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Sunday, 28 August 2011

थोडा है थोड़े की ज़रूरत है-खट्टा मीठा १९७७

फिल्म नरम गरम से एक गीत और याद आया फिल्म खट्टा मीठा

का। निहायत ही खुशनुमा और उम्मीदें जगाने वाला गीत है ये।

इस फिल्म के कथानक ने मुझे काफी प्रभावित किया।



गीत का सार है-थोड़ा ही तो चाहिए। जीवन में थोड़ा थोड़ा सब

कुछ प्रसाद स्वरुप मिलता रहे तो आनंद ही आनंद है। आनंद तो है

मगर थोड़े में संतोष करने पर ही।



गीत लिखा है गुलज़ार ने और इसे गाया है किशोर कुमार एवं

लता मंगेशकर ने। इसे आप राजेश रोशन द्वारा संगीतबद्ध सर्वश्रेष्ठ

रचनाओं में से एक गिन सकते हैं। गुलज़ार बिना कुछ अलग हट के

और कुछ लीक से हटकर बने गीतों की आप कल्पना नहीं कर सकते

हैं. भारतीय सिनेमा का एक अवश्यक तत्त्व से हैं गुलज़ार। गुलज़ार

को हिंदी फ़िल्मी गीत में प्रयोगधर्मिता का मसीहा कहें तो अतिशयोक्ति

नहीं होना चाहिए।



गीत को आप परफेक्ट युगल गीत कह सकते हैं। ऐसे गीत सुनने में बेहद

रोचक लगते हैं जिसमें दो शब्द गायक, दो शब्द गायिका गाये। इसे आप

अकेले गुनगुनाएं तो आनंद नहीं आएगा। साथ में कोई होना ज़रूरी है इसे

गुनगुनाने के लिए। खुशकिस्मत हैं वो लोग जिन्हें साथ में कोई ना कोई

गुनगुनाने वाला मिलता है।



गीत में आपको महानायक अमिताभ की एक झलक दिख जाएगी।







हुं हुं हुं, हे हे हे, ला ला ला ला ला ला



थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है

ज़िंदगी फिर भी अहा ख़ूबसूरत है

थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है



जिस दिन पैसा होगा

वो दिन कैसा होगा

उस दिन पहिये घूमेंगे

और क़िस्मत के लब चूमेंगे

बोलो ऐसा होगा



थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है



सुन सुन सुन हवा चली, सबा चली

तेरे आँचल से उड़ के घटा चली



सुन सुन सुन कहाँ चली कहाँ चली

मैं छूने ज़रा आसमाँ चली

बादल पे उड़ना होगा

थोड़ा है, थोड़े की

ज़रूरत है, हाँ ज़रूरत है, हो ज़रूरत है



हमने सपना देखा है

कोई अपना देखा है

हमने सपना देखा है

कोई अपना देखा है

जब रात का घूँघट उतरेगा

और दिन की डोली गुज़रेगी

तब सपना पूरा होगा

थोड़ा है, थोड़े की

ज़रूरत है

ज़िंदगी, फिर भी अहा, ख़ूबसूरत है

थोड़ा है, थोड़े की, ज़रूरत है

..............................................

Thoda hai thode ki zaroorat-Khatta Meetha 1977

Sunday, 19 June 2011

अभी अभी थी दुश्मनी-ज़ख़्मी १९७५

एक मनोरंजक और नटखट गीत देखते हैं। आखिर
बहुत दिन हो गये हैं हमें ऐसा गीत सुने। फिर हमें
सौम्यता का स्वर्ण पदक भी तो नहीं प्राप्त करना है
ब्लॉग पुरस्कारों में।

जवानी के दौर में जब आप किसी लड़की की ऊँगली मुंह
में डालते हैं तो दिल के अन्दर से व्ह्यऊँ व्ह्यऊँ ट्यून ट्यून
की ध्वनियाँ निकलने लगती है। गीत की शुरुआत में इसे
बड़े ही अनोखे अंदाज़ में दिखाया गया है। जो भी पाठक
जवानी के दौर में हैं या गुज़र चुके हैं उन्होंने इसे ज़रूर
महसूस किया होगा। युवा रीना राय और राजेश रोशन पर
फिल्माया गया ये गीत लता मंगेशकर का गाया हुआ
है, इसे लिखा गौहर कानपुरी ने और संगीत से संवारा
है बप्पी लहरी ने।






गीत के बोल:

अभी अभी थी दुश्मनी अभी है दोस्ती
दिल विल मेरी मंजिल नहीं
चली रे
अभी अभी थी दुश्मनी अभी है दोस्ती
दिल विल मेरी मंजिल नहीं
चली रे

हा, छोड़ ना

गोरी गोरी बाहों को अरे अरे छोडो जी
देखो इन अदाओं से नाता नहीं जोड़ो जी
गोरी गोरी बाहों को अरे अरे छोडो जी
देखो इन अदाओं से नाता नहीं जोड़ो जी
इसके आगे प्यार है, प्यार बेकार है

अभी अभी थी दुश्मनी अभी है दोस्ती
दिल विल मेरी मंजिल नहीं
चली रे

ऐसे ही अकेले में प्यार किया जाता है
कसम खायी जाती है वादा किया जाता है, हा
ऐसे ही अकेले में प्यार किया जाता है
कसम खायी जाती है वादा किया जाता है
बाद में फिर शादी है, शादी में बर्बादी है


अभी अभी थी दुश्मनी अभी है दोस्ती
दिल विल मेरी मंजिल नहीं
चली रे
ला ला ला ला ला ला ला ला ला
चली रे
..................................
Abhi abhi thi dushmani-Zakhmi 1975

Wednesday, 2 February 2011

बागों में खिले हैं कैसे कैसे फुलवा-शुभकामना १९८३

आपको फिल्म सितारा के दो गीत सुनवाए। उम्मीद है
पसंद आये होंगे। अब सुनिए एक कम सुना हुआ कर्णप्रिय
गीत जो कम देखी गई फिल्म शुभकामना से है। इसे
आशा भोंसले और एस पी बालसुब्रमण्यम ने गाया है।
फिल्म में रति अग्निहोत्री और राकेश रोशन की जोड़ी
है। उत्पल दत्त के अलावा इस फिल्म के कलाकारों के
अभिनय पर ज्यादा दिमाग खर्च करने की आवश्यकता
नहीं पड़ेगी, अगर आप फिल्म देखना चाहें तो। गीत
अलबत्ता फिल्म के सुनने लायक हैं और ऐसा लगता है
एक बार फिर संगीतकार की मेहनत बेकार हुई। फिल्म
हिट होती है तो जनता गाने भी सुन लेती है। राकेश रोशन
की हंसी शायद फिल्म उद्योग की सबसे खिसियानी हंसियों
में से एक है। गीत की शुरुआत में केवल यही एक चीज़
खटकती है। बोल अनजान के हैं वही "खाई के पान बनारस"
गीत को लिखने वाले । एक बिल्ली अलसाई सी म्याऊँ बोले
तो जो आवाज़ आएगी कुछ वैसे ही अंदाज़ में इस गीत के
शब्द "गाये", "आये" वगैरह गाये गए हैं।



गीत के बोल:

बागों में खिले हैं कैसे कैसे फुलवा
बुलबुल क्यूँ नहीं गाये

गाना वो चाहे जो होंठों पे ना आये
बुलबुल कैसे गाये

Saturday, 20 November 2010

शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया-आखिर क्यों १९८५

'क' शब्द से राकेश रोशन का पुराना नाता लगता है ।
इस फिल्म के नाम में भी एक शब्द है जो 'क' से
शुरू होता है। उनके ससुर जे. ओमप्रकाश को 'अ'
अक्षर से विशेष लगाव था। इस फिल्म के निर्देशक
जे. ओमप्रकाश ही हैं। ये एक सफल फिल्म है। इसके
गीत भी फुरसत और तबियत से तैयार किये गए हैं ।
गीत के बोल, धुन और स्मिता का अभिनय सभी कुछ
लाजवाब है। स्मिता पाटिल ने भारतीय नारी की छबि
खूबसूरत ढंग से निखारी थी हिंदी फिल्मों में। "कोई जब
तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे" , "फूल तुम्हे भेजा है ख़त में"
वाले इन्दीवर साहब के बोल हैं इसमें और सुर दिए हैं
स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने।





गीत के बोल :

आ आ आ, आ आ आ, आ आ
हूँ ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं

शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
अबहूँ न आये मोरे श्याम संवरिया
शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
अबहूँ न आये मोरे श्याम संवरिया
शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया

हो ओ ओ ओ
हा आ आ आ

अनछुए होंठ मेरे खोये खोये नैन मेरे
गूंजते हैं पर्णों में मधुर मधुर बोल तेरे
मेरे साथ बैन करे, हो
मेरे साथ बैन करे मोरी अटरिया

शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया

सोलह बरस बीते गिन गिन रतियाँ
पी से मिलन चली संग की सखियाँ
अब तो ले लो पिया, हो
अब तो ले लो पिया आ के खबरिया

शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया

प् नि सा रे नि सा रे नि सा रे नि ध प्
आ आ आ आ आ आ आ आ आ

शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
अबहूँ न आये मोरे श्याम संवरिया
शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
शाम हुई चढ़ आई रे बदरिया
 
 
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