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Saturday, 16 July 2011

मैं भोली हसीना -वो जो हसीना १९८३

प्यार वो खूबसूरत एहसास है कि उसका असर सभी उम्र वालों
पर बराबर होता है. बस ग्राम और किलोग्राम का फर्क हो जाता है.
सबका इसे ज़ाहिर करने का तरीका जुदा होता है. अंतरमुखी व्यक्ति
इसे अपने शांत अंदाज़ में व्यक्त करता है और बहिर्मुखी व्यक्ति ढोल
ढमाके के साथ . अब एक जवान लड़की पूरी उछल कूद कर के इसे
कैसे बतला सकती है इस गीत के ज़रिये बताया गया है. गीत नैचुरल
लगता है और इसमें बिलकुल फ्री स्टाइल स्नान और नृत्य किया गया
है. व्याकुलता मिश्रित छटपटाहट किसे कहते हैं देखिये इस गीत में.
रंजीता और प्रेमा नारायण इसमें प्रमुख कलाकार हैं.

लता मंगेशकर की आवाज़ है, गौहर कानपुरी के बोल हैं और राम-लक्ष्मण
का संगीत है.




गीत के बोल:

मैं भोली हसीना
बनी जो नगीना
कहीं की रही न हाय
होय रब्बा मुझे क्या हो गया
हुआ क्या हसीना
मेरा बचपन खो गया

मैं भोली हसीना
बनी जो नगीना
कहीं की रही न हाय
होय रब्बा मुझे क्या हो गया
हुआ क्या हसीना
मेरा बचपन खो गया

धक् धक् धक् धडके जिगर
पल पल पल फडके नज़र
धक् धक् धक् धडके जिगर
पल पल पल फडके नज़र
पग पग पर लगता है डर
डर से कहीं जाऊं न मर

नींद नहीं नैना कटत नहीं रैना
पडत नहीं चाइना हाय
होय रब्बा मुझे क्या हो गया
हुआ क्या हसीना
मेरा बचपन खो गया

छोटा लगे दिन लंबी लगे रात
पहले तो न थी ऐसी कोई बात
छोटा लगे दिन लंबी लगे रात
पहले तो न थी ऐसी कोई बात
बैरी हुआ दिल तौबा दिल की जात
ऐसे मौके पे छोड़ा मेरा साथ

मैं बेला चमेली थी सब की सहेली
फिरूं अब अकेली हाय
होय रब्बा मुझे क्या हो गया
हुआ क्या हसीना
मेरा बचपन खो गया

मैं भोली हसीना
बनी जो नगीना
कहीं की रही न हाय
होय रब्बा मुझे क्या हो गया
हुआ क्या हसीना
मेरा बचपन खो गया
......................................................
Main bholi haseena-Woh jo haseena 1983

Wednesday, 15 June 2011

साथ साथ तुम चलो-सितारा १९८०

फिल्म अभिमान में नारी के सितारा बनने का जिक्र है तो एक
और ऐसी फिल्म है जिसमें ग्रामीण परिवेश में पली बड़ी नायिका
फिल्म जगत की एक हस्ती बन जाती है। इस थीम पर पहले एक
फिल्म हम देख चुके हैं-मेरे हमसफ़र। फिल्म सितारा बॉक्स ऑफिस
पर कोई कमाल नहीं दिखा पाई ना ही इसके संगीत ने कोई अलख
जगाया । फिर भी, इस फिल्म में कुछ यादगार गीत हैं। फिल्म का
सबसे अलोकप्रिय गीत आपको सुनवाते हैं जो भूपेंद्र और आशा भोंसले
की आवाज़ में है। संगीत राहुल देव बर्मन का है। गीत फिल्माया गया
है ज़रीना वहाब और मिथुन पर। फिल्म एक आध बार आपको टी वी के
चैनल पर दिखाई दी होगी। मिथुन के चरित्र का नाम कुंदन और ज़रीना
के चरित्र का नाम धनिया है। वो धनिया से सरिता बन जाती है फिल्म
जगत में। गुल्ज़ाराना गीत बहुत दिनों के बाद प्रस्तुत कर रहा हूँ
ब्लॉग पर।




गीत के बोल:

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
हो, साथ साथ तुम चलो तो रात रात चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें


साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
हो, साथ साथ तुम चलो तो रात रात चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें

सुबह से कह्नेगे जा के
अपना घर संभालिये
रात को जो सपने
दे गये थे वो निकालिए
हो, आपको खबर ना हो
सपने बेखबर चले

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

रोज़ चढ़ के आस्मां पे
आ हा हा
चाँद जब लगायेंगे
लौ बुझाने का भी समय
ओ हो
हम उसे बताएँगे
फूँक से बुझा के चाँद
चाँद के उधर चलें
उधर चलें, उधर चलें

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला

हो हो, हो हो
तेज़ है हवा कहीं
वक़्त ना उड़े आज का, हो
हो, चाँद से पकड़ के रखना
आ हा हा
हो ना वो एक रात का
रात ओढ़ के चलो,
रात के उधर चलें
उधर चलें, उधर चलें
उधर चलें, उधर चलें

साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
साथ साथ तुम चलो तो रात रात भर चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें
रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें
हो, रात साथ कल सुबह एक सुबह के घर चलें
..................................
Saath saath tum chalo-Sitara 1980

Monday, 16 May 2011

मैं भी हूँ यहाँ - कौन कैसे १९८३

आपको एक गीत सुनवाया था पहले फिल्म स्वयंवर का।
फ़िल्मी गीत कभी कभी कुछ ध्वनि विशेष की वजह
से कुछ जीव जंतुओं की याद ताज़ा करवा देते हैं।
आइये एक और ऐसा ही गीत और सुनवाया जाये। आपने
कुत्ते के छोटे पिल्ले को "काईं काएं क्यों क्यों" की ध्वनियाँ
अवश्य निकलते सुना होगा, विशेषकर तब, जब वे किसी
परेशानी में होते हैं या जब बच्चे उनको पत्थर मार दिया करते हैं।

प्रस्तुत गीत में "आ", "ऊ" की ध्वनियों पे गौर करें तो
आपको कुछ समानता सुनाई पड़ेगी। बहरहाल गीत कर्णप्रिय
है और इस पर किया जा रहा नृत्य भी काफी उत्तेजक है।
फिल्म का नाम है "कौन कैसे", जिसमे परेशान से दिखाई
देने वाले नायक हैं दीपक पराशर और नाचने वाली नायिका
का नाम है अनीता राज। गुलशन बावरा के लिखे गीत की तर्ज़
बनाई है राहुल देव बर्मन ने।



गीत के बोल:

मैं भी हूँ यहाँ तू भी है यहाँ
मैं भी हूँ यहाँ तू भी है यहाँ
हो फिर क्यूँ रहे इस तरह प्यार में दूरियां
जाता है कहाँ
वो ना मिलेगा कहीं जो मिलेगा यहाँ
ऊ ऊ

मैं भी हूँ यहाँ तू भी है यहाँ
हो फिर क्यूँ रहे इस तरह प्यार में दूरियां
जाता है कहाँ
वो ना मिलेगा कहीं जो मिलेगा यहाँ
आ आ आ

बात करो जो पास आ के
निगाहों को मिला के
तो फिर कुछ मज़ा है
बात करो जो पास आ के
निगाहों को मिला के
तो फिर कुछ मज़ा है
दोस्त रहे जो यूँ अकेले
ना खेल कोई खेले
तो जीने में क्या है
जुल्फों के साये में
आ लूट ले मस्तियाँ
आ आ आ

मैं भी हूँ यहाँ तू भी है यहाँ
हो फिर क्यूँ रहे इस तरह प्यार में दूरियां
जाता है कहाँ
वो ना मिलेगा कहीं जो मिलेगा यहाँ
ऊ ऊ

मैं भी हूँ ला ला ला ला ला ला

खूब निभेगी तेरी मेरी
तो फिर कैसी देरी
मुझे आजमा ले
ला ला ला ला ला ला ला ला ला

खूब निभेगी तेरी मेरी
तो फिर कैसी देरी
मुझे आजमा ले
जीत उसी की हुई यारा
के जो भी दिल हारा
ये बाज़ी लगा ले
तीर-ए-नज़र यूँ चला के
चला है कहाँ
आ आओ

मैं भी हूँ यहाँ तू भी है यहाँ
मैं भी हूँ यहाँ तू भी है यहाँ
हो फिर क्यूँ रहे इस तरह प्यार में दूरियां
जाता है कहाँ
वो ना मिलेगा कहीं जो मिलेगा यहाँ
.......................................................................
Main bhi hoon yahan-Kaun Kaise 1983

Tuesday, 1 February 2011

सजना का कंगना-सितारा १९८०

हम में से कई एक ने पुराने ज़माने का चाबी वाला भोंपू या
ग्रामोफोन नहीं देखा होगा। नई पीढ़ी तो लगभग इसके स्वाद
से अछूती है। गाँव में एक फिल्म आई है उसका प्रचार हो रहा
है। पहले के समय में फिल्म का प्रचार तांगे, रिक्शे या बैलगाड़ी
के ज़रिये भी होता था। उसमे एक माइक होता जिसे लगभग
मुंह में डाल के उदघोषक कुछ अस्पष्ट से तो कुछ अति-अस्पष्ट से
शब्दों का उच्चारण करता हुआ अपना गला साफ़ करता। जो
चीज़ साफ़ सुनाई देती वो थी ग्रामोफोन से निकलने वाली ध्वनि।
कुछ लग चुकी फिल्मों के एल पी या ई पी रिकॉर्ड बजाये जाते।
गीत मनोरंजक है, इसमें महिला और पुरुष उदघोषक फुर्सत के
क्षणों में रिकॉर्ड बजा कर उसपर नृत्य और अभिनय कर रहे हैं।
जैसे ही ग्रामोफोन कि चाबी ख़त्म होने लगती है वो टें बोल जाता
है, उस प्रभाव को बड़े प्रभावी ढंग से बतलाया गया है। सिनेमा के
उन कुछ क्षणों में से एक जो वास्तविकता के सबसे करीब हैं। इसके
अलावा एक और पहलू से आप वाकिफ होंगे रिकॉर्ड के घिस जाने पर
सुई अटकना भी शुरू हो जाती है और एक ही शब्द को आपको रटने
की कोशिश करने लगती है तब उसे हलके से धक्के से आगे बढ़ाना
पढता था। ऐसी ऐसी विकट स्तिथियों में मैंने ग्रामोफोन बजते
सुने हैं कि आप सुन कर चकित रह जायेंगे वे किस्से। एक बार तो
रेगिस्तानी मेले में ऊँट की पीठ पर रख कर बजाया जा रहा था
ग्रामोफोने। ऊँट को २-४ गाने के बाद जाने क्या सूझी उसने एक
ज़ोरदार अंगडाई ली और ग्रामोफोन चारों खाने चित हो कर गिरा
मरा फ़ोन में तब्दील हो गया । वो बैटरी की सहायता से बजाया जाने
वाला रिकॉर्ड प्लयेर था ।

गौरतलब है कि इसमें नायक और नायिका हेमा मालिनी और राजेश
खान्नाका नाम लेते हैं। फिल्म सिनेमा के इतिहास में फ़िल्मी गीतों
की जीवन्तता के बारे में बात की जाये तो ये दोनों कलाकार दूसरों
पर भरी पढ़ते हैं। ज़रूरी नहीं की हिट गीत रोचक हो या रोचक गीत
बड़ा हिट हो जाये। इस गीत के मामले में भी कुछ ऐसा ही है।
लेखनी एक बार फिर गुलज़ार की है और संगीतमय प्रयोगधर्मिता
राहुल देव बर्मन की। पिछले गीत में भूपेंद्र के साथ लता गा रहीं थीं
तो इस गीत में उनका साथ दिया है आशा भोंसले ने।

गीत में हास्य का पुट भी है। नायिका अति उत्साह में उछलती कूदती
गोबर के ढेर में पांव डाल कर फिसल पढ़ती है। नायक ने धोती यूँ बांध
रखी है मानो धोती के कपडे का कोई पतलून सिलवा के पहना हो।

म्यूजिकल मिस्फॉयरिंग भी है इस गीत में। कल्पना करें कि पुरुष आवाज़
नायिका के लिए और महिला आवाज़ नायक के लिए। गीत को आप
सिनेमा इतिहास के सबसे मनोरंजक गीतों में शामिल कर लीजिये।



गीत के बोल:

सजना का कंगना
हो कंगना में हीरा
हो सजना का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं

अरे सजनी का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं

एक तो तेरी ऑंखें बिल्लौरी
ऑंखें जैसे दो हीरों की चोरी
एक तो तेरी ऑंखें बिल्लौरी
ऑंखें जैसे दो हीरों की चोरी
हो हीरे पे, हीरे पे, हीरे पे......

सजना का कंगना
कंगना में हीरा

हो हीरे पे हीरा मैं खाई के मरूं
एक बार, के दुई बार, के तीन बार,
के कै बार मरूं

सजना का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं

एक तो पड़े लोगों की नज़र ना
दूजे तेरी गली से गुज़ारना
हो ओ ओ ओ, एक तो पड़े लोगों की नज़र ना
दूजे तेरी गली से गुज़ारना
बच बच के रुकना कभी चलना
एक बार, के दुई बार, के तीन बार,
के कै बार बचूं

हे सजनी का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं


एक तो तेरी पायल ऊंची बोले
दूजे गोरी घूंघट में ना बोले
एक तो तेरी पायल ऊंची बोले
दूजे गोरी घूंघट में ना बोले

मलमल के घूंघट में गोरी जले
एक बार के दुई बार के तीन बार
के कै बार जले

सजना का कंगना
कंगना में हीरा
हीरा मैं खाई के मरूं एक बार,
के दुई बार, के तीन बार, के कै बार मरूं
...................................
Sajna ka kangna-Sitara 1980

Monday, 31 January 2011

थोड़ी सी ज़मीन थोडा आसमान-सितारा

तुमसे थोड़ी सी ज़मीन ही तो मांगी थी तुम तो हलकट प्रोपर्टी
ब्रोकर की तरह थोड़ी सी धूल थमा के चलते बने। थोडा आसमान
क्या मांग लिया तुमने तो हमें भैंस की तरह पोखर में डुबो दिया।
अब भाई दारू पी के बढ़िया बढ़िया शेर निकलते होंगे दिल से, हम
तो चाय और भजिये पर जिंदा रहने वाले प्राणी हैं अतः बासी
भजिये खाने के बाद आने वाली डकार के अंदाज़ में ऐसे ही उदगार
प्रकट हो पा रहे हैं, बतलाइए क्या किया जाए।

आइये सुनें एक आशावादी गीत जो देखने और सुनने दोनों में आनंद
देता है। गुलज़ार का लिखा और संगीतकार पंचम उर्फ़ आर डी बर्मन
का संगीतबद्ध किया ये गीत गा रहे हैं लता और भूपेंद्र। सौंधी मिटटी
और लेपे हुए चूल्हे को सुनें ध्यान लगा कर और बाजरे के या चने के
जिस खेत में आपका जी चाहे कौवे उड़ायें।

सपने ज़रूर देखने चाहिए मगर उनको अमल में लाने का पुख्ता
प्रोग्राम होना ज़रूरी है।



गीत के बोल:

ला ला ला ला ला ला, ला ला ला ला ला ला

थोड़ी सी ज़मीन थोड़ा आसमान
तिनकों का बस एक आशियाँ

थोड़ी सी ज़मीन थोड़ा आसमान
तिनकों का बस एक आशियाँ

मांगा है जो तुमसे वो ज्यादा तो नहीं है
देने को तो जान दें दें, वादा तो नहीं है
कोई तेरे वादों पे जीता हैं कहाँ

मेरे घर के आँगन में, छोटा सा झूला हो
सौंधी सौंधी मिटटी होगी, लेप हुआ चूल्हा हो
थोड़ी थोड़ी आग होगी, थोड़ा सा धुंआ

रात कट जायेगी तो कैसे दिन बिताएंगे
बाजरे के खेतों में कौवे उड़ायेंगे
बाजरे के टिक्कों जैसे, बेटे हो जवान

Thursday, 20 January 2011

दिल धक् धक् करने लगा-पतिता-१९८०

सन ८० की फिल्म पतिता का जो गीत चलन में था फिल्म की रिलीज़
के वक़्त वो पेश है आज। ये है किशोर कुमार की आवाज़ में-दिल धक्
धक् करने लगा। आनंद बक्षी के लिखे गीत की धुन बनाई है बप्पी लहरी
ने। मिथुन चक्रवर्ती के ऊपर इसे फिल्माया गया है और गीत में उन्होंने
प्रशंसकों को अपने नृत्य से खुश कर दिया था । सैक्सोफोने लेकर जब
नायक हुंकार भरता है तो शम्मी और देव आनंद का ज़माना याद आ जाता
है मगर जल्द ही वो ग़लतफहमी दूर हो जाती है जब वो नृत्य शुरू करता है।

वैसे इस आकर्षक गीत में कई और ऐसी आकर्षक वजह हैं जिनके कारण
पब्लिक इसे थीएटर में देखने जाया करती थी वो सब आपको गीत देखने पर
समझ आएँगी।




गीत के बोल:

धक् धक् धक् धक्
धक् धक् धक् धक्
धक् धक् धक् धक्
धक् धक् धक् धक्
दिल धक् करने लगा
मैं दिल से डरने लगा
दिल धक् करने लगा
मैं दिल से डरने लगा
ऐसा लगता है मैं
किसी पे मरने लगा

हाय दिल धक् करने लगा
मैं दिल से डरने लगा

मैं पूछा करता हूँ
इस दिल दीवाने से
वो खुद आये तो क्या हो
जिसकी याद आने से
आई कोई ख़ुशबू
कोई जादू चलने लगा
हो ओ ओ ऐसा लगता है मैं
किसी पे मरने लगा

दिल धक् करने लगा
मैं दिल से डरने लगा

तस्वीरें देखी हैं
कितनी बाज़ारों में
तस्वीरें देखी हैं
कितनी बाज़ारों में
तुम जैसे हैं हजारों
वो है एक हजारों में
देखी दो निगाहें
मैं आहें भरने लगा

हो ओ ओ ऐसा लगता है मैं
किसी पे मरने लगा

दिल धक् करने लगा
मैं दिल से डरने लगा

सोचा था खेलूंगा
मैं एक खिलोने से
अब कैसे की रोकूँ दिल को
खुद पे आशिक होने से
मैं तो दिल्लगी में
दिल का सौदा करने लगा

हो ओ ओ ऐसा लगता है मैं
किसी पे मरने लगा

दिल धक् करने लगा
मैं दिल से डरने लगा

ऐसा लगता है मैं
किसी पे मरने लगा
....................................
Dil dhak dhak karne laga-Patita 1980

Wednesday, 19 January 2011

उस्तादी उस्ताद से-उस्तादी से १९८२

फ़िल्मी क़व्वाली एक और ले आये हैं आपकी खिदमत में। ये
फिल्माई गई है रंजीता और विनोद मेहरा पर। थोड़ी कॉमेडी
वाली इस क़व्वाली में हैदराबाद से गाज़ियाबाद की सैर करवा दी
गई है। गीत में आपको मिथुन और गुज़रे ज़माने के हिट हीरो
भगवान भी दिखाई देंगे। गनीमत है जो खातून इसमें गा रही हैं
उन्होंने अपने तुगलकाबाद से होने का दावा पेश नहीं किया।





गीत के बोल :

इश्क का जो दावा जो करते थे
सारी महफ़िल से कहते थे
हाँ, इश्क का जो दावा जो करते थे
सारी महफ़िल से कहते थे
हुस्न का तोड़ेंगे गुरूर वो
जाने फिर मेरे हुज़ूर वो
क्यूँ नहीं आये यहाँ
हो चली है शब् जवान

नहीं अच्छी मोहतरमां
इस कदर भी बेसब्री
हम वो उस्ताद हैं वो
जो कभी हारे ना बाज़ी, हाँ
मर्द का यूँ उलझना
वो भी औरत से तौबा
एक उस्ताद की ये
नहीं है शान क़िबला

कौन असली है डर है
कौन असली है कौन नकली है
कौन असली है डर है
राज़ कैसे खुलेगा
अरे हट
असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
नहीं चलेगी
नहीं चलेगी, हाँ
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
उस्तादी उस्ताद से
चुप
बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के
बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
उस्तादी उस्ताद से

असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
हाँ, बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के

हमसे उलझा है जो वो हारा है
छोड़ दो जिद ये माल हमारा है
जान दे देंगे जिद ना छोड़ेंगे
ओ माल हाथों से जाने ना देंगे

तू चीज़ की ऐ
निब्बू बांध निचोड़ा तैनू
क्या चीज़ छिब्बा ते
लगती वांग दिलो वान तैनू
सुनो गज़ियाबादी
खुद को ना समझो बागी
अरे जा हैदराबादी
उड़ा जायेंगे बाज़ी
आ अगर ऐसा दावा है
तो फिर हम भी हैं राज़ी

बच के
टूटे ना शीशा टकरा के फौलाद से
टूटे ना शीशा टकरा के फौलाद से

अजी नहीं चलेगी नहीं चलेगी
नहीं चलेगी नहीं चलेगी
उस्तादी उस्ताद से

असली हैदर हैं हम
हैदराबाद के
बागी हैदर हैं हम
गाज़ियाबाद के
....................................
Ustadi ustad se-Ustadi Ustad se 1982

Saturday, 4 December 2010

लग जा गले से ऐ तन्हाई-वो जो हसीना

लग जा गले-इस थीम पर आपको एक मधुर गीत सुनवाया
अब सुनिए पुरुष आवाज़ में रंगीन युग से एक निवेदन।
निवेदन नायिका के बजाये तन्हाई से किया जा रहा है।
गीत है फिल्म वो जो हसीना से जिसके दो गीत आपको
सुनवाए जा चुके हैं। इस फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती और
रंजीता नायक-नायिका की भूमिकाओं में हैं। रवीन्द्र रावल
के लिखे बोलों को सुर में ढाला है राम-लक्ष्मण (विजय पाटिल)
ने। आवाजें है नितिन मुकेश और उषा मंगेशकर की।

नितिन मुकेश का गाया ये गीत हर समय की युवा पीढ़ी को
भाता रहा है। सरल से शब्दों में दिल की व्यथा कह दी गई
है। गीत की सबसे दमदार पंक्ति है-आग से मैंने प्यास बुझाई !
gईट का विडियो उपलब्ध नहीं है और जिस महाशय ने इस
गीत पर स्लाइड शो बनाया है उसे देख के लगता है कि ये गीत
डिप्रेशन के शिकार लोगों को ज्यादा पसंद आता है।



गीत के बोल:

लग जा गले से ऐ तन्हाई
लग जा गले से ऐ तन्हाई

प्यार मेरा निकला हरजाई
प्यार मेरा निकला हरजाई

लग जा गले से ऐ तन्हाई
प्यार मेरा निकला हरजाई
प्यार मेरा निकला हरजाई

मैं भी रो रो के दूँगी दुहाई
मैं भी रो रो के दूँगी दुहाई

कैसे करूं मैं किसी से गिला
दुनिया में होती तो मिलती वफ़ा
हो, कैसे करूं मैं किसी से गिला
दुनिया में होती तो मिलती वफ़ा

मुझको मोहब्बत रास ना आई
मुझको मोहब्बत रास ना आई
प्यार मेरा निकला हरजाई
प्यार मेरा निकला हरजाई

मैं भी रो रो के दूँगी दुहाई
मैं भी रो रो के दूँगी दुहाई

तू ही बता ऐ मेरी ज़िन्दगी
पहले कहाँ थी ये दीवानगी
हो, तू ही बता ऐ मेरी ज़िन्दगी
पहले कहाँ थी ये दीवानगी

आग से मैंने प्यास बुझाई
आग से मैंने प्यास बुझाई
प्यार मेरा निकला हरजाई
प्यार मेरा निकला हरजाई

मैं भी रो रो के दूँगी दुहाई
मैं भी रो रो के दूँगी दुहाई

Friday, 19 November 2010

बात पते की कहे मदारी-परिवार १९८७

चिट्ठाजगत पर एक शब्द देखा-ब्लॉगवुड । एकदम सटीक शब्द
है। जिन महानुभाव ने इसे सर्वप्रथम प्रयोग किया वो बधाई के
पात्र हैं। जैसे बॉलीवुडिये कहते हैं कि बॉलीवुड एक परिवार है
वैसे ही ब्लॉगवुडियों के लिए ब्लॉगवुड एक परिवार है । मदारी
और जमूरे वाला फंडा ब्लॉग जगत पर पाया जाता है। परिवार
फिल्म के नाम से एक गीत याद आया फिल्म परिवार का।आप
भी देखिये और मजा लीजिये। इसमें मिथुन चक्रवर्ती के साथ
उनकी मण्डली है जिसमे बच्चे और दो जानवर-बन्दर और
कुत्ता शामिल है।



गीत के बोल:

बोलों की अगर ज़रुरत हो तो चटका लगायें.
...........................................
Baat pate ki kahe madari-Parivar 1987
 
 
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