बिलकुल बॉलीवुड का मसालिया विडियो है ये, मगर थोड़ा अलग कह
सकते हैं क्यूंकि इसमें किशोर कुमार और मधुबाला हैं। किशोर कुमार
की उछल-कूद और मधुबाला की अदाओं से भरपूर,लता और किशोर के
गाये इस युगल गीत को सुननेवालों का मानना है कि ये रात में सुनने में
ज्यादा आनंद देता है। फिल्म का नाम है हाफ टिकट। शैलेन्द्र के लिखे
गीत की तर्ज़ बनाई है सलिल चौधरी ने। फिल्म हाफ टिकट के तकरीबन
सभी गीत सुनने में आनंद देते हैं. इसके अलावा फिल्म में लता और किशोर
का गाया एक युगल गीत और है जिसे हम आगे सुनेंगे।
गीत के बोल:
डी डी डी डी डेई
डो डो डो डो डोऊ ऊ
डी डी डी डी डेई
चाँद रात तुम हो साथ
क्या करें जी अब तो
दिल मचल मचल गया
चाँद रात तुम हो साथ
क्या करें जी अब तो
दिल मचल मचल गया
दिल का ऐतबार क्या
क्या करोगे जी कल
जो ये बदल बदल गया
जुल्मी नज़र कैसी निडर दिल चुरा लिया
जाने किस अजब से देश में बुला लिया
जुल्मी नज़र कैसी निडर दिल चुरा लिया
जाने किस अजब से देश में बुला लिया
ये भी कोई दिल है क्या
जहाँ मौका मिला फिसल फिसल गया
चाँद रात तुम हो साथ
क्या करें जी अब तो
दिल मचल मचल गया
दिल का ऐतबार क्या
क्या करोगे जी कल
जो ये बदल बदल गया
सुनिए ज़रा मैंने कहा मत सताइए
अपने आप अपनी राह लौट जाइये
सुनिए ज़रा मैंने कहा मत सताइए
अपने आप अपनी राह लौट जाइये
ये वो राहें नहीं
जिसपे चल के कोई
संभल संभल गया
चाँद रात तुम हो साथ
क्या करें जी अब तो
दिल मचल मचल गया
दिल का ऐतबार क्या
क्या करोगे जी कल
जो ये बदल बदल गया
बहके कदम अब तो सनम बांह थाम लो
अपनी नज़र अपनी निगाहों से काम लो
बहके कदम अब तो सनम बांह थाम लो
अपनी नज़र अपनी निगाहों से काम लो
आपका क्या गया
फूल सा मेरा दिल
कुचल कुचल गया
चाँद रात तुम हो साथ
क्या करें जी अब तो
दिल मचल मचल गया
दिल का ऐतबार क्या
क्या करोगे जी कल
जो ये बदल बदल गया
-------------------------------
Chand raat tum ho saath-Half Ticket 1962
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Monday, 12 September 2011
Tuesday, 19 July 2011
ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी-झुमरू १९६१
कुछ सदाबहार धुनें दूसरे देशों की भीं सदाबहार धुनें हुआ करती हैं.
सन १९५५ के जूलियस ला रोसा के "डोमानी" को ही लीजिए. ये
आनंदित करने वाली धुन है. बोल आपके समझ आयें तो मुझे
भी मदद ज़रूर कीजियेगा समझने में.
सन १९६१ में इसका देसी संस्करण अवतरित हुआ फिल्म झुमरू में.
इस गीत को किशोर के सबसे ज्यादा पसंद किये जाने वाले गीतों
में स्थान प्राप्त है. गीत का देसीकरण होने पर उसमें आशा भोसले
की आवाज़ में शुरुआती गुनगुनाहट और किशोर की योडलिंग मिलायी
गयी-लीजिए तैयार एक कर्णप्रिय हिंदी गीत. फिल्म के गीत मजरूह
सुल्तानपुरी ने लिखे हैं और संगीत स्वयं किशोर कुमार का है.
इसको कहते हैं अच्छे संगीत का ग्लोबलायिजेशन. ये होना ज़रूर चाहिए
मगर मर्यादाओं के भीतर. क्रेडिट देने के मामले में हम हमेशा पीछे ही
रहते हैं. यू ट्यूब पर गीत के नीचे छपे कमेन्ट ज़रूर पढ़ें, आनंद आएगा.
गीत के बोल:
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
लम्बी सी एक डगर है ज़िंदगानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
आ हा हा आ, हा आ आ हा हा
सारे हसीं नज़ारे, सपनों में खो गये
सर रख के आसमाँ पे, पर्वत भी सो गये
मेरे दिल, तू सुना, कोई ऐसी दास्तां
जिसको सुनकर, मिले चैन मुझे मेरी जाँ
मंज़िल है अन्जानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
ऐसे मैं चल रहा हूँ पेड़ों की छाँव में
जैसे कोई सितारा बादल के गाँव में
मेरे दिल तू सुना, कोई ऐसी दास्तां
जिसको सुनकर, मिले चैन मुझे मेरी जाँ
मंज़िल है अन्जानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
थोड़ी सी रात बीती, थोड़ी सी राह गई
खामोश रुत ना जाने, क्या बात कह गई
मेरे दिल तू सुना, कोई ऐसी दास्तां
जिसको सुनकर, मिले चैन मुझे मेरी जाँ
मंज़िल है अन्जानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
लम्बी सी एक डगर है ज़िंदगानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
....................................
Thandi hawa ye chandni suhani-Jhumroo 1961
सन १९५५ के जूलियस ला रोसा के "डोमानी" को ही लीजिए. ये
आनंदित करने वाली धुन है. बोल आपके समझ आयें तो मुझे
भी मदद ज़रूर कीजियेगा समझने में.
सन १९६१ में इसका देसी संस्करण अवतरित हुआ फिल्म झुमरू में.
इस गीत को किशोर के सबसे ज्यादा पसंद किये जाने वाले गीतों
में स्थान प्राप्त है. गीत का देसीकरण होने पर उसमें आशा भोसले
की आवाज़ में शुरुआती गुनगुनाहट और किशोर की योडलिंग मिलायी
गयी-लीजिए तैयार एक कर्णप्रिय हिंदी गीत. फिल्म के गीत मजरूह
सुल्तानपुरी ने लिखे हैं और संगीत स्वयं किशोर कुमार का है.
इसको कहते हैं अच्छे संगीत का ग्लोबलायिजेशन. ये होना ज़रूर चाहिए
मगर मर्यादाओं के भीतर. क्रेडिट देने के मामले में हम हमेशा पीछे ही
रहते हैं. यू ट्यूब पर गीत के नीचे छपे कमेन्ट ज़रूर पढ़ें, आनंद आएगा.
गीत के बोल:
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
लम्बी सी एक डगर है ज़िंदगानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
आ हा हा आ, हा आ आ हा हा
सारे हसीं नज़ारे, सपनों में खो गये
सर रख के आसमाँ पे, पर्वत भी सो गये
मेरे दिल, तू सुना, कोई ऐसी दास्तां
जिसको सुनकर, मिले चैन मुझे मेरी जाँ
मंज़िल है अन्जानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
ऐसे मैं चल रहा हूँ पेड़ों की छाँव में
जैसे कोई सितारा बादल के गाँव में
मेरे दिल तू सुना, कोई ऐसी दास्तां
जिसको सुनकर, मिले चैन मुझे मेरी जाँ
मंज़िल है अन्जानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
थोड़ी सी रात बीती, थोड़ी सी राह गई
खामोश रुत ना जाने, क्या बात कह गई
मेरे दिल तू सुना, कोई ऐसी दास्तां
जिसको सुनकर, मिले चैन मुझे मेरी जाँ
मंज़िल है अन्जानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
ठण्डी हवा ये चाँदनी सुहानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
लम्बी सी एक डगर है ज़िंदगानी
ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी
....................................
Thandi hawa ye chandni suhani-Jhumroo 1961
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Monday, 20 June 2011
तुम रूठ के मत जाना- फागुन १९५८
मधुबाला के नाम से ये गीत मुझे बार बार याद आ जाता है-
मैं सोया अँखियाँ मीचे। इस गीत को सुनते सुनते मुझे भी
नींद आ जाती है। गीत के विडियो ऑडियो दोनों में नशा
सा है। गीत इतनी सौम्यता से गाया और फिल्माया गया है
कि इसकी सादगी से भी नशा सा होने लगता है। एक बार इसे
अवश्य सुनें और देखें।
आज आपको एक और गीत सुनवाते हैं फिल्म फागुन से।
ये भी युगल गीत है आशा और रफ़ी की आवाजों में। कमर
जलालाबादी के सरल बोलों पर धुन तैयार की है संगीतकार
ओ पी नय्यर ने। फागुन फिल्म सन १९५८ की एक बड़ी हिट
फिल्म थी। सफलता में फिल्म के संगीत का भी बहुत बड़ा
योगदान था।
एक कविता पाठ की तरह सा ये गीत विरह गीत के रूप में प्रस्तुत
किया गया है फिल्म में। जैसे फिल्म फागुन के गीत एक दूसरे के
निकट के सम्बन्धी से सुनाई देते हैं वैसे ही इस गीत में रोती हुई
नायिका सुचित्रा सेन की दूर की रिश्तेदार सी दिखाई देती है।
गीत के बोल:
तुम रूठ के मत जाना
तुम रूठ के मत जाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
क्यों हो गया बेगाना
क्यों हो गया बेगाना
तेरा-मेरा क्या रिश्ता ये तूने नहीं जाना
तेरा-मेरा क्या रिश्ता ये तूने नहीं जाना
मैं लाख हूँ बेगाना
मैं लाख हूँ बेगाना
फिर ये तड़प कैसी इतना तो बता जाना
फिर ये तड़प कैसी इतना तो बता जाना
फ़ुरसत हो तो आ जाना
फ़ुरसत हो तो आ जाना
अपने ही हाथों से मेरी दुनिया मिटा जाना
अपने ही हाथों से मेरी दुनिया मिटा जाना
तुम रूठ के मत जाना
तुम रूठ के मत जाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
.................................
Tum rooth ke mat jaana-Phagun 1958
मैं सोया अँखियाँ मीचे। इस गीत को सुनते सुनते मुझे भी
नींद आ जाती है। गीत के विडियो ऑडियो दोनों में नशा
सा है। गीत इतनी सौम्यता से गाया और फिल्माया गया है
कि इसकी सादगी से भी नशा सा होने लगता है। एक बार इसे
अवश्य सुनें और देखें।
आज आपको एक और गीत सुनवाते हैं फिल्म फागुन से।
ये भी युगल गीत है आशा और रफ़ी की आवाजों में। कमर
जलालाबादी के सरल बोलों पर धुन तैयार की है संगीतकार
ओ पी नय्यर ने। फागुन फिल्म सन १९५८ की एक बड़ी हिट
फिल्म थी। सफलता में फिल्म के संगीत का भी बहुत बड़ा
योगदान था।
एक कविता पाठ की तरह सा ये गीत विरह गीत के रूप में प्रस्तुत
किया गया है फिल्म में। जैसे फिल्म फागुन के गीत एक दूसरे के
निकट के सम्बन्धी से सुनाई देते हैं वैसे ही इस गीत में रोती हुई
नायिका सुचित्रा सेन की दूर की रिश्तेदार सी दिखाई देती है।
गीत के बोल:
तुम रूठ के मत जाना
तुम रूठ के मत जाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
क्यों हो गया बेगाना
क्यों हो गया बेगाना
तेरा-मेरा क्या रिश्ता ये तूने नहीं जाना
तेरा-मेरा क्या रिश्ता ये तूने नहीं जाना
मैं लाख हूँ बेगाना
मैं लाख हूँ बेगाना
फिर ये तड़प कैसी इतना तो बता जाना
फिर ये तड़प कैसी इतना तो बता जाना
फ़ुरसत हो तो आ जाना
फ़ुरसत हो तो आ जाना
अपने ही हाथों से मेरी दुनिया मिटा जाना
अपने ही हाथों से मेरी दुनिया मिटा जाना
तुम रूठ के मत जाना
तुम रूठ के मत जाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
मुझसे क्या शिकवा दीवाना है दीवाना
.................................
Tum rooth ke mat jaana-Phagun 1958
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Madhubala,
Mohd. Rafi,
OP Nayyar,
Phagun,
Qamar Jalalabadi
ओ जी धीरे धीरे-परदेस १९५०
सन ५० के संगीत पर थोड़ी गुफ्तगूँ और हो जाये । सन ५० में आलातरीन
नगमे तैयार किये गये। उस समय बहुत से दिग्गज संगीतकार मौजूद थे
फिल्म संगीत के दृश्य पटल पर। एक थे गुलाम मोहम्मद साहब। इन्होनें
भी कई अविस्मर्णीय धुनें तैयार कीं। नौशाद की तरह इनके भी पसंदीदा
गीतकार थे शकील बदायूनीं । शकील साहब ज़रूर ही बदायूं से आये होंगे
उनके नाम के साथ जगह का नाम जो जुड़ा हुआ है। शकील बदायूनीं ने
भी तकरीबन सभी किस्म के अफसानों पर गीत, ग़ज़ल, शेर, शायरी लिख
डाली अपने पूरे फ़िल्मी करियर में। प्रस्तुत गीत थोड़ा हलके फुल्के मूड
वाला है।
गीत थोड़ा हास्य का सा पुट लिए चालू होता है। नायक मैन्डोलिन बजा
रहा है प्रत्युत्तर में नायिका सितार बजाती है और थोड़ा बजा कर उछलना
कूदना शुरू कर देती है जैसे सितार बिजली से चलने वाला हो और
उसे २२० वोल्ट का झटका लग गया हो।
गीत की उल्लेखनीय पंक्ति है-सबके ज़माने बीते, मेरा ज़माना आया। ये पंक्ति
क्या आपको ऐसा नहीं लगता गीतकार ने मधुबाला के लिए ही लिखी हो। सन
५० के बाद मधुबाला की कई यादगार फ़िल्में आयीं।
गीत के बोल:
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले आ
हो ओ ओ, ओ ओ ओ ओ ओ ओ
गीत अनोखे लेकर आई जवानी मोरी
आई जवानी मोरी
सुन ले ना कोई ऐ दिल गाये जा चोरी चोरी
गाये जा चोरी चोरी
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
जब बान में कोयल बोले, सुन मेरा डोले जिया
तो सुन मेरा डोले जिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले आ
हो ओ ओ, ओ ओ ओ ओ ओ ओ
रात रंगीली आई, दिन भी सुहाना आया
दिन भी सुहाना आया
सबके ज़माने बीते, मेरा ज़माना आया
मेरा ज़माना आया
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ
जब नैनों से दिल हारा, जग मैंने जीत लिया
ओ जग मैंने जीत लिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले आ
..............................
O ji dheere dheere o ji haule haule-Pardes 1950
नगमे तैयार किये गये। उस समय बहुत से दिग्गज संगीतकार मौजूद थे
फिल्म संगीत के दृश्य पटल पर। एक थे गुलाम मोहम्मद साहब। इन्होनें
भी कई अविस्मर्णीय धुनें तैयार कीं। नौशाद की तरह इनके भी पसंदीदा
गीतकार थे शकील बदायूनीं । शकील साहब ज़रूर ही बदायूं से आये होंगे
उनके नाम के साथ जगह का नाम जो जुड़ा हुआ है। शकील बदायूनीं ने
भी तकरीबन सभी किस्म के अफसानों पर गीत, ग़ज़ल, शेर, शायरी लिख
डाली अपने पूरे फ़िल्मी करियर में। प्रस्तुत गीत थोड़ा हलके फुल्के मूड
वाला है।
गीत थोड़ा हास्य का सा पुट लिए चालू होता है। नायक मैन्डोलिन बजा
रहा है प्रत्युत्तर में नायिका सितार बजाती है और थोड़ा बजा कर उछलना
कूदना शुरू कर देती है जैसे सितार बिजली से चलने वाला हो और
उसे २२० वोल्ट का झटका लग गया हो।
गीत की उल्लेखनीय पंक्ति है-सबके ज़माने बीते, मेरा ज़माना आया। ये पंक्ति
क्या आपको ऐसा नहीं लगता गीतकार ने मधुबाला के लिए ही लिखी हो। सन
५० के बाद मधुबाला की कई यादगार फ़िल्में आयीं।
गीत के बोल:
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले आ
हो ओ ओ, ओ ओ ओ ओ ओ ओ
गीत अनोखे लेकर आई जवानी मोरी
आई जवानी मोरी
सुन ले ना कोई ऐ दिल गाये जा चोरी चोरी
गाये जा चोरी चोरी
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
जब बान में कोयल बोले, सुन मेरा डोले जिया
तो सुन मेरा डोले जिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले आ
हो ओ ओ, ओ ओ ओ ओ ओ ओ
रात रंगीली आई, दिन भी सुहाना आया
दिन भी सुहाना आया
सबके ज़माने बीते, मेरा ज़माना आया
मेरा ज़माना आया
हो ओ ओ ओ ओ ओ ओ
जब नैनों से दिल हारा, जग मैंने जीत लिया
ओ जग मैंने जीत लिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले
अंगना में आ जा पिया
ओ जी धीरे धीरे ओ जी हौले हौले आ
..............................
O ji dheere dheere o ji haule haule-Pardes 1950
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Lata Mangeshkar,
Madhubala,
Pardes,
Rehman,
Shakeel Badayuni
Monday, 30 May 2011
मन में किसी की प्रीत बसा ले-आराम १९५१
आज आराम से कुछ पुराने गाने सुनने का मन हुआ तो
फिल्म 'आराम' के भी कुछ गीत सुन लिए। ये कुछ संयोग
जैसा है कि जिस दिन फुर्सत से गीत सुनने का मन होता है
उस दिन ३० के, ४० के और ५० के दशक के गीत याद आते
हैं जैसे उनसे कोई पुरानी रिश्तेदारी हो। फिल्म का संगीत
लाजवाब है। गौर फरमाएं अनिल बिश्वास ने फिल्म 'लाजवाब'
में भी लाजवाब संगीत दिया है। हाँ ये बात सही है कि आराम
उन फिल्मों में से है जिन्हें श्रोताओं और दर्शकों ने भी जवाब में
लाजवाब कहा। प्रस्तुत गीत में प्यानो का बहुत सुन्दर प्रयोग
हुआ है। फिल्म के तीन गीत आप पूर्व में सुन चुके हैं, लगे हाथ
चौथा भी सुन लीजिये। नायक प्रेमनाथ बहुत ही expressive
किस्म के अदाकार थे। इधर उनको प्यानो बजाते देख मुझे
सुनील दत्त याद आ गये। शायद सुनील दत्त प्रेमनाथ के ख़ास
हाव भावों से प्रभावित थे। संगीत निर्देशक के साथ ही साथ
फिल्म के निर्देशक की भी दाद देना पड़ेगी। मधुबाला को इतने
expression बदलते मैंने बहुत ही कम गीतों में देखा है।
आपने कभी ध्यान दिया है कि युवा लड़कियां बात करते करते
गर्दन को ज्यादा घुमाती हैं, या एक ओर टेढ़ा कर लेती हैं, उम्र
गुजरने के साथ साथ गर्दन घुमाना कम होता और बेलन घुमाना बढ़ने
लगता है। मुझे याद है दूसरी कक्षा में एक बाला दो का पहाडा
सुनाते सुनाते खुद १८० के कोण तक घूमती थी और गर्दन को
२७० के कोण में इधर उधार घुमा डालती थी। उसको देख कर ही
हमें अहसास होता था कि पहाडा याद करना कितना कसरती काम है।
तो सुनिए जनाब १० में से १० नंबर वाला गीत। राजेंद्र कृष्ण की
रचनाएँ अपने मदन मोहन के संगीत निर्देशन में अवश्य सुनी होंगी
और सराही भी होंगी, मैंने भी सराही हैं। मदन मोहन को शिकायत रही
कि उनकी रचनाओं को वो प्रतिसाद नहीं मिला जिसके वे हक़दार
थे। इसका जवाब ये गीत है। गाने में सितार के टुकड़े हो या ना हों
वो आम जनता के कानों को स्वीकार्य होना चाहिए। सितार के ऊंचे
सप्तक वाले सुर कानों को ज़रा झनझना देते हैं और ये बाजीगरी शुद्ध
शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों के लिए ठीक है।
सरलता एक बहुत बड़ा अस्त्र है जिसके बलबूते पर बड़े बड़े किले फतह
किये जाते हैं। ये मूल मंत्र संगीतकार अनिल बिश्वास के शिष्य सी. रामचंद्र
ने भी माना और सी. रामचंद्र से ओर्केस्ट्रा के गुर सीखने वाले संगीतकार
सचिन देव बर्मन ने भी माना। शंकर जयकिशन ने सरलता और शोरगुल
वाली शैली दोनों के बीच एक संतुलन बनाये रखा। यहाँ शोरगुल से मतलब
वाद्य यंत्रों की अधिकता से है, गलत अर्थ ना निकाल बैठें। प्रस्तुत गीत
सौम्यता की एक शानदार मिसाल है। इतने अहिस्ता से गीत गाया जा रहा
है कि कान से लगा के मन तक हलकी सी गुदगुदी का अहसास होता है।
गीत के बोल:
मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
किसी को मन का मीत बना ले
मीत बना ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
प्रीत बना ले ये जीवन को एक सुहाना सपना
एक सुहाना सपना
जीवन में ये ज्योत जगा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
जलनेवाला हँसते हँसते फिर भी जलता जाए
फिर भी जलता जाए
प्रीत के हैं अन्दाज़ निराले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
..................................
Man mein kisi ki preet-Aaram 1951
फिल्म 'आराम' के भी कुछ गीत सुन लिए। ये कुछ संयोग
जैसा है कि जिस दिन फुर्सत से गीत सुनने का मन होता है
उस दिन ३० के, ४० के और ५० के दशक के गीत याद आते
हैं जैसे उनसे कोई पुरानी रिश्तेदारी हो। फिल्म का संगीत
लाजवाब है। गौर फरमाएं अनिल बिश्वास ने फिल्म 'लाजवाब'
में भी लाजवाब संगीत दिया है। हाँ ये बात सही है कि आराम
उन फिल्मों में से है जिन्हें श्रोताओं और दर्शकों ने भी जवाब में
लाजवाब कहा। प्रस्तुत गीत में प्यानो का बहुत सुन्दर प्रयोग
हुआ है। फिल्म के तीन गीत आप पूर्व में सुन चुके हैं, लगे हाथ
चौथा भी सुन लीजिये। नायक प्रेमनाथ बहुत ही expressive
किस्म के अदाकार थे। इधर उनको प्यानो बजाते देख मुझे
सुनील दत्त याद आ गये। शायद सुनील दत्त प्रेमनाथ के ख़ास
हाव भावों से प्रभावित थे। संगीत निर्देशक के साथ ही साथ
फिल्म के निर्देशक की भी दाद देना पड़ेगी। मधुबाला को इतने
expression बदलते मैंने बहुत ही कम गीतों में देखा है।
आपने कभी ध्यान दिया है कि युवा लड़कियां बात करते करते
गर्दन को ज्यादा घुमाती हैं, या एक ओर टेढ़ा कर लेती हैं, उम्र
गुजरने के साथ साथ गर्दन घुमाना कम होता और बेलन घुमाना बढ़ने
लगता है। मुझे याद है दूसरी कक्षा में एक बाला दो का पहाडा
सुनाते सुनाते खुद १८० के कोण तक घूमती थी और गर्दन को
२७० के कोण में इधर उधार घुमा डालती थी। उसको देख कर ही
हमें अहसास होता था कि पहाडा याद करना कितना कसरती काम है।
तो सुनिए जनाब १० में से १० नंबर वाला गीत। राजेंद्र कृष्ण की
रचनाएँ अपने मदन मोहन के संगीत निर्देशन में अवश्य सुनी होंगी
और सराही भी होंगी, मैंने भी सराही हैं। मदन मोहन को शिकायत रही
कि उनकी रचनाओं को वो प्रतिसाद नहीं मिला जिसके वे हक़दार
थे। इसका जवाब ये गीत है। गाने में सितार के टुकड़े हो या ना हों
वो आम जनता के कानों को स्वीकार्य होना चाहिए। सितार के ऊंचे
सप्तक वाले सुर कानों को ज़रा झनझना देते हैं और ये बाजीगरी शुद्ध
शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों के लिए ठीक है।
सरलता एक बहुत बड़ा अस्त्र है जिसके बलबूते पर बड़े बड़े किले फतह
किये जाते हैं। ये मूल मंत्र संगीतकार अनिल बिश्वास के शिष्य सी. रामचंद्र
ने भी माना और सी. रामचंद्र से ओर्केस्ट्रा के गुर सीखने वाले संगीतकार
सचिन देव बर्मन ने भी माना। शंकर जयकिशन ने सरलता और शोरगुल
वाली शैली दोनों के बीच एक संतुलन बनाये रखा। यहाँ शोरगुल से मतलब
वाद्य यंत्रों की अधिकता से है, गलत अर्थ ना निकाल बैठें। प्रस्तुत गीत
सौम्यता की एक शानदार मिसाल है। इतने अहिस्ता से गीत गाया जा रहा
है कि कान से लगा के मन तक हलकी सी गुदगुदी का अहसास होता है।
गीत के बोल:
मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
किसी को मन का मीत बना ले
मीत बना ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
इस दुनियाँ में किसी का हो जा
किसी को कर ले अपना
प्रीत बना ले ये जीवन को एक सुहाना सपना
एक सुहाना सपना
जीवन में ये ज्योत जगा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
प्रीत सताए प्रीत रुलाए
जिया में आग लगाए
जलनेवाला हँसते हँसते फिर भी जलता जाए
फिर भी जलता जाए
प्रीत के हैं अन्दाज़ निराले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
ओ मतवाले, ओ मतवाले
मन में किसी की प्रीत बसा ले
..................................
Man mein kisi ki preet-Aaram 1951
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Aaram,
Anil Biswas,
Durga Khote,
Lata Mangeshkar,
Madhubala,
Premnath,
Rajinder Krishan
Saturday, 21 May 2011
नैन मिले नैन हुए बाँवरे-तराना १९५१
आपको पुरानी तराना फिल्म का एक भी गीत नहीं सुनाया है अभी तक।
आज आपको इस हिट मुज़िकल फिल्म से एक गीत सुनवाते हैं जो
सुबह सुबह के किसी रेडियो प्रोग्राम में आपने ज़रूर सुना होगा।
कुछ haunting(भूतिया नहीं) melodies अक्सर बिना किसी वजह से
याद आ जाती हैं और आप उनको गुनगुनाने लग जाते हैं। ये भी एक ऐसा
ही युगल गीत है। इस गीत में बहुत स्कोप है आहें भरने का विशेषकर प्रेमी
युगल के लिए। प्रेम धवन के सरल से मगर प्रभावी बोलों को एक
आकर्षक धुन पर तैराया है संगीतकार अनिल बिस्वास ने। अनिल बिश्वास
जैसे कुशल चितेरे फिल्म संगीत जगत में कम ही हुए हैं। हिंदी गीत जो आज हम
आज सुनते हैं उसके स्वरुप को व्यवस्थित करने का श्री अनिल बिस्वास को
ही जाता है। गीत में सौम्यता को शुरू से आखिर तक कायम रखने की कला
में अनिल बिश्वास सिद्धहस्त थे। गीत फिल्माया गया है दो नामी कलाकारों
पर-दिलीप कुमार और मधुबाला।
गीत के बोल:
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
चैन कहाँ मोहे सजन संवरे
नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
देखते ही देखते मैं खो गई
देखते ही देखते मैं खो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
नैन हुए बावरे
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
नैन हुए बावरे
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
नैन हुए बावरे
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
नैन हुए बावरे
नैन मिले नैन हुए बावरे
चैन कहाँ मोहे सजन साँवरे
नैन हुए बावरे
.....................................
Nain mile nain hue banwre-Tarana 1951
आज आपको इस हिट मुज़िकल फिल्म से एक गीत सुनवाते हैं जो
सुबह सुबह के किसी रेडियो प्रोग्राम में आपने ज़रूर सुना होगा।
कुछ haunting(भूतिया नहीं) melodies अक्सर बिना किसी वजह से
याद आ जाती हैं और आप उनको गुनगुनाने लग जाते हैं। ये भी एक ऐसा
ही युगल गीत है। इस गीत में बहुत स्कोप है आहें भरने का विशेषकर प्रेमी
युगल के लिए। प्रेम धवन के सरल से मगर प्रभावी बोलों को एक
आकर्षक धुन पर तैराया है संगीतकार अनिल बिस्वास ने। अनिल बिश्वास
जैसे कुशल चितेरे फिल्म संगीत जगत में कम ही हुए हैं। हिंदी गीत जो आज हम
आज सुनते हैं उसके स्वरुप को व्यवस्थित करने का श्री अनिल बिस्वास को
ही जाता है। गीत में सौम्यता को शुरू से आखिर तक कायम रखने की कला
में अनिल बिश्वास सिद्धहस्त थे। गीत फिल्माया गया है दो नामी कलाकारों
पर-दिलीप कुमार और मधुबाला।
गीत के बोल:
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
चैन कहाँ मोहे सजन संवरे
नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
नैन मिले नैन हुए बाँवरे
देखते ही देखते मैं खो गई
देखते ही देखते मैं खो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
जागते ही जागते मैं सो गई
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
अब कभी मैं जागना ना चाहूँ रे
नैन हुए बावरे
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
चलते चलते पाँव मेरे थम गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
तुम मिले तो दिल के सारे ग़म गये
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
मिल गयी ज़ुल्फ़ों की ठंड़ी छाँव रे
नैन हुए बावरे
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
धड़कने दिल की छुपाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
लाज का घूँघट उठाऊँ किस तरह
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
किस तरह साजन तेरी बन जाऊँ रे
नैन हुए बावरे
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
ऐ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
नैनों से नैना तेरे कुछ कह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
प्यार की लहरों में दो दिल बह गये
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
अब रुके ना प्रीत की ये नाव रे
नैन हुए बावरे
नैन मिले नैन हुए बावरे
चैन कहाँ मोहे सजन साँवरे
नैन हुए बावरे
.....................................
Nain mile nain hue banwre-Tarana 1951
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Tuesday, 11 January 2011
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे-गेटवे ऑफ़ इंडिया १९५७
आपने कफ़ सिरप ज़रूर एक ना एक बार पिया होगा आइये आज
पियें सौम्यता का सिरप। गीत है फिल्म 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' से।
इसे दो सौम्य कलाकारों पर फिल्माया गया है-भारत भूषण और
मधुबाला। इस गीत को उतने ही आहिस्ता से गाया भी गया है
जितनी आहिस्ता से ये दोनों कलाकार अपने संवाद बोलते हैं या
अदाएं दिखाते हैं । सितार की आवाज़ के साथ गायकों की आवाज़
का मेल 'सोने में सुहागा' जैसा है। अभी इसी उपमा से काम चलाइए,
दूसरी सूझ नहीं रही है।
गीत के बोल:
रफ़ी : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा :हम ज़माने से दूर जा बैठे
आशा : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम ज़माने से दूर जा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
रफ़ी : भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
हाय! क्या चीज़ थी गँवा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा : दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल वही दिल जो दिल में जा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
रफ़ी : एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
गैर का क्यों उसे बना बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा : गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
देख कर कुछ तो चोट खा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम जमाने से दूर जा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
...................................................
Do ghadi wo jo paas aa baithe-Gateway of India 1957
पियें सौम्यता का सिरप। गीत है फिल्म 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' से।
इसे दो सौम्य कलाकारों पर फिल्माया गया है-भारत भूषण और
मधुबाला। इस गीत को उतने ही आहिस्ता से गाया भी गया है
जितनी आहिस्ता से ये दोनों कलाकार अपने संवाद बोलते हैं या
अदाएं दिखाते हैं । सितार की आवाज़ के साथ गायकों की आवाज़
का मेल 'सोने में सुहागा' जैसा है। अभी इसी उपमा से काम चलाइए,
दूसरी सूझ नहीं रही है।
गीत के बोल:
रफ़ी : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा :हम ज़माने से दूर जा बैठे
आशा : दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम ज़माने से दूर जा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
रफ़ी : भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
भूल की उनका हमनशीं हो के
रोयेंगे दिल को उम्र भर खो के
हाय! क्या चीज़ थी गँवा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा : दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल को एक दिन ज़रुर जाना था
वही पहुँचा जहां ठिकाना था
दिल वही दिल जो दिल में जा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
रफ़ी : एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
एक दिल ही था ग़मगुसार अपना
मेहरबां खास राज़दार अपना
गैर का क्यों उसे बना बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
आशा : गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
गैर भी तो कोई हसीं होगा
दिल यूँ ही दे दिया नहीं होगा
देख कर कुछ तो चोट खा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
हम जमाने से दूर जा बैठे
दो घड़ी वो जो पास आ बैठे
...................................................
Do ghadi wo jo paas aa baithe-Gateway of India 1957
Friday, 17 December 2010
सपने में सजन से दो बातें-गेटवे ऑफ़ इंडिया १९५७
हिंदी फ़िल्में सभी नामों से बना करती हैं। प्याज़, आलू, मिर्च का
नाम शायद अभी तक फिल्मकारों के दिमाग में नहीं आया है।
वो शायद किसी पत्रकार के दिमाग में आये जो फिल्म बनाने की
तमन्ना रखता हो। गेट के नाम से दो फ़िल्में मेरे ध्यान में
आती हैं, 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' और 'चाइना गेट'। बाकी के गेट
अभी शायद बाकी हैं । इस फिल्म से एक गीत सुनिए जो कि
राजेंद्र कृष्ण का लिखा हुआ है और संगीत मदन मोहन ने तैयार
किया है। लता मंगेशकर के गाये इस गीत को सुने काफी दिन
हो गए थे सोचा आपको भी सुनवा दिया जाए । ब्लॉग की सूची
में भी देखा तो यह गीत मौजूद नहीं था। इस गीत का विडियो
यू ट्यूब पर उपलब्ध नहीं है, ऑडियो सुन कर काम चला लें।
गीत के बोल:
सपने में सजन से दो बातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक रात मिलन की आई थी
और उस के बद जुदाई थी
ग़म और ख़ुशी की दो रातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक सावन रुत लाई झूले
दूजी में सजन हम को भूले
देखी हैं यही दो बरसातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक रोज़ तुम्हें दिल दे बेठे
फिर रोग बिरहा का ले बेठे
ये प्यार की हैं दो सौग़ातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
...............................
Sapne mein sajan se do batein-Gateway of India 1957
नाम शायद अभी तक फिल्मकारों के दिमाग में नहीं आया है।
वो शायद किसी पत्रकार के दिमाग में आये जो फिल्म बनाने की
तमन्ना रखता हो। गेट के नाम से दो फ़िल्में मेरे ध्यान में
आती हैं, 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' और 'चाइना गेट'। बाकी के गेट
अभी शायद बाकी हैं । इस फिल्म से एक गीत सुनिए जो कि
राजेंद्र कृष्ण का लिखा हुआ है और संगीत मदन मोहन ने तैयार
किया है। लता मंगेशकर के गाये इस गीत को सुने काफी दिन
हो गए थे सोचा आपको भी सुनवा दिया जाए । ब्लॉग की सूची
में भी देखा तो यह गीत मौजूद नहीं था। इस गीत का विडियो
यू ट्यूब पर उपलब्ध नहीं है, ऑडियो सुन कर काम चला लें।
गीत के बोल:
सपने में सजन से दो बातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक रात मिलन की आई थी
और उस के बद जुदाई थी
ग़म और ख़ुशी की दो रातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक सावन रुत लाई झूले
दूजी में सजन हम को भूले
देखी हैं यही दो बरसातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक रोज़ तुम्हें दिल दे बेठे
फिर रोग बिरहा का ले बेठे
ये प्यार की हैं दो सौग़ातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
इक याद रही इक भूल गए
सपने में सजन से दो बातें
...............................
Sapne mein sajan se do batein-Gateway of India 1957
Sunday, 12 December 2010
साज़-ए-दिल छेड़ दे-पासपोर्ट १९६१
सुन्दर , खूबसूरत और ब्यूटिफुल इन तीन शब्दों में इस
गीत को बयां किया जा सकता है। वजह-साफ़ है, धुन
बढ़िया है, बोल बढ़िया है और नायिका भी बढ़िया है, नायक
भी स्मार्ट है। और क्या चाहिए विडियो गीत में हमको।
कल्याणजी आनंदजी की सबसे पहली कुछ फिल्मों में
से एक है-पासपोर्ट। यूँ कहें तो कल्याणजी आनंदजी की जोड़ी
बनने के बाद लता और रफ़ी का गाया दूसरा युगल गीत।
इसके पहले वे कल्याणजी वीर जी शाह के संगीत निर्देशन
में ६ युगल गीत गा चुके थे। गीत लिखा है फारूख कैसर ने
और इसे फिल्माया गया है मधुबाला और प्रदीप कुमार पर।
मुखड़े को थोडा अलग तरीके से गवाया गया है। हर पंक्ति
दो दो बार गाई जा रही है फिर भी अटपटी नहीं लगती।
गीत के बोल:
साज-ए-दिल छेड़ दे
साज-ए-दिल छेड़ दे
क्या हसीं रात है
क्या हसीं रात है
कुछ नहीं चाहिए
कुछ नहीं चाहिए
तू अगर साथ है
तू अगर साथ है
साज-ए-दिल छेड़ दे
मुझे चाँद क्यूँ ताकता है
मुझे चाँद क्यूँ ताकता है
मेरा कौन ये लगता है
मुझे शक यही होता है
मुझे शक यही होता है
मेरे चाँद से ये जलता है
हमें इसकी क्या परवाह है
हमें इसकी क्या परवाह है
साज-ए-दिल छेड़ दे
तेरे दर पे सर झुक जाए
तेरे दर पे सर झुक जाए
यही ज़िन्दगी रुक जाए
कली दिल की ये खिल जाए
कली दिल की ये खिल जाए
ख़ुशी प्यार की मिल जाए
कभी फिर गमी ना आये
कभी फिर गमी ना आये
साज-ए-दिल छेड़ दे
...................................
Saaz-e-dil chhed de-Passport 1961
गीत को बयां किया जा सकता है। वजह-साफ़ है, धुन
बढ़िया है, बोल बढ़िया है और नायिका भी बढ़िया है, नायक
भी स्मार्ट है। और क्या चाहिए विडियो गीत में हमको।
कल्याणजी आनंदजी की सबसे पहली कुछ फिल्मों में
से एक है-पासपोर्ट। यूँ कहें तो कल्याणजी आनंदजी की जोड़ी
बनने के बाद लता और रफ़ी का गाया दूसरा युगल गीत।
इसके पहले वे कल्याणजी वीर जी शाह के संगीत निर्देशन
में ६ युगल गीत गा चुके थे। गीत लिखा है फारूख कैसर ने
और इसे फिल्माया गया है मधुबाला और प्रदीप कुमार पर।
मुखड़े को थोडा अलग तरीके से गवाया गया है। हर पंक्ति
दो दो बार गाई जा रही है फिर भी अटपटी नहीं लगती।
गीत के बोल:
साज-ए-दिल छेड़ दे
साज-ए-दिल छेड़ दे
क्या हसीं रात है
क्या हसीं रात है
कुछ नहीं चाहिए
कुछ नहीं चाहिए
तू अगर साथ है
तू अगर साथ है
साज-ए-दिल छेड़ दे
मुझे चाँद क्यूँ ताकता है
मुझे चाँद क्यूँ ताकता है
मेरा कौन ये लगता है
मुझे शक यही होता है
मुझे शक यही होता है
मेरे चाँद से ये जलता है
हमें इसकी क्या परवाह है
हमें इसकी क्या परवाह है
साज-ए-दिल छेड़ दे
तेरे दर पे सर झुक जाए
तेरे दर पे सर झुक जाए
यही ज़िन्दगी रुक जाए
कली दिल की ये खिल जाए
कली दिल की ये खिल जाए
ख़ुशी प्यार की मिल जाए
कभी फिर गमी ना आये
कभी फिर गमी ना आये
साज-ए-दिल छेड़ दे
...................................
Saaz-e-dil chhed de-Passport 1961
Monday, 6 December 2010
छम छम घुँघरू बोले-फागुन १९५८
लौट के बुद्धू घर को आये इशटाईल में फिर लौट चलें
काले पीले ज़माने की ओर। सुनिए एक झकास गाना
फिल्म फागुन से। ये है आशा की आवाज़ में एकल गीत।
इसे फिल्माया गया है हिंदी सिनेमा की वीनस मधुबाला
पर। कमर जलालाबादी के बोल, ओ पी नय्यर का संगीत
और आशा की आवाज़ साथ में मधुबाला की मुस्कराहट।
भारत भूषण भी दिखते हैं गीत में, उनकी मुस्कराहट
से कोई फर्क नहीं पढता। वस्तुतः वे गीत में नहीं
प्रकट होते तो भी काम चल जाता।
ओ पी नय्यर ऐसे संगीतकार है एस डी बर्मन के अलावा
जिनकी फिल्मों के एक नहीं वरन पूरे गीत सुनती है जनता।
अंदाज़ा लगाइए दोन ने कितनी मेहनत की होगी ये जानने
में कि जनता को कैसे लुभाया जाए। इन दोनों के कुछ
ही एल्बम औसत दर्जे के होंगे जिनमें से जनता एक आध
गीत सुनती होगी। उदाहरण के लिए फागुन फिल्म के सभी
गीत चाव से सुने जाते हैं।
गीत के बोल:
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
जब से तू दिल में सामने लगा
ज़िन्दगी में नया मज़ा आने लगा
जब से तू दिल में सामने लगा
ज़िन्दगी में नया मज़ा आने लगा
बदली है चाल खिल गए गाल
आँखों में सवाल बिखरे हैं बाल
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
याद रहे पिया मेरा प्यार सच्चा जी
फिर कभी आपसे मिलेंगे अच्छा जी
याद रहे पिया मेरा प्यार सच्चा जी
फिर कभी आपसे मिलेंगे अच्छा जी
आपके ग़ुलाम देते हैं सलाम
देख लिया नाच लाओ जी इनाम
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
...............................
Chham chham ghunghroo bole-Phagun 1958
काले पीले ज़माने की ओर। सुनिए एक झकास गाना
फिल्म फागुन से। ये है आशा की आवाज़ में एकल गीत।
इसे फिल्माया गया है हिंदी सिनेमा की वीनस मधुबाला
पर। कमर जलालाबादी के बोल, ओ पी नय्यर का संगीत
और आशा की आवाज़ साथ में मधुबाला की मुस्कराहट।
भारत भूषण भी दिखते हैं गीत में, उनकी मुस्कराहट
से कोई फर्क नहीं पढता। वस्तुतः वे गीत में नहीं
प्रकट होते तो भी काम चल जाता।
ओ पी नय्यर ऐसे संगीतकार है एस डी बर्मन के अलावा
जिनकी फिल्मों के एक नहीं वरन पूरे गीत सुनती है जनता।
अंदाज़ा लगाइए दोन ने कितनी मेहनत की होगी ये जानने
में कि जनता को कैसे लुभाया जाए। इन दोनों के कुछ
ही एल्बम औसत दर्जे के होंगे जिनमें से जनता एक आध
गीत सुनती होगी। उदाहरण के लिए फागुन फिल्म के सभी
गीत चाव से सुने जाते हैं।
गीत के बोल:
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
जब से तू दिल में सामने लगा
ज़िन्दगी में नया मज़ा आने लगा
जब से तू दिल में सामने लगा
ज़िन्दगी में नया मज़ा आने लगा
बदली है चाल खिल गए गाल
आँखों में सवाल बिखरे हैं बाल
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
याद रहे पिया मेरा प्यार सच्चा जी
फिर कभी आपसे मिलेंगे अच्छा जी
याद रहे पिया मेरा प्यार सच्चा जी
फिर कभी आपसे मिलेंगे अच्छा जी
आपके ग़ुलाम देते हैं सलाम
देख लिया नाच लाओ जी इनाम
छम छम घुँघरू बोले
मेरी चाल नशीली डोले
मन गाने लगा समझाने लगा
तू आज किसी की हो ले
छम छम घुँघरू बोले
...............................
Chham chham ghunghroo bole-Phagun 1958
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Sunday, 5 December 2010
महफ़िल में जल उठी शमा- निराला १९५०
ये आपने ज़रूर महसूस किया होगा की शमा-परवाना
थीम पर बने गीत कुछ ज्यादा ही मशहूर होते हैं। ये
प्रतीक स्वरुप हैं उसके अलावा प्रेमी जोड़ों को भी यदा कदा
हिंदी गीत याद कर लिया करते हैं >-जैसे कि शीरीं फ़रहाद,
हीर-रांझा और लैला-मजनू ।
एक शमा परवाने की दास्तान सुनिए फिल्म निराला से।
पिछला गीत सुनते समय जाने क्यूँ ये गीत याद आ गया।
फिल्म निराला(१९५०) में देव आनंद और मधुबाला
की जोड़ी है।
फिल्म निराला का नाम याद आते ही स्वतः दिमाग में
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का नाम अपने आप कौंध जाता
है जिहोने छंद मुक्त कविताओं की ईजाद कर के आधुनिक
कवियों के लिए नए रास्ते खोले थे। रास्ते तो उन्होंने ज़रूर
खोले थे और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जैसे
रचनाकारों ने साधिकार उन रास्तों का प्रयोग कर के देखा
लेकिन अनेक आधुनिक हिंदी कवि कल्पनाशीलता और
शब्द सामर्थ्य के अभाव में सतही दोहराव करते से प्रतीत
होते हैं। स्तिथि तकरीबन चहुँ ओर एक समान है। जब हिंदी
गीतों में "मैं झंडू बाम हुई डार्लिंग तेरे लिए" प्रयुक्त होने का
समय आ गया है तो आप समझ ही सकते हैं कि भविष्य
कैस्टर आयल सरीखा चिकना और चमकदार है।
साहित्य क्षेत्र आपना नहीं है अतः फटे में टांग उलझाने
बजाये गीत पर चर्चा कर लेते हैं थोड़ी सी। ये हालाँकि एक
दर्द भरा गीत है लेकिन इसकी आकर्षक धुन कि वजह से
वे लोग भी चाव से सुना करते हैं जो गीत के बोलों पर ज्यादा
ध्यान नहीं दिया करते ।
प्यारेलाल संतोषी के लिखे गीत को तर्ज़ में ढाला है संगीतकार
चितलकर रामचंद्र ने और गाया है लता मंगेशकर ने। ये लता
के सबसे लोकप्रिय गीतों में से एक है। परदे पर गाने वाली
अभिनेत्री हैं मधुबाला ।
गीत के बोल:
महफ़िल में जल उठी शमा
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
चरों तरफ लगाये फेरे
फिर भी हर दम दूर रहे
उल्फत देखो आग बनी है
मिलने से मजबूर रहे
यही सजा है दुनिया में
यही सजा है दुनिया में
दीवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
मरने का है नाम मुहब्बत
जलने का है नाम जवानी
पत्थर दिल हैं सुनाने वाले
कहने वाला आँख का पानी
आंसू आये आँखों में
आंसू आये आँखों में
गिर जाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
थीम पर बने गीत कुछ ज्यादा ही मशहूर होते हैं। ये
प्रतीक स्वरुप हैं उसके अलावा प्रेमी जोड़ों को भी यदा कदा
हिंदी गीत याद कर लिया करते हैं >-जैसे कि शीरीं फ़रहाद,
हीर-रांझा और लैला-मजनू ।
एक शमा परवाने की दास्तान सुनिए फिल्म निराला से।
पिछला गीत सुनते समय जाने क्यूँ ये गीत याद आ गया।
फिल्म निराला(१९५०) में देव आनंद और मधुबाला
की जोड़ी है।
फिल्म निराला का नाम याद आते ही स्वतः दिमाग में
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का नाम अपने आप कौंध जाता
है जिहोने छंद मुक्त कविताओं की ईजाद कर के आधुनिक
कवियों के लिए नए रास्ते खोले थे। रास्ते तो उन्होंने ज़रूर
खोले थे और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जैसे
रचनाकारों ने साधिकार उन रास्तों का प्रयोग कर के देखा
लेकिन अनेक आधुनिक हिंदी कवि कल्पनाशीलता और
शब्द सामर्थ्य के अभाव में सतही दोहराव करते से प्रतीत
होते हैं। स्तिथि तकरीबन चहुँ ओर एक समान है। जब हिंदी
गीतों में "मैं झंडू बाम हुई डार्लिंग तेरे लिए" प्रयुक्त होने का
समय आ गया है तो आप समझ ही सकते हैं कि भविष्य
कैस्टर आयल सरीखा चिकना और चमकदार है।
साहित्य क्षेत्र आपना नहीं है अतः फटे में टांग उलझाने
बजाये गीत पर चर्चा कर लेते हैं थोड़ी सी। ये हालाँकि एक
दर्द भरा गीत है लेकिन इसकी आकर्षक धुन कि वजह से
वे लोग भी चाव से सुना करते हैं जो गीत के बोलों पर ज्यादा
ध्यान नहीं दिया करते ।
प्यारेलाल संतोषी के लिखे गीत को तर्ज़ में ढाला है संगीतकार
चितलकर रामचंद्र ने और गाया है लता मंगेशकर ने। ये लता
के सबसे लोकप्रिय गीतों में से एक है। परदे पर गाने वाली
अभिनेत्री हैं मधुबाला ।
गीत के बोल:
महफ़िल में जल उठी शमा
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
चरों तरफ लगाये फेरे
फिर भी हर दम दूर रहे
उल्फत देखो आग बनी है
मिलने से मजबूर रहे
यही सजा है दुनिया में
यही सजा है दुनिया में
दीवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
मरने का है नाम मुहब्बत
जलने का है नाम जवानी
पत्थर दिल हैं सुनाने वाले
कहने वाला आँख का पानी
आंसू आये आँखों में
आंसू आये आँखों में
गिर जाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
महफ़िल में जल उठी शमा
परवाने के लिए
प्रीत बनी है दुनिया में
मर जाने के लिए
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