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Saturday, 18 December 2010

साला मैं तो साहब बन गया-सगीना १९७४

बिना विवरण वाला एक गीत प्रस्तुत है। आशा है आपको
पसंद आएगा। स्वच्छता जीवन का एक आवश्यक तत्त्व है
और इसी को ब्लॉग पर भी अमल में लाने की कोशिश जारी है।
टिप्पणी वाले स्थान में तो वैसे भी बहुत सफाई रहती है, थोड़ी
पोस्ट वाले स्थान में भी दर्शायी जाए। वो तो देखिये कमबख्त
हाथ की उँगलियाँ हरकत करती रहती है और देखते ही देखते
७ लाइन टाइप हो गयीं।



गीत के बोल:

साला मैं तो साहब बन गया
अरे, साला मैं तो साहब बन गया
रे, साहब बनके कैसा तन गया
ये सूट मेरा देखो, ये बूट मेरा देखो
जैसे गोरा कोई लन्दन का

वाह फकीरे! वाह फकीरे
वाह फकीरे, सूट पहनकर कैसा कूड़े फंडे
कौवा जैसे पंख मयूर का अपनी दम में बांधे
अपना दम में बांधे
अरे क्या जानो हम इस भेजा में क्या-क्या नक्षा खींचा
लीडर लोग की ऊंची बातें, क्या समझे तुम नीचा?
क्या समझे तुम नीचा?
मेरा वो सब जाहिलपन गया
साला मैं तो साहब बन गया

साला मैं तो साहब बन गया
रे, साहब बनके कैसा तन गया
ये सूट मेरा देखो, ये बूट मेरा देखो
जैसे गोरा कोई लन्दन का

सूरत है बन्दर की फिर भी लगती है अलबेली
कैसा राजा भोज बना है मेरा गंगू तेली
तेरा गंगू तेली
तुम लंगोटी-वाला ना बदला मैं ना बदलेगा
तुम सब साला लोग का किस्मत, हम साला बदलेगा
हम साला बदलेगा
सीना देखो कैसा तन गया!

साला मैं तो साहब बन गया
अरे, साला मैं तो साहब बन गया
रे, साहब बनके कैसा तन गया
ये सूट मेरा देखो, ये बूट मेरा देखो
जैसे गोरा कोई लन्दन का
.............................
Saala main to sahab ban gaya-Sagina 1974

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