आइये सुनते हैं एक क्लासिक गीत. जो चीज़ें जूनी पुरानी हो जाती
हैं उनको भी क्लासिक कहा जाता है. प्रस्तुत गीत कर्णप्रिय कोरस वाला
गीत है.
अब चूंकि गीत क्लासिक है अतः इसके लिए विवरण की कोई आवश्यकता
नहीं है. फिर भी अगर आप कुछ जाना चाहें इसके बारे में तो पोस्ट के टैग
टटोल लीजियेगा. फिल्म का नाम है ज़लज़ला जो सन १९५२ की फिल्म है.
गीत के बोल:
हई हो हई हई
हई हो हई हई
जीवन नय्या
नय्या बहती जाये
नय्या बहती जाये
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
ग़म के थपेड़े
थपेड़े सहती जाये
थपेड़े सहती जाये
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
आयें मुसाफ़िर जायें मुसाफ़िर
दिल का धोखा खायें ए मुसाफ़िर
राह में लूटे जायें मुसाफ़िर
लेकिन नय्या
नय्या बहती जाये
नय्या बहती जाये
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
जीवन नय्या
नय्या बहती जाये
नय्या बहती जाये
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
दूर किनारा गहरा पानी
तेज़ भँवर लहरें दीवानी
राग हवाओं
राग हवाओं के तूफ़ानी
लेकिन नय्या
नय्या बहती जाये
नय्या बहती जाये
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
डूब गये, डूब गये
मौत के हो गहरी अंधियारे
डूब गये
डूब गये सब चाँद सितारे
डूब गये
अंधे हो गये
अंधे हो गये रस्ते सारे
लेकिन नय्या
नय्या बहती जाये
नय्या बहती जाये
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
मंज़िल मंज़िल बढ़ते जाओ
बढ़ते जाओ बढ़ते जाओ
तूफ़ानों से मत घबराओ
मत घबराओ मत घबराओ
मिल के साथी ज़ोर लगाओ
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
हई हो हई हो
..............................
Jeevan naiya behti jaaye-Zalzala 1952
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Saturday, 6 August 2011
Sunday, 5 June 2011
तस्वीर बनाता हूँ तेरी-दीवाना १९५२
आइये अमर गीतों की श्रंखला में अगला गीत सुनें फिल्म दीवाना(१९५२)
से। अभिनेता सुरेश परदे पर अभिनेत्री सुरैया की तस्वीर बनाते हुए दीवाने
हुए जा रहे हैं। उनकी दीवानगी में सहायक हैं शकील बदायूनीं के बोल और
नौशाद का संगीत। फिल्म में सुरैया के चरित्र का नाम बहुत घरेलू सा है-लाली।
गीत गाया है मोहम्मद रफ़ी ने और ये उनके गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है।
अफोस बस इतना है कि अभिनेता सुरेश ने इस शानदार गीत पर टाइम-पास
किस्म की एक्टिंग की है। सावन और जुल्फों के कनेक्शन पर गौर फरमाएं।
गीत के बोल:
तस्वीर बनाता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
देखा है तुझे मैंने मोहब्बत की नज़र से, अरे
मोहब्बत की नज़र से
तस्वीर बनाता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
जितने भी मिले रंग वो
सब भर दिए तुझ में, हाय
भर दिए तुझ में
एक रंग-ए-वफ़ा और है
लाऊं वो किधर से, अरे
लाऊं वो किधर से
तस्वीर बनाता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
सावन तेरी जुल्फों से घटा
मांग के लाया, हाय
मांग के लाया
बिजली ने चुरायी है तड़प
तेरी नज़र से, अरे
तड़प तेरी नज़र से
मैं दिल में बुला कर तुझे
रुखसत ना करूंगा, हाय
रुखसत ना करूंगा
मुश्किल है तेरा लौट के
जाना मेरे घर से, अरे
जाना मेरे घर से
तस्वीर बनता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
..................................
Tasveer banata hoon teri khoon-e-jigar se-Deewana 1952
से। अभिनेता सुरेश परदे पर अभिनेत्री सुरैया की तस्वीर बनाते हुए दीवाने
हुए जा रहे हैं। उनकी दीवानगी में सहायक हैं शकील बदायूनीं के बोल और
नौशाद का संगीत। फिल्म में सुरैया के चरित्र का नाम बहुत घरेलू सा है-लाली।
गीत गाया है मोहम्मद रफ़ी ने और ये उनके गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है।
अफोस बस इतना है कि अभिनेता सुरेश ने इस शानदार गीत पर टाइम-पास
किस्म की एक्टिंग की है। सावन और जुल्फों के कनेक्शन पर गौर फरमाएं।
गीत के बोल:
तस्वीर बनाता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
देखा है तुझे मैंने मोहब्बत की नज़र से, अरे
मोहब्बत की नज़र से
तस्वीर बनाता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
जितने भी मिले रंग वो
सब भर दिए तुझ में, हाय
भर दिए तुझ में
एक रंग-ए-वफ़ा और है
लाऊं वो किधर से, अरे
लाऊं वो किधर से
तस्वीर बनाता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
सावन तेरी जुल्फों से घटा
मांग के लाया, हाय
मांग के लाया
बिजली ने चुरायी है तड़प
तेरी नज़र से, अरे
तड़प तेरी नज़र से
मैं दिल में बुला कर तुझे
रुखसत ना करूंगा, हाय
रुखसत ना करूंगा
मुश्किल है तेरा लौट के
जाना मेरे घर से, अरे
जाना मेरे घर से
तस्वीर बनता हूँ तेरी खून-ए-जिगर से
खून-ए-जिगर से
..................................
Tasveer banata hoon teri khoon-e-jigar se-Deewana 1952
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Saturday, 14 May 2011
ऐ मेरे दिल कहीं और चल २- दाग १९५२
"प्यासा हूँ मगर लोग समझते हैं पिया सा"- वाह साहब क्या पंक्तियाँ
हैं पिछले गीत की। आप सभी ने ये ज़रूर एक ना एक बार सुना होगा
कि कोई शराबी नाली में पड़ा है और कुत्ता उसका मुंह चाट रहा है।
मैंने २-३ बार देखा भी है। कुछ रोज़ पहले ध्यान से देखने पर
पाया कुत्ता उस व्यक्ति के होंठ भी चाट के साफ़ कर रहा है। अमूमन
ऐसे दृश्य केवल वहीँ देखे जा सकते हैं जहाँ कुत्ते पाले होते
हैं और कुत्तों को घर के सदस्य की तरह रखा जाता है। वैसी
जगहों पर उनकी चाटा-चाटी को भी खुली छूट होती है।
प्रस्तुत गीत एक प्रसिद्ध फिल्म दाग से है। सन १९५२ की दाग।
१९५२ की दाग शैलेन्द्र के गीतों के लिए याद की जाती है
तो सन १९७३ वाली साहिर के गीतों के लिए। प्रस्तुत गीत में
नायक कुत्ते को निमंत्रण देता सा प्रतीत होता है-आ जा मेरे
पीछे पीछे, मैं आगे चल के गिरने वाला हूँ उसके बाद तेरी जो
मर्ज़ी हो करना। इस फिल्म के लिए नायक को फ़िल्म फेयर
पुरस्कार मिला था। नायक को तो आप पहचान ही गए होंगे।
गीत गाया है तलत महमूद ने और इसकी धुन तैयार की है
शंकर जयकिशन ने।
गीत के बोल:
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चल जहां गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
चल जहां गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
इन बहारों से क्या फ़ायदा
जिस में दिल की कली जल गई
ज़ख्म फिर से हरा हो गया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
लुट रहा था किसी का जहाँ
देखती रह गई ये ज़मीन
चुप रहा बेरहम आसमान
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
........................................
Ae mere dil kahin aur chaal(Talat)-Daag 1952
हैं पिछले गीत की। आप सभी ने ये ज़रूर एक ना एक बार सुना होगा
कि कोई शराबी नाली में पड़ा है और कुत्ता उसका मुंह चाट रहा है।
मैंने २-३ बार देखा भी है। कुछ रोज़ पहले ध्यान से देखने पर
पाया कुत्ता उस व्यक्ति के होंठ भी चाट के साफ़ कर रहा है। अमूमन
ऐसे दृश्य केवल वहीँ देखे जा सकते हैं जहाँ कुत्ते पाले होते
हैं और कुत्तों को घर के सदस्य की तरह रखा जाता है। वैसी
जगहों पर उनकी चाटा-चाटी को भी खुली छूट होती है।
प्रस्तुत गीत एक प्रसिद्ध फिल्म दाग से है। सन १९५२ की दाग।
१९५२ की दाग शैलेन्द्र के गीतों के लिए याद की जाती है
तो सन १९७३ वाली साहिर के गीतों के लिए। प्रस्तुत गीत में
नायक कुत्ते को निमंत्रण देता सा प्रतीत होता है-आ जा मेरे
पीछे पीछे, मैं आगे चल के गिरने वाला हूँ उसके बाद तेरी जो
मर्ज़ी हो करना। इस फिल्म के लिए नायक को फ़िल्म फेयर
पुरस्कार मिला था। नायक को तो आप पहचान ही गए होंगे।
गीत गाया है तलत महमूद ने और इसकी धुन तैयार की है
शंकर जयकिशन ने।
गीत के बोल:
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चल जहां गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
चल जहां गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
इन बहारों से क्या फ़ायदा
जिस में दिल की कली जल गई
ज़ख्म फिर से हरा हो गया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
लुट रहा था किसी का जहाँ
देखती रह गई ये ज़मीन
चुप रहा बेरहम आसमान
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
........................................
Ae mere dil kahin aur chaal(Talat)-Daag 1952
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Sunday, 3 April 2011
ऐ मेरे दिल कहीं और चल -दाग १९५२
जैसे आप सब लोग भूल चुके होंगे कि हमारी क्रिकेट की सन १९८३
की विश्व विजेता टीम का एक सदस्य था-बलविंदर संधू जिसने
गोर्डन ग्रीनिज नामक महान सलामी बल्लेबाज़ का विकेट लिया था
लोर्ड्स के मैदान पर वर्ल्ड कप फ़ाइनल में। उसी तरह से शायद आप
भूल चुके होंगे कि दाग फिल्म का गीत-'ऐ मेरे दिल कहीं और चल'
लता मंगेशकर ने भी गाया है। तलत महमूद वाला गीत ज्यादा
लोकप्रिय हुआ इसलिए इसे ज्यादा नहीं सुना गया। अब देखिये
गौतम गंभीर ने मेहनत की लेकिन शतक से चूक जाने की वजह
से उनका नाम याद तो किया जायेगा मगर उतना नहीं जितना धोनी
का। इसका मतलब ये नहीं कि गंभीर का योगदान कमतर था।
गंभीर ने तो पारी की नीव रखी जिसपर विजय की इबारत धोनी ने
लिखी।
इस गीत की एक पंक्ति मुझे कल उस समय याद आई जब घुंघराले बाल
वाले गेंदबाज़ मलिंगा ने भारत के शीर्ष बल्लेबाजों को पेवेलियन की
राह दिखाई । वो पंक्ति इस प्रकार से है-"ज़ख्म फिर से हरा हो गया"
हमारे क्रिकेट मैच भी बिन नाटकीयता के ख़त्म नहीं होते। इसके पहले
हुए २०-२० वर्ल्ड कप को ही लीजिये। आखिरी गेंद तक किसी को ये मालूम
नहीं था कि हम जीतेंगे। खैर अंत सुखांत सो सब सुखांत ।
प्रस्तुत गीत में केवल लता की आवाज़ है मँडोलिन के साथ। बाकी किसी
साज़ की आवश्यकता नहीं थी इस गीत में। न्यूनतम साजों के साथ भी
शंकर जयकिशन ने मधुर गीत बनाये हैं और आप इस गीत को लता
द्वारा गाये सर्वश्रेष्ठ दर्द भरे गीतों में शामिल कर सकते हैं । लेखनी शैलेन्द्र
की है
गीत के बोल:
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चल जहाँ गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
चल जहाँ गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
उन बहारों से क्या फ़ायदा
जिसे दिल की कली जल गई
ज़ख्म फिर से हरा हो गया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
लुट रहा था किसी का जहाँ
देखती रह गई ये ज़मीन
चुप रहा बेरहम आस्मां
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
की विश्व विजेता टीम का एक सदस्य था-बलविंदर संधू जिसने
गोर्डन ग्रीनिज नामक महान सलामी बल्लेबाज़ का विकेट लिया था
लोर्ड्स के मैदान पर वर्ल्ड कप फ़ाइनल में। उसी तरह से शायद आप
भूल चुके होंगे कि दाग फिल्म का गीत-'ऐ मेरे दिल कहीं और चल'
लता मंगेशकर ने भी गाया है। तलत महमूद वाला गीत ज्यादा
लोकप्रिय हुआ इसलिए इसे ज्यादा नहीं सुना गया। अब देखिये
गौतम गंभीर ने मेहनत की लेकिन शतक से चूक जाने की वजह
से उनका नाम याद तो किया जायेगा मगर उतना नहीं जितना धोनी
का। इसका मतलब ये नहीं कि गंभीर का योगदान कमतर था।
गंभीर ने तो पारी की नीव रखी जिसपर विजय की इबारत धोनी ने
लिखी।
इस गीत की एक पंक्ति मुझे कल उस समय याद आई जब घुंघराले बाल
वाले गेंदबाज़ मलिंगा ने भारत के शीर्ष बल्लेबाजों को पेवेलियन की
राह दिखाई । वो पंक्ति इस प्रकार से है-"ज़ख्म फिर से हरा हो गया"
हमारे क्रिकेट मैच भी बिन नाटकीयता के ख़त्म नहीं होते। इसके पहले
हुए २०-२० वर्ल्ड कप को ही लीजिये। आखिरी गेंद तक किसी को ये मालूम
नहीं था कि हम जीतेंगे। खैर अंत सुखांत सो सब सुखांत ।
प्रस्तुत गीत में केवल लता की आवाज़ है मँडोलिन के साथ। बाकी किसी
साज़ की आवश्यकता नहीं थी इस गीत में। न्यूनतम साजों के साथ भी
शंकर जयकिशन ने मधुर गीत बनाये हैं और आप इस गीत को लता
द्वारा गाये सर्वश्रेष्ठ दर्द भरे गीतों में शामिल कर सकते हैं । लेखनी शैलेन्द्र
की है
गीत के बोल:
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चल जहाँ गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
चल जहाँ गम के मारे ना हों
झूठी आशा के तारे ना हों
उन बहारों से क्या फ़ायदा
जिसे दिल की कली जल गई
ज़ख्म फिर से हरा हो गया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
चार आंसू कोई रो दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
फेर के मुंह कोई चल दिया
लुट रहा था किसी का जहाँ
देखती रह गई ये ज़मीन
चुप रहा बेरहम आस्मां
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया
ऐ मेरे दिल कहीं और चल
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Shailendra,
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Wednesday, 8 December 2010
वो पास नहीं मजबूर है दिल-नौबहार १९५२
एक संगीतप्रेमी ने पूछा था-आप कैसे गीत सुनते हैं।
अमूमन इस सवाल का जवाब मैं कुछ लोकप्रिय गीत
गिनवा कर दे देता हूँ। कुछ हद तक ठीक भी है क्युंकि
मैं हर तरह का संगीत सुनना पसंद करता हूँ। अब वो
चाहे १५० लोगों के ओर्केस्ट्रा से भरा हुआ कोई संगीत
का टुकड़ा हो या डालडे के तीन के डब्बे से बने इकतारे
के साथ कोई प्रलाप। सब सुन लेता हूँ। इन सबके बीच
पोप, कॉर्न, रॉक, सॉइल, मेटल, प्लांट, एनिमल सब तरह
का संगीत आ जाता है।
वास्तविकता में कैसे गीत ज्यादा सुनता हूँ-उसका एक
नमूना पेश है आपके लिए-फिल्म नौबहार(१९५२) का
ये गीत जो नलिनी जयवंत पर फिल्माया गया है और
लता मंगेशकर ने गाया है। कवि शैलेन्द्र के लिखे बोलों
को सुरों में ढाला है रोशन ने। गीत का ऑडियो उपलब्ध
है सुनने के लिए और विडियो आप देखना चाहें तो
इस लिंक को क्लिक कर लीजिये। विडियो
मुझे ज़्यादातर दर्द भरे और सॉफ्ट गीत पसंद हैं। दर्द भरे
और रोतले गीतों में फर्क है। कुछ तो गीत ही रोते हुए से
प्रतीत होते हैं। इस पर ज्यादा चर्चा नहीं वरना सन
१९००-१९३५ के दौर के गीत सुनने वाले मेरे पीछे लग
जायेंगे।
नलिनी जयवंत के पास भी जादुई ऑंखें थीं। अक्सर
देखा गया है कि जिन नायक नायिकाओं की ऑंखें
भावाभिव्यक्ति में समर्थवान होती हैं वही ज्यादा
लोकप्रिय और सफल होते हैं, कुछ अपवाद हमेशा
मिलेंगे आपको, जैसे अजय देवगन आँखों से बढ़िया
अभिनय कर लेते हैं मगर नंबर एक की कुर्सी पर
कोई और बैठा है।
गीत के बोल:
भटके हुए मुसाफिर मंजिल को ढूंढते हैं
दिल खो गया हमारा हम दिल को ढूंढते हैं
वो पास नहीं मजबूर है दिल हम आस लगाये बैठे हैं
उम्मीद भरे अरमानों का तूफ़ान छुपाये बैठे हैं
जाओ के वही बेदर्द हो तुम
जाओ के वही बेदर्द हो तुम
वादों का जिन्हें कुछ भास् नहीं
हम हैं के तुम्हारे वादों पर
दुनिया को भुलाये बैठे हैं
बरबाद है दिल उजड़ा है चमन,
बेरंग हुई फूलों की खबन
बरबाद है दिल उजड़ा है चमन,
बेरंग हुई फूलों की खबन
बेकार उलझते काटों से
दामन को बचाये बैठे हैं
वो पास नहीं मजबूर है दिल
हम आस लगाये बैठे हैं
..............................
Wo paas nahin majboor hai dil-Naubahaar 1952
अमूमन इस सवाल का जवाब मैं कुछ लोकप्रिय गीत
गिनवा कर दे देता हूँ। कुछ हद तक ठीक भी है क्युंकि
मैं हर तरह का संगीत सुनना पसंद करता हूँ। अब वो
चाहे १५० लोगों के ओर्केस्ट्रा से भरा हुआ कोई संगीत
का टुकड़ा हो या डालडे के तीन के डब्बे से बने इकतारे
के साथ कोई प्रलाप। सब सुन लेता हूँ। इन सबके बीच
पोप, कॉर्न, रॉक, सॉइल, मेटल, प्लांट, एनिमल सब तरह
का संगीत आ जाता है।
वास्तविकता में कैसे गीत ज्यादा सुनता हूँ-उसका एक
नमूना पेश है आपके लिए-फिल्म नौबहार(१९५२) का
ये गीत जो नलिनी जयवंत पर फिल्माया गया है और
लता मंगेशकर ने गाया है। कवि शैलेन्द्र के लिखे बोलों
को सुरों में ढाला है रोशन ने। गीत का ऑडियो उपलब्ध
है सुनने के लिए और विडियो आप देखना चाहें तो
इस लिंक को क्लिक कर लीजिये। विडियो
मुझे ज़्यादातर दर्द भरे और सॉफ्ट गीत पसंद हैं। दर्द भरे
और रोतले गीतों में फर्क है। कुछ तो गीत ही रोते हुए से
प्रतीत होते हैं। इस पर ज्यादा चर्चा नहीं वरना सन
१९००-१९३५ के दौर के गीत सुनने वाले मेरे पीछे लग
जायेंगे।
नलिनी जयवंत के पास भी जादुई ऑंखें थीं। अक्सर
देखा गया है कि जिन नायक नायिकाओं की ऑंखें
भावाभिव्यक्ति में समर्थवान होती हैं वही ज्यादा
लोकप्रिय और सफल होते हैं, कुछ अपवाद हमेशा
मिलेंगे आपको, जैसे अजय देवगन आँखों से बढ़िया
अभिनय कर लेते हैं मगर नंबर एक की कुर्सी पर
कोई और बैठा है।
गीत के बोल:
भटके हुए मुसाफिर मंजिल को ढूंढते हैं
दिल खो गया हमारा हम दिल को ढूंढते हैं
वो पास नहीं मजबूर है दिल हम आस लगाये बैठे हैं
उम्मीद भरे अरमानों का तूफ़ान छुपाये बैठे हैं
जाओ के वही बेदर्द हो तुम
जाओ के वही बेदर्द हो तुम
वादों का जिन्हें कुछ भास् नहीं
हम हैं के तुम्हारे वादों पर
दुनिया को भुलाये बैठे हैं
बरबाद है दिल उजड़ा है चमन,
बेरंग हुई फूलों की खबन
बरबाद है दिल उजड़ा है चमन,
बेरंग हुई फूलों की खबन
बेकार उलझते काटों से
दामन को बचाये बैठे हैं
वो पास नहीं मजबूर है दिल
हम आस लगाये बैठे हैं
..............................
Wo paas nahin majboor hai dil-Naubahaar 1952
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Sunday, 28 November 2010
एक झूठी सी तसल्ली-शीशम १९५२
जब माहौल छाया गीत वाला बन ही गया है तो आइये सुनें
फिल्म शीशम से मुकेश का गाया एक बढ़िया गीत। गीत
लिखा है ज़िया सरहदी ने और इसकी धुन बनाई है रोशन ने।
फिल्म में नासिर खान और नूतन प्रमुख कलाकार हैं। बहुत
सरल सा गीत है और एक ही धारा में चलता जाता है।
गीत के बोल:
एक झूठी सी तसल्ली वो मुझे दे के चले
मेरा दिल ले के चले
एक झूठी सी तसल्ली वो मुझे दे के चले
मेरा दिल ले के चले
तेरे वादों के सहारे पे जिए जायेंगे हम
सहते जायेंगे सितम
तेरे वादों के सहारे पे जिए जायेंगे हम
सहते जायेंगे सितम
सहते जायेंगे सितम
राज़ ये तेरे सिवा और कोई जान ना ले
मेरा दिल ले के चले
एक झूठी सी तसल्ली
अपने बीमार को वो देखने आये थे मगर
थी ना कुछ दिल कि खाबर
अपने बीमार को वो देखने आये थे मगर
थी ना कुछ दिल कि खाबर
थी ना कुछ दिल कि खाबर
बुझा जायेंगे दिया उनसे जलाये ना जले
मेरा दिल ले के चले
एक झूठी सी तसल्ली वो मुझे दे के चले
मेरा दिल ले के चले
फिल्म शीशम से मुकेश का गाया एक बढ़िया गीत। गीत
लिखा है ज़िया सरहदी ने और इसकी धुन बनाई है रोशन ने।
फिल्म में नासिर खान और नूतन प्रमुख कलाकार हैं। बहुत
सरल सा गीत है और एक ही धारा में चलता जाता है।
गीत के बोल:
एक झूठी सी तसल्ली वो मुझे दे के चले
मेरा दिल ले के चले
एक झूठी सी तसल्ली वो मुझे दे के चले
मेरा दिल ले के चले
तेरे वादों के सहारे पे जिए जायेंगे हम
सहते जायेंगे सितम
तेरे वादों के सहारे पे जिए जायेंगे हम
सहते जायेंगे सितम
सहते जायेंगे सितम
राज़ ये तेरे सिवा और कोई जान ना ले
मेरा दिल ले के चले
एक झूठी सी तसल्ली
अपने बीमार को वो देखने आये थे मगर
थी ना कुछ दिल कि खाबर
अपने बीमार को वो देखने आये थे मगर
थी ना कुछ दिल कि खाबर
थी ना कुछ दिल कि खाबर
बुझा जायेंगे दिया उनसे जलाये ना जले
मेरा दिल ले के चले
एक झूठी सी तसल्ली वो मुझे दे के चले
मेरा दिल ले के चले
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