'वेदांत के सिद्धांत' और 'आबरा का डबरा' एक दूसरे के पर्याय हैं। वेदांत एक
मित्र मण्डली का सदस्य है। अकाउंटिंग के पेशे में नहीं होता तो शायद वो
एक सफल राजनीतिक वक्ता या सम्पादकीय लिखने वाला पत्रकार बन
सकता था। किन किन चीज़ों के parallel draw करता था वो, हमारे दिमाग
के कल्पना-कोष से बाहर होते थे। इतनी सफाई और चतुराई के साथ ही
वो विषय परिवर्तन करता कि कब 'मूंग की दाल' से दिल्ली के 'जंतर मंतर'
के बारे में जानकारी शुरू हो जाती, पता ही नहीं चलता। उसकी इसी खूबी
के चलते उसको उसी के समकक्ष एक मित्र ने 'आबरा का डबरा, की पदवी
भी दे डाली। आज आपको अपने मित्र की पसंद का एक गीत सुनाता हूँ।
गीत लिखा है हसरत जयपुरी ने जिन्होंने शंकर जयकिशन के लिए कई
रोमांटिक गीत लिखे। आवाज़ मन्ना डे की है। गीत में आपको कई हास्य
कलाकार दिखाई देंगे नायक शम्मी कपूर और नायिका आशा पारेख के
अलावा।
गीत के बोल:
क्यूँ मारा, क्यूँ मारा
क्यूँ मारा, क्यूँ मारा
क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ क्यूँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो लड्डू पड़े खाती है, हाँ
वो पेड़ों पे चढ़ जाती है, हाँ
वो लड्डू पड़े खाती है
वो पेड़ों पे चढ़ जाती है
ये मच्छर बीन बजाते हैं
वो अपना राग सुनती है
वो छुम्मक छुम्मक नाचे जब मैं दिल का बजाऊँ
मैं दिल का बजाऊँ एक तारा
मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
अरे घर का ये एक स्टेशन है, हाँ
ये झंडी प्यारी प्यारी है
अरे घर का ये एक स्टेशन है
ये झंडी प्यारी प्यारी है
हम सब तो रेल के डिब्बे हैं
वो अपनी इंजन गाडी है
वो गुस्सा जब भी करती है
तो बन जाती है
तो बन जाती है, अंगारा
मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
बंधू रे बंधू रे
वो जान से बढ़ कर प्यारी है
बंधू रे, बंधू रे
क्या बोलूं मैं,
क्या बोलूं मैं एक कटारी है
बंधू रे, बंधू रे
वो जान से बढ़ कर प्यारी है, हाँ
क्या बोलूं मैं एक कटारी है, हाँ
वो जान से बढ़ कर प्यारी है
क्या बोलूं मैं एक कटारी है
कजरारी उसकी अँखियाँ हैं
इस बात से अपनी यारी है
मैंने तो अपनी कल्लो का है नाम रखा
है नाम रखा, जहान आरा
मेरी भैंस को डंडा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
वो खेत में चारा चरती थी
तेरे बाप का वो क्या करती थी
हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा
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Meri bhains ko danda kyun maara-Pagla kahin ka 1970
Friday, 3 June 2011
मेरी भैंस को डंडा क्यूँ मारा-पगला कहीं का १९७०
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