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Thursday, 25 October 2012

दीवारों का जंगल-दीवार १९७५

यश चोपड़ा के जाने से हिंदी फिल्म सिनेमा का एक
चैप्टर बंद हो गया है. इस चैप्टर में सफलता के कई
अफ़साने लिखे हुए हैं. प्रगतिशील से परिवर्तनशील सभी
दौरों से गुज़रते हुए उन्होंने दर्शकों के समक्ष कई अनमोल
फ़िल्में पेश कीं.

उनको फिल्म सिनेमा का दर्शक प्रेम कहानियों और प्रेम
त्रिकोणों के लिए ज्यादा जानता है. एक विशिष्ट बात उनके
पूरे फ़िल्मी कैरियर में रही कि उनकी फिल्मों के संगीत का
स्तर बेहतर रहा और संगीत लोकप्रिय रहा. उनके खाते में
फ़िल्मी दुनिया का एक उपकार दर्ज है वो है- महानायक की
दूसरी पारी की सफल शुरुआत करवाना. फिल्म मोहब्बतें
आपको ज़रूर ही अभी तक याद होगी.

चलिए ज़रा लीक से हट कर उनकी निर्देशित एक फिल्म का
गीत सुनते हैं जो ज़रा फिलोसोफिक है. गीत साहिर का लिखा
हुआ है जिसे मन्ना डे ने स्वर दिया है और संगीत तैयार किया
है राहुल देव बर्मन ने.




गीत के बोल:

दीवारों का जंगल जिसका आबादी है नाम
बाहर से चुप चुप लगता है अंदर है कोहराम

दीवारों के इस जंगल में भटक रहे इंसान
अपने अपने उलझे दामन झटक रहे इंसान
अपनी विपदा छोड़ते आये
अपनी विपदा छोड़ते आये कौन किसी के गाम

बाहर से चुप चुप लगता है अंदर है कोहराम

सीने खाली ऑंखें सूनी चेहरों पर हैरानी
सीने खाली ऑंखें सूनी चेहरों पर हैरानी
जितने घने हंगामें इसमें उतनी घनी वीरानी
रातें कातिल सुबहें मुजरिम
रातें कातिल सुबहें मुजरिम, मुजरिम है हर शाम

बाहर से चुप चुप लगता है अंदर है कोहराम
 
-------------------------------------------------
Deewaron ka jangal-Deewar 1975



Monday, 30 January 2012

रात गई फिर दिन आता है-बूट पॉलिश १९५४

कथनी और करनी में अंतर मिट जाता है तभी व्यक्ति महात्मा बनता है।
आज बापू की पुण्यतिथि है और उनकी याद में एक गीत प्रस्तुत है फिल्म
बूट पॉलिश से। प्रेरणादायक गीत है ये और मानो ये सन्देश दे रहा हो कि
राजनीति के संक्रमण काल के बाद सुहानी भोर ज़रूर आएगी एक बार फिर।

आम आदमी का जीवन क्या जीवन है इस गीत के माध्यम से ही जान लीजिये।
बच्चों पर बनी ये मर्मस्पर्शी फिल्म मधुर गीतों का खज़ाना है। गीतकार शैलेन्द्र
हसरत और 'सरस्वती कुमार दीपक' ने एक एक गीत में प्राण फूँक दिए हों
मानो। फिल्म 'तीसरी कसम' के एक गीत में भी बुढ़ापे और जवानी की गाथा है
जो शैलेन्द्र का लिखा हुआ है । काल के पहिये पर नीरज साहब फिल्म 'चंदा
और बिजली' के गीत में कह चुके हैं। तीनों ही गीतों का संगीत तैयार किया है
शंकर जयकिशन ने। गीत में प्रमुख कलाकार हैं-बेबी नाज़ और डेविड।

प्रस्तुत गीत के लेखक हैं सरस्वती कुमार "दीपक" । गायक मन्ना डे की आवाज़
को तो आप पहचानते ही होंगे।



गीत के बोल:

रात गई
हो हो हो हो हो
रात गई फिर दिन आता है
इसी तरह आते जाते ही
ये सारा जीवन जाता है
हो ओ रात गई, रात गई

रात गई फिर दिन आता है
इसी तरह आते जाते ही
ये सारा जीवन जाता है
हो ओ रात गई, रात गई

कितना बड़ा सफ़र इस दुनिया का
एक रोता एक मुस्काता है
एक रोता एक मुस्काता है
हा आ आ आ आ आ आ आ
कदम कदम रखता राही
कितनी दूर चला जाता है
एक एक तिनके तिनके से
एक एक तिनके तिनके से
पंछी का घर बन जाता है

हो ओ रात गई, रात गई

कभी अँधेरा कभी उजाला
कभी अँधेरा कभी उजाला
फूल खिला फिर मुरझाता है
खेला बचपन हंसी जवानी
खेला बचपन हंसी जवानी
मगर बुढ़ापा तडपाता है
मगर बुढ़ापा तडपाता है
खेला बचपन हंसी जवानी
मगर बुढ़ापा तडपाता है

सुख दुःख का पहिया चलता है
वही नसीबा कहलाता है

हो ओ रात गई, रात गई

रात गई फिर दिन आता है
इसी तरह आते जाते ही
ये सारा जीवन जाता है
हो ओ रात गई, रात गई
........................................
Raat gayi fir din aata hai-Boot Polish

Wednesday, 17 August 2011

वर्दी है भगवान फौजी मेरा नाम-फौजी १९७५

देश को स्वतंत्र हुए ६५ साल हो गये हैं। वर्षों के संघर्ष के बाद हमें सन १९४७

में स्वतंत्रता प्राप्त हुयी। इस दौरान जितने भी वीरों और बहादुरों ने इसकी

प्राप्ति में अपना बलिदान और योगदान दिया उन सभी को नमन। स्वतंत्रता

दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं




प्रस्तुत गीत है फिल्म फौजी से जो सन १९७५ की फिल्म है। गीत में दिखाई

देने वाले कलाकारों में जोगिन्देव्र प्रमुख हैं। जोगिन्दर की बनाई अधिकतर फिल्मों

में सोनिक ओमी का संगीत है। गीत गाया है मन्ना डे और मोहम्मद रफ़ी ने

और उनके साथ एक महिला आवाज़ भी है जिसे मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ।







गीत के बोल:



गीत के बोल बाद में उपलब्ध कराये जायेंगे, फ़िलहाल

इसे सुन कर आनंद उठा लीजिए.

Friday, 15 July 2011

जाऊं मैं कहाँ ये ज़मीन -मिस इंडिया १९५७

आपको श्वेत श्याम युग से एक तेज धुन वाला युगल गीत
सुनवाते हैं. आकर्षक ध्वनि संयोजन से गीत शुरू होता है.
स्टेज पर नशेड़ी सा एक युवक लड़खड़ाते हुए गाना चालू करता
है. इतना नहीं लडखडाता है कि माइक ले के स्टेज के नीचे
टपक जाए. ये है फिल्म का नायक जिसने पार्टी में शायद
ज्यादा पी ली है. पी कितनी भी ली हो गाना सुर ताल में
गायेगा. ये हैं फिल्म के नायक प्रदीप कुमार. एक बात बस
समझ नहीं आई कि मन्ना डे वाले अंतरे एक से क्यूँ हैं इस
गीत में. कहीं ये पुराने ज़माने का 'कॉपी कट पेस्ट' एरर तो
नहीं ?

ये एक गीयर बदलने वाला गीत है. तेज संगीत के और हा हा
के बाद कुछ धीमा धीमा सा गीत सुनाई देता है. तेज वाले भाग
में नायिका शीला वाज़ हैं तो धीमे वाले भाग में नर्गिस.

अभिनेत्री नर्गिस के कैरियर की वे फ़िल्में अधिकांश दर्शकों
को याद हैं जिनमें इन्होने राज कपूर के साथ काम किया है.
सिवाए मदर इंडिया (१९५७) और रात और दिन(१९६४) के
इक्का दुक्का फ़िल्में और हैं जो प्रसिद्ध हुई हैं. सन १९५७ में
एक फिल्म आई थी-मिस इंडिया. इसमें उन्होंने एक आधुनिक
समय की नारी की भूमिका अदा की है. समय से आगे की
भूमिकाएं या फ़िल्में अक्सर नहीं चला करती हैं. इस फिल्म
का संगीत भी थोडा सा ही बजा वो भी सचिन देव बर्मन के
भक्तों के घर. गीत लता मंगेशकर और मन्ना डे का गाया हुआ
है. बोल लिखे हैं राजेंद्र कृष्ण ने.

एक बड़े शामियाने से अगर पहनने के कपडे निकाले जाएँ तो कुछ
कुछ वैसे ही बनेंगे जैसे की इस गीत में बालाएं पहने हुए हैं.



गीत के बोल:

हे हे हे हे हे हे, हे हे हे हे हे हे
हो, हा हा हा
हे हे हे हे हे, हो हो
हा हा, हो हो, हा हा हा हा हा

जाऊं मैं कहाँ,
हाय, जाऊं मैं कहाँ
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे,
चल दिया कारवां छोड़ के
जाऊं मैं कहाँ,
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे,
चल दिया कारवां छोड़ के

जाऊं मैं कहाँ

हो हो हो हो हो हो हो हो
हो हो हा हा हा हा हा

ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
बाँहों में आ के सो जा,
सो जा, सो जा

जाऊं मैं कहाँ,
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे,
चल दिया कारवां छोड़ के

जाऊं मैं कहाँ

रात गुज़रती जाए
आस नज़र न आये
रात गुज़रती जाए
आस नज़र न आये
रो न सकूं अब
रोते रोते आंसू भी शरमाये

हो हो हो, जाऊं मैं कहाँ
ये ज़मीन ये जहां छोड़ के
राह में मुझे
चल दिया कारवां छोड़ के

जाऊं मैं कहाँ

हो हो हो हो हा हा हा हा
हो हो हा हा हो हो हो

ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
ये भीगी भीगी रातें
ये घुमड़ घुमड़ बरसातें
ऐसे में दिल से कर ले
दो चार नज़र की बातें
बाँहों में आ के सो जा,
सो जा, सो जा

..............................
Jaoon main kahan-Miss India 1957

Tuesday, 12 July 2011

आयो कहाँ से घनश्याम-बुड्ढा मिल गया १९७१

मन्ना डे की लाजवाब, बेमिसाल गायकी का एक शानदार नमूना।
सुनते रहिये बस । इसको सुनकर मैं कभी नहीं थकता । फिल्म
बुड्ढा मिल गया में इसे फिल्माया गया है प्रसिद्द चरित्र अभिनेता
ओमप्रकाश पर. फिल्म बुड्ढा मिल गया में इसे फिल्माया गया है
प्रसिद्द चरित्र अभिनेता ओमप्रकाश पर. गीत के अंत में नायिका
अर्चना की आवाज़ है. पोस्ट का ड्राफ्ट २ साल से पढ़ा हुआ था आज
सोचा इसे पोस्ट कर ही दिया जाए.







गाने के बोल:

हाँ हाँ आं, आ आ आ , रे

आयो कहाँ से घनश्याम
आयो कहाँ से घनश्याम

रैना बितायी किस धाम
रैना बितायी किस धाम
हाय राम

आयो कहाँ से घनश्याम
आयो कहाँ से घनश्याम

रात की जागी रे,
रात की जागी रे
अँखियाँ हैं तोरी
रात की जागी रे
अँखियाँ हैं तोरी
हो रही गली गली
जिया की चोरी
हो रही गली गली
जिया की चोरी
हो नहीं जाना बदनाम
हाय राम

आयो कहाँ से घनश्याम
हाय राम
आयो कहाँ से घनश्याम
आयो कहाँ से घनश्याम

सज धज तुमरी का कहूं रसिया
ध नि ध ध , ध नि ध ध, म ध प्,
म प् म, रे म गा, म ग सा नि सा नि सा
नि सा ग म ग,सा गा म प् नि गा म,
प् नि सा गा म सा नि नि प् म गा सा म प्

सज धज ठुमरी का कहूं रसिया
ऐसे लगे तेरे हाथों में बंसिया
ऐसे लगे तेरे हाथों में बंसिया
जैसे कटारी लियो थाम
जैसे कटारी लियो थाम
हाय राम

आयो कहाँ से घनश्याम
आयो कहाँ से घनश्याम
आयो कहाँ से घनश्याम
आयो कहाँ से घनश्याम


मैं न कहूं कछु
मोसे न रूठो
मैं न कहूं कछु
मोसे न रूठो
तुम ख़ुद अपने जियरा से पूछो
तुम ख़ुद अपने जियरा से पूछो
बीती कहाँ पे कल शाम

आयो कहाँ से घनश्याम
आयो कहाँ से घनश्याम
श्याम,
आयो कहाँ से घनश्याम
श्याम रे
आयो कहाँ से घनश्याम
...........................
Aayo kahan se ghanshyam-Buddha mil gaya 1971

Friday, 3 June 2011

मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा-पगला कहीं का १९७०

'वेदांत के सिद्धांत' और 'आबरा का डबरा' एक दूसरे के पर्याय हैं। वेदांत एक
मित्र मण्डली का सदस्य है। अकाउंटिंग के पेशे में नहीं होता तो शायद वो
एक सफल राजनीतिक वक्ता या सम्पादकीय लिखने वाला पत्रकार बन
सकता था। किन किन चीज़ों के parallel draw करता था वो, हमारे दिमाग
के कल्पना-कोष से बाहर होते थे। इतनी सफाई और चतुराई के साथ ही
वो विषय परिवर्तन करता कि कब 'मूंग की दाल' से दिल्ली के 'जंतर मंतर'
के बारे में जानकारी शुरू हो जाती, पता ही नहीं चलता। उसकी इसी खूबी
के चलते उसको उसी के समकक्ष एक मित्र ने 'आबरा का डबरा, की पदवी
भी दे डाली। आज आपको अपने मित्र की पसंद का एक गीत सुनाता हूँ।

गीत लिखा है हसरत जयपुरी ने जिन्होंने शंकर जयकिशन के लिए कई
रोमांटिक गीत लिखे। आवाज़ मन्ना डे की है। गीत में आपको कई हास्य
कलाकार दिखाई देंगे नायक शम्मी कपूर और नायिका आशा पारेख के
अलावा।




गीत के बोल:

क्यूँ मारा, क्यूँ मारा
क्यूँ मारा, क्यूँ मारा
क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

वो लड्डू पड़े खाती है, हाँ
वो पेड़ों पे चढ़ जाती है, हाँ
वो लड्डू पड़े खाती है
वो पेड़ों पे चढ़ जाती है
ये मच्छर बीन बजाते हैं
वो अपना राग सुनती है
वो छुम्मक छुम्मक नाचे जब मैं दिल का बजाऊँ
मैं दिल का बजाऊँ एक तारा

मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

अरे घर का ये एक स्टेशन है, हाँ
ये झंडी प्यारी प्यारी है
अरे घर का ये एक स्टेशन है
ये झंडी प्यारी प्यारी है
हम सब तो रेल के डिब्बे हैं
वो अपनी इंजन गाडी है
वो गुस्सा जब भी करती है
तो बन जाती है
तो बन जाती है, अंगारा

मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

बंधू रे बंधू रे
वो जान से बढ़ कर प्यारी है
बंधू रे, बंधू रे
क्या बोलूं मैं,
क्या बोलूं मैं एक कटारी है
बंधू रे, बंधू रे
वो जान से बढ़ कर प्यारी है, हाँ
क्या बोलूं मैं एक कटारी है, हाँ
वो जान से बढ़ कर प्यारी है
क्या बोलूं मैं एक कटारी है
कजरारी उसकी अँखियाँ हैं
इस बात से अपनी यारी है
मैंने तो अपनी कल्लो का है नाम रखा
है नाम रखा, जहान आरा

मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा

मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
.................................
Meri bhains ko danda kyun maara-Pagla kahin ka 1970

Wednesday, 25 May 2011

काल का पहिया घूमे भैया-चंदा और बिजली १९६९

हिंदी और उर्दू की एक प्रसिद्ध कहावत है-नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली।
कहावतें उदाहरण देने के लिए सटीक माध्यम हुआ करती हैं। समय या युग की
सीमाओं से परे, कहावतें हमेशा जवान रहती हैं। कुछ गीतों को भी ऐसा ही दर्ज़ा
प्राप्त है।

अक्सर देखा गया है कि आदमी बेईमानी और धूर्तता से जीवन यापन करने के
बाद एकदम से धार्मिक हो जाता है और कुछ ऐसा कार्य करने लग जाता है जो
उसके भूतकाल के क्रियाकलापों के एकदम विपरीत हो। इसमें दोनों श्रेणी के लोग
होते हैं-जो किसी दैवीय प्रेरणा की वजह से सुधार की ओर अग्रसर हो रहे होते हैं
और दूसरे वे लोग जो ढोंग और दिखावा करने के लिए ऐसे कार्य करते हैं ताकि
उनके नाम के साथ हो रही थू थू, वाह वाह में तब्दील हो जाये। वाह वाह तो नहीं
होती, अलबत्ता जनता दबी जुबान वही कहावत दोहराती सुनाई देती है-नौ सौ चूहे
खा के बिल्ली हज को चली।

काल चक्र घूमता रहता है और ऐसे कई ढोंगियों को उसने धूल चटाई है। हालाँकि
प्रस्तुत गीत का कहावत से कोई ज्यादा लेना देना नहीं है मगर ज्यादा मात्र में चूहे
खाने वाली बिल्लियों को ये गीत एक बार अवश्य सुनना चाहिए। सन १९६९ की
फिल्म चंदा और बिजली का जितना भी जिक्र होता है वो अधिकतर इस गीत की
ही वजह से है। गीत में अप्प दो कलाकारों को शायद पहचान पायें-एक तो बाल
कलाकार-सचिन और दूसरे उल्हास, जो बुज़ुर्ग दिखाई दे रहे हैं। गीत परदे पर
किसने गाया है, मुझे मालूम नहीं, मगर पार्श्व में इसको गा रहे हैं मन्ना डे।
कविवर गोपालदास नीरज की रचना को स्वरों से सजाया है शंकर जयकिशन
ने।



गीत के बोल:

काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि

काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात कभी तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि

जनक की बेटी अवध की रानी
सीता भटके बन बन में
जनक की बेटी अवध की रानी
सीता भटके बन बन में
राह अकेली
राह अकेली, रात अँधेरी
मगर जतन हैं दामन में
साथ ना जिसके चलता कोई
साथ ना जिसके चलता कोई
उसके साथ भगवन चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि

हाय री किस्मत कुंवर कन्हैया
स्वाद ना जाने माखन का
हाय री किस्मत कुंवर कन्हैया
स्वाद ना जाने माखन का
हंसी चुराए
हंसी चुराए फूलों की
वो कंस है माली उपवन का
भूल ना पापी, मगर पाप की
भूल ना पापी, मगर पाप की
ज्यादा नहीं दुकान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि

काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात कभी तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
............................................
Kaal ka pahiya ghoome bhaiya-Chanda aur bijli 1969

Wednesday, 19 January 2011

उस्तादी उस्ताद से-उस्तादी से १९८२

फ़िल्मी क़व्वाली एक और ले आये हैं आपकी खिदमत में। ये
फिल्माई गई है रंजीता और विनोद मेहरा पर। थोड़ी कॉमेडी
वाली इस क़व्वाली में हैदराबाद से गाज़ियाबाद की सैर करवा दी
गई है। गीत में आपको मिथुन और गुज़रे ज़माने के हिट हीरो
भगवान भी दिखाई देंगे। गनीमत है जो खातून इसमें गा रही हैं
उन्होंने अपने तुगलकाबाद से होने का दावा पेश नहीं किया।





गीत के बोल :

इश्क का जो दावा जो करते थे
सारी महफ़िल से कहते थे
हाँ, इश्क का जो दावा जो करते थे
सारी महफ़िल से कहते थे
हुस्न का तोड़ेंगे गुरूर वो
जाने फिर मेरे हुज़ूर वो
क्यूँ नहीं आये यहाँ
हो चली है शब् जवान

नहीं अच्छी मोहतरमां
इस कदर भी बेसब्री
हम वो उस्ताद हैं वो
जो कभी हारे ना बाज़ी, हाँ
मर्द का यूँ उलझना
वो भी औरत से तौबा
एक उस्ताद की ये
नहीं है शान क़िबला

कौन असली है डर है
कौन असली है कौन नकली है
कौन असली है डर है
राज़ कैसे खुलेगा
अरे हट
असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
नहीं चलेगी
नहीं चलेगी, हाँ
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
उस्तादी उस्ताद से
चुप
बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के
बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
उस्तादी उस्ताद से

असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
हाँ, बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के

हमसे उलझा है जो वो हारा है
छोड़ दो जिद ये माल हमारा है
जान दे देंगे जिद ना छोड़ेंगे
ओ माल हाथों से जाने ना देंगे

तू चीज़ की ऐ
निब्बू बांध निचोड़ा तैनू
क्या चीज़ छिब्बा ते
लगती वांग दिलो वान तैनू
सुनो गज़ियाबादी
खुद को ना समझो बागी
अरे जा हैदराबादी
उड़ा जायेंगे बाज़ी
आ अगर ऐसा दावा है
तो फिर हम भी हैं राज़ी

बच के
टूटे ना शीशा टकरा के फौलाद से
टूटे ना शीशा टकरा के फौलाद से

अजी नहीं चलेगी नहीं चलेगी
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
उस्तादी उस्ताद से

असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के
....................................
Ustadi ustad se-Ustadi Ustad se 1982

Saturday, 1 January 2011

ये आवारा रातें-गैर फ़िल्मी गीत

"कहाँ आ गए हम कहाँ जा रहे थे"। ये प्रश्न अंतर्मन अक्सर करता है
मानव से। नए दौर में प्रवेश करते समय तो ये प्रासंगिक सा हो जाता है।

मन्ना डे की आवाज़ में आइये दोहराएँ उस सुनहरे दौर की सुनहरी यादें।
वी बलसारा की तैयार की हुई धुन है और इस गीत को शायद आपने एक
आध बार अवश्य सुना होगा। ये मन्ना डे का गाया बेहद लोकप्रिय गैर
फ़िल्मी गीत है।



गीत के बोल :

ये आवारा रातें
ये खोयी सी बातें
ये उलझा सा मौसम
ये मौसम की घातें

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

ये नागिन से बलखाये
बाँहों के साये
ये छिटके से तारे
जो पलकों पे छाये

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

ये आवारा रातें
ये खोयी सी बातें
ये उलझा सा मौसम
ये मौसम की घातें

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

ये सोयी सी गलियां
ये खुम्ह्लाई कलियाँ
ये आँखों के भँवरे
करे रंगरलियाँ

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

ये आवारा रातें
ये खोयी सी बातें
ये उलझा सा मौसम
ये मौसम की घातें

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

ये बिखरी हवाएं
क्यूँ टूटी सी आहें
बुलायें सभी को
नज़रों की बाहें

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

कहाँ आ गए हम
कहाँ जा रहे थे

नया नया चाँद है-खुदा का बंदा १९५७

नया साल, नई उमंगें, नई उमंगें, नई मंजिलें और नये रेज़ोल्यूशन ।
नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ ही ये गीत प्रस्तुत है पुरानी फिल्म
खुदा का बंदा से। संगीत एस एन त्रिपाठी का है और इसे गा रहे हैं
गीता दत्त और मन्ना डे।

नए साल में आपको प्याज़ और टमाटर खूब खाने को मिलें इसी दुआ
के साथ.......



गीत के बोल:

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नया नया प्यार है जी
नया नया साथ है

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नई नई रात है

कितने भी रंग चाहे बदले ज़माना
हो ओ ओ ओ ओ ओ
कितने भी रंग चाहे बदले ज़माना
दिल में जो आई हो तो
दिल पे ना जाना
दिल पे ना जाना
जी दिल पे ना जाना

मिल के बिछड़ जाना
बड़ी बुरी बात है
मिल के बिछड़ जाना
बड़ी बुरी बात है

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नया नया प्यार है जी
नया नया साथ है

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नई नई रात है

नज़रों में आज मेरी दुनिया हसीं है
हो ओ ओ ओ
नज़रों में आज मेरी दुनिया हसीं है
उल्फत की राह देखो
कितनी रंगीन है
कितनी रंगीन है
जी,कितनी रंगीन है

घर में हमारे आई
ख़ुशी की बारात है
घर में हमारे आई
ख़ुशी की बारात है

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नया नया प्यार है जी
नया नया साथ है

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नई नई रात है

तुम जो मिले तो
मिला ख़ुशी का खज़ाना
हो ओ ओ ओ ओ ओ
तुम जो मिले तो मिला
ख़ुशी का खज़ाना
तुम जो हो पास मेरे
समा है सुहाना
समा है सुहाना
जी समा है सुहाना

प्यार फले फूले यही
दुआ दिन रात है
प्यार फले फूले यही
दुआ दिन रात है

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नया नया प्यार है जी
नया नया साथ है

नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नया नया चाँद है जी
नई नई रात है
नई नई रात है

Saturday, 18 December 2010

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं-उपकार १९६७

बहुत दिन हो गए आपको प्रेरणा और प्रेरणादायक गीतों के
बारे में कुछ बताये हुए। कुछ गीत वे होते हैं जिनसे श्रोता
प्रेरणा लेते हैं। कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनसे संगीतकार
प्रेरणा लेते हैं। आज हम ऐसे गीत के बारे में बात करेंगे
जो संगीतकारों के संभावित आदान प्रदान से तैयार हुआ।

एक फिल्म आई थी सन १९६७ में- उपकार जिसका ये गीत-
कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या-बहुत ही
लोकप्रिय हुआ था। इस गीत को तमिल भाषा में संगीतकार
इलाया राजा ने भी तैयार किया-Kanavu Kaanum । दोनों
गीत आपके लिए प्रस्तुत हैं। तमिल भाषा मुझे नहीं आती मगर
इतना अंदाजा लगाया जा सकता है की गीत के बोल ज़रूर सत्य
वचन जैसे ही होंगे।

ऐसा समझा जाता है कि दोनों संगीतकार एक दूसरे से प्रेरित
हुए। जैसे भौतिकी में होता है-mutual induction वैसे ही इस
संगीत के असर को हम कह सकते हैं-mutual inspiration।

फिल्म उपकार का गीत परदे पर गा रहे हैं प्रसिद्ध खलनायक
और चरित्र अभिनेता-प्राण । नैराश्य के भावों को उन्होंने
बहुत ही उम्दा ढंग से प्रदर्शित किया है। गीत इन्दीवर की
कलम से निकला है। इस गीत के लिए सन १९६८ में गायक
मन्ना डे को सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया।

फिल्म उपकार का विडियो गीत:



तमिल फिल्म "ningal kedavai(Neengal Kettavai)-1984" का विडियो गीत:
Lyrics:Kaviyarasu Vairamuthu, Music:Ilaiyaraja, Singer-Yesudas



हिंदी गीत के बोल:

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या
कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या
कोई किसी का नहीं ये झूठे नाते हैं नातों का क्या

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या

होगा मसीहा आ आ आ
होगा मसीहा सामने तेरे
फिर भी न तू बच पायेगा
तेरा अपना, आ आ आ आ आ
तेर अपना खून ही आखिर
तुझको आग लगायेगा
आसमान में, ऐ ऐ
आसमान मे उड़ने वाले मिट्टी में मिल जायेगा

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या

सुख में तेरे, ऐ ऐ ऐ
सुख में तेरे साथ चलेंगे
दुख में सब मुख मोड़ेंगे
दुनिया वाले, ऐ ऐ ऐ ऐ
दुनिया वाले तेरे बनकर
तेरा ही दिल तोड़ेंगे
देते हैं, ऐ ऐ
देते हैं भगवान को धोखा, इनसान को क्या छोड़ेंगे

कसमे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या
..........................................
Kasme Vaade Pyar Wafa Sab Batein Hain-Upkar 1967

Friday, 17 December 2010

आ जा मिल के चलें वहां-घर घर की बात १९५९

एक दुर्लभ गीत सुनिए जो मुझे पसंद है। ये है फिल्म 'घर घर
की बात' से। युगल गीत जिसे लता और मन्ना डे ना गाया है
इसको फिल्माया गया है नायक सुरेश और महमूद की बहन
नायिका मीनू मुमताज़ पर। गुलशन बावरा ने इसके बोल लिखे
हैं और संगीत दिया है कल्याणजी आनंदजी ने। फिल्म पिटने की
स्तिथि में कई मधुर गीत डब्बे में बंद हो के रह जाते हैं-उसका एक
अच्छा उदाहरण है प्रस्तुत गीत। संगीत वास्तव में कल्याणजी वीरजी
शाह यानि बड़े भाई ने तैयार किया है। छोटा भाई सन १९६० के बाद
कल्याणजी के साथ जुड़ा और जोड़ी बनी-कल्याणजी आनंदजी।
गौरतलब है नायिका के घाघरे और नायक के बुश्शर्ट का प्रिंट
एक ही कपडे की मिल के लगते हैं। विडियो रंगीन होता तो शायद
निष्कर्ष पर पहुंचना आसान हो जाता।



गीत के बोल:

आ जा मिल के चलें वहां
फूल प्यार के खिले जहाँ

ले के हाथों में हाथ
चलें साथ साथ
मंजिल कि खोज में हम

संग लायी है प्रीत
गएँ प्यार के गीत
यही कह रहा है मौसम

ले के हाथों में हाथ
चलें साथ साथ
मंजिल कि खोज में हम

संग लायी है प्रीत
गएँ प्यार के गीत
यही कह रहा है मौसम

आ जा मिलके चलें वहां
फूल प्यार के खिले जहाँ

एक दर्द मीठा बन के
तू समा गया है दिल में
एक दर्द मीठा बन के
तू समा गया है दिल में

दिल कहता है छुप जाऊं मैं
तेरे हसीं आंचल में

रंगीन फिजा ये ठंडी हवा
आ झूम के लग जा गले

ले के हाथों में हाथ
चलें साथ साथ
मंजिल कि खोज में हम

संग लायी है प्रीत
गएँ प्यार के गीत
यही कह रहा है मौसम

आ जा मिलके चलें वहां
फूल प्यार के खिले जहाँ

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Aa jaa mil ke chalen wahan-Ghar ghar ki baat 1959
 
 
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