अमिताभ बच्चन की हिट फ़िल्में जनता को याद हैं। कुछ फ्लॉप
फ़िल्में भी हैं उनकी, जिनके मधुर गीत अक्सर इधर उधार बजा
करते हैं। परंपरा के अनुसार हम आपको उनकी कम देखी गई
फिल्म से कम सुना हुआ गीत सुनवाते हैं। ये गीत योगेश का लिखा,
किशोर कुमार का गाया हुआ और आर. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध है।
अब आप ये मत पूछियेगा कि परदे पर तानपुरा दिख रहा है और
गीत में गिटार की आवाज़ आ रही है। ये एक आधुनिक तानपुरा है
जो गिटार की आवाज़ निकालता है। तबला भी विशेष है जिसमें से
कांगो-बांगो की आवाज़ निकलती है।
गीत के बोल:
तुम हो मेरी दिल की धड़कन
तुम बिन लगे ना मन
तुम को ही ढूँढा करते हैं
हर पल मेरे दो नयन
तुम हो मेरी दिल की धड़कन
तुम बिन लगे ना मन
तुम को ही ढूँढा करते हैं
हर पल मेरे दो नयन
तुम जो नहीं तो कैसी ख़ुशी
मायूसियों में डूबी है ज़िन्दगी
मुझे तुम बिन हर पलछिन
दस्ता हैं सूनापन
तुम हो मेरे दिल की धड़कन
तुम बिन लगे ना मन
तुम को ही ढूँढा करते हैं
हर पल मेरे दो नयन
तुम्हें जो देखा तो पलकों तले
लाखों दिए से देखो जलने लगे
मेरा तन मन मेरा जीवन
तुमसे ही है मगन
तुम हो मेरी दिल की धड़कन
तुम बिन लगे ना मन
तुम को ही ढूँढा करते हैं
हर पल मेरे दो नयन
.........................................
Tum ho meri dil ki dhadkan-Manzil 1979
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Monday, 10 January 2011
Friday, 26 November 2010
हमका धोखा हुई गवा-बेशरम १९७८
आपने पिछली एक पोस्ट में कल्याणजी आनंदजी के
संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर का गाया एक गीत सुना
था जो फिल्म कर्मयोगी से लिया गया था। गीत फिल्माया
गया था रीना रॉय पर। अब अभिनेत्री बदल देते हैं जी।
अब आपको लता का एक और गीत सुनवाते हैं जो शर्मिला
टैगोर पर फिल्माया गया है फिल्म बेशरम(१९७८) में।
अमिताभ बच्चन टैगोर टैगोर कि जोड़ी वाली ये फिल्म
ज्यादा नहीं चली बस यही एक गीत रेडुआ पर बज बज के
इस फिल्म कि यादें ताज़ा करता रहा। गौरतलब है कि इस
फिल्म में अमजद खान भी हैं जो शायद फिल्म शोले के
बाद सीधे इसी फिल्म में अमिताभ के साथ दिखाई दिए।
गाने की एक खूबी बस बतलाऊँगा आपको-इसमें नृत्य तो
बढ़िया हो ही रहा है साथ साथ संगीतमय कपडा धुलाई हो
रही है।
आम आदमी की भाषा में बात करें तो- शर्मिला सामने बैठी
बिंदु को चिढाने के लिए इत्ता अच्छा नाच रही है-के-मैं भी
तेरे जैसे ठुमके लगा सकती हूँ।
गीत के बोल:
चोरी चोरी चुपके चुपके
मिलने मैं आती थी
प्यार भरी बतियान मैं,
रोज़ सुनती थी
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
चोरी चोरी चुपके चुपके
मिलने मैं आती थी
प्यार भरी बतियान मैं,
रोज़ सुनती थी
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
हाय हाय, धोखा हुई गवा
याद करो, याद करो वो बातें
तारों भरी रातें
जब हम मिले थे नदिया किनारे
चंदा ने चुपके चुपके
बदली से छुप के
हंस कर किये थे वो जो इशारे
वो चंदा के इशारे
मैं समझ गई थी सारे
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
हाय राम धोखा हुई गवा
तुमने हमें ना जाना
ना जाना
तुमने हमें ना जाना
बड़े नादान हो, बड़े नादान हो
हमने तुम्हे पहचाना
बड़े बेईमान हो, बड़े बेईमान हो
संग बैठे हो सौतन के,
यहाँ टुकड़े हो गए मन के
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
हाय राम, धोखा हुई गवा
संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर का गाया एक गीत सुना
था जो फिल्म कर्मयोगी से लिया गया था। गीत फिल्माया
गया था रीना रॉय पर। अब अभिनेत्री बदल देते हैं जी।
अब आपको लता का एक और गीत सुनवाते हैं जो शर्मिला
टैगोर पर फिल्माया गया है फिल्म बेशरम(१९७८) में।
अमिताभ बच्चन टैगोर टैगोर कि जोड़ी वाली ये फिल्म
ज्यादा नहीं चली बस यही एक गीत रेडुआ पर बज बज के
इस फिल्म कि यादें ताज़ा करता रहा। गौरतलब है कि इस
फिल्म में अमजद खान भी हैं जो शायद फिल्म शोले के
बाद सीधे इसी फिल्म में अमिताभ के साथ दिखाई दिए।
गाने की एक खूबी बस बतलाऊँगा आपको-इसमें नृत्य तो
बढ़िया हो ही रहा है साथ साथ संगीतमय कपडा धुलाई हो
रही है।
आम आदमी की भाषा में बात करें तो- शर्मिला सामने बैठी
बिंदु को चिढाने के लिए इत्ता अच्छा नाच रही है-के-मैं भी
तेरे जैसे ठुमके लगा सकती हूँ।
गीत के बोल:
चोरी चोरी चुपके चुपके
मिलने मैं आती थी
प्यार भरी बतियान मैं,
रोज़ सुनती थी
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
चोरी चोरी चुपके चुपके
मिलने मैं आती थी
प्यार भरी बतियान मैं,
रोज़ सुनती थी
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
हाय हाय, धोखा हुई गवा
याद करो, याद करो वो बातें
तारों भरी रातें
जब हम मिले थे नदिया किनारे
चंदा ने चुपके चुपके
बदली से छुप के
हंस कर किये थे वो जो इशारे
वो चंदा के इशारे
मैं समझ गई थी सारे
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
हाय राम धोखा हुई गवा
तुमने हमें ना जाना
ना जाना
तुमने हमें ना जाना
बड़े नादान हो, बड़े नादान हो
हमने तुम्हे पहचाना
बड़े बेईमान हो, बड़े बेईमान हो
संग बैठे हो सौतन के,
यहाँ टुकड़े हो गए मन के
मगर तुम ना समझे
हमका धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
धोखा हुई गवा
हाय राम, धोखा हुई गवा
Saturday, 20 November 2010
गुज़र जाएँ दिन-अन्नदाता १९७२
फिल्म अन्नदाता के तीन गीत आप सुन चुके हैं। अब सुनिए
किशोर की आवाज़ में सोलो गीत। ये गीत अनिल धवन परदे पर
गा रहे हैं साथ साथ साईकिल चला रहे हैं। किशोर कुमार ने ७० के
दशक से जो अपनी गति वाली पारी शुरू की उसमे लगभग हर
संगीतकार ने उनकी सेवाएँ लीं । इस ब्लॉग के पिछले गीत और
इस गीत में क्या समानता है बताइए तो?
पिछले गीत की तरह ही ये गीत भी योगेश का लिखा और सलिल का
संगीतबद्ध किया हुआ है। सलिल चौधरी की रेंज बताने के लिए
ही मैंने उनके एक के बाद एक दो गीत प्रस्तुत किये हैं। गीतकार
योगेश का कवि ह्रदय इस गीत में भी स्वच्छंद मुखर हुआ है।
गीत के बोल:
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
किसी की हाय यादों में
किसी की हाय बातों में
किसी से मुलाकातों में
के ये सिलसिले, जब से चले
ख्वाब मेरे हो गए रंगीन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
रहे ना दिल बस में ये
ना माने कोई रस्में ये
रहे ना दिल बस में ये
ना माने कोई रस्में ये
के खाऊँ मैं तो कसमें ये
उन्हें है पता
के जग चाहे रूठे ये
के जग चाहे छूटे ये
के जग चाहे रूठे ये
के जग चाहे छूटे ये
नाता नहीं टूटे ये, हाय
आ, गुज़र जाये दिन दिन दिन
कभी ये मेरा मन चाहे
फूलों के जहाँ हों साये
कभी ये मेरा मन चाहे
फूलों के जहाँ हों साये
जहाँ पे हर दिल गाये
धुन प्यार की
ज़माने चाहे हो जाएँ
वहीँ पे जा के सो जाएँ
ज़माने चाहे हो जाएँ
वहीँ पे जा के सो जाएँ
वहीँ पे जाके सो जाएँ, हाय
आ, गुज़र जाए दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
किसी की हाय यादों में
किसी की हाय बातों में
किसी से मुलाकातों में
के ये सिलसिले, जब से चले
ख्वाब मेरे हो गए रंगीन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
......................................
Guzar jaayen din-Annadata 1972
किशोर की आवाज़ में सोलो गीत। ये गीत अनिल धवन परदे पर
गा रहे हैं साथ साथ साईकिल चला रहे हैं। किशोर कुमार ने ७० के
दशक से जो अपनी गति वाली पारी शुरू की उसमे लगभग हर
संगीतकार ने उनकी सेवाएँ लीं । इस ब्लॉग के पिछले गीत और
इस गीत में क्या समानता है बताइए तो?
पिछले गीत की तरह ही ये गीत भी योगेश का लिखा और सलिल का
संगीतबद्ध किया हुआ है। सलिल चौधरी की रेंज बताने के लिए
ही मैंने उनके एक के बाद एक दो गीत प्रस्तुत किये हैं। गीतकार
योगेश का कवि ह्रदय इस गीत में भी स्वच्छंद मुखर हुआ है।
गीत के बोल:
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
किसी की हाय यादों में
किसी की हाय बातों में
किसी से मुलाकातों में
के ये सिलसिले, जब से चले
ख्वाब मेरे हो गए रंगीन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
रहे ना दिल बस में ये
ना माने कोई रस्में ये
रहे ना दिल बस में ये
ना माने कोई रस्में ये
के खाऊँ मैं तो कसमें ये
उन्हें है पता
के जग चाहे रूठे ये
के जग चाहे छूटे ये
के जग चाहे रूठे ये
के जग चाहे छूटे ये
नाता नहीं टूटे ये, हाय
आ, गुज़र जाये दिन दिन दिन
कभी ये मेरा मन चाहे
फूलों के जहाँ हों साये
कभी ये मेरा मन चाहे
फूलों के जहाँ हों साये
जहाँ पे हर दिल गाये
धुन प्यार की
ज़माने चाहे हो जाएँ
वहीँ पे जा के सो जाएँ
ज़माने चाहे हो जाएँ
वहीँ पे जा के सो जाएँ
वहीँ पे जाके सो जाएँ, हाय
आ, गुज़र जाए दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
किसी की हाय यादों में
किसी की हाय बातों में
किसी से मुलाकातों में
के ये सिलसिले, जब से चले
ख्वाब मेरे हो गए रंगीन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
गुज़र जाएँ दिन दिन दिन
के हर पल गिन गिन गिन
......................................
Guzar jaayen din-Annadata 1972
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Yogesh
कहीं दूर जब दिन ढल जाए-आनंद १९७०
हम जनता को उनकी पसंद से भी पहचानते हैं। किसी व्यक्ति
के मूड का अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है इसका एक उदाहरण
देता हूँ।
एक सज्जन को मुकेश के गीत पसंद हैं। फिल्म आनंद का ये मशहूर
गीत -"कहीं दूर जब दिन ढल जाए" इन महाशय ने अपनी कालर ट्यून
बना रखा था। जब भी उनको मोबाइल पर रिंग मारो ये गीत सुनाई देता
था। इससे मूड फ्रेश हो जाया करता। ये सिलसिला बहुत दिन तक चला ।
साल भर बाद उनकी कालर ट्यून बदल गई। हिमेश रेशमिया का कोई गीत
उन्होंने कालर ट्यून बना के लगा डाला। उसी के साथ उनके व्यवहार में
बदलाव भी दिखा। उनकी आँखों में अब अक्सर सूअर का बाल दिखाई देता।
इस फेनोमिना की क्या वजह हो सकती है मेरी समझ के बाहर है।
खैर, ये गीत सुनिए आज, जो एक सदाबहार गीत है और फिल्म जगत के
काका अर्थात राजेश खन्ना इसको परदे पर गा रहे हैं। योगेश के लिखे गीत
के लिए धुन बनाई है सलिल चौधरी ने।
गीत के बोल:
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
मेरे ख्यालों के आंगन में
कोई सपनों के दीप जलाये
दीप जलाये
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
कभी यूँ ही जब हुयीं बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे जब यूँ ही ऑंखें
कभी यूँ ही जब हुयीं बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे जब यूँ ही ऑंखें
कभी मचल के प्यार से चल के
छुए कोई मुझे पर नज़र ना आये
नज़र ना आये
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते
कहीं से निकाल आयें जन्मों के नाते
कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते
कहीं से निकाल आयें जन्मों के नाते
है मीठी उलझान बैरी अपना मन
अपना ही हो के सहे दर्द पराये
दर्द पराये
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे
दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे
ये मेरे सपने यही तो हैं अपने
मुझसे जुदा ना होंगे इनके ये साये
इनके ये साये
..................................
Kahin door jab din dhal jaaye-Anand 1970
के मूड का अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है इसका एक उदाहरण
देता हूँ।
एक सज्जन को मुकेश के गीत पसंद हैं। फिल्म आनंद का ये मशहूर
गीत -"कहीं दूर जब दिन ढल जाए" इन महाशय ने अपनी कालर ट्यून
बना रखा था। जब भी उनको मोबाइल पर रिंग मारो ये गीत सुनाई देता
था। इससे मूड फ्रेश हो जाया करता। ये सिलसिला बहुत दिन तक चला ।
साल भर बाद उनकी कालर ट्यून बदल गई। हिमेश रेशमिया का कोई गीत
उन्होंने कालर ट्यून बना के लगा डाला। उसी के साथ उनके व्यवहार में
बदलाव भी दिखा। उनकी आँखों में अब अक्सर सूअर का बाल दिखाई देता।
इस फेनोमिना की क्या वजह हो सकती है मेरी समझ के बाहर है।
खैर, ये गीत सुनिए आज, जो एक सदाबहार गीत है और फिल्म जगत के
काका अर्थात राजेश खन्ना इसको परदे पर गा रहे हैं। योगेश के लिखे गीत
के लिए धुन बनाई है सलिल चौधरी ने।
गीत के बोल:
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
मेरे ख्यालों के आंगन में
कोई सपनों के दीप जलाये
दीप जलाये
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
कभी यूँ ही जब हुयीं बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे जब यूँ ही ऑंखें
कभी यूँ ही जब हुयीं बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे जब यूँ ही ऑंखें
कभी मचल के प्यार से चल के
छुए कोई मुझे पर नज़र ना आये
नज़र ना आये
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते
कहीं से निकाल आयें जन्मों के नाते
कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते
कहीं से निकाल आयें जन्मों के नाते
है मीठी उलझान बैरी अपना मन
अपना ही हो के सहे दर्द पराये
दर्द पराये
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
सांझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आये
दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे
दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे
हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे
ये मेरे सपने यही तो हैं अपने
मुझसे जुदा ना होंगे इनके ये साये
इनके ये साये
..................................
Kahin door jab din dhal jaaye-Anand 1970
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