आज आराम से कुछ पुराने गाने सुनने का मन हुआ तो
फिल्म 'आराम' के भी कुछ गीत सुन लिए। ये कुछ संयोग
जैसा है कि जिस दिन फुर्सत से गीत सुनने का मन होता है
उस दिन ३० के, ४० के और ५० के दशक के गीत याद आते
हैं जैसे उनसे कोई पुरानी रिश्तेदारी हो। फिल्म का संगीत
लाजवाब है। गौर फरमाएं अनिल बिश्वास ने फिल्म 'लाजवाब'
में भी लाजवाब संगीत दिया है। हाँ ये बात सही है कि आराम
उन फिल्मों में से है जिन्हें श्रोताओं और दर्शकों ने भी जवाब में
लाजवाब कहा। प्रस्तुत गीत में प्यानो का बहुत सुन्दर प्रयोग
हुआ है। फिल्म के तीन गीत आप पूर्व में सुन चुके हैं, लगे हाथ
चौथा भी सुन लीजिये। नायक प्रेमनाथ बहुत ही expressive
किस्म के अदाकार थे। इधर उनको प्यानो बजाते देख मुझे
सुनील दत्त याद आ गये। शायद सुनील दत्त प्रेमनाथ के ख़ास
हाव भावों से प्रभावित थे। संगीत निर्देशक के साथ ही साथ
फिल्म के निर्देशक की भी दाद देना पड़ेगी। मधुबाला को इतने
expression बदलते मैंने बहुत ही कम गीतों में देखा है।
आपने कभी ध्यान दिया है कि युवा लड़कियां बात करते करते
गर्दन को ज्यादा घुमाती हैं, या एक ओर टेढ़ा कर लेती हैं, उम्र
गुजरने के साथ साथ गर्दन घुमाना कम होता और बेलन घुमाना बढ़ने
लगता है। मुझे याद है दूसरी कक्षा में एक बाला दो का पहाडा
सुनाते सुनाते खुद १८० के कोण तक घूमती थी और गर्दन को
२७० के कोण में इधर उधार घुमा डालती थी। उसको देख कर ही
हमें अहसास होता था कि पहाडा याद करना कितना कसरती काम है।
तो सुनिए जनाब १० में से १० नंबर वाला गीत। राजेंद्र कृष्ण की
रचनाएँ अपने मदन मोहन के संगीत निर्देशन में अवश्य सुनी होंगी
और सराही भी होंगी, मैंने भी सराही हैं। मदन मोहन को शिकायत रही
कि उनकी रचनाओं को वो प्रतिसाद नहीं मिला जिसके वे हक़दार
थे। इसका जवाब ये गीत है। गाने में सितार के टुकड़े हो या ना हों
वो आम जनता के कानों को स्वीकार्य होना चाहिए। सितार के ऊंचे
सप्तक वाले सुर कानों को ज़रा झनझना देते हैं और ये बाजीगरी शुद्ध
शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों के लिए ठीक है।
सरलता एक बहुत बड़ा अस्त्र है जिसके बलबूते पर बड़े बड़े किले फतह
किये जाते हैं। ये मूल मंत्र संगीतकार अनिल बिश्वास के शिष्य सी. रामचंद्र
ने भी माना और सी. रामचंद्र से ओर्केस्ट्रा के गुर सीखने वाले संगीतकार
सचिन देव बर्मन ने भी माना। शंकर जयकिशन ने सरलता और शोरगुल
वाली शैली दोनों के बीच एक संतुलन बनाये रखा। यहाँ शोरगुल से मतलब
वाद्य यंत्रों की अधिकता से है, गलत अर्थ ना निकाल बैठें। प्रस्तुत गीत
सौम्यता की एक शानदार मिसाल है। इतने अहिस्ता से गीत गाया जा रहा
है कि कान से लगा के मन तक हलकी सी गुदगुदी का अहसास होता है।
गीत के बोल:
मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
किसी को मन का मीत बना ले
मीत बना ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
प्रीत बना ले ये जीवन को एक सुहाना सपना
एक सुहाना सपना
जीवन में ये ज्योत जगा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
जलनेवाला हँसते हँसते फिर भी जलता जाए
फिर भी जलता जाए
प्रीत के हैं अन्दाज़ निराले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
..................................
Man mein kisi ki preet-Aaram 1951
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Monday, 30 May 2011
Saturday, 21 May 2011
नैन मिले नैन हुए बाँवरे-तराना १९५१
आपको पुरानी तराना फिल्म का एक भी गीत नहीं सुनाया है अभी तक।
आज आपको इस हिट मुज़िकल फिल्म से एक गीत सुनवाते हैं जो
सुबह सुबह के किसी रेडियो प्रोग्राम में आपने ज़रूर सुना होगा।
कुछ haunting(भूतिया नहीं) melodies अक्सर बिना किसी वजह से
याद आ जाती हैं और आप उनको गुनगुनाने लग जाते हैं। ये भी एक ऐसा
ही युगल गीत है। इस गीत में बहुत स्कोप है आहें भरने का विशेषकर प्रेमी
युगल के लिए। प्रेम धवन के सरल से मगर प्रभावी बोलों को एक
आकर्षक धुन पर तैराया है संगीतकार अनिल बिस्वास ने। अनिल बिश्वास
जैसे कुशल चितेरे फिल्म संगीत जगत में कम ही हुए हैं। हिंदी गीत जो आज हम
आज सुनते हैं उसके स्वरुप को व्यवस्थित करने का श्री अनिल बिस्वास को
ही जाता है। गीत में सौम्यता को शुरू से आखिर तक कायम रखने की कला
में अनिल बिश्वास सिद्धहस्त थे। गीत फिल्माया गया है दो नामी कलाकारों
पर-दिलीप कुमार और मधुबाला।
गीत के बोल:
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
चैन कहाँ मोहे सजन संवरे
नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
देखते ही देखते मैं खो गई
देखते ही देखते मैं खो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
नैन हुए बावरे
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
नैन हुए बावरे
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
नैन हुए बावरे
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
नैन हुए बावरे
नैन मिले नैन हुए बावरे
चैन कहाँ मोहे सजन साँवरे
नैन हुए बावरे
.....................................
Nain mile nain hue banwre-Tarana 1951
आज आपको इस हिट मुज़िकल फिल्म से एक गीत सुनवाते हैं जो
सुबह सुबह के किसी रेडियो प्रोग्राम में आपने ज़रूर सुना होगा।
कुछ haunting(भूतिया नहीं) melodies अक्सर बिना किसी वजह से
याद आ जाती हैं और आप उनको गुनगुनाने लग जाते हैं। ये भी एक ऐसा
ही युगल गीत है। इस गीत में बहुत स्कोप है आहें भरने का विशेषकर प्रेमी
युगल के लिए। प्रेम धवन के सरल से मगर प्रभावी बोलों को एक
आकर्षक धुन पर तैराया है संगीतकार अनिल बिस्वास ने। अनिल बिश्वास
जैसे कुशल चितेरे फिल्म संगीत जगत में कम ही हुए हैं। हिंदी गीत जो आज हम
आज सुनते हैं उसके स्वरुप को व्यवस्थित करने का श्री अनिल बिस्वास को
ही जाता है। गीत में सौम्यता को शुरू से आखिर तक कायम रखने की कला
में अनिल बिश्वास सिद्धहस्त थे। गीत फिल्माया गया है दो नामी कलाकारों
पर-दिलीप कुमार और मधुबाला।
गीत के बोल:
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
चैन कहाँ मोहे सजन संवरे
नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
देखते ही देखते मैं खो गई
देखते ही देखते मैं खो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
नैन हुए बावरे
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
नैन हुए बावरे
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
नैन हुए बावरे
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
नैन हुए बावरे
नैन मिले नैन हुए बावरे
चैन कहाँ मोहे सजन साँवरे
नैन हुए बावरे
.....................................
Nain mile nain hue banwre-Tarana 1951
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Thursday, 6 January 2011
हूँ मैं एक नया तराना-फरार १९५५
'नया' थीम और शब्द के ऊपर आपको नए साल कई शुरुआत में एक गीत
सुनवाया था। एक और गीत सुनिए जिसमे नए तराने के जिक्र है। एक
क्लब सॉन्ग है ये। एक दाढ़ी वाला स्टेज पर गिटार भांज रहा है। गीता
बाली नृत्य कर रही हैं और परदे पर इसे गा रही हैं। गायिका गीता दत्त ने
पार्श्व गायन किया है। प्रेम धवन के लिखे गीत की तर्ज़ बनाई है संगीतज्ञ
अनिल बिश्वास ने।
गीत के बोल:
हर इक नज़र इधर उधार
है बेक़रार मेरे लिए
महफ़िल का दिल धड़क रहा है बार बार
मेरे लिए
हूँ मैं इक नया तराना इक नया फ़साना
इक नई कहानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना इक नया फ़साना
इक नई कहानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना
रूप की रानी नाम है मेरा
दिल तडपाना काम है मेरा
रूप की रानी नाम है मेरा
दिल तडपाना काम है मेरा
कोई कहे मतवाली
कोई कहे भोली भाली
कोई कहे दीवानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना
मेरी अदाएं मेरे बहाने
कोई ना समझे कोई ना जाने
मेरी अदाएं मेरे बहाने
कोई ना समझे कोई ना जाने
इक पवन झकोला इक उड़न खटोला
इक याद खाली(??) हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना
इक नया फ़साना इक नई कहानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली एक छैल छबीली
मदमस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं एक नया तराना
हूँ मैं
सुनवाया था। एक और गीत सुनिए जिसमे नए तराने के जिक्र है। एक
क्लब सॉन्ग है ये। एक दाढ़ी वाला स्टेज पर गिटार भांज रहा है। गीता
बाली नृत्य कर रही हैं और परदे पर इसे गा रही हैं। गायिका गीता दत्त ने
पार्श्व गायन किया है। प्रेम धवन के लिखे गीत की तर्ज़ बनाई है संगीतज्ञ
अनिल बिश्वास ने।
गीत के बोल:
हर इक नज़र इधर उधार
है बेक़रार मेरे लिए
महफ़िल का दिल धड़क रहा है बार बार
मेरे लिए
हूँ मैं इक नया तराना इक नया फ़साना
इक नई कहानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना इक नया फ़साना
इक नई कहानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना
रूप की रानी नाम है मेरा
दिल तडपाना काम है मेरा
रूप की रानी नाम है मेरा
दिल तडपाना काम है मेरा
कोई कहे मतवाली
कोई कहे भोली भाली
कोई कहे दीवानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना
मेरी अदाएं मेरे बहाने
कोई ना समझे कोई ना जाने
मेरी अदाएं मेरे बहाने
कोई ना समझे कोई ना जाने
इक पवन झकोला इक उड़न खटोला
इक याद खाली(??) हूँ मैं
इक रंग रंगीली इक छैल छबीली
मद मस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं इक नया तराना
इक नया फ़साना इक नई कहानी हूँ मैं
इक रंग रंगीली एक छैल छबीली
मदमस्त जवानी हूँ मैं
हूँ मैं एक नया तराना
हूँ मैं
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Monday, 22 November 2010
नदी किनारे बैठ के आओ-जागीरदार १९३७
हिंदी सिनेमा के प्रथम दौर से एक गीत चुना है आज आपके लिए।
फिल्म का नाम है जागीरदार । सन १९३७ की इस फिल्म का निर्देशन
महबूब खान (मदर इंडिया फेम)ने किया था।
अभिनेता मोतीलाल और अभिनेत्री माया बनर्जी ने ये गीत गाया है
और इस पर अभिनय भी किया है। अफ़सोस, इसकी विडियो क्लिप
उपलब्ध नहीं है दर्शन हेतु। मोतीलाल अपनी कातिल मुस्कराहट
के लिए विख्यात थे।
गीत जिया सरहदी ने लिखा और इस गीत को स्वरों में बांधा है
अनिल बिश्वास ने। बतौर संगीतकार अनिल बिश्वास के लिए ये
पहली बड़ी हिट फिल्म थी।
आज के दौर में अगर आप किसी से कहेंगे 'नदी किनारे बैठ के आओ'
तो वो आपको टेडी नज़र से देखेगा-कारण-लगभग सभी नदी के
किनारे जनता ने आबाद कर दिए हैं और सुबह के नित्य कर्म से
लेकर शाम के नित्य कर्म तक सब कुछ होता है किनारे पर।
कुछ ही नदियाँ आबादी क्षेत्र में जनता के कहर से बची हुई हैं।
गीत की कुछ पंक्तियाँ इटालिक फॉण्ट में हैं उनपर नज़र डालें। मुझे
बोल कुछ गड़बड़ लगते हैं। ज्यादा बारीक कान वाले कृपया सहायता
करें।
गीत के बोल:
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
चुल्लू भर भर पानी के बूँदें
चुल्लू भर भर पानी के बूँदें
लो भर भर बरसायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
सुख बन जब बन के राजा
सुख बन जब बन के राजा
पवन जाग उजाली
पवन जाग उजाली
मिल जुल कर फिर बन में हम तुम
मिल जुल कर फिर बन में हम तुम
अपना राज चलायें
अपना राज चलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
कागज़ की एक नाव बना कर
जल में उसे चलायें
कागज़ की एक नाव बना कर
जल में उसे चलायें
दुनिया की तस्वीर बना कर
दुनिया की तस्वीर बना कर
दुनिया को दिखलायें
दुनिया को दिखलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
फिल्म का नाम है जागीरदार । सन १९३७ की इस फिल्म का निर्देशन
महबूब खान (मदर इंडिया फेम)ने किया था।
अभिनेता मोतीलाल और अभिनेत्री माया बनर्जी ने ये गीत गाया है
और इस पर अभिनय भी किया है। अफ़सोस, इसकी विडियो क्लिप
उपलब्ध नहीं है दर्शन हेतु। मोतीलाल अपनी कातिल मुस्कराहट
के लिए विख्यात थे।
गीत जिया सरहदी ने लिखा और इस गीत को स्वरों में बांधा है
अनिल बिश्वास ने। बतौर संगीतकार अनिल बिश्वास के लिए ये
पहली बड़ी हिट फिल्म थी।
आज के दौर में अगर आप किसी से कहेंगे 'नदी किनारे बैठ के आओ'
तो वो आपको टेडी नज़र से देखेगा-कारण-लगभग सभी नदी के
किनारे जनता ने आबाद कर दिए हैं और सुबह के नित्य कर्म से
लेकर शाम के नित्य कर्म तक सब कुछ होता है किनारे पर।
कुछ ही नदियाँ आबादी क्षेत्र में जनता के कहर से बची हुई हैं।
गीत की कुछ पंक्तियाँ इटालिक फॉण्ट में हैं उनपर नज़र डालें। मुझे
बोल कुछ गड़बड़ लगते हैं। ज्यादा बारीक कान वाले कृपया सहायता
करें।
गीत के बोल:
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
चुल्लू भर भर पानी के बूँदें
चुल्लू भर भर पानी के बूँदें
लो भर भर बरसायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
सुख बन जब बन के राजा
सुख बन जब बन के राजा
पवन जाग उजाली
पवन जाग उजाली
मिल जुल कर फिर बन में हम तुम
मिल जुल कर फिर बन में हम तुम
अपना राज चलायें
अपना राज चलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
कागज़ की एक नाव बना कर
जल में उसे चलायें
कागज़ की एक नाव बना कर
जल में उसे चलायें
दुनिया की तस्वीर बना कर
दुनिया की तस्वीर बना कर
दुनिया को दिखलायें
दुनिया को दिखलायें
नदी किनारे बैठ के आओ
फिर से जी बहलायें
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