गायक जगजीत सिंह ने अपने जीवनकाल में एक बहुत बड़ा प्रशंसक वर्ग
बनाया जिसमें आम आदमी भी शामिल है। जादुई आवाज़ के मालिक
जगजीत सिंह जीवन के उतार चढ़ाव के बीच भी नियमित रूप से सक्रिय
रहे और श्रोताओं को अपनी नई रचनाओं से आनंदित करते रहे।
जगजीत सिंह की खनकती आवाज़ का मैं बहुत बड़ा मुरीद हूँ और ता-उम्र
रहूँगा। कुछ दिन पूर्व जब उनके अस्वस्थ होने और चिकित्सालय में भर्ती
होने का समाचार मिला तभी मन सशंकित हो उठा था। ईश्वर से उनके जल्द
स्वस्थ होने की कामना ही करता रह गया। शायद ईश्वर को उनकी रचनाएँ
सुनने की ज़रुरत महसूस हुई और उन्हें अपने पास बुला लिया । नश्वर संसार है,
जिसने जन्म लिया है उसे यहाँ से एक ना एक दिन जाना ही है। आना-जाना
लगा रहता है मगर जिससे जुड़ाव हो जाता है उसके जाने का दुःख रह रह कर
टीसता रहता है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिवार
एवं करीबी लोगों को इस दुःख को सहने का हौसला दे।
आज उनको (रोज एक ना एक बार उनको याद कर लेते हैं किसी ना किसी बहाने)
याद करते हुए उनकी ५ रचनाएँ आपके लिए प्रस्तुत हैं।
1) मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था। .......................
ये ग़ज़ल मुझे उनकी गई रचनाओं में जो सबसे ज्यादा पसंद हैं उनमें से एक है।
तन्हाई का अपना पुराना रिश्ता रहा है और समय के साथ साथ मजबूत हो
गया है। इसको सुनो तो लगता है अपनी ही कहानी सुन रहे हों। म्यूज़िक विडियो
जगत में इस रचना ने अपना एक अलग स्थान बना रखा है और इसे हर उम्र
वर्ग के श्रोताओं -दर्शकों ने पसंद किया है।
2) गहरे ज़ख्मों को भरने में वक़्त तो लगता है ...................
हर चीज़ इस जीवन की अपना समय लेती है। वैसे ही प्यार का पहला ख़त
लिखने में भी असमंजस की स्तिथि होती है-क्या लिखूं क्या ना लिखूं।
३) मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन......................
समय निकलने के साथ साथ क्या क्या नहीं छूट जाता हाथ से।
बाद में याद आते हैं वो सुहाने दिन और मन आह कर उठता है ।
4) जान बाकी है मगर सांस रुकी हो जैसे ........
हम भी चुप हैं, तुम भी चुप हो मगर आँखों ने कुछ कह दिया हो जैसे।
मन में बहुत सी बातें हैं, किसी कहूं, तुम्हीं बताओ ? कुछ तुम ही सुना दो।
एक "हाँ" सुनने में कभी कभी जीवन बीत जाता है।
5) कहाँ तुम चले गये ........................
जाने वाले इतने चुपके से क्यूँ जाते हैं कि मन में कई बातें, कई सवाल रह
जाते हैं। अभी तुमसे कितनी बातें करनी थीं, अभी तुमसे ये पूछना था,
अभी तुमसे ये सुनना था-सब अधूरा रह जाता है ।
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Wednesday, 12 October 2011
Wednesday, 3 August 2011
प्यार मुझसे जो किया तुमने-साथ साथ १९८२
अब सुनते हैं दूसरी अलग हट के बनी फिल्म से एक गीत। फिल्म का
नाम है साथ साथ इसका एक गीत आपको सुनवा चुके हैं पहले। अब सुनते
हैं दूसरा गीत जो जगजीत सिंह की आवाज़ में है। विडियो उपलब्ध नहीं है इसका
यू ट्यूब पर अतः ऑडियो से ही काम चला लें। बोल जावेद अख्तर के हैं और
संगीत कुलदीप सिंह का।
गीत के बोल:
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालत की आंधी में बिखर जओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ
ये तो बस मैं हूँ के इस हाल में भी ज़िन्दा हूँ
ख्वाब क्यूं देखूँ वो कल जिसपे मैं शर्मिन्दा हूँ
मैं जो शर्मिन्दा हुआ तुम भी तो शरमाओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
क्यूं मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुमको तो आसान रहे
हमसफ़र मुझको बनओगी तो पछताओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
एक मैं क्या अभी आयेंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
.......................................
Pyar mujhse jo kiya tumne-Saath saath 1982
नाम है साथ साथ इसका एक गीत आपको सुनवा चुके हैं पहले। अब सुनते
हैं दूसरा गीत जो जगजीत सिंह की आवाज़ में है। विडियो उपलब्ध नहीं है इसका
यू ट्यूब पर अतः ऑडियो से ही काम चला लें। बोल जावेद अख्तर के हैं और
संगीत कुलदीप सिंह का।
गीत के बोल:
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालत की आंधी में बिखर जओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ
ये तो बस मैं हूँ के इस हाल में भी ज़िन्दा हूँ
ख्वाब क्यूं देखूँ वो कल जिसपे मैं शर्मिन्दा हूँ
मैं जो शर्मिन्दा हुआ तुम भी तो शरमाओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
क्यूं मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुमको तो आसान रहे
हमसफ़र मुझको बनओगी तो पछताओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
एक मैं क्या अभी आयेंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी
प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
.......................................
Pyar mujhse jo kiya tumne-Saath saath 1982
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Saath saath
Tuesday, 31 May 2011
कल चौदहवीं की रात थी-गैर फ़िल्मी गीत जगजीत सिंह
किसी अमावस्या के दिन हम ये ग़ज़ल अवश्य याद कर सकते
हैं- कल चौदहवीं की रात थी। गीतकारों और शायरों ने चाँद के बारे
में लिखा है तो रात की खूबसूरती का बयां भी अपने अपने अंदाज़ में
किया है। इसको कई गायकों ने गाया है।
आज हम आपको सुनवा रहे हैं जगजीत सिंह की खनकती हुई
आवाज़ में यही ग़ज़ल। इसका शुरुआती वर्ज़न(८० के दशक वाला)
थोड़ा अधिक मीठा है। इसमें भी मिठास है मगर "लो कैलोरी वाली" ।
स्टेज शो में आपके पास पूरा स्कोप होता है घुमा घुमा के चौके देने का।
प्रस्तुतइ में तबला वादक और वायलिन वादक को भी २०-२०
खेलने का भरपूर अवसर मिला है। यहाँ जगजीत सिंह के गाने के
अंदाज़ से आपको दो गायक ज़रूर याद आयेंगे-अनूप जलोटा और
गुलाम अली। इब्ने इंशा नाम के मशहूर शायर ने इस ग़ज़ल को
लिखा है और जब भी इसको सुनो ऐसा लगता है ताज़े फूल अभी
अभी बागान से लाये गये हों।
गीत के बोल:
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी शब् भर रहा चर्चा तेरा
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कुछ ने कहा ये चाँद है
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा
हम भी वहीँ मौजूद थे हम से भी सब पूछा किये
हम हंस दिए, हम चुप रहे मंज़ूर था पर्दा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
इस शहर में किससे मिलें हमसे तो छूटी महफ़िलें
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कूचे को तेरे छोड़कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगले तेरे, परबत तेरे बस्ती तेरी, सेहरा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
बेदर्द सुननी हो तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक तेरा, रुसवां तेरा शायर तेरा, इंशा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कुछ ने कहा यह चाँद है
कुछ ने कहा यह चाँद है
कुछ ने कहा चेहरा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
..................................
Kal chaudvin ki raat thi-Jagjit Singh
हैं- कल चौदहवीं की रात थी। गीतकारों और शायरों ने चाँद के बारे
में लिखा है तो रात की खूबसूरती का बयां भी अपने अपने अंदाज़ में
किया है। इसको कई गायकों ने गाया है।
आज हम आपको सुनवा रहे हैं जगजीत सिंह की खनकती हुई
आवाज़ में यही ग़ज़ल। इसका शुरुआती वर्ज़न(८० के दशक वाला)
थोड़ा अधिक मीठा है। इसमें भी मिठास है मगर "लो कैलोरी वाली" ।
स्टेज शो में आपके पास पूरा स्कोप होता है घुमा घुमा के चौके देने का।
प्रस्तुतइ में तबला वादक और वायलिन वादक को भी २०-२०
खेलने का भरपूर अवसर मिला है। यहाँ जगजीत सिंह के गाने के
अंदाज़ से आपको दो गायक ज़रूर याद आयेंगे-अनूप जलोटा और
गुलाम अली। इब्ने इंशा नाम के मशहूर शायर ने इस ग़ज़ल को
लिखा है और जब भी इसको सुनो ऐसा लगता है ताज़े फूल अभी
अभी बागान से लाये गये हों।
गीत के बोल:
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी शब् भर रहा चर्चा तेरा
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कुछ ने कहा ये चाँद है
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा
हम भी वहीँ मौजूद थे हम से भी सब पूछा किये
हम हंस दिए, हम चुप रहे मंज़ूर था पर्दा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
इस शहर में किससे मिलें हमसे तो छूटी महफ़िलें
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कूचे को तेरे छोड़कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगले तेरे, परबत तेरे बस्ती तेरी, सेहरा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
बेदर्द सुननी हो तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक तेरा, रुसवां तेरा शायर तेरा, इंशा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कल चौदहवीं की रात थी
शब् भर रहा चर्चा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
कुछ ने कहा यह चाँद है
कुछ ने कहा यह चाँद है
कुछ ने कहा चेहरा तेरा
कल चौदहवीं की रात थी
..................................
Kal chaudvin ki raat thi-Jagjit Singh
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Non film song
Wednesday, 19 January 2011
छल्ला-लौंग दा लश्कारा १९८६
गुरदास मान(ਗੁਰਦਾਸ ਮਾਨ) पंजाबी संगीत में नामी हस्ती हैं। उनके साथ
परदे पर आपको हिंदी सिनेमा की एक बड़ी हस्ती भी दिखेगी-राज बब्बर।
आज सुनिए युगों पुराना पंजाबी लोक गीत-छल्ला। इसको समय समय
पर कई कलाकाओं ने अपने अंदाज़ में गाया है। फिल्म में संगीत
जगजीत सिंह का है,जी हाँ वही-प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक।
गीत के बोल:
हो जावो नी कोई मोर लियावो,
नी मेरे नाल गया आज्ज लड़ के,
ओह अल्लाह करे जे आ जावे सोहना,
देवां जान कदमा विच धर के
हो छल्ला बेरी ओये बूर ऐ, वे वतन माहि दा
दूर ऐ, वे जाना पहले
पूर ऐ, वे गल सुन छल्लेया
छोरा, वे काहदा ला अई झोरा
ओ छल्ला खूह ते धरिये, छल्ला खूह ते धरिये
छल्ला खूह ते धरिये, वे गल्लां मूह ते करिए,
वे सच्चे रब तों डरिये, वे गल सुन छल्लेया
ढोला, वे रब्ब तों साद अई ओहला.
ओ छल्ला कालियां मर्चां होए ,
ओ छल्ला कालियां मर्चां
छल्ला कालियां मर्चां
छल्ला कालियां मर्चां, वे मोहरा पी के
मर्सां, वे सिरे तेरे चढ्सन,
वे गल सुन छल्लेया ,
ढोल वे साद के कीट अई कोला
हो छल्ला नौ नौ खेवे,
हो छल्ला नौ नौ खेवे
छल्ला नौ नौ खेवे
छल्ला नौ नौ खेवे वे पुत्तर मिठड़े मेवे,
वे अल्लाह सभ नु देवे,
वे गल सुन छल्लेया
कांवां , वे मांवां ठंडियाँ छांवां
हो छल्ला कण दियां डंडियाँ होए,
हो छल्ला कण दियां डंडियाँ
छल्ला कण दियां डंडियाँ
छल्ला कण दियां डंडियाँ
छल्ला कण दियां डंडियाँ , वे सारे पिंड विच भंडियाँ,
वे गल्लां छज्ज पा छंदियाँ,
वे गल सुन छल्लेया
ढोल, वे साड के कीत अई कोला.
ओ छल्ला गल दी वे गानी,
छल्ला गल दी गानी
छल्ला गल दी गानी
छल्ला गल दी गानी वे तुर गए दिलं दे जानी
वे मेरी दुखन दी कहानी, वे आ के सुन जा
ढोल वे तेत्तों साद अई ओला
ओ छल्ला पाया आई गहणे होए,
ओ छल्ला पाया आई गहणे
छल्ला पाया आई गहणे
छल्ला पाया आई गहणे
छल्ला पाया आई गहणे, वे सजन वेली ना रहणे
वे दुःख ते जिंदड़ी दे सहने, वे गल सुन छल्या
ढोल वे कहदा पाणा अई रौला
इसके बोल में सुधार करने में मेरी मदद करें।
...........................................
Chhalla(Gurdaas Maan)-Laung da lishkara 1986
परदे पर आपको हिंदी सिनेमा की एक बड़ी हस्ती भी दिखेगी-राज बब्बर।
आज सुनिए युगों पुराना पंजाबी लोक गीत-छल्ला। इसको समय समय
पर कई कलाकाओं ने अपने अंदाज़ में गाया है। फिल्म में संगीत
जगजीत सिंह का है,जी हाँ वही-प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक।
गीत के बोल:
हो जावो नी कोई मोर लियावो,
नी मेरे नाल गया आज्ज लड़ के,
ओह अल्लाह करे जे आ जावे सोहना,
देवां जान कदमा विच धर के
हो छल्ला बेरी ओये बूर ऐ, वे वतन माहि दा
दूर ऐ, वे जाना पहले
पूर ऐ, वे गल सुन छल्लेया
छोरा, वे काहदा ला अई झोरा
ओ छल्ला खूह ते धरिये, छल्ला खूह ते धरिये
छल्ला खूह ते धरिये, वे गल्लां मूह ते करिए,
वे सच्चे रब तों डरिये, वे गल सुन छल्लेया
ढोला, वे रब्ब तों साद अई ओहला.
ओ छल्ला कालियां मर्चां होए ,
ओ छल्ला कालियां मर्चां
छल्ला कालियां मर्चां
छल्ला कालियां मर्चां, वे मोहरा पी के
मर्सां, वे सिरे तेरे चढ्सन,
वे गल सुन छल्लेया ,
ढोल वे साद के कीट अई कोला
हो छल्ला नौ नौ खेवे,
हो छल्ला नौ नौ खेवे
छल्ला नौ नौ खेवे
छल्ला नौ नौ खेवे वे पुत्तर मिठड़े मेवे,
वे अल्लाह सभ नु देवे,
वे गल सुन छल्लेया
कांवां , वे मांवां ठंडियाँ छांवां
हो छल्ला कण दियां डंडियाँ होए,
हो छल्ला कण दियां डंडियाँ
छल्ला कण दियां डंडियाँ
छल्ला कण दियां डंडियाँ
छल्ला कण दियां डंडियाँ , वे सारे पिंड विच भंडियाँ,
वे गल्लां छज्ज पा छंदियाँ,
वे गल सुन छल्लेया
ढोल, वे साड के कीत अई कोला.
ओ छल्ला गल दी वे गानी,
छल्ला गल दी गानी
छल्ला गल दी गानी
छल्ला गल दी गानी वे तुर गए दिलं दे जानी
वे मेरी दुखन दी कहानी, वे आ के सुन जा
ढोल वे तेत्तों साद अई ओला
ओ छल्ला पाया आई गहणे होए,
ओ छल्ला पाया आई गहणे
छल्ला पाया आई गहणे
छल्ला पाया आई गहणे
छल्ला पाया आई गहणे, वे सजन वेली ना रहणे
वे दुःख ते जिंदड़ी दे सहने, वे गल सुन छल्या
ढोल वे कहदा पाणा अई रौला
इसके बोल में सुधार करने में मेरी मदद करें।
...........................................
Chhalla(Gurdaas Maan)-Laung da lishkara 1986
Monday, 27 December 2010
कोई ये कैसे बताये-अर्थ १९८२
एक सदाबहार गीत-नाम गुम जायेगा सुनते हुए इस गीत का ख्याल आया।
मस्तिष्क में ऐसे गीतों से धुंधली यादें दृष्टिपटल पर कुछ साफ़ सी होकर
उभरना शुरू हो जाती हैं। ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट सा गया है कुछ
समय के बहाव के साथ लपकना रह गया। ऐसे ही सुबह दोपहर शाम गुज़र
जाती है और मन कुछ अज्ञात की तलाश में इधर उधर भटकना जारी रखता
है। रोजमर्रा की दौड़ तो बस एक बहाना है मन को थोड़ी देर के लिए फुसलाने
का।
विवाहेतर संबंधों पर फ़िल्में बनती रही हैं हिंदी सिनेमा जगत में परन्तु उनको
दर्शकों की खुली स्वीकृति कभी भी प्राप्त नहीं हुई। ऐसी फ़िल्में अक्सर पुरुष ही
ज्यादा देखने जाया करते। कुछ अतिरिक्त मनोबल वाली महिलाएं भी देख लिया
करती मगर अकेले नहीं, अपने खुले विचारों वाले पतियों के साथ।वैसे मनोबल
के मामले में महिलाएं पुरुषों से मीलों आगे हैं। ये तो प्रकट मनोबल की बात
हो रही है बस। जो अप्रकट है वो अतुलनीय है।
कई बार मैं सोचता हूँ की कैफ़ी आज़मी ने शबाना के लिए कुछ ख़ास गीत लिखे
हैं और कभी लगता ये मन का वहम है। कैफ़ी तो लाजवाब शायर हैं, शबाना पर
फिल्माए गए गीत का बेहतर होना संयोग मात्र हो सकता है। ऐसी कई फ़िल्में हैं
जिनमे शबाना ने अभिनय किया है और फिल्म के गीत कैफ़ी आज़मी के लिखे
हुए हैं।
गीत के बोल:
कोई ये कैसे बताये के वो तनहा क्यूँ है
वो जो अपना था, वो और किसी का क्यों है
यही दुनिया हैं तो फिर, एसी ये दुनिया क्यों है
यही होता हैं तो, आखिर यही होता क्यों है?
इक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो, पकड़ ले दामन
उस के सीने में समा जाए, हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फासला इतना क्यों है?
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी हैं फिर से बंधाता क्यों है?
तुम मसर्रत का कहो या इसे गम का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है?
मस्तिष्क में ऐसे गीतों से धुंधली यादें दृष्टिपटल पर कुछ साफ़ सी होकर
उभरना शुरू हो जाती हैं। ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट सा गया है कुछ
समय के बहाव के साथ लपकना रह गया। ऐसे ही सुबह दोपहर शाम गुज़र
जाती है और मन कुछ अज्ञात की तलाश में इधर उधर भटकना जारी रखता
है। रोजमर्रा की दौड़ तो बस एक बहाना है मन को थोड़ी देर के लिए फुसलाने
का।
विवाहेतर संबंधों पर फ़िल्में बनती रही हैं हिंदी सिनेमा जगत में परन्तु उनको
दर्शकों की खुली स्वीकृति कभी भी प्राप्त नहीं हुई। ऐसी फ़िल्में अक्सर पुरुष ही
ज्यादा देखने जाया करते। कुछ अतिरिक्त मनोबल वाली महिलाएं भी देख लिया
करती मगर अकेले नहीं, अपने खुले विचारों वाले पतियों के साथ।वैसे मनोबल
के मामले में महिलाएं पुरुषों से मीलों आगे हैं। ये तो प्रकट मनोबल की बात
हो रही है बस। जो अप्रकट है वो अतुलनीय है।
कई बार मैं सोचता हूँ की कैफ़ी आज़मी ने शबाना के लिए कुछ ख़ास गीत लिखे
हैं और कभी लगता ये मन का वहम है। कैफ़ी तो लाजवाब शायर हैं, शबाना पर
फिल्माए गए गीत का बेहतर होना संयोग मात्र हो सकता है। ऐसी कई फ़िल्में हैं
जिनमे शबाना ने अभिनय किया है और फिल्म के गीत कैफ़ी आज़मी के लिखे
हुए हैं।
गीत के बोल:
कोई ये कैसे बताये के वो तनहा क्यूँ है
वो जो अपना था, वो और किसी का क्यों है
यही दुनिया हैं तो फिर, एसी ये दुनिया क्यों है
यही होता हैं तो, आखिर यही होता क्यों है?
इक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो, पकड़ ले दामन
उस के सीने में समा जाए, हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फासला इतना क्यों है?
दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
इक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी हैं फिर से बंधाता क्यों है?
तुम मसर्रत का कहो या इसे गम का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है?
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Rajkiran,
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