आपने फिल्म माचिस का "पानी पानी रे " सुना। अब सुनिए "माटी रे माटी रे"
इन पर्यावरण प्रेमी गीतों का संगीत तैयार किया है विशाल भरद्वाज ने। फिल्म माचिस
का गीत गुलज़ार का लिखा हुआ है। उन्हें दोनों गीतों के गायन के लिए सबसे उपयुक्त
लता मंगेशकर ही लगीं। गौरतलब है कि लता ने ९० के दशक के उत्तरार्ध में गायन
काफी कम कर दिया था।
प्रस्तुत गीत जावेद अख्तर का है और इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ
सन १९९९ में। गीत का विडियो पूरी कहानी की तरह है और गीत खत्म होने के बाद
इसमें हिंसक दृश्य भी शामिल हैं। फिल्म में शबाना आज़मी गॉड मदर की भूमिका
में हैं।
गीत के बोल:
माटी रे माटी रे माटी रे माटी रे
रुत आए दिन आए जो आए दुख लाए
देख ले हमने कैसे उमरिया काटी रे
माटी रे माटी रे
माटी रे माटी रे
देस छूटा गांव छूटा छूटे घर आंगन
काट ही डाले दुखो ने जन्मों के बंधन
दर्द ने ही दिल की खाई पाटी रे
माटी रे माटी रे
माटी रे माटी रे
घात कैसी कर गया मुझसे मेरा जीवन
किसका मुख दिखला रहा है तुझको ये दर्पण
हो गई कैसे मैं इतनी नाटी रे
माटी रे माटी रे
माटी रे माटी रे
.................................
Maati re maati re-God Mother 1998
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Thursday, 11 August 2011
Saturday, 29 January 2011
तुमसे नहीं पहचान मेरी-एक ही रास्ता १९७७
आइये विनोद मेहरा पर फिल्माया गया एक और गीत सुनें।
ये है फिल्म एक ही रास्ता से। एक बच्चे से हीरो मुखातिब
है और गीत के माध्यम से अपना रिश्ता मजबूत करने का
प्रयत्न करता दिखलाई पढ़ रहा है। वर्मा मालिक के लिखे
गीत को गाया है रफ़ी ने और इसकी तर्ज़ बनाई है रोशन
पुत्र राजेश ने। ये एक कम सुना गया गीत है इसलिए इसको
पहले सुनने का प्रयास करते हैं। फिल्म 'एक ही रास्ता' के बाकी
गीत हम सुनेंगे आगे.....
गीत के बोल:
तुमसे नहीं पहचान मेरी लेकिन ऐसे लगता है
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुमसे नहीं पहचान मेरी लेकिन ऐसे लगता है
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुझे देख के भूली बिसरी तस्वीर उभर आती है
याद कि धुंधली सी परछाई दिल में उतार जाती है
दोनों को ना याद हो, हो सकता है ऐसे
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुझसे मेरा क्या नाता जब समझ नहीं पाता हूँ
डूब के मैं गहराईयों में सोच के ये रह जाता हूँ
किसी जनम में तूने कोई वचन लिया हो जैसे
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुमसे नहीं पहचान मेरी लेकिन ऐसे लगता है
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
......................................
Tumse nahin pehchan meri-Ek hi rasta 1977
ये है फिल्म एक ही रास्ता से। एक बच्चे से हीरो मुखातिब
है और गीत के माध्यम से अपना रिश्ता मजबूत करने का
प्रयत्न करता दिखलाई पढ़ रहा है। वर्मा मालिक के लिखे
गीत को गाया है रफ़ी ने और इसकी तर्ज़ बनाई है रोशन
पुत्र राजेश ने। ये एक कम सुना गया गीत है इसलिए इसको
पहले सुनने का प्रयास करते हैं। फिल्म 'एक ही रास्ता' के बाकी
गीत हम सुनेंगे आगे.....
गीत के बोल:
तुमसे नहीं पहचान मेरी लेकिन ऐसे लगता है
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुमसे नहीं पहचान मेरी लेकिन ऐसे लगता है
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुझे देख के भूली बिसरी तस्वीर उभर आती है
याद कि धुंधली सी परछाई दिल में उतार जाती है
दोनों को ना याद हो, हो सकता है ऐसे
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुझसे मेरा क्या नाता जब समझ नहीं पाता हूँ
डूब के मैं गहराईयों में सोच के ये रह जाता हूँ
किसी जनम में तूने कोई वचन लिया हो जैसे
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
तुमसे नहीं पहचान मेरी लेकिन ऐसे लगता है
पहले भी किसी युग में अपना साथ रहा हो जैसे
......................................
Tumse nahin pehchan meri-Ek hi rasta 1977
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Thursday, 6 January 2011
हिंदी फिल्मों में बरसात -मैं तो कारे बदरवा से हारी -देवता १९७८
फिल्म देवता से एक और गीत सुनिए। ये गीत है गायिका लता मंगेशकर
की आवाज़ में और बरसाती गीत भी कह सकते हैं इसको। बेंजामिन गिलानी
को आप अवश्य ही पहचानते होंगे। ये दूरदर्शन के कुछ सीरिअल में दिखाई दिया
करते थे। नायिका हैं शबाना आज़मी। गुलज़ार के लिखे बोलों को धुन में जकड़ा
है आर डी बर्मन ने। ये फिल्म का कम सुना गया गीत है मगर मेरे हिसाब से
सबसे ज्यादा सुनने लायक यही है। इसका संगीत कुछ अलग हटके है और धुन
थोड़ी तेज़ भी लगती है।
गीत के बोल:
मैं तो कारे बदरवा से हारी
.........................................
बाकी के बोल डिमांड पर..........................
--------------------------------------------
Main to kaare badarwa se haari-Devta 1978
की आवाज़ में और बरसाती गीत भी कह सकते हैं इसको। बेंजामिन गिलानी
को आप अवश्य ही पहचानते होंगे। ये दूरदर्शन के कुछ सीरिअल में दिखाई दिया
करते थे। नायिका हैं शबाना आज़मी। गुलज़ार के लिखे बोलों को धुन में जकड़ा
है आर डी बर्मन ने। ये फिल्म का कम सुना गया गीत है मगर मेरे हिसाब से
सबसे ज्यादा सुनने लायक यही है। इसका संगीत कुछ अलग हटके है और धुन
थोड़ी तेज़ भी लगती है।
गीत के बोल:
मैं तो कारे बदरवा से हारी
.........................................
बाकी के बोल डिमांड पर..........................
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Main to kaare badarwa se haari-Devta 1978
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Monday, 27 December 2010
कोई ये कैसे बताये-अर्थ १९८२
एक सदाबहार गीत-नाम गुम जायेगा सुनते हुए इस गीत का ख्याल आया।
मस्तिष्क में ऐसे गीतों से धुंधली यादें दृष्टिपटल पर कुछ साफ़ सी होकर
उभरना शुरू हो जाती हैं। ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट सा गया है कुछ
समय के बहाव के साथ लपकना रह गया। ऐसे ही सुबह दोपहर शाम गुज़र
जाती है और मन कुछ अज्ञात की तलाश में इधर उधर भटकना जारी रखता
है। रोजमर्रा की दौड़ तो बस एक बहाना है मन को थोड़ी देर के लिए फुसलाने
का।
विवाहेतर संबंधों पर फ़िल्में बनती रही हैं हिंदी सिनेमा जगत में परन्तु उनको
दर्शकों की खुली स्वीकृति कभी भी प्राप्त नहीं हुई। ऐसी फ़िल्में अक्सर पुरुष ही
ज्यादा देखने जाया करते। कुछ अतिरिक्त मनोबल वाली महिलाएं भी देख लिया
करती मगर अकेले नहीं, अपने खुले विचारों वाले पतियों के साथ।वैसे मनोबल
के मामले में महिलाएं पुरुषों से मीलों आगे हैं। ये तो प्रकट मनोबल की बात
हो रही है बस। जो अप्रकट है वो अतुलनीय है।
कई बार मैं सोचता हूँ की कैफ़ी आज़मी ने शबाना के लिए कुछ ख़ास गीत लिखे
हैं और कभी लगता ये मन का वहम है। कैफ़ी तो लाजवाब शायर हैं, शबाना पर
फिल्माए गए गीत का बेहतर होना संयोग मात्र हो सकता है। ऐसी कई फ़िल्में हैं
जिनमे शबाना ने अभिनय किया है और फिल्म के गीत कैफ़ी आज़मी के लिखे
हुए हैं।
गीत के बोल:
कोई ये कैसे बताये के वो तनहा क्यूँ है
वो जो अपना था, वो और किसी का क्यों है
यही दुनिया हैं तो फिर, एसी ये दुनिया क्यों है
यही होता हैं तो, आखिर यही होता क्यों है?
इक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो, पकड़ ले दामन
उस के सीने में समा जाए, हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फासला इतना क्यों है?
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी हैं फिर से बंधाता क्यों है?
तुम मसर्रत का कहो या इसे गम का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है?
मस्तिष्क में ऐसे गीतों से धुंधली यादें दृष्टिपटल पर कुछ साफ़ सी होकर
उभरना शुरू हो जाती हैं। ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट सा गया है कुछ
समय के बहाव के साथ लपकना रह गया। ऐसे ही सुबह दोपहर शाम गुज़र
जाती है और मन कुछ अज्ञात की तलाश में इधर उधर भटकना जारी रखता
है। रोजमर्रा की दौड़ तो बस एक बहाना है मन को थोड़ी देर के लिए फुसलाने
का।
विवाहेतर संबंधों पर फ़िल्में बनती रही हैं हिंदी सिनेमा जगत में परन्तु उनको
दर्शकों की खुली स्वीकृति कभी भी प्राप्त नहीं हुई। ऐसी फ़िल्में अक्सर पुरुष ही
ज्यादा देखने जाया करते। कुछ अतिरिक्त मनोबल वाली महिलाएं भी देख लिया
करती मगर अकेले नहीं, अपने खुले विचारों वाले पतियों के साथ।वैसे मनोबल
के मामले में महिलाएं पुरुषों से मीलों आगे हैं। ये तो प्रकट मनोबल की बात
हो रही है बस। जो अप्रकट है वो अतुलनीय है।
कई बार मैं सोचता हूँ की कैफ़ी आज़मी ने शबाना के लिए कुछ ख़ास गीत लिखे
हैं और कभी लगता ये मन का वहम है। कैफ़ी तो लाजवाब शायर हैं, शबाना पर
फिल्माए गए गीत का बेहतर होना संयोग मात्र हो सकता है। ऐसी कई फ़िल्में हैं
जिनमे शबाना ने अभिनय किया है और फिल्म के गीत कैफ़ी आज़मी के लिखे
हुए हैं।
गीत के बोल:
कोई ये कैसे बताये के वो तनहा क्यूँ है
वो जो अपना था, वो और किसी का क्यों है
यही दुनिया हैं तो फिर, एसी ये दुनिया क्यों है
यही होता हैं तो, आखिर यही होता क्यों है?
इक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो, पकड़ ले दामन
उस के सीने में समा जाए, हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फासला इतना क्यों है?
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी हैं फिर से बंधाता क्यों है?
तुम मसर्रत का कहो या इसे गम का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है?
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Tuesday, 21 December 2010
चाँद चुरा के लाया हूँ -देवता १९७८
आज फिल्म देवता से गीत सुनिए। ना ना, ये वो पुरानी देवता फिल्म
नहीं है जिसमें सी रामचंद्र का संगीत है। ये तो सन १९७८ में आई
संजीव कुमार और शबाना आज़मी की जोड़ी वाली फिल्म है जिसमें
उनके साथ एक और प्रतिभाशाली कलाकार डैनी ने काम किया। इस
फिल्म का संगीत काफी सुना गया और सराहा गया।
बदलाव के लिए आपको आज फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत पहले
सुनवाते हैं। इसे गाया है लता और किशोर ने। बोल हैं एक नामचीन
गीतकार के और संगीत है आर दी बर्मन का। इस फिल्म का प्रोमो रेडियो
पर खूब बजा करता और उसमें संजीव कुमार का एक डॉयलॉग सुनवाया
जाता जिसे हम अगली पोस्ट में पढेंगे। बोल किसके हैं पहचानिए और
ना पहचान पायें तभी गीत के टैग देखें।
गीत के बोल:
चाँद चुरा के लाया हूँ
चाँद चुरा के लाया हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
हो, ना कोई देखे ना पहचाने
बैठें पेड़ के नीचे
अरे चल बैठें चर्च के पीछे
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
अरे जो होना था कल हुआ था
आज तो आज की सोचो
जाग गए तो
जागने दो
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
हो ढूँढ ना पाएँ बस्ती वाले साहिल से कह जाएँ
बोल दिया तो
बोलने दो ना
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
नहीं है जिसमें सी रामचंद्र का संगीत है। ये तो सन १९७८ में आई
संजीव कुमार और शबाना आज़मी की जोड़ी वाली फिल्म है जिसमें
उनके साथ एक और प्रतिभाशाली कलाकार डैनी ने काम किया। इस
फिल्म का संगीत काफी सुना गया और सराहा गया।
बदलाव के लिए आपको आज फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत पहले
सुनवाते हैं। इसे गाया है लता और किशोर ने। बोल हैं एक नामचीन
गीतकार के और संगीत है आर दी बर्मन का। इस फिल्म का प्रोमो रेडियो
पर खूब बजा करता और उसमें संजीव कुमार का एक डॉयलॉग सुनवाया
जाता जिसे हम अगली पोस्ट में पढेंगे। बोल किसके हैं पहचानिए और
ना पहचान पायें तभी गीत के टैग देखें।
गीत के बोल:
चाँद चुरा के लाया हूँ
चाँद चुरा के लाया हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
हो, ना कोई देखे ना पहचाने
बैठें पेड़ के नीचे
अरे चल बैठें चर्च के पीछे
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
कल बापू जाग गए थे मेरी लाज की सोचो
अरे जो होना था कल हुआ था
आज तो आज की सोचो
जाग गए तो
जागने दो
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
ओ चाँद चुरा के लाई हूँ
चल बैठें चर्च के पीछे
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
चल दरिया पर कश्ती ले चल दूर कहीं बह जाएँ
हो ढूँढ ना पाएँ बस्ती वाले साहिल से कह जाएँ
बोल दिया तो
बोलने दो ना
अच्छा
हाँ
तो फिर चल बैठें चर्च के पीछे
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Wednesday, 15 December 2010
चाँद के पास जो सितारा है-स्वीकार किया मैंने १९८३
उषा खन्ना के संगीत खजाने से एक मधुर युगल गीत
सुनवाते हैं आपको। लता और किशोर का गाया युगल
गीत फुर्सत के क्षणों में बनाया गया सा लगता है। कवि
एक कदम आगे बढ़ गया है और चाँद को छोड़ कर उसके
पास के सितारे पर नज़र गड़ा ली और उसको हसीं
बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये बात तो पते की है
की जब कोई व्यक्ति खुश होता है तो उसको आस पास
की दुनिया खुशनुमा दिखाई देने लगती है और जब किसी
से इश्क हो जाए तो सब जगह प्यार मोहब्बत का माहौल
नज़र आता है।
सन १९८३ का वर्ष काफी समृद्ध रहा फिल्म संगीत के मामले
मामले में। ये गीत मुझे पिछली पोस्ट पढ़ कर ध्यान में आया।
८० के दशक में गायक, गीतकार, संगीतकार, फिल्म के नायक
नायिका और जो छोट गए हों वे सब, बड़े बड़े दिग्गज मौजूद थे
और ये एक संधि काल जैसा था पुराने युग और ९० के दशक में
आने वाले नए युग का। इस दौर में कई नई प्रतिभाओं का आगमन
हुआ तो कुछ स्थापित गायक और कलाकार हमसे बिछड़ भी गए।
गीत फिल्माया गया है शबाना आज़मी और विनोद मेहरा पर
जिनकी जोड़ी आपको शायद ही किसी और फिल्म में देखने को
मिले। 'स्वीकार किया मैंने' का एक गीत आप सुन चुके है पहले
गीत के बोल:
चाँद के पास जो
चाँद के पास जो सितारा है
वो सितारा हसीं लगता है
जब से तुम हो मेरी निगाहों में
जब से तुम हो मेरी निगाहों में
हर नज़ारा हसीं लगता है
हर नज़ारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है।
ज़िन्दगी दो दिलों की चाहत है
ज़िन्दगी दो दिलों की चाहत है
ज़िन्दगी दो दिलों की चाहत है
हर ख़ुशी प्यार की अमानत है
प्यार के पास जो
प्यार के पास जो सहारा है
वो सहारा हसीं लगता है
वो सहारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है
रात तन्हाईयों की दुश्मन है
रात तन्हाईयों की दुश्मन है
रात तन्हाईयों की दुश्मन है
हर सफ़र हमसफ़र से रोशन है
मौज के पास जो
मौज के पास जो किनारा है
वो किनारा हसीं लगता है
वो किनारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है
आज की रात है मुरादों की
आज की रात है मुरादों की
आज की रात है मुरादों की
रौशनी है नए इरादों की
शमा के पास जो
शमा के पास जो शरारा है
वो शरारा हसीं लगता है
वो शरारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है
चाँद के पास जो सितारा है
वो सितारा हसीं लगता है
वो सितारा हसीं लगता है
...........................
Chand ke paas jo sitara hai-Sweekar Kiya Maine 1983
सुनवाते हैं आपको। लता और किशोर का गाया युगल
गीत फुर्सत के क्षणों में बनाया गया सा लगता है। कवि
एक कदम आगे बढ़ गया है और चाँद को छोड़ कर उसके
पास के सितारे पर नज़र गड़ा ली और उसको हसीं
बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये बात तो पते की है
की जब कोई व्यक्ति खुश होता है तो उसको आस पास
की दुनिया खुशनुमा दिखाई देने लगती है और जब किसी
से इश्क हो जाए तो सब जगह प्यार मोहब्बत का माहौल
नज़र आता है।
सन १९८३ का वर्ष काफी समृद्ध रहा फिल्म संगीत के मामले
मामले में। ये गीत मुझे पिछली पोस्ट पढ़ कर ध्यान में आया।
८० के दशक में गायक, गीतकार, संगीतकार, फिल्म के नायक
नायिका और जो छोट गए हों वे सब, बड़े बड़े दिग्गज मौजूद थे
और ये एक संधि काल जैसा था पुराने युग और ९० के दशक में
आने वाले नए युग का। इस दौर में कई नई प्रतिभाओं का आगमन
हुआ तो कुछ स्थापित गायक और कलाकार हमसे बिछड़ भी गए।
गीत फिल्माया गया है शबाना आज़मी और विनोद मेहरा पर
जिनकी जोड़ी आपको शायद ही किसी और फिल्म में देखने को
मिले। 'स्वीकार किया मैंने' का एक गीत आप सुन चुके है पहले
गीत के बोल:
चाँद के पास जो
चाँद के पास जो सितारा है
वो सितारा हसीं लगता है
जब से तुम हो मेरी निगाहों में
जब से तुम हो मेरी निगाहों में
हर नज़ारा हसीं लगता है
हर नज़ारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है।
ज़िन्दगी दो दिलों की चाहत है
ज़िन्दगी दो दिलों की चाहत है
ज़िन्दगी दो दिलों की चाहत है
हर ख़ुशी प्यार की अमानत है
प्यार के पास जो
प्यार के पास जो सहारा है
वो सहारा हसीं लगता है
वो सहारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है
रात तन्हाईयों की दुश्मन है
रात तन्हाईयों की दुश्मन है
रात तन्हाईयों की दुश्मन है
हर सफ़र हमसफ़र से रोशन है
मौज के पास जो
मौज के पास जो किनारा है
वो किनारा हसीं लगता है
वो किनारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है
आज की रात है मुरादों की
आज की रात है मुरादों की
आज की रात है मुरादों की
रौशनी है नए इरादों की
शमा के पास जो
शमा के पास जो शरारा है
वो शरारा हसीं लगता है
वो शरारा हसीं लगता है
चाँद के पास जो सितारा है
चाँद के पास जो सितारा है
वो सितारा हसीं लगता है
वो सितारा हसीं लगता है
...........................
Chand ke paas jo sitara hai-Sweekar Kiya Maine 1983
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