ लौट के आ जा मेरे मीत

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे-गेटवे ऑफ़ इंडिया १९५७

आपने कफ़ सिरप ज़रूर एक ना एक बार पिया होगा आइये आज
पियें सौम्यता का सिरप। गीत है फिल्म 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' से।
इसे दो सौम्य कलाकारों पर फिल्माया गया है-भारत भूषण और
मधुबाला। इस गीत को उतने ही आहिस्ता से गाया भी गया है
जितनी आहिस्ता से ये दोनों कलाकार अपने संवाद बोलते हैं या
अदाएं दिखाते हैं । सितार की आवाज़ के साथ गायकों की आवाज़
का मेल 'सोने में सुहागा' जैसा है। अभी इसी उपमा से काम चलाइए,
दूसरी सूझ नहीं रही है।



गीत के बोल:

रफ़ी : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा :हम ज़माने से दूर जा बैठे

आशा : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम ज़माने से दूर जा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

रफ़ी : भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
हाय! क्या चीज़ थी गँवा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

आशा : दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल वही दिल जो दिल में जा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

रफ़ी : एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
गैर का क्यों उसे बना बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे

आशा : गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
देख कर कुछ तो चोट खा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम जमाने से दूर जा बैठे

दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
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Do ghadi wo jo paas aa baithe-Gateway of India 1957
 
 
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