गीतों को सुनते सुनते कुछ अंतराल के बाद उसकी बारीकियां पकड़ में
आने लगती हैं और गुनगुनाने वाले का मुगालता ख़त्म हो जाता है कि वह
इसे बढ़िया ढंग से गा रहा है। ये बात दीगर है कि कुछ ओर्केस्ट्रा के कलाकारों
को ये मुगालता ता-उम्र बना रहता है। आज आपको एक गीत ऐसा सुनवाते हैं
जिसे मैंने जितनी बार इधर उधार सुना बिगड़ा हुआ ही सुना। इसकी हू-ब-हू
कॉपी करना असंभव है। गीत कठिनतम गीतों में से एक है और गायक का
अनूठा अंदाज़ इसमें अपने चरम पर है।
फिल्म का नाम है झुमरू और ये फिल्म का शीर्षक गीत है। गीत लिखा है
मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन स्वयं किशोर कुमार ने बनाई है ।
गीत के बोलों में जो योड्लिंग के साथ साथ कुछ अन्य शब्दों का समावेश भी
है जिसे आप स्वयं समझिये।
गीत के बोल:
मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू
फक्कड़ घुँघरू बन के घूमूं
मैं ये प्यार का गीत सुनाता चला
मंजिल पे मेरी नज़र
मैं दुनिया से बेखबर
बीती बातों पे धूल उड़ाता चला
मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू
फक्कड़ घुँघरू बन के घूमूं
मैं ये प्यार का गीत सुनाता चला
मंजिल पे मेरी नज़र
मैं दुनिया से बेखबर
बीती बातों पे धूल उड़ाता चला
मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू
फक्कड़ घुँघरू बन के घूमूं
साथ में हमसफ़र ना कोई कारवां,
भोला भाला सीधा साधा
लेकिन दिल का हूँ शहज़ादा
है ये मेरी ज़मीन ये मेरा आसमान
मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू
फक्कड़ घुँघरू बन के घूमूं
प्यार सीने मैं है हर किसी के लिए
मुजको प्यारा हर इंसान
दिलवालों पे हूँ कुर्बान
ज़िन्दगी है मेरी ज़िन्दगी के लिए
मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरू
फक्कड़ घुँघरू बन के घूमूं
मैं ये प्यार का गीत सुनाता चला
मंजिल पे मेरी नज़र
मैं दुनिया से बेखबर
बीती बातों पे धूल उड़ाता चला
....................................
Main hoon jhum jhum jhum jhum jhumroo-jhumroo 1961
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Friday, 27 January 2012
Sunday, 21 November 2010
अँधेरी रातों में-शहंशाह १९८८
सन ८८ में भी कुछ सुनने लायक गीत आये उन गीतों में से एक
आपको सुनवा चुके हैं। एक फिल्म बनाई थी टीनू आनंद ने-
शहंशाह जिसमे शीर्षक भूमिका अमिताभ बच्चन ने निभाई थी ।
१९८८ में ये फिल्म आई और इसमें किशोर कुमार का गाया एक
गीत है जो शीर्षक गीत भी है फिल्म का-अँधेरी रातों में। आनंद
बक्षी के लिखे गीत को स्वरबद्ध किया है नयी संगीतकार जोड़ी
अमर-उत्पल ने। ये गीत मैंने बहुत सुना है, आज आप भी एक
बार सुन लीजिये। टीनू आनंद निर्देशित फिल्म 'कालिया' में भी
अमिताभ बच्चन नायक की भूमिका में थे।
गीत के बोल:
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
हर ज़ुल्म मिटने को
एक मसीहा निकलता है
जिसे लोग शहंशाह कहते हैं
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
हर ज़ुल्म मिटाने को
एक मसीहा निकलता है
जिसे लोग शहंशाह कहते हैं
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
शहर की गलियों में वो फिरता है
शहर की गलियों में वो फिरता है
दोस्तों से दोस्त बनकर मिलता है
दुश्मनों के सर पे ऐसे गिरता है
जैसे बिजली गिरे बरसातों में
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
हर ज़ुल्म मिटाने को
एक मसीहा निकलता है
जिसे लोग शहंशाह कहते हैं
आपको सुनवा चुके हैं। एक फिल्म बनाई थी टीनू आनंद ने-
शहंशाह जिसमे शीर्षक भूमिका अमिताभ बच्चन ने निभाई थी ।
१९८८ में ये फिल्म आई और इसमें किशोर कुमार का गाया एक
गीत है जो शीर्षक गीत भी है फिल्म का-अँधेरी रातों में। आनंद
बक्षी के लिखे गीत को स्वरबद्ध किया है नयी संगीतकार जोड़ी
अमर-उत्पल ने। ये गीत मैंने बहुत सुना है, आज आप भी एक
बार सुन लीजिये। टीनू आनंद निर्देशित फिल्म 'कालिया' में भी
अमिताभ बच्चन नायक की भूमिका में थे।
गीत के बोल:
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
हर ज़ुल्म मिटने को
एक मसीहा निकलता है
जिसे लोग शहंशाह कहते हैं
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
हर ज़ुल्म मिटाने को
एक मसीहा निकलता है
जिसे लोग शहंशाह कहते हैं
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
शहर की गलियों में वो फिरता है
शहर की गलियों में वो फिरता है
दोस्तों से दोस्त बनकर मिलता है
दुश्मनों के सर पे ऐसे गिरता है
जैसे बिजली गिरे बरसातों में
अँधेरी रातों में सुनसान राहों पर
हर ज़ुल्म मिटाने को
एक मसीहा निकलता है
जिसे लोग शहंशाह कहते हैं
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