निस्संदेह ये वर्ष कला और सिनेमा जगत के लिए त्रासदायी रहा है। इस वर्ष
अनेक नामचीन हस्तियों ने नश्वर संसार से विदा ली। उन कलाकारों की बस यादें
ही चित्र, चलचित्र और आवाज़ के रूप में हमें उनकी उपस्थिति का एहसास कराती
रहेंगी।
देव आनंद मेरे पसंदीदा कलाकारों में से एक हैं। उनके १-२ गीत रोज ही याद आ
जाते हैं। परसों के रोज मुझे एक गीत विशेष रूप से याद आया वो है फिल्म
छुपा रुस्तम का गीत-बोलो क्या हमको दोगे। इसमें शुरू में केवल 'आंय' बोला गया
है देव आनंद द्वारा। ये एक शब्द ही उनके अंदाज़ को बयां करने के लिए काफी है।
अब ये आप बूझिये कि ये शब्द किशोर कुमार की आवाज़ में है या स्वयं देव आनंद
की आवाज़ में। किशोर कुमार जिन्होंने देव आनंद के लिए विशेष तौर पर गीत गाये ,
यूँ कहिये पार्श्व गायन के मामले में वे या तो स्वयं के लिए या फिर केवल देव आनंद
के लिए ही परदे पर गीत गाते। ये सिलसिला कम से कम सन १९६९ में आई आराधना
के पहले तक तो चला। कभी कभी तो ये लगने लगता जैसे देव आनंद स्वयं परदे पर
गीत गा रहे हों। तय है कि किशोर के गाये देव आनंद अभिनीत गीतों में अतिरिक्त ऊर्जा
का संचार होता महसूस होता है।
बहुत कम ऐसे कलाकार हुए हैं हिंदी सिनेमा जगत में जिनके गीत देखते समय गीत
और धुन पर से ध्यान कुछ देर के लिए हट जाता है उनमें से एक हैं देव आनंद। उन्हें
सदाबहार यूँ ही नहीं कहा जाता है। वे हमेशा सक्रिय दिखलाई दिए और फिल्म उद्योग
के बाल, युवा, बुज़ुर्ग सभी वर्गों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहे।
गीत कम सुना हुआ है इसलिए कम देखा गया भी कह सकते हैं इसको। इस गीत
में जो कि सन ७० के दशक के पूर्वार्ध का गीत है, देव आनंद अपनी पूरी ऊर्जा के
साथ नायिका से कदम ताल मिलते हुए जीवन्तता प्रदान कर रहे हैं। गायक-गायिका हैं
किशोर कुमार और आशा भोंसले। गीत सचिन देव बर्मन की संगीत फैक्ट्री की उपज है
जिसकी रचना की है गीतकार नीरज ने।
गीत के बोल:
पूछो पूछो, पूछो ना
बोलो क्या हमको दोगे
'आंय'
बोलो क्या हमको दोगे
दिल जो हमने तुमको बिना मांगे दे दिया हँसते हँसते
बोलो क्या हमको दोगे
बोलो क्या हमको दोगे
दिल जो हमने तुमको बिना मांगे दे दिया हँसते हँसते
पूछो क्या हमसे लोगे, पूछो
दिल जो हमने तुमसे बिना पूछे ले लिया हँसते हँसते
पूछो क्या हमसे लोगे
बहका करें जो तेरी बाँहों में
महका करें जो तेरी राहों में
बहका करें जो तेरी बाँहों में
महका करें जो तेरी राहों में
देखा करें जो तेरी चाहों में
घर बसा लें जो हम तेरी ही निगाहों में
तो क्या हमको दोगे
बोलो क्या हमको दोगे
दिल जो हमने तुमको बिना मांगे दे दिया हँसते हँसते
बोलो क्या हमको दोगे
हे हे हे हे
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
हो हो हो हो
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला
दुश्मन जलेंगे जब मिलेंगे हम
प्यासे कभी न फिर रहेंगे हम
जल रहा है
बहुत
तो जलने दो
दुश्मन जलेंगे जब मिलेंगे हम
प्यासे कभी न फिर रहेंगे हम
जन्नत बना लेंगे ज़मीन पे हम
खुशियाँ रहेंगी और रहेंगे हम अब
पूछो के तुम क्या हमसे लोगे, पूछो
पूछो क्या हमसे लोगे
दिल जो हमने तुमसे बिना पूछे ले लिया हा हा हा हा
पूछो क्या हमसे लोगे
तेरी बाँहों का जब सहारा हो
रास्ता फिर कितना ही अँधियारा हो
हो हो हो हो, हो हो हो
तेरी बाँहों का जब सहारा हो
रास्ता फिर कितना ही अँधियारा हो
उठते ही तूफ़ान तुम किनारा हो
जो कुछ अपना है वो सब कुछ तुम्हारा
हाँ तो क्या हमको दोगे
बोलो क्या हमको दोगे
दिल जो हमने तुमको बिना मांगे दे दिया हँसते हँसते
बोलो क्या हमको दोगे
पूछो क्या हमसे लोगे
बोलो क्या हमको दोगे
पूछो क्या हमसे
बोलो क्या हमको
पूछो, बोलो
ओ पूछो, बोलो
......................................
Bolo kya hamko doge-Chhupa Rustom 1973
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Tuesday, 6 December 2011
Wednesday, 25 May 2011
काल का पहिया घूमे भैया-चंदा और बिजली १९६९
हिंदी और उर्दू की एक प्रसिद्ध कहावत है-नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली।
कहावतें उदाहरण देने के लिए सटीक माध्यम हुआ करती हैं। समय या युग की
सीमाओं से परे, कहावतें हमेशा जवान रहती हैं। कुछ गीतों को भी ऐसा ही दर्ज़ा
प्राप्त है।
अक्सर देखा गया है कि आदमी बेईमानी और धूर्तता से जीवन यापन करने के
बाद एकदम से धार्मिक हो जाता है और कुछ ऐसा कार्य करने लग जाता है जो
उसके भूतकाल के क्रियाकलापों के एकदम विपरीत हो। इसमें दोनों श्रेणी के लोग
होते हैं-जो किसी दैवीय प्रेरणा की वजह से सुधार की ओर अग्रसर हो रहे होते हैं
और दूसरे वे लोग जो ढोंग और दिखावा करने के लिए ऐसे कार्य करते हैं ताकि
उनके नाम के साथ हो रही थू थू, वाह वाह में तब्दील हो जाये। वाह वाह तो नहीं
होती, अलबत्ता जनता दबी जुबान वही कहावत दोहराती सुनाई देती है-नौ सौ चूहे
खा के बिल्ली हज को चली।
काल चक्र घूमता रहता है और ऐसे कई ढोंगियों को उसने धूल चटाई है। हालाँकि
प्रस्तुत गीत का कहावत से कोई ज्यादा लेना देना नहीं है मगर ज्यादा मात्र में चूहे
खाने वाली बिल्लियों को ये गीत एक बार अवश्य सुनना चाहिए। सन १९६९ की
फिल्म चंदा और बिजली का जितना भी जिक्र होता है वो अधिकतर इस गीत की
ही वजह से है। गीत में अप्प दो कलाकारों को शायद पहचान पायें-एक तो बाल
कलाकार-सचिन और दूसरे उल्हास, जो बुज़ुर्ग दिखाई दे रहे हैं। गीत परदे पर
किसने गाया है, मुझे मालूम नहीं, मगर पार्श्व में इसको गा रहे हैं मन्ना डे।
कविवर गोपालदास नीरज की रचना को स्वरों से सजाया है शंकर जयकिशन
ने।
गीत के बोल:
काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात कभी तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
जनक की बेटी अवध की रानी
सीता भटके बन बन में
जनक की बेटी अवध की रानी
सीता भटके बन बन में
राह अकेली
राह अकेली, रात अँधेरी
मगर जतन हैं दामन में
साथ ना जिसके चलता कोई
साथ ना जिसके चलता कोई
उसके साथ भगवन चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
हाय री किस्मत कुंवर कन्हैया
स्वाद ना जाने माखन का
हाय री किस्मत कुंवर कन्हैया
स्वाद ना जाने माखन का
हंसी चुराए
हंसी चुराए फूलों की
वो कंस है माली उपवन का
भूल ना पापी, मगर पाप की
भूल ना पापी, मगर पाप की
ज्यादा नहीं दुकान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात कभी तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
............................................
Kaal ka pahiya ghoome bhaiya-Chanda aur bijli 1969
कहावतें उदाहरण देने के लिए सटीक माध्यम हुआ करती हैं। समय या युग की
सीमाओं से परे, कहावतें हमेशा जवान रहती हैं। कुछ गीतों को भी ऐसा ही दर्ज़ा
प्राप्त है।
अक्सर देखा गया है कि आदमी बेईमानी और धूर्तता से जीवन यापन करने के
बाद एकदम से धार्मिक हो जाता है और कुछ ऐसा कार्य करने लग जाता है जो
उसके भूतकाल के क्रियाकलापों के एकदम विपरीत हो। इसमें दोनों श्रेणी के लोग
होते हैं-जो किसी दैवीय प्रेरणा की वजह से सुधार की ओर अग्रसर हो रहे होते हैं
और दूसरे वे लोग जो ढोंग और दिखावा करने के लिए ऐसे कार्य करते हैं ताकि
उनके नाम के साथ हो रही थू थू, वाह वाह में तब्दील हो जाये। वाह वाह तो नहीं
होती, अलबत्ता जनता दबी जुबान वही कहावत दोहराती सुनाई देती है-नौ सौ चूहे
खा के बिल्ली हज को चली।
काल चक्र घूमता रहता है और ऐसे कई ढोंगियों को उसने धूल चटाई है। हालाँकि
प्रस्तुत गीत का कहावत से कोई ज्यादा लेना देना नहीं है मगर ज्यादा मात्र में चूहे
खाने वाली बिल्लियों को ये गीत एक बार अवश्य सुनना चाहिए। सन १९६९ की
फिल्म चंदा और बिजली का जितना भी जिक्र होता है वो अधिकतर इस गीत की
ही वजह से है। गीत में अप्प दो कलाकारों को शायद पहचान पायें-एक तो बाल
कलाकार-सचिन और दूसरे उल्हास, जो बुज़ुर्ग दिखाई दे रहे हैं। गीत परदे पर
किसने गाया है, मुझे मालूम नहीं, मगर पार्श्व में इसको गा रहे हैं मन्ना डे।
कविवर गोपालदास नीरज की रचना को स्वरों से सजाया है शंकर जयकिशन
ने।
गीत के बोल:
काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात कभी तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
जनक की बेटी अवध की रानी
सीता भटके बन बन में
जनक की बेटी अवध की रानी
सीता भटके बन बन में
राह अकेली
राह अकेली, रात अँधेरी
मगर जतन हैं दामन में
साथ ना जिसके चलता कोई
साथ ना जिसके चलता कोई
उसके साथ भगवन चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
हाय री किस्मत कुंवर कन्हैया
स्वाद ना जाने माखन का
हाय री किस्मत कुंवर कन्हैया
स्वाद ना जाने माखन का
हंसी चुराए
हंसी चुराए फूलों की
वो कंस है माली उपवन का
भूल ना पापी, मगर पाप की
भूल ना पापी, मगर पाप की
ज्यादा नहीं दुकान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
काल का पहिया घूमे भैया
लाख तरह इंसान चले
ले के चले बारात कभी तो
कभी बिना सामान चले
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
राम कृष्ण हरि राम कृष्ण हरि
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Kaal ka pahiya ghoome bhaiya-Chanda aur bijli 1969
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